आरएसएस की शताब्दी वर्षगांठ पर पुस्तक का किया विमोचन
'आरएसएस @100 सेवा, एकता और त्याग की एक सदी'स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Saturday 18 July 2026 02:00:57 PM
नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने श्याम जाजू और अनुपम त्रिवेदी की पुस्तक ‘आरएसएस @100: सेवा, एकता और त्याग की एक सदी’ का विमोचन किया और कहाकि आरएसएस के स्वयंसेवकों के नि:स्वार्थ सेवाभाव और देश केप्रति अनुकरणीय कर्तव्यों से कई पीढ़ियां प्रेरित हैं। उपराष्ट्रपति ने कहाकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शताब्दी वर्षगांठ पर उपराष्ट्रपति भवन में पुस्तक विमोचन समारोह में भाग लेना उनके लिए व्यक्तिगत सम्मान की बात है, जिसके साथ उनका लंबा जुड़ाव है। उन्होंने संघ पर लिखी एक तमिल कविता का जिक्र किया। उपराष्ट्रपति ने कहाकि यह कविता संगठन की तुलना पवित्र गंगा से करती है, जो नि:स्वार्थ भाव से दूसरों के कल्याण केलिए अविरल बहती आ रही है, यह सेवा भावना है, जिसने संघ को उसकी शताब्दी यात्रा में मार्गदर्शन किया है।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने आरएसएस की जनकल्याण की सेवा भावना को पुस्तक में बखूबी दर्शाने केलिए लेखकों की सराहना की। उन्होंने कहाकि संघ की यात्रा भारत की सांस्कृतिक जड़ों, विरासत और परंपराओं को पुनर्जीवित करने, सुदृढ़ करने और पुनर्निर्माण करने की रही है। पुस्तक के शीर्षक का जिक्र करते हुए वे बोले कि संघ की सेवाभावना समाज केप्रति नि:स्वार्थ समर्पण को दर्शाती है, उन बंधनों को मजबूत करती है, जो भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करते हैं, स्वयंसेवकों का त्याग हमें याद दिलाता हैकि स्थायी संस्थान, समर्पण दृढ़ता और नि:स्वार्थ प्रयासों से ही बनते हैं। उपराष्ट्रपति ने आरएसएस की दैनिक शाखाओं से चरित्र निर्माण और नेतृत्व विकास पर दिए जाने वाले प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने शाखा को आत्मा की कार्यशाला बताया, जहां युवाओं की कच्ची ऊर्जा को राष्ट्रीय चरित्र में ढाला जाता है। उन्होंने कहाकि स्वयंसेवक का सार प्रत्येक व्यक्ति को सौंपी गई जिम्मेदारी की गरिमा को समर्पण और उत्कृष्टता केसाथ निभाना है।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहाकि आरएसएस ने भारत की सभ्यतागत विरासत, विविध परंपराओं, भाषाओं और आध्यात्मिक विचारों में गौरव की भावना को बढ़ावा देकर सांस्कृतिक निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहित किया है। उन्होंने कहाकि शताब्दी समारोह लाखों स्वयंसेवकों के समर्पण को स्वीकार करने का अवसर है और यहभी कहाकि संस्थाएं तभी कायम रहती हैं, जब उनमें दृढ़ विश्वास, प्रतिबद्धता और आम लोगों की अपने से बड़े उद्देश्यों केलिए काम करने की इच्छाशक्ति हो। ‘एक स्वयंसेवक प्रधानमंत्री: मोदी युग’ पुस्तक का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहाकि यह पुस्तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वयंसेवक से प्रधानमंत्री बनने तकके सफर को दर्शाती है। उन्होंने कहाकि प्रधानमंत्री ने निरंतर सेवा और राष्ट्र प्रथम के सिद्धांत को शासन के केंद्र में रखा है, जो आरएसएस के नि:स्वार्थ सेवा और राष्ट्र निर्माण पर अटूट जोर को प्रतिबिंबित करता है। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी इस मौके पर उपस्थित थे। उपराष्ट्रपति ने रक्षामंत्री के साथ हुई बातचीत को याद करते हुए कहाकि दोनों ने ही अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत जमीनीस्तर के कार्यकर्ता के रूपमें की थी, जो जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति से प्रेरित आंदोलन से जुड़े थे।
गंगा के उदाहरण से उन्होंने संघ की यात्रा को दृढ़ता प्रदान की, जो एक छोटी धारा बनकर एक विशाल गंगा बन जाती है। उपराष्ट्रपति ने कहाकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भी एक छोटे से संगठन के रूपमें शुरुआत हुई और दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठनों में से एक बन गया है। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में दिल्ली विधानसभा के अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष राम बहादुर राय, आरएसएस क्षेत्र संघचालक पवन जिंदल, प्रभात प्रकाशन के प्रबंध निदेशक प्रभात कुमार और गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। गौरतलब हैकि आज संघ को सांस्कृतिक संस्कारी और राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत स्वयंसेवी संगठन माना जाता है, जो भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के देशों में भी अपनी ख्याति बिखेर रहा है। दुनिया के देश भी अपने देश के चरित्र निर्माण केलिए संघ की गतिविधियों का अनुसरण करते हैं।