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अब आसान नहीं रहा हज और उमरा

ज़ियारत में भी अमरी‌कियों और अर‌बियों को तरजीह

हिसाम-उल-सिद्दी़की

महंगे होटल-expensive hotel

सऊदी अरब की शाही हुकूमत ने हज के फरीजे की तशरीह (व्याख्या) ही बदल दी है। अब हज और उमरा के लिए वही लोग जा सकेंगे जिनकी हैसियत आलीशान फाइव स्टार होटलों के किराए की शक्ल में लाखों रूपए अदा करने की होगी। इतना ही नहीं हरम के एतराफ में अब दो-पांच और दस रियाल में सर भी नहीं मुड़ाया जा सकेगा, क्योंकि फाइव स्टार होटल में दुकान खोलने वाला कोई भी नाई सौ-पचास रियाल से कम में हाजियों का सर मूंड़ने के लिए तैयार नहीं है। पीने के लिए चाय की सस्ती दुकानें भी नहीं बची हैं। हुकूमत ने मक्का मोअज्जिमा और मदीना मुनव्वरा दोनों ही जगह अल्लाह के घर और मस्जिदे नबवी दोनों की करीबी तमाम इमारतों को ध्वस्त करा दिया है। उनकी जगह नए फाइव स्टार होटल बन रहे हैं, कुछ बन भी चुके हैं। हालात इतने खराब हैं कि उमरा करने के बाद अल्लाह के घर के एतराफ में नाई की एक दुकान तक नहीं बची। जबल-ए-उमर की जानिब सिर्फ एक दुकान है, जहां इतनी भीड़ होती है कि अगर कोई उसकी कतार में लग जाएं तो कम से कम दो वक्त की नमाज जरूर चली जाएगी।
हिन्दुस्तान से हज पर जाने वालों को इस बार यह सोच कर जाना चाहिए कि अव्वल श्रेणी की फीस अदा करने के बावजूद उन्हें अल्लाह के घर से कम से कम दो किलोमीटर के फासले पर ही रहने की जगह मिलेगी। उसके लिए भी तीन हजार सऊदी रियाल अदा करने होगें। जुलाई के पहले हफ्ते तक भारत की सेन्ट्रल हज कमेटी और सऊदी अरब में हिन्दुस्तानी सिफारत खाने और जेद्दाह में कायम कौंसिल खाने के अफसरान की तमाम कोशिशों के बावजूद एक लाख से ज्यादा हाजियों को ठहराने के लिए इमारतें नहीं मिल सकीं। हरम शरीफ से तकरीबन आठ किलोमीटर के फासले पर अज़ीज़िया में ही सिर्फ दो इमारतें मिली हैं। अज़ीज़िया में ठहरने वाले हाजियों को एक हज़ार आठ सौ सऊदी रियाल अदा करने होगें। इस रकम में कहने को तो ट्रांसपोर्ट का खर्चा भी शामिल है, लेकिन हज की भीड़ के दौरान गाडि़यां चल ही नहीं पातीं, इसलिए हज पर जाने वालों को अपनी जेब देखकर बहुत सोच समझ कर जाना चाहिए।
मक्का मोअज्जिमा में हरम के इर्द-गिर्द की जो इमारतें और बाजार तोड़े गए, उनमें हरम के बाब अब्दुल अजीज के सामने से अजीयाद रोड पर बने अस्पताल तक मंहगे आलीशान होटल बन चुके है। दाहिनी तरफ हिल्टन होटल की सात इमारतें और एक इंटर कांटीनेंटल होटल खड़ा है। मरवा की पहाडि़यों की तरफ जो बहुत बड़े बाजार थे और लाखों हाजियों के ठहराने की जो इमारते बनी थी वह सब टूट चुकी हैं। बाब उस्सलाम खत्म किया जा चुका है। एक भी चाय खाना, सस्ते खाने के होटल और नाई की दुकानें नहीं बची है। अब अगर कोई हाजी एक कप चाय भी पीना चाहेगा तो उसे एक या दो रियाल की चाय न मिलकर कम से कम दस और ज्यादा से ज्यादा बीस रियाल की चाय मिलेगी, क्योंकि फाइव स्टार होटलों के रेट यही हैं। इन होटलों में खाना खाने का तो आम हाजी तसव्वुर भी नहीं कर सकता। क्योंकि उनमें सिर्फ सुबह के नाश्ते के लिए साठ से सौ रियाल तक वसूले जाते हैं। इस सिलसिले में जब हमने कुछ मकामी शाही अफसरान से बात करने की कोशिश की तो कोई बात करने को तैयार नहीं हुआ। अल्लाह के घर के बंदोबस्त में लगे एक छोटे अफसर ने सिर्फ इतना कहा कि जबल-ए-उमर को तोड़ने का काम चल रहा है, वहां पर बड़ी तादाद में सस्ते होटल बनेंगे। जवल-ए-उमर तोड़ने का काम कब मुकम्मल होगा इस पर उनका जवाब था, तीन साल। फिर इमारते कब तक बन पाएंगी, इस सवाल का उन्होने हाथ के इशारे से जवाब दिया और कहा कि पता नहीं।
