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प्रभास पाटन में सोमनाथ का इतिहास संरक्षित

तांबे की प्लेटों, शिलालेखों और स्मारक पत्थरों पर समृद्ध अतीत दर्ज

सोमनाथ की समृद्धि, विरासत और वीरता की स्थायी भावना की झलक

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Sunday 11 January 2026 03:57:58 PM

history of somnath is preserved in the prabhas patan region

प्रभास पाटन (गुजरात)। प्रभास पाटन और सोमनाथ मंदिर के इतिहास को बताने वाले शिलालेख और असली अवशेष पूरे प्रभास क्षेत्र में मिलते हैं। प्रभास पाटन तांबे की प्लेटों, शिलालेखों और स्मारक पत्थरों केसाथ एक समृद्ध और पवित्र अतीत को संजोए हुए है, जिनमें इसकी समृद्धि, विरासत और वीरता की स्थायी भावना की झलक मिलती है। शिलालेख, तांबे की प्लेटें और हमलों के दौरान नष्ट हुए मंदिर के अवशेष वीरता, शक्ति और भक्ति के प्रतीक के रूपमें प्रभास पाटन म्यूज़ियम में रखे गए हैं। यह म्यूज़ियम अभी प्रभास पाटन के पुराने सूर्य मंदिर में चल रहा है। ऐसा ही एक शिलालेख प्रभास पाटन में म्यूज़ियम केपास भद्रकाली गली में पुराने राम मंदिर के बगल में है। सोमपुरा ब्राह्मण दीपकभाई दवे के घर पर संरक्षित यह उनके आंगन में प्राचीन भद्रकाली मंदिर की दीवार में लगा हुआ है।
प्रभास पाटन म्यूज़ियम के क्यूरेटर तेजल परमार ने जानकारी देते हुए बतायाकि यह शिलालेख, जो 1169 ईस्वी यानी वल्लभी संवत 850 और विक्रम संवत 1255 में बनाया गया था और अभी राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित है, अन्हिलवाड़ पाटन के महाराजाधिराज कुमारपाल के आध्यात्मिक गुरु परम पशुपत आचार्य श्रीमान भावबृहस्पति की प्रशंसा में लिखा गया शिलालेख है। यह शिलालेख सोमनाथ मंदिर के प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को दर्ज करता है, इसमें चारों युगों में सोमनाथ महादेव के निर्माण का उल्लेख है। इसके अनुसार सत्य युग में चंद्र (सोम) ने इसे सोने का बनवाया था, त्रेता युग में रावण ने इसे चांदी का बनवाया था, द्वापर युग में श्रीकृष्ण ने इसे लकड़ी का बनवाया था और कलयुग में राजा भीमदेव सोलंकी ने एक सुंदर कलात्मक पत्थर का मंदिर बनवाया था।
इतिहास भी पुष्टि करता हैकि भीमदेव सोलंकी ने पूर्व के अवशेषों पर चौथा मंदिर बनवाया था, जिसके बाद 1169 ईस्वी में कुमारपाल ने उसी जगह पर पांचवां मंदिर बनवाया। सोलंकी शासन के तहत प्रभास पाटन धर्म, वास्तुकला और साहित्य का एक प्रमुख केंद्र बन गया, जबकि सिद्धराज जयसिंह के न्याय और कुमारपाल की भक्ति ने सोमनाथ को गुजरात के स्वर्ण युग के गौरवशाली प्रतीक के रूपमें स्थापित किया। प्रभास पाटन की पवित्र भूमि में न केवल खंडहर हैं, बल्कि सनातन धर्म का आध्यात्मिक गौरव भी है। ऐतिहासिक भद्रकाली शिलालेख सोलंकी शासकों और भवबृहस्पति जैसे विद्वानों की भक्ति को दर्शाता है। कला, वास्तुकला और साहित्य की अपनी समृद्ध विरासत से यह भूमि आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहती है, जबकि प्रभास की विरासत और सोमनाथ का स्थायी शिखर इसबात की पुष्टि करते हैंकि भक्ति और आत्मसम्मान कालातीत हैं।

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