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सीमेंट की सड़कों का आया ज़माना

शिवम् भारद्वाज

सड़क

नई दिल्ली। दुनिया सीमेंट की सड़कों पर मुद्दत से दौड़ रही है और भारत अभी भी तारकोल की सड़कों के पीछे भाग रहा है। सड़क निर्माण विशेषज्ञों के सीमेंट की सड़कों के निर्माण प्रस्ताव अभी भी ठंडे बस्ते में पड़े हैं। ऐसा उन सड़क माफियाओं के शक्तिशाली तंत्र के कारण होता आ रहा है जो सोने की तरह से तारकोल की दलाली में लिप्त हैं और बड़े स्तर पर सांठगांठ करके यह नहीं चाहते कि भारत अपने यहां से तारकोल को बाहर कर दे जिससे उनकी दुकानें ठप हो जाएंगी। हर साल खरबों रुपए तारकोल की सड़कों के निर्माण और उनकी मरम्मत के नाम पर इधर-उधर होते हैं। सभी क्षेत्रों में दुनिया की रीस पीटने चले भारतीय हुक्मरान अगर सड़क क्रांति की सोचते तो आज देश के राजमार्ग सीमेंट से बने होते। भारत सरकार ने इसमें पहल की या नहीं या उसकी पहल कितनी सुस्त है इससे परे देश के निजी क्षेत्र ने अपनी और खासतौर से बड़ी आवासीय परियोजनाओं में सीमेंट की सड़कों का जो प्रयोग शुरू किया है वह कालोनियों में जा कर बसने वालों को बहुत लुभा रहा है। दुनिया में तारकोल की सड़कों का निर्माण अब कम हो रहा है। तारकोल की सड़कों में जाया होने वाले