महंगे होटल-expensive hotelहरम शरीफ के अंदर दाखिल होने में भी अब गैर-सऊदियों के लिए तरह-तरह की पाबंदियां हैं। ख्वातीन के बैग तक सख्ती के साथ चेक किए जाते हैं। उन्हें पानी की छोटी बोतल भी अंदर ले जाने की इजाज़त नहीं है। लेकिन सऊदी शहरी अपने साथ खाने-पीने का सामान और असलहों के अलावा कुछ भी अंदर ले जा सकते हैं। मदीना मुनव्वरा में मस्जिदे नबवी के बंदोबस्त में तो कुछ अजीब ही किस्म की तब्दीलियां हुई हैं। रसूल अल्लाह (सल-) के रौज़े की ज़ियारत के लिए ख्वातीन को सुबह साढ़े आठ से ग्यारह बजे तक, जुहर के आधे घंटे बाद से अस्र से आधा घंटा पहले तक और मगरिब के बाद थोड़ी देर तक आधे घंटे के लिए इजाजत मिलती है क्योंकि उनके लिए कनात वगैरह लगाकर पर्दे का बंदोबस्त करना पड़ता है। इन अवकात में भी अंदर तैनात सऊदी ख्वातीन पुलिस, सऊदी ख्वातीन, ईरानी, अफ्रीकी, अमरीकी, रूसी, चीनी और पाकिस्तानी ख्वातीन की अलग-अलग कतारें लगवाती है। भारत-बांग्लादेश और श्रीलंका का कोई जिक्र नहीं है। इन मुल्कों की ख्वातीन पाकिस्तानी ख्वातीन के साथ ही खड़ी हो जाती हैं। रौज़े की जियारत में भी अमरीकी और सऊदी ख्वातीन को तरजीह दी जाती है। मदीने में भी हरम शरीफ और जन्नत उल बकीअ कबु्रस्तान के दरमियान बाऊंड्री से लगा एक बड़ा बाज़ार हुआ करता था, जहां लोगों को सस्ती चाय, तस्वीह और मुसल्ले वगैरह मिल जाते थे, वह बाजार तोड़े जा चुके हैं और उनकी जगह पर बड़े होटलों की इमारतें बन गई हैं।
महंगे होटल-expensive hotelकुरआन और हदीस के मुताबिक मक्का मोअज्जिमा शहर अल्लाह ने अपने घर और घर में हाजिरी देने वाले बंदों के लिए मुंतखब किया है। अल्लाह के घर का तवाफ करने आने वाले किसी भी शख्स से मक्का में रिहाइश और खाने-पीने का कोई मुआवजा नहीं वसूला जाएगा। लेकिन सऊदी शाही हुकूमत अल्लाह के घर का तवाफ करने आने वाले हाजियों पर साल दर साल मआशी (आर्थिक) बोझ में इजाफा ही करती जा रही है। अरबी चूंकि उनकी जुबान है, मुमकिन है कि इस सिलसिले में उन्होने कुरआन और हदीस को दूसरों के मुकाबले कुछ ज्यादा ही समझ कर यह फैसला किया हो। मक्का मोअज्जिमा और मदीना मुनव्वरा दोनों ही जगह यहूदियों, अमरीकियों और इसाई ग्रुप के आलीशान होटल बनते जा रहे है। इन होटलों के ज़रिए दुनिया भर के मुसलमानों के खून पसीने की कमाई का अरबों डालर हर साल इन इंटरनेशनल होटलों के यहूदी और इसाई मालिकान को रायल्टी की शक्ल में जाता है। मिसाल के तौर पर मक्का मोअज्जिमामें हरम शरीफ के ठीक सामने बना हिल्टन होटल, हर साल तकरीबन दो सौ पचहत्तर करोड़ रुपए का मुनाफा कमाता है जिसका बीस फीसद यानि पचपन करोड़ रुपए उसके मालिकान को रायल्टी की शक्ल में जाता है। यह तो सिर्फ एक होटल की बात है ऐसे बेशुमार इंटरनेशनल कंपनियों के होटल वहां बन चुके हैं या बनवाएं जा रहे है।
महंगे होटल-expensive hotelअब ज़ाहिर है जिन होटलों के मालिकान यहूदी और इसाई होंगे वह हज और उमरा का फरीजा अदा करने के लिए आने वालों को लूटने में कोई कसर नहीं रखेंगे। लिहाजा अब हाजी साहबान को बहुत सोच-समझ कर हज पर जाना होगा। हां, हरम शरीफ में एक बेहतर काम यह हो गया है कि सफा-मरवा के दरमियान सई करने की जगह को अब दोगुना कर दिया गया है, इसलिए अब हज और उमरा करने वालों को खासी आसानी होगी।

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