सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सबसे बड़ी ज्ञात बस्ती है राखीगढ़ी
वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए एएनएसआई को सौंपे गए अवशेषस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Monday 22 June 2026 03:24:30 PM
राखीगढ़ी (हरियाणा)। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के अधीन प्रतिष्ठित राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान, भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण को हरियाणा के राखीगढ़ी पुरातात्विक स्थल से प्राप्त मानव कंकाल अवशेषों को विस्तृत वैज्ञानिक जांच केलिए औपचारिक रूपसे सौंप दिया है। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के निदेशक प्रोफेसर बीवी शर्मा ने इसपर कहा हैकि दोनों संस्थानों केबीच हालही में हस्ताक्षरित समझौता ज्ञापन के अंतर्गत किए गए इस हस्तांतरण से सिंधु-सरस्वती सभ्यता के सबसे महत्वपूर्ण शहरी केंद्रों में से एकमें बहुविषयक अनुसंधान को बढ़ावा देने की उम्मीद है। लगभग 550 हेक्टेयर में फैला राखीगढ़ी सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सबसे बड़ी ज्ञात बस्ती के रूपमें मान्यता प्राप्त है। यहां पुरातात्विक उत्खनन से प्रारंभिक हड़प्पाकाल से परिपक्व हड़प्पाकाल तक निरंतर बसावट के प्रमाण मिले हैं।
सिंधु-सरस्वती सभ्यता की यहां नियोजित बस्तियां, जल निकासी व्यवस्था, शिल्प उत्पादन केंद्र, व्यापार नेटवर्क और कब्रिस्तान हैं। वर्ष 2025-26 के क्षेत्र सत्रमें ग्रेटर नोएडा में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की उत्खनन शाखा-II के उत्खनन के दौरान पुरातत्वविदों ने टीला संख्या 7 में आठ कब्रें खोजीं, जिसे पहले कब्रिस्तान के रूपमें पहचाना था। तीन पूर्ण मानव कंकाल अन्य कब्रों से प्राप्त कंकाल के टुकड़ों केसाथ विस्तृत जांच केलिए कोलकाता भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के प्राचीन मानव कंकाल भंडार और प्रयोगशाला में स्थानांतरित कर दिए गए हैं। इन स्थलों से प्राप्त शेष कंकाल सामग्री को भी कुछ दिन में स्थानांतरित किए जाने की उम्मीद है। कंकाल जीवविज्ञान, पुरातत्व और आनुवंशिकी के क्षेत्रमें कई विद्वानों ने सिंधु-सरस्वती सभ्यता पर शोध के संबंध में भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण की पहल का स्वागत किया है। आंध्र विश्वविद्यालय के पूर्व संकाय सदस्य प्रोफेसर विजय प्रकाश ने कंकाल सामग्री के हस्तांतरण को पुरातात्विक उत्खनन से प्राप्त जैविक विरासत के वैज्ञानिक विश्लेषण और राष्ट्रीय संस्थानों की भावी पीढ़ियों के लाभ केलिए संरक्षण सुनिश्चित करने का एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।
लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर उदय प्रताप सिंह ने कहा हैकि यह हस्तांतरण भारत की पुरामानवविज्ञान अनुसंधान परंपरा को मजबूत करने में बड़ी उपलब्धि है। उन्होंने कहाकि मानव जीवविज्ञान और अस्थिविज्ञान में भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण की विशेषज्ञता इसे सिंधु-सरस्वती सभ्यता में जनसंख्या इतिहास, स्वास्थ्य, जीवनशैली और सांस्कृतिक अनुकूलन के पहलुओं को पुनर्निर्मित करने की एक मजबूत स्थिति में रखती है। शोधकर्ताओं का मानना हैकि ये अवशेष आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों को लागू करने का एक दुर्लभ अवसर प्रदान करते हैं, इनमें प्राचीन डीएनए विश्लेषण, स्टेबल आइसोटोप स्टडी, अस्थिविज्ञान संबंधी आकलन, पुरारोगविज्ञान संबंधी जांच और पर्यावरण पुनर्निर्माण प्रमुख हैं। इनसे हड़प्पाकाल के दौरान वंश, प्रवास पैटर्न, आहार, रोगों की व्यापकता, अनुकूलन रणनीतियों और मानव पर्यावरण अंतःक्रियाओं के बारेमें बहुमूल्य जानकारी मिलने की उम्मीद है। भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के अनुसार यह शोध प्रमुख वैज्ञानिक संस्थानों के सहयोग से किया जाएगा, जिनमें बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट ऑफ पैलियोसाइंसेज लखनऊ, यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन और प्राचीन डीएनए अनुसंधान में विशेषज्ञता रखनेवाले बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के विद्वानों की टीम शामिल है।
