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भारत ने संजोई भगवान बुद्ध की पवित्र विरासत

श्रीलंका में 4 फरवरी से पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी

कोलंबो के प्रतिष्ठित गंगारामया मंदिर में सार्वजनिक दर्शन

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Tuesday 3 February 2026 03:28:25 PM

exhibition of the sacred devnimori relics of lord buddha in sri lanka

कोलंबो/ नई दिल्ली। भारत भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी से श्रीलंका में आध्यात्मिक पहुंच और सांस्कृतिक कूटनीति की एक महत्वपूर्ण पहल कर रहा है। गौरतलब हैकि अप्रैल 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने श्रीलंका यात्रा के दौरान इसकी घोषणा की थी। वडोदरा के महाराजा सयाजीराव विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठापित भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेष 4 से 10 फरवरी 2026 तक सार्वजनिक दर्शन केलिए कोलंबो ले जाए जाएंगे और 11 फरवरी 2026 को उनकी भारत वापसी होगी। यह पवित्र यात्रा बौद्ध धर्म की जन्मस्थली के रूपमें भारत के स्थायी सभ्यतागत उत्तरदायित्व को रेखांकित करती और भारत श्रीलंका केबीच गहरे आध्यात्मिक, सांस्कृतिक जन संबंधों की पुष्टि करती है। भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों केसाथ गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत और गुजरात के उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय भारतीय प्रतिनिधिमंडल जाएगा, जिसमें वरिष्ठ भिक्षु और अधिकारी भी शामिल होंगे।
भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेष, निर्धारित प्रोटोकॉल और अवशेषों को दी जानेवाली पवित्रता के अनुरूप भारतीय वायुसेना के विशेष विमान से पूर्ण राजकीय सम्मान केसाथ यह यात्रा करेंगे, जो उस श्रद्धा को दर्शाता है, जिसके साथ भारत भगवान बुद्ध की पवित्र विरासत को संजोए हुए है। भारत का प्रतिनिधिमंडल कोलंबो में औपचारिक, धार्मिक और आधिकारिक कार्यक्रमों में भाग लेगा, इनमें प्रदर्शनी का औपचारिक उद्घाटन और भारत की बौद्ध विरासत एवं समकालीन सांस्कृतिक जुड़ाव को उजागर करने वाली संबंधित प्रदर्शनियां शामिल होंगी। पवित्र अवशेषों को कोलंबो के प्रतिष्ठित गंगारामया मंदिर में सार्वजनिक दर्शन केलिए स्थापित किया जाएगा, जो देश के सबसे प्रतिष्ठित और आध्यात्मिक रूपसे महत्वपूर्ण बौद्ध संस्थानों में से एक है। उन्नीसवीं सदी के अंतमें श्रद्धेय हिक्कादुवे सुमंगला नायक थेरा का यह मंदिर पूजा, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान प्रदान के एक प्रमुख केंद्र के रूपमें विकसित हुआ है, जो इस प्रदर्शनी केलिए एक उपयुक्त और गरिमामय वातावरण प्रदान करता है।
श्रीलंका एक ऐसा राष्ट्र है, जहां बौद्ध धर्म के सांस्कृतिक लोकाचार इतिहास और दैनिक जीवन को आकार देते हैं, वहां इस प्रदर्शनी से श्रद्धालुओं केबीच गहराई से गूंजने और भारत श्रीलंका की साझा बौद्ध विरासत को और अधिक सुदृढ़ करने की उम्मीद है। ज्ञातव्य हैकि भगवान बुद्ध के पवित्र देवनिमोरि अवशेष गुजरात के अरावली जिले में शामलाजी के निकट देवनिमोरि पुरातात्विक स्थल से प्राप्त हुए हैं, जो अत्यधिक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व का स्थान है। पहलीबार 1957 में प्रख्यात पुरातत्वविद् प्रोफेसर एसएन चौधरी ने इस स्थल की खोज की थी। उत्खनन के दौरान यहां महत्वपूर्ण बौद्ध संरचनाएं और अवशेष मिले थे, जो साझा युग की शुरुआती शताब्दियों में पश्चिमी भारत में बौद्ध धर्म के फलने फूलने के जीवंत प्रमाण हैं। ये अवशेष न केवल एक अमूल्य पुरातात्विक खजाना हैं, बल्कि भगवान बुद्ध की शाश्वत शिक्षा-शांति, करुणा और सद्भाव के जीवंत प्रतीक भी हैं।
