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आईएफएफआई में शोले की मोटरबाइक आकर्षक

'शोले के 50 वर्ष : शोले आज भी क्यों गुंजायमान है?' संवाद सत्र

रमेश सिप्पी ने शोले के इतिहास की एक दिलचस्प यात्रा कराई

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Friday 28 November 2025 01:01:45 PM

sholay's motorbike a highlight at iffi

पणजी। भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोह में ‘शोले के 50 वर्ष : शोले आजभी क्यों गुंजायमान है?’ शीर्षक वाला संवाद सत्र दर्शकों पर छा गया। इफ्फी में फिल्म के इतिहास की एक दिलचस्प यात्रा कराई। इस सत्र की मेजबानी मशहूर हिंदी फिल्म शोले के मशहूर फिल्म निर्माता रमेश सिप्पी की पत्नी और प्रतिभाशाली अभिनेत्री निर्माता किरण सिप्पी ने की। शोले की यह 50वीं सालगिरह है। इस अवसर पर आईएफएफआई ने फ़िल्म की मशहूर मोटरबाइक को फेस्टिवल ग्राउंड में दिखाया। शोले सिनेमा के शौकीन एकबार फिर अतीत में चले गए। फिल्म निर्माता रमेश सिप्पी ने ‘शोले के 50 वर्ष : शोले आजभी क्यों गुंजायमान है?’ शीर्षक वाले संवाद सत्र में दर्शकों को फिल्म के इतिहास की एक दिलचस्प यात्रा कराई। सत्र की मेजबानी उनकी पत्नी और प्रतिभाशाली अभिनेत्री निर्माता किरण सिप्पी ने की।
शोले संवाद सत्र पुरानी यादों, खुलासों और दिल से दी गई श्रद्धांजलि से भरा था, क्योंकि रमेश सिप्पी ने एक ऐसी फिल्म बनाने के बारेमें सोचा, जो एक सांस्कृतिक उपलब्धि बन गई। रमेश सिप्पी ने सिनेप्रेमियों केलिए सबसे बेसब्री से इंतज़ार की जा रही घोषणाओं में से एक साझा कीकि 50 साल बाद फिर नए अंदाज में शोले के प्रदर्शन में इसबार ओरिजिनल एंडिंग में कोई बदलाव नहीं होगा! रमेश सिप्पी ने बतायाकि जब फ़िल्म पहली बार 1975 में इमरजेंसी के दौरान रिलीज़ हुई थी तो उस समय के सेंसर बोर्ड ने क्लाइमेक्स पर एतराज़ जताया था, जहां ठाकुर बलदेव सिंह अपने स्पाइक वाले जूतों से गब्बर सिंह को मारते हैं और ज़ोर दिया थाकि एक पुलिस अफ़सर को बदला लेते हुए नहीं दिखाया जा सकता। न चाहते हुए भी फ़िल्म निर्माता और उनकी टीम को इसका अंत दोबारा शूट करना पड़ा। रमेश सिप्पी ने दर्शकों से कहाकि अब आप फ़िल्म वैसी ही देखेंगे जैसी वह बनी थी और फिर अपनी सृजनात्‍मक कल्पना के लंबे समय से रुके हुए काम को फिरसे शुरू करने का जश्न मनाया।
रमेश सिप्पी ने बतायाकि कैसे उन्होंने फिल्म केलिए एक बिल्कुल नया विज़ुअल पैलेट खोजा, ऐसे समय में जब हिंदी सिनेमा की ज़्यादातर डकैत ड्रामा फिल्में राजस्थान और चंबल घाटी में शूट होती थीं, रमेश सिप्पी ने मैसूरु और बेंगलुरु के पास के ऊबड़-खाबड़ इलाकों को देखा और खोजा। पथरीले बैकग्राउंड ने शोले को एक ऐसा खास लुक दिया जो भारतीय सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा गया था। रमेश सिप्पी ने एक अनोखा कंट्रास्ट भी जोड़ा गब्बर सिंह, उत्तर प्रदेश के अपने फूहड़ उच्चारण केसाथ दक्षिण भारत के एक इलाके में आतंक मचा रहा था। अमजद खान के यादगार किरदार के बारेमें बात करते हुए सिप्पी ने बतायाकि असल में इस किरदार का निभाने की जिम्मेदारी वह डैनी डेन्जोंगपा को देना चाहते थे, लेकिन विदेश में शूटिंग कमिटमेंट्स के कारण वह उपलब्ध नहीं थे। पटकथा लेखक सलीम जावेद की सिफारिश केबाद अमजद खान ने अपने थिएटर कौशल से रमेश सिप्पी को प्रभावित किया और बाकी सब सिनेमाई इतिहास बन गया।
रमेश सिप्पी ने बतायाकि पटकथा लेखकों की जोड़ी ने शुरू में मनमोहन देसाई को दो लाइन का विचार दिया था, जिसे उन्होंने मना कर दिया था, लेकिन सिप्पी के पिता-पुत्र की जोड़ी यानी महान जीपी सिप्पी और बेटे रमेश सिप्पी ने तुरंत इसकी क्षमता पहचान ली। एक महीने के अंदर स्क्रीनप्ले पूरा हो गया और एक चंचल विलेन का जन्म हुआ जब रमेश सिप्पी ने सलीम जावेद से कहाकि उन्हें एक ऐसा चरित्र चाहिए, जो अचानक खतरनाक हो, इस तरह हिंदी सिनेमा को अब तकके सबसे बेहतरीन विलेन में से एक मिला। रमेश सिप्पी फिल्म के उन बड़े अभिनेताओं को याद करके भावुक हो गए, जो अब हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने संजीव कुमार, अमजद खान और धर्मेंद्र को दिल से श्रद्धांजलि दी, जिनका हाल ही में निधन हो गया। एक दिल को छू लेने वाले किस्से में रमेश सिप्पी ने धर्मेंद्र के समर्पण को याद किया, जब घुड़सवारी का एक एक्शन सीन चल रहा था, जिसमें काठी फिसल गई और अभिनेता गिर गए। रमेश सिप्पी ने कहाकि एक पल के लिए मेरा दिल थम गया, लेकिन धर्म जी बस खड़े हुए, खुदको साफ किया और फिरसे जाने केलिए तैयार थे। वह हमेशा खुद को आगे बढ़ाना चाहते थे और नई चीजें आज़माना चाहते थे।
रमेश सिप्पी ने कहाकि शोले ज़बरदस्त टीमवर्क का नतीजा थी। फ़िल्म में जो कई पहली चीज़ें थीं, उनमें से यह जानना चाहिएकि यह पहली भारतीय फ़िल्म थी जिसमें ब्रिटेन से एक प्रोफ़ेशनल फ़ाइट सीक्वेंस टीम आई थी। किरण सिप्पी ने बतायाकि इसने हिंदी सिनेमा में एक्शन सीन केलिए सेफ़्टी प्रोटोकॉल शुरू किए। उन्होंने कहाकि सिनेमैटोग्राफ़र द्वारका दिवेचा ने अपनी विज़ुअल स्टोरीटेलिंग से नए मानक स्थापित किए। उन्होंने याद कियाकि प्रोडक्शन मैनेजर अज़ीज़ भाई ने पर्दे के पीछे अहम भूमिका निभाई थी। मास्टर फिल्म निर्माता ने बतायाकि जया भादुड़ी के शाम के लैंप सीक्वेंस की शानदार लाइटिंग को कैप्चर करने में कई दिन लग गए, हर दिन सही मैजिक आवर का इंतज़ार किया गया। उन्होंने आनंद बख्शी के लिखे और आरडी बर्मन के कंपोज़ किए हुए हमेशा याद रहने वाले गाने यह दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे को भी याद किया, जो पीढ़ियों से गूंजता आ रहा है।
शोले सिर्फ़ एक फ़िल्म नहीं है, यह एक जीती-जागती विरासत है जो फ़िल्म बनाने वालों को प्रेरित करती है, दर्शकों का मनोरंजन करती है और भारतीय सिनेमा की सीमाओं को फिरसे परिभाषित करती है। अपने 50 साल के जश्न और लंबे इंतज़ार केबाद अपने नए अंदाज में वापसी के साथ शोले एकबार फिर दहाड़ने केलिए तैयार है, ठीक वैसे ही जैसे मशहूर फिल्म निर्माता रमेश सिप्पी ने आधी सदी पहले इसकी कल्पना की थी।

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