पद्मश्री डॉ कुमारस्वामी थंगराज ने इस पहल का स्वागत किया है। वे हैदराबाद के सेंटर फॉर सेलुलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी में वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं। उन्होंने कहाकि राखीगढ़ी के अवशेषों पर प्राचीन डीएनए तकनीक लागू करने से उनके आनुवंशिक इतिहास के बारेमें महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है और वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिल सकती हैकि लगभग 3000 ईसा पूर्व से मानव जीनोम कैसे विकसित और अनुकूलित हुए एवं प्राकृतिक चयन से गुजरे। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने भी इस सहयोग को हड़प्पा सभ्यता के जीनोमिक इतिहास के पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण कदम बताया है। उन्होंने कहाकि प्राचीन डीएनए अनुसंधान को अस्थिविज्ञान और समस्थानिक अध्ययनों केसाथ एकीकृत करके सिंधु घाटी की आबादी के वंश, स्वास्थ्य, गतिशीलता और जीवनशैली के बारेमें साक्ष्य प्राप्त होंगे, साथही जीवाश्मविज्ञान में भारतीय वैज्ञानिकों की नई पीढ़ी को प्रशिक्षित करने में भी मदद मिलेगी। अधिकारियों ने बतायाकि यद्यपि 1945 में अपनी स्थापना केबाद सेही भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने सिंधु-सरस्वती स्थलों से प्राप्त अवशेषों पर अस्थिविज्ञान अनुसंधान की एक लंबी परंपरा को बनाए रखा है, लेकिन विभिन्न चुनौतियों के कारण वर्षों से इस क्षेत्रमें गतिविधियां कम होती जा रही थीं। हालांकि हाल के वर्ष में संस्थान ने समर्पित अनुसंधान टीमों के गठन और वैज्ञानिक कर्मियों केलिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रमों से पुरामानवविज्ञान अनुसंधान को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए हैं।
भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण ने हालही में कई सिंधु-सरस्वती स्थलों से प्राप्त कंकाल अवशेषों पर पुरारोग विज्ञान संबंधी अध्ययन पूरा किया है और अपने निष्कर्षों के आधार पर वैज्ञानिक प्रकाशन तैयार कर रहा है। राखीगढ़ी अवशेषों के स्थानांतरण से अनुसंधान क्षमताओं को विशेष रूपसे प्राचीन डीएनए विश्लेषण के क्षेत्रमें और मजबूती मिलने की उम्मीद है। संस्थान भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण, भारतीय भूविज्ञान सर्वेक्षण और पुरातात्विक जलवायु पर काम कर रहे अनुसंधान समूहों जैसे संगठनों केसाथ सहयोग बढ़ाने की भी योजना बना रहा है। पुणे के दक्कन कॉलेज के पूर्व मानवविज्ञानी प्रोफेसर सुभाष वालिम्बे ने शहरीकरण के मानव जैविक और रोग संबंधी प्रतिक्रियाओं पर पड़ने वाले प्रभावों को समझने केलिए अवशेषों के गहन मानववैज्ञानिक अध्ययन के महत्व पर बल दिया। उन्होंने कहाकि चल रहे आनुवंशिक अध्ययन हड़प्पा सभ्यता की उत्पत्ति और जनसंख्या इतिहास से संबंधित लंबे समय से चली आरही बहसों में योगदान दे सकते हैं।
राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर किशोर के बासा ने भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण के भीतर कंकाल संबंधी जैविक अनुसंधान के पुनरुद्धार का स्वागत करते हुए कहाकि ऐसे अध्ययन न केवल मानवविज्ञान, बल्कि इतिहास, पुरातत्व, जनसंख्या अध्ययन, पोषण, रोग इतिहास और आनुