हर रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष कृतज्ञता और दिव्य आनंद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस प्रमुख ने धर्म ध्वज फहरायास्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Tuesday 25 November 2025 04:40:33 PM
अयोध्या। सप्तपुरियों में श्रेष्ठ अयोध्या धाम में आज प्रभु श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आरएसएस सरसंघचालक डॉ मोहन भागवत ने पूर्ण विधिविधान केसाथ भगवा धर्म ध्वज फहराया। यह धर्म ध्वज श्रीराम मंदिर का निर्माण कार्य पूरा होने का प्रतीक है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश-दुनियाभर में रामभक्तों को बधाई और हार्दिक शुभकामनाएं दीं और अपने संबोधन की शुरुआत सियावर रामचंद्र की जय उद्घोष से की। उन्होंने श्रीराम मंदिर का निर्माण कार्य में समर्पित प्रत्येक कार्यकर्ता, कारीगर, योजनाकार और वास्तुकार को नमन किया और श्रीराम मंदिर निर्माण में योगदान देने वाले प्रत्येक दानदाता केप्रति भी कृतज्ञता व्यक्त की। प्रधानमंत्री ने कहाकि आज करोड़ों रामभक्तों की आस्था, तपस्या और प्रतीक्षा एक नए शिखर पर प्रतिष्ठित हो गई है और भारतीय सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का यह दिव्य संदेश पूरे भारतवर्ष में अदम्य आध्यात्मिक आत्मिक ऊर्जा का संचार कर रहा है।
श्रीराम मंदिर के शिखर पर धर्म ध्वज पर चमकते सूरज की तस्वीर है, जो भगवान श्रीराम की चमक और वीरता का प्रतीक है और कोविदार पेड़ की तस्वीर केसाथ 'ॐ' लिखा हुआ है। प्रधानमंत्री ने कहाकि यह धर्म ध्वज केवल एक ध्वज नहीं है, यह भारतीय संस्कृति के क्रांतिकारी का ध्वज है, यह भगवान का रंग है, इसपर रचित सूर्यवंश का नाम, ओम शब्द और अंकित वृक्ष रामराज्य की कीर्ति का प्रतिरूप है। प्रधानमंत्री ने कहाकि आज अयोध्या नगरी भारत की सांस्कृतिक चेतना के एक और उत्कर्ष बिंदु की साक्षी बन रही है, श्रीराम जन्मभूमि मंदिर के शिखर ध्वजारोहण उत्सव का यह क्षण अद्वितीय और अलौकिक है। प्रधानमंत्री ने कहाकि आज प्रत्येक रामभक्त के हृदय में अद्वितीय संतोष, असीम कृतज्ञता और अपार दिव्य आनंद है। नरेंद्र मोदी ने श्रीराम मंदिर से जुड़ी स्मृतियों को याद करते हुए कहाकि सदियों पुराने घाव भर रहे हैं, सदियों का दर्द समाप्त हो रहा है और सदियों का संकल्प आज सिद्ध हो रहा है। उन्होंने कहाकि यह उस यज्ञ की परिणति है, जिसकी अग्नि 500 वर्ष तक प्रज्वलित रही, एक ऐसा यज्ञ जिसकी आस्था कभी डगमगाई नहीं, आस्था क्षणभर केलिए भी खंडित नहीं हुई। उन्होंने रेखांकित कियाकि आज भगवान श्रीराम के गर्भगृह की अनंत ऊर्जा और श्रीराम परिवार की दिव्य महिमा धर्म ध्वजा के रूपमें इस दिव्यतम एवं भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो गई है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाकि यह धर्म ध्वज संकल्प है, सिद्धि है, संघर्ष से सृजन की गाथा है, यह सदियों से संजोए गए स्वप्नों का साकार रूप है और संतों की तपस्या, समाज की सहभागिता की सार्थक परिणति है। प्रधानमंत्री कहाकि आनेवाली सदियों और सहस्राब्दियों तक यह धर्म ध्वजा भगवान श्रीराम के आदर्शों और सिद्धांतों का उद्घोष करेगा। उन्होंने कहाकि यह आह्वान करेगाकि विजय केवल सत्य की होती है, असत्य की नहीं, सत्य स्वयं ब्रह्म का रूप है और सत्य में ही धर्म की स्थापना होती है। उन्होंने कहाकि यह धर्म ध्वज जो कहा गया है, उसे अवश्य पूरा करने के संकल्प को प्रेरित करेगा, यह संदेश देगाकि संसार में कर्म और कर्तव्य को ही प्रधानता देनी चाहिए। उन्होंने कहाकि यह भेदभाव और पीड़ा से मुक्ति, समाज में शांति और सुख की उपस्थिति की कामना व्यक्त करेगा। उन्होंने कहाकि यह धर्म ध्वज हमें इस संकल्प केलिए प्रतिबद्ध करेगाकि हमें एक ऐसे समाज का निर्माण करना है, जहां कोई ग़रीबी न हो और कोई भी दुखी या असहाय न हो। प्रधानमंत्री ने धर्मग्रंथों का स्मरण करते हुए कहाकि जो लोग किसीभी कारण से मंदिर में नहीं आ पाते, लेकिन उसकी ध्वजा के आगे झुकते हैं, उन्हें भी समान पुण्य प्राप्त होता है।
प्रधानमंत्री ने कहाकि यह धर्म ध्वज मंदिर के उद्देश्य का प्रतीक है और दूर सेही यह रामलला की जन्मभूमि के दर्शन कराती रहेगी और युगों-युगों तक भगवान श्रीराम के आदर्शों और प्रेरणाओं को मानवता तक पहुंचाती रहेगी। प्रधानमंत्री ने कहाकि अयोध्या वह भूमि है, जहां से श्रीराम ने अपनी जीवन यात्रा शुरू की थी। उन्होंने कहाकि अयोध्या ने दुनिया को दिखाया हैकि कैसे एक व्यक्ति, समाज और उसके मूल्यों की शक्ति से पुरुषोत्तम बनता है। उन्होंने स्मरण कियाकि जब श्रीराम वनवास केलिए अयोध्या से निकले थे तो वे युवराज राम थे, लेकिन जब वे लौटे तो वे 'मर्यादा पुरुषोत्तम' बनकर लौटे। उन्होंने कहाकि श्रीराम के मर्यादा पुरुषोत्तम बनने में महर्षि वशिष्ठ का ज्ञान, महर्षि विश्वामित्र की दीक्षा, महर्षि अगस्त्य का मार्गदर्शन, निषादराज की मित्रता, माता शबरी का स्नेह और भक्त हनुमान की भक्ति सभी ने अनुकरणीय भूमिका निभाई। नरेंद्र मोदी ने प्रसन्नता व्यक्त कीकि श्रीराम मंदिर का दिव्य प्रांगण भारत की सामूहिक शक्ति का चेतना स्थल बन रहा है, यहां सात मंदिर निर्मित हैं, जिनमें माता शबरी का मंदिर भी शामिल है, जो आदिवासी समुदाय की प्रेम एवं आतिथ्य परंपराओं का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने निषादराज के मंदिर का भी उल्लेख किया, जो उस मैत्री का साक्षी है, जो साधनों की नहीं, बल्कि उद्देश्य और भावना की पूजा करती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बतायाकि एकही स्थान पर माता अहिल्या, महर्षि वाल्मीकि, महर्षि वशिष्ठ, महर्षि विश्वामित्र, महर्षि अगस्त्य और संत तुलसीदास विराजमान हैं, जिनकी रामलला केसाथ उपस्थिति भक्तों को उनके दर्शन कराती है। उन्होंने जटायु और गिलहरी की मूर्तियों का उल्लेख किया, जो महान संकल्पों की सिद्धि में छोटे से छोटे प्रयास के महत्व को दर्शाती हैं। उन्होंने प्रत्येक नागरिक से आग्रह कियाकि जबभी वे श्रीराम मंदिर जाएं तो सप्त मंदिरों के भी दर्शन अवश्य करें। उन्होंने कहाकि ये मंदिर हमारी आस्था को मजबूत करने केसाथ-साथ मैत्री, कर्तव्य और सामाजिक सद्भाव के मूल्यों को भी सशक्त बनाते हैं। प्रधानमंत्री ने कहाकि हमारे राम मतभेदों से नहीं, बल्कि भावनाओं से जुड़ते हैं, आज हमभी इसी भावना केसाथ आगे बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहाकि बीते 11 वर्ष में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों, वंचितों, किसानों, श्रमिकों, युवाओं समाज के हर वर्ग को विकास के केंद्र में रखा गया है। उन्होंने कहाकि जब राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति, वर्ग और क्षेत्र सशक्त होगा तो सभीका प्रयास संकल्प की पूर्ति में योगदान देगा और इन्हीं सामूहिक प्रयासों से 2047 तक एक विकसित भारत का निर्माण होगा। प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के संकल्प को भगवान श्रीराम से जोड़ने की बात कही और याद दिलायाकि आनेवाले हज़ार वर्ष केलिए भारत की नींव मज़बूत होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाकि जो लोग केवल वर्तमान केबारे में सोचते हैं, वे आने वाली पीढ़ियों केसाथ अन्याय करते हैं और हमें केवल आजके बारेमें ही नहीं, बल्कि आनेवाली पीढ़ियों के बारेमें भी सोचना चाहिए, क्योंकि राष्ट्र हमसे पहले भी था और हमारे बादभी रहेगा। प्रधानमंत्री ने कहाकि एक जीवंत समाज के रूपमें हमें आने वाले दशकों और सदियों को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शिता केसाथ काम करना चाहिए और इसके लिए हमें भगवान श्रीराम से सीखना होगा, उनके व्यक्तित्व को समझना होगा, उनके आचरण को अपनाना होगा और यह याद रखना होगाकि श्रीराम आदर्शों, अनुशासन और जीवन के सर्वोच्च चरित्र के प्रतीक हैं। उन्होंने कहाकि श्रीराम के गुण हमें एक सशक्त, दूरदर्शी और स्थायी भारत के निर्माण में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। नरेंद्र मोदी ने कहाकि 25 नवंबर भारत की प्राचीन विरासत पर गर्व का एक और असाधारण क्षण लेकर आया है, जिसका प्रतीक धर्म ध्वज पर अंकित कोविदर वृक्ष है। उन्होंने बतायाकि कोविदर वृक्ष हमें याद दिलाता हैकि जब हम अपनी जड़ों से अलग हो जाते हैं तो हमारा गौरव इतिहास के पन्नों में दफन हो जाता है। प्रधानमंत्री ने उस प्रसंग का स्मरण किया जब भरत अपनी सेना केसाथ चित्रकूट पहुंचे और लक्ष्मण ने दूर से ही अयोध्या की सेना को पहचान लिया। नरेंद्र मोदी ने महर्षि वाल्मीकि के वर्णित उस वर्णन का उल्लेख किया, जिसमें लक्ष्मण ने श्रीराम से कहा थाकि एक विशाल वृक्ष जैसा दीप्तिमान, ऊंचा ध्वज अयोध्या का है, जिसपर कोविदार का शुभ प्रतीक अंकित है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाकि श्रीराम मंदिर के प्रांगण में कोविदार की पुनः प्राणप्रतिष्ठा हुई है तो यह केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं है, बल्कि स्मृति की वापसी, पहचान का पुनरुत्थान और एक गौरवशाली सभ्यता का नवघोष है। उन्होंने कहाकि कोविदार हमें याद दिलाता हैकि जब हम अपनी पहचान भूल जाते हैं तो हम स्वयं को खो देते हैं, लेकिन जब पहचान लौटती है तो राष्ट्र का आत्मविश्वास भी लौटता है। उन्होंने कहाकि देश को आगे बढ़ने केलिए अपनी विरासत पर गर्व करना होगा। प्रधानमंत्री ने याद दिलायाकि 190 साल पहले 1835 में मैकाले नामक एक अंग्रेज सांसद ने भारत को उसकी जड़ों से उखाड़ फेंकने का बीज बोया और मानसिक गुलामी की नींव रखी थी। उन्होंने कहाकि दुर्भाग्य हैकि मैकाले के विचारों का व्यापक प्रभाव पड़ा, भारत को स्वतंत्रता तो मिली, लेकिन हीनभावना से मुक्ति नहीं मिली, एक विकृति फैल गई, जहां हर विदेशी चीज़ को श्रेष्ठ माना जाने लगा, जबकि हमारी अपनी परंपराओं और प्रणालियों को केवल दोष की दृष्टि से देखा जाने लगा। उन्होंने कहाकि 2035 में उस घटना को दो सौ साल पूरे हो जाएंगे और आग्रह कियाकि आनेवाले दस साल भारत को इस मानसिकता से मुक्त करने केलिए समर्पित होने चाहिएं।नरेंद्र मोदी ने इस बात पर ज़ोर दियाकि गुलामी की मानसिकता इस धारणा को पुष्ट करती रहीकि भारत ने लोकतंत्र विदेश से उधार लिया है और यहां तककि इसका संविधान भी विदेश से प्रेरित है, जबकि सच्चाई यह है कि भारत लोकतंत्र की जननी है और लोकतंत्र हमारे डीएनए में है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरी तमिलनाडु के उत्तिरामेरुर गांव का उदाहरण दिया, जहां एक हज़ार साल पुराने शिलालेख में बताया गया हैकि उस युग में भी शासन कैसे लोकतांत्रिक तरीके से चलाया जाता था और लोग अपने शासक कैसे चुनते थे। उन्होंने कहाकि मैग्ना कार्टा की तो व्यापक प्रशंसा की जाती थी, लेकिन भगवान बसवन्ना के अनुभव मंडप के ज्ञान को सीमित रखा गया था। उन्होंने बतायाकि अनुभव मंडप एक ऐसा मंच था, जहां सामाजिक, धार्मिक और आर्थिक मुद्दों पर सार्वजनिक रूपसे बहस होती थी और सामूहिक सहमति से निर्णय लिए जाते थे। उन्होंने दुःख व्यक्त कियाकि गुलामी की मानसिकता के कारण भारत की पीढ़ियां अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं के ज्ञान से वंचित रहीं। प्रधानमंत्री ने कहाकि गुलामी की मानसिकता हमारी व्यवस्था के हर कोने में समा गई है, सदियों से भारतीय नौसेना के ध्वज पर ऐसे प्रतीक अंकित थे जिनका भारत की सभ्यता, शक्ति या विरासत से कोई संबंध नहीं था। उन्होंने कहाकि अब नौसेना के ध्वज से गुलामी के हर प्रतीक को हटा दिया गया है और छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत को स्थापित किया गया है। उन्होंने कहाकि यह केवल स्वरूप में परिवर्तन नहीं, बल्कि मानसिकता में परिवर्तन का क्षण है, भारत अब अपनी शक्ति को दूसरों की विरासत से नहीं, बल्कि अपने प्रतीकों से परिभाषित करेगा। नरेंद्र मोदी ने कहाकि यही परिवर्तन आज अयोध्या में भी दिखाई दे रहा है, यही गुलामी की मानसिकता थी, जिसने इतने वर्षों तक रामत्व के सार को नकार दिया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेखांकित कियाकि भगवान श्रीराम स्वयं में एक संपूर्ण मूल्य व्यवस्था हैं, ओरछा के राजाराम से रामेश्वरम के भक्त राम तक, शबरी के प्रभु राम से मिथिला के पहुना रामजी तक, राम हर घर में, हर भारतीय के हृदय और कण-कण में विराजमान हैं। उन्होंने कहाकि अयोध्या के सौंदर्यीकरण का कार्य तेज़ी से जारी है, यह दुनिया केलिए एक मिसाल बनने वाला शहर बन रहा है। उन्होंने कहाकि त्रेतायुग में अयोध्या ने मानवता को उसकी आचार संहिता दी थी और 21वीं सदी में अयोध्या मानवता को विकास का एक नया मॉडल दे रही है। उन्होंने कहाकि अब अयोध्या एक विकसित भारत की रीढ़ बनकर उभर रही है। प्रधानमंत्री ने कहाकि भविष्य में अयोध्या परंपरा और आधुनिकता का संगम होगा, जहां सरयू का पावन प्रवाह और विकास की धारा एकसाथ बहेगी। उन्होंने कहाकि अयोध्या आध्यात्मिकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता केबीच सामंजस्य स्थापित करेगी, रामपथ, भक्तिपथ और जन्मभूमि पथ एक नई अयोध्या का दर्शन कराते हैं। उन्होंने भव्य हवाई अड्डे और शानदार रेलवे स्टेशन का ज़िक्र किया, जहां वंदे भारत और अमृत भारत एक्सप्रेस ट्रेनें अयोध्या को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ती हैं। उन्होंने कहाकि अयोध्या के लोगों के जीवन में समृद्धि लाने केलिए निरंतर काम किया जा रहा है। उन्होंने कहाकि एक समय अयोध्या विकास के मानकों पर पिछड़ा हुआ था, लेकिन आज यह उत्तर प्रदेश के अग्रणी शहरों में से एकके रूपमें उभर रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बतायाकि जब भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय की महान चुनौती का सामना किया तो रथ के पहिये वीरता और धैर्य थे, ध्वज सत्य और सदाचार था, अश्व बल, बुद्धि, संयम और परोपकार थे, लगाम क्षमा, करुणा और समता थी, जिसने रथ को सही दिशा में आगे बढ़ाया। प्रधानमंत्री ने कहाकि विकसित भारत की यात्रा को गति देने केलिए ऐसे रथ की आवश्यकता है, जिसके पहिए वीरता और धैर्य से संचालित हों अर्थात चुनौतियों का सामना करने का साहस और परिणाम प्राप्त होने तक अडिग रहने का धैर्य। उन्होंने कहाकि इस रथ का ध्वज सत्य और सर्वोच्च आचरण होना चाहिए अर्थात नीति, नीयत और नैतिकता से कभी समझौता नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने कहाकि इस रथ के घोड़े बल, बुद्धि, अनुशासन और परोपकार होने चाहिए अर्थात शक्ति, बुद्धि, संयम और दूसरों की सेवा करने की भावना होनी चाहिए। उन्होंने कहाकि इस रथ की लगाम क्षमा, करुणा और समता होनी चाहिए अर्थात सफलता में अहंकार नहीं होना चाहिए और असफलता में भी दूसरों केप्रति सम्मान होना चाहिए। नरेंद्र मोदी ने श्रद्धापूर्वक कहाकि यह क्षण कंधे से कंधा मिलाकर चलने, गति बढ़ाने और रामराज्य से प्रेरित भारत के निर्माण का है, यह तभी संभव है, जब राष्ट्रहित स्वार्थ से ऊपर रहे। इस भक्तिभाव से परिपूर्ण ऐतिहासिक कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास, संत समाज, भक्तगण, देश और दुनिया से कोटि-कोटि रामभक्त उपस्थित थे।