असम पुस्तक मेले में केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल का संबोधन
पुस्तक मेले 'बौद्धिक विकास और ज्ञान का तीर्थ स्थल होते हैं'स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Saturday 3 January 2026 12:23:53 PM
गुवाहाटी। केंद्रीय पत्तनपोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने पुस्तक मेलों को ‘ज्ञान का तीर्थ स्थल’ कहा है, जो बौद्धिक विकास और एक विचारशील समाज का पोषण करते हैं। सर्बानंद सोनोवाल गुवाहाटी के खानापारा में असम पुस्तक मेले में आए पुस्तक प्रेमियों को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने युवाओं को पुस्तकें पढ़ने केलिए प्रोत्साहित किया। सर्बानंद सोनोवाल ने कहाकि पुस्तकें मस्तिष्क को आलोकित करती हैं, विचारों को शुद्ध करती हैं और पीढ़ियों तक समाज को ज्ञान से समृद्धशाली बनाती हैं। उन्होंने कहाकि साहित्य का सामूहिक स्वरूप समाज की अंतरात्मा, रचनात्मकता और कल्पना को दर्शाता है और बौद्धिक रूपसे प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। सर्बानंद सोनोवाल ने युवाओं से पढ़ने की आदत डालने का आग्रह किया और कहाकि पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने केलिए उठाया गया हर कदम लोगों की बौद्धिक उन्नति की ओर एक ठोस कदम है। उन्होंने कहाकि मेले में पाठकों की उत्साही उपस्थिति इस बातकी पुष्टि करती हैकि असम एक समाज के रूपमें सही दिशा में आगे बढ़ रहा है।
सर्बानंद सोनोवाल ने कहाकि पुस्तकें वे उपहार हैं, जिन्हें बारबार खोला जा सकता है और हरबार वे हमें नई अंतर्दृष्टि और दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। उन्होंने असम के उन सांस्कृतिक और साहित्यिक नायकों की स्थायी विरासत को याद किया, जिन्होंने अपने शब्दों और विचारों से असमिया लोगों की पहचान को आकार दिया और असम की आवाज़ को दुनिया तक पहुंचाया है। दार्शनिक फ्रांसिस बेकन के एक कथन का उद्धरण देते हुएकि अध्ययन मनुष्य को पूर्ण बनाता है, सर्बानंद सोनोवाल ने गहन अध्ययन के स्थान पर सतही डिजिटल उपभोग को अपनाने केप्रति आगाह किया। उन्होंने कहाकि हम सोशल मीडिया फीड का कितना भी उपभोग क्यों न कर लें, लेकिन केवल पुस्तकें ही हमें पूर्ण कर सकती हैं, केवल पठन-पाठन ही हमें गहराई, कल्पनाशीलता और आलोचनात्मक सोच प्रदान कर सकता है। उन्होंने स्वीकार कियाकि तकनीक ने पढ़ने की आदतों को बदल दिया है, ई-बुक्स, ऑडियोबुक्स, डिजिटल लाइब्रेरी जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पारंपरिक पठन के पूरक हो सकते हैं और ज्ञान को अधिक सुलभ बना सकते हैं। उन्होंने कहाकि असली चुनौती पढ़ने को फिरसे आनंददायक बनाना है, विशेष रूपसे युवाओं केलिए।
सर्बानंद सोनोवाल ने पुस्तकालयों, विशेष रूपसे छोटे शहरों के पुस्तकालयों के आधुनिकीकरण और असमिया साहित्य को समकालीन व पाठक अनुकूल प्रारूपों में अधिक सुलभ बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। उन्होंने उस मौन द्वंद के बारेमें बात की जिसका सामना कई युवा आधुनिक सफलता की आकांक्षाओं और अपनी मातृभाषा केप्रति लगाव केबीच करते हैं। उन्होंने कहाकि प्रगति अपनी भाषाई और सांस्कृतिक जड़ों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने प्रकाशकों और पाठकों केसाथ बातचीत की और कई पुस्तकें खरीदीं, जिनमें बनलता प्रकाशन की प्रोफेसर भवानी पेगु की 'मृतो ईश्वर', अनुराधा शर्मा पुजारी की 'भारतरत्न भूपेन हजारिका', हरेन गोगोई की 'बोधिद्रुम-2', देबजीत भुइयां की 'मायाबिनी रातिर बुकुत-जुबीन र जिवन आरु गान' और बाबुल कुमार बरुआ की 'मुर जेल जात्रार काहिनी' प्रमुख थीं। सर्बानंद सोनोवाल ने पुस्तकों को पढ़ने केप्रति उनके विश्वास और उत्साह तथा असमिया साहित्य को बढ़ावा देने की उनकी उत्सुकता को रेखांकित किया।