वाले भारी भरकम धन की बचत हुई है। तेल कंपनियां दबाव बनाकर उन देशों को तारकोल बेच रही हैं जहां तारकोल की सड़कें हैं जिनमें भारत में इसकी काफी खपत है और इसके नाम पर एक लंबे समय से जबरदस्त गोलमाल चल रहा है।
देश में सड़कों के निर्माण में विशेषज्ञों की सलाह को लगातार नजरअंदाज कर उसे कूड़े में फेंकने के परिणाम अब सामने आ रहे हैं। अरबों रुपये की सड़क परियोजनाएं, भारी भरकम लागत और कमजोर निर्माण के कारण आवागमन, परिवहन और अर्थव्यवस्था पर दबाव बनती जा रही हैं। सड़क निर्माण में सीमेंट के प्रयोग के सुझावों को अगर करीब बीस साल पहले ही गंभीरता से ले लिया गया होता तो देश में आज लंबी उम्र की सीमेंटेड सड़कों का जाल बिछा होता। सड़कों के नाम पर हर साल जो अरबों रुपए यूं ही बह जाते हैं वे देश और राज्य की किन्हीं और बड़ी जरूरतों को पूरा करते। विदेशों में सीमेंट की सड़कें देखकर अब यहां भी इन सड़कों के निर्माण पर जोर दिया जाने लगा है। निजी क्षेत्र की आवासीय परियोजनाओं में यह तो काम शुरू भी हो गया है। बड़ी आवासीय परियोजनाओं और पॉश कालोनियों में कुछ शहरों और कस्बों में भी अब सीमेंट की सड़कें बनाई जा रहीं हैं। कल तक सरकार में सीमेंटेड सड़कों के निर्माण के प्रस्तावों को एक तरफ रख देने वाले नीति-नियंता भी अब सीमेंटेड सड़कों के कसीदे पढ़ रहे हैं।
विश्व बैंक कृषि विविधिकरण परियोजना के तहत भारत के राज्यों को ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों के लिए धन देता रहा है। उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लें तो उसने काफी पहले राज्य को साढ़े सात सौ करोड़ रुपए दिए थे, सब तारकोल की सड़कों में बह गए। पता नहीं कितने सात सौ पचास करोड़ की तारकोल की सड़कें और राज्यों में भी अदृश्य लोक में बन गईं या अपनी उम्र से पहले ही गिट्टी और खतरनाक गड्डों में बदल गईं। आसमान से बरसती आग के सामने पिघलती या कमजोर गुणवत्ता के कारण समय से पहले ही दरकती या फिर बाढ़ के साथ ही बह जाती इन सड़कों को जब दोबारा बनवाया जाता है या उनकी मरम्मत की जाती है तो इनकी लागत दुगनी हो चुकी होती है। टूटी सड़कों पर परिवहन में जान माल का नुकसान और दूसरी अनवरत कठिनाइयां, सो अलग। इस वक्त देश के विभिन्न शहर बाढ़ की चपेट में हैं। तारकोल की सड़कें बह रही हैं। सबसे ज्यादा सड़कों की भारी तबाही हो रही है।
सरकार सीमेंटेड सड़कों के बारे में क्यों नहीं सोचती रही और विश्व बैंक तारकोल के बजाय सीमेंट की सड़कों के लाभ सुनने को तैयार क्यों नहीं होता है इसकी भी बड़ी दिलचस्प और रहस्य उजागर करने वाली कहानी है। भारत सहित अन्य विकासशील देशों को तेल बेचने वाले देश और तेल कंपनिया तारकोल में भी भारी मुनाफा कमाती हैं और भारत जैसे देशों में ही सड़कों के निर्माण में उसकी खपत सबसे ज्यादा है। भारत अगर तारकोल लेना बंद कर दे तो तेल निर्यातक एक ही झटके में अरबों रुपए के नीचे आ जाएंगे। भारत को तेल चाहिए तो उसे तारकोल भी खरीदना होगा चाहे वह भारत के उपयोग का हो या नहीं हो। चूंकि विश्व बैंक भारत की सड़कों के लिए भी पैसा देता है जो इस अघोषित शर्त पर भी आधारित है कि तेल निर्यातकों की तारकोल की खपत को बढ़ाना ही है इसलिए इस दबाव के साथ तेल निर्यातक देशों, तेल कंपनियों और विश्व बैंक के गठजोड़ में लंबे समय से यह एक बड़ा आर्थिक व्यापार होता आ रहा है। इसलिए विश्व बैंक सड़क निर्माण में पैसा देते वक्त तारकोल से सड़क बनाने की कड़ी शर्तें लगाता आ रहा है। देश और राज्य के बड़े काबिल अधिकारी विश्व बैंक अधिकारियों के सामने इसीलिए बोल ही नहीं पाते हैं। अपने तर्क रखने की तो दूर की बात है। विश्व बैंक भी भारत के अधिकांश नौकरशाहों को अपने हाथ की रेखाओं की तरह जान गया है। देश के नेताओं का तो अंग्रेजों ने पहले से ही नामकरण कर ही रखा है, जिसे यहां लगभग सभी जानते हैं। विश्व बैंक के सामने कुछ अफसर हिम्मत करके आवाज उठाते भी हैं तो उन्हें अपने ही घूरकर चुप कर देते हैं।