देवनिमोरि स्तूप के भीतर आधार से 24 फीट की ऊंचाई पर मिली यह अवशेष मंजूषा हरे रंग के शिस्ट पत्थर से बनी है। इसपर ब्राह्मी लिपि और संस्कृत भाषा में शिलालेख अंकित है, जिसपर लिखा है-‘दशबल शरीर निलय’ अर्थात भगवान बुद्ध के शारीरिक अवशेषों का निवास स्थान। इस मंजूषा के भीतर एक तांबे का बक्सा है, इसमें पवित्र भस्म (राख) केसाथ जैविक पदार्थ, रेशमी कपड़ा और मनके रखे हुए हैं। यह मंजूषा तीन भागों से बनी है-मुख्य भाग आधार 6.8 इंच, ऊंचाई 2.9 इंच, और लेज का व्यास 4 इंच, ढक्कन व्यास 6.7 इंच, मोटाई 1.05 इंच, और ऊंचाई 0.7 इंच। नाब-गोलाकार शीर्ष केसाथ, जिसकी ऊंचाई 0.66 इंच और व्यास 1.1 इंच है। तांबे के उस बक्से का ऊपरी हिस्सा और आधार समतल था, जिसके किनारे पर एक स्लिप ऑन ढक्कन लगा हुआ था। बक्से के भीतर रेशमी कपड़ा, चांदी तांबे की सोने की परत वाली एक बोतल, पवित्र भस्म युक्त जैविक सामग्री और आवरण के रूपमें उपयोग की गई काली मिट्टी मिली थी। सुराही के आकार की वह छोटी सोने की परत वाली बोतल सैगर बेस, बेलनाकार शरीर और स्क्रूटाइप ढक्कन वाली संकरी गर्दन से युक्त थी। पवित्र अवशेषों को अब एक डेसिकेटर में रखा गया है। इसे एयरटाइट कांच के भीतर सील किया गया है, ताकि अंदर रखी वस्तुओं को और अधिक खराब होने से बचाया जा सके।
भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को सोने की परत वाली चांदी तांबे की बोतल और रेशमी कपड़े केसाथ काटन बेस पर रखा गया है, ताकि उनका बेहतर संरक्षण सुनिश्चित हो सके। अपने आध्यात्मिक महत्व से परे श्रीलंका में पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की यह प्रदर्शनी भारत की सांस्कृतिक कूटनीति और उसकी जनकेंद्रित विदेश नीति को सुदृढ़ करके एक महत्वपूर्ण राजनयिक उद्देश्य को पूरा करती है। श्रीलंका केसाथ बौद्ध विरासत को साझा करके भारत साझा विश्वास, इतिहास और मूल्यों पर टिके द्विपक्षीय संबंधों की सभ्यतागत नींव को रेखांकित करता है। यह प्रदर्शनी 'सॉफ्ट पावर' के एक शक्तिशाली माध्यम के रूपमें कार्य करती है, जो आपसी विश्वास को बढ़ाने, जन-जन केबीच गहरे संबंधों को बढ़ावा देने और औपचारिक राजनयिक प्रयासों को एक गहन सांस्कृतिक एवं भावनात्मक गरिमा प्रदान करने में सहायक है। प्रदर्शनी वैश्विक बौद्ध विरासत के एक जिम्मेदार संरक्षक के रूपमें भारत की भूमिका की पुष्टि करती है और हिंद महासागर के पड़ोसी देशों में क्षेत्रीय सद्भाव को मजबूत करती है। यह दक्षिण एशिया में शांति, स्थिरता और सहकारी सहअस्तित्व के भारत के दृष्टिकोण में श्रीलंका के महत्वपूर्ण भागीदार होने के स्थान को भी मजबूत करती है।
श्रीलंका में पवित्र देवनिमोरि अवशेषों की प्रदर्शनी दुनिया केसाथ अपनी बौद्ध विरासत साझा करने की भारत की पुरानी परंपरा को बढ़ावा देती है। हाल के वर्ष में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों को थाईलैंड, मंगोलिया, वियतनाम, रूसी संघ और भूटान जैसे देशों में सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया जा चुका है, जहां लाखों बौद्ध अनुयायियों को उनका दर्शनकर आर्शीवाद प्राप्त करने का अवसर मिला और इन प्रयासों ने जन-जन केबीच संबंधों को मजबूत किया है। श्रीलंका में यह प्रदर्शनी पवित्र पिपरहवा रत्न अवशेषों की हालिया और बहुचर्चित स्वदेश वापसी केबाद आयोजित हो रही है, जिसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अमूल्य राष्ट्रीय धरोहर की ‘घर वापसी’ के रूपमें सराहा था। प्रदर्शनी के जरिए भारत एकबार फिर बुद्ध धम्म के सार्वभौमिक संदेश-अहिंसा, करुणा और सह अस्तित्व को प्रसारित कर रहा है, साथही सांस्कृतिक कूटनीति एवं वैश्विक सद्भाव केप्रति अपनी प्रतिबद्धता की पुष्टि कर रहा है। श्रीलंका केलिए देवनिमोरि अवशेषों की यह यात्रा शांति के शक्तिशाली प्रतीक, साझा आध्यात्मिक विरासत के उत्सव और भारत श्रीलंका केबीच उस विशेष व स्थायी मित्रता के प्रमाण के रूपमें खड़ी है, जो सदियों पुराने सभ्यतागत संबंधों और आपसी सम्मान में निहित है।

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