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Saturday 30 August 2025 04:14:19 PM
नई दिल्ली। इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के सहयोग से दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय ने आईजीएनसीए के समवेत सभागार में राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तरपर प्रशंसित लघु फिल्म 'सेल्फी प्लीज' की विशेष स्क्रीनिंग का आयोजन किया। फिल्म 'सेल्फी प्लीज' एक ऐसे परिवार की कहानी है, जहां बड़ी बहन डाउन सिंड्रोम से पीड़ित है, जिसके कारण छोटी बहन उपेक्षित महसूस करती है और उसे लगता हैकि उसकी मां बड़ी बहन पर ज़्यादा ध्यान देती है। फिल्म की लेखिका और निर्देशक अनु सिंह चौधरी ने फिल्म 'सेल्फी प्लीज' में डाउन सिंड्रोम जैसे संवेदनशील विषय को बेहद भावनात्मकता केसाथ प्रस्तुत किया है।
रंगमंच विशेषज्ञ एवं शिक्षाविद मालविका जोशी और दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर अनु सिंह लाठर ने उद्घाटन सत्र को संबोधित किया। प्रोफेसर अनु सिंह लाठर ने कहाकि उच्चशिक्षा और रंगमंच या मीडिया केबीच की दूरी को पाटना हमारी ज़िम्मेदारी है और मंच से रंगमंच और मीडिया क्षेत्र के पेशेवरों से विश्वविद्यालयों केसाथ जुड़ने का आग्रह किया। उन्होंने कहाकि छात्र बेहद उत्साहित हैं और उनके साथ सहयोग करना एक सुखद अनुभव होगा। मालविका जोशी ने कहाकि फिल्म का विषय बेहद संवेदनशील है और पोस्टर पर जिस तरह से 'सेल्फी प्लीज' लिखा गया है, वह एक सशक्त संदेश देता है। उन्होंने कहाकि 15 मिनट की यह फिल्म जीवन केप्रति दृष्टिकोण बदलने की क्षमता रखती है। निर्देशक अनु सिंह चौधरी ने बतायाकि फिल्म को बनाने में काफी समय लगा, क्योंकि एक निर्देशक केवल तभी निर्णय ले सकता है, जब उसके पास एक इंसान के रूपमें व्यक्तिगत अनुभव और अपने तरीके से कहानी कहने की स्वतंत्रता हो।
इंदिरा गांधी कला केंद्र के मीडिया सेंटर के प्रमुख अनुराग पुनेठा ने धन्यवाद ज्ञापन करते हुए कहाकि यह फिल्म न केवल हमें मानव के रूपमें संवेदनशील बनाती है, बल्कि हमें शिक्षित भी करती है। स्क्रीनिंग केबाद 'एक सामान्य परिवार का मिथक' विषय पर विशेष चर्चा हुई। पैनल में फिल्म की लेखिका-निर्देशक अनु सिंह चौधरी, अभिनेत्री सारिका सिंह, मालविका जोशी और iCANthink की संस्थापक दीपा गरवा ने अपने विचार साझा किए। चर्चा का संचालन दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार डॉ संजीव राय ने किया और विषयगत परिचय सहर बेग ने प्रस्तुत किया। प्रश्नोत्तर सत्र हुआ, जिसमें पैनलिस्टों ने फिल्म से संबंधित दर्शकों के सवालों के जवाब दिए। दर्शकों को फिल्म का संदेश और उसके बाद हुई चर्चा दोनों ही बेहद प्रासंगिक और प्रेरणादायक लगे। यह आयोजन कला और शिक्षा के क्षेत्रमें एक सार्थक पहल का प्रतीक है, जो परिवार, समाज और व्यक्तिगत पहचान पर एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।