राज्य सरकारें विश्व बैंक से कहती रही हैं कि वह ग्रामीण सड़कों के निर्माण के लिए जो धनराशि देता है उससे सीमेंट की सड़कें बनवाई जाएंगी तो वे तारकोल से ज्यादा टिकाऊ और लंबी चल सकती हैं, इन पर बाढ़ के पानी का कोई असर नहीं होता है्र बल्कि पानी के संपर्क से सीमेंट और ज्यादा मजबूत ही होता जाता है। सड़क निर्माण विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तारकोल के स्थान पर सीमेंट की सड़कें ही ज्यादा सफल रहेंगी क्योंकि वहां आवागमन और भारी वाहनों का दबाव ज्यादा रहता है, जहां सड़कों का नियमित अनुरक्षण हमेशा संभव नहीं है। शहरों और कस्बों में स्थानीय निकायों ने अपने संसाधनों से इसीलिए सीसी रोड बनवानी शुरू कर दी हैं ताकि वे लंबी चलें और उनके अनुरक्षण की समस्या न रहे। एक अनुमान के अनुसार सीमेंट की सड़क पचास साल चलती है तो कोलतार की सड़क केवल तीन साल ही चल पाती है और पांच साल में इसकी लागत जोड़ी जाए तो सीमेंट की सड़क सस्ती हो जाती है और उसके रखरखाव की भी उतनी बड़ी समस्या नहीं रहती है। मगर ये तर्क पिछले कुछ सालों तक किसी को मंजूर नहीं हुए। विश्व बैंक से यह अनुरोध होता रहा है कि वह यह पाबंदी न लगाए कि सड़कें कोलतार से ही बनाई जाएं। लेकिन वह किसी भी हालत में इस शर्त को हटाने की तैयार नहीं है।
देश में बहुत पहले कई राज मार्गों पर जो सीसी ट्रैक बनवाए गए थे वे आज भी कायम हैं जबकि उन ट्रैक पर जो तारकोल की सड़कें बनी हुई हैं वे हर साल ध्वस्त हो जाती हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में भी ऐसा कई स्थानों पर है। नदियों और बड़े नालों के रास्तों पर जो रपटे बनाये जाते हैं वे इसलिए सीमेंट से निर्मित होते हैं ताकि उनकी ज्यादा काल तक शक्ति बनी रहे। यही कारण है कि बाढ़ में सड़कें तो बहती सुनी गई हैं लेकिन उनमें जो सीमेंटेड रपटे बनाए गए थे वे अपनी जगह कायम हैं। इसीलिए इस बात पर जोर दिया जाता रहा है कि तारकोल की सड़कों के स्थान पर सीमेंट की सड़कों के निर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सीमेंट की सड़कों का अच्छा प्रयोग महाराष्ट्र में हुआ है। करीब साठ साल पहले वर्ल्ड वार के दौरान मुंबई में सीमेंट से बनी मैरिन ड्राईव सड़क आज भी कायम है, जबकि हर बार मुंबई में आई भयानक बाढ़ से तारकोल की सड़कें बाढ़ के साथ ही बह गईं,। इससे सड़क परिवहन और बीमा कंपनियों का करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ। इसके बाद ही मुंबई में सीमेंट की सड़कों का और ज्यादा प्रचलन शुरू हो गया है जिससे वहां सड़कों के बार-बार टूटने की समस्या से निजात मिल रही है।
देखने में आ रहा है कि निजी क्षेत्र की आवासीय योजनाओं में नामी गिरामी कंपनियों ने अपने यहां सीमेंटेड सड़कों के प्रयोग शुरू कर दिए हैं। वे इस क्षेत्र में नए-नए प्रयोग करने में लगी हुई हैं। प्राकृतिक आपदाओं के खतरों ने इन्हें जन-जीवन और जन सुविधाओं के प्रति काफी चौकन्ना किया है। बड़ी आवासीय परियोजनाओं में लगी प्रतिष्ठित निर्माण कंपनियों के सामने अपनी श्रेष्ठता साबित करने की जो चुनौतियां हैं ये प्रयोग उसी की रणनीतियों का हिस्सा बन गए हैं जिससे आदमी गुणवत्ता को प्राथमिकता देने लगा है। बड़ी आवासीय परियोजनाओं में अब सीमेंट से निर्माण सड़कों को ही प्राथमिकता दी जा रही है। अब जहां सीमेंट की सड़कों से गुणवत्ता दिखाई देगी वहीं इन सड़कों पर लंबे समय तक अतिरिक्त अनुरक्षण से भी मुक्ति मिलेगी। यह योजना निजी क्षेत्र के लिए भले ही महंगी साबित हो रही है लेकिन यह लोगों की गुणवत्ता की मांग पूरी करती है। एपीआई अंसल ने अपनी आवासीय परियोजनाओं में लंबी चौड़ी सड़कों को सीमेंटेड बनवाया है। लखनऊ में सुशांत गोल्फ सिटी में इसका प्रयोग देखने को मिलता है। गुणवत्तायुक्त आवास और बाधारहित आवागमन चाहने वाले, इसलिए और भी ज्यादा एपीआई अंसल की आवासीय योजनाओं से प्रभावित हो रहे हैं। निजी क्षेत्र के इस आधुनिक सिटी में मलेशिया की निर्माण कंपनी यूईएम के गठजोड़ से चौड़ी सड़कें केवल सीमेंट से ही बनाई जा रही हैं। यह नया प्रयोग दूसरी निर्माण कंपनियों में प्रतिस्पर्धा का काम कर रहा है।
नई कालोनियों में जाकर रहने वाले लोगों की सबसे पहली प्राथमिकता बिजली, सड़क और पानी है जिसमें सड़क सर्वाधिक प्राथमिकता पर है। बाकी निजी क्षेत्र की निर्माण कंपनियों एवं राज्य सरकारों को भी तारकोल की सड़क के स्थान पर सीमेंट की सड़कों को प्राथमिकता देनी होगी। सड़क निर्माण विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य सरकार की सभी सड़कों को धीरे-धीरे क्रमिक विकास के रूप में सीमेंट में तब्दील करना चाहिए क्योंकि आने वाले समय में अनुरक्षण पर होने वाला खर्च इतना बढ़ जायेगा कि वह सड़क निर्माण के बराबर ही नहीं बल्कि उससे दुगना हो जायेगा। इससे सीमेंट की लोहालाट सड़कों का जाल बिछ सकता है जिससे बार-बार के अनुरक्षण के फर्जी खर्चों से निजात मिल सकती है। यही प्रयोग उन सड़कों के लिए भी होगा जो सरकार के क्षेत्र में आती हैं तो आम आदमी विकास का मतलब और उसकी कीमत समझ सकेगा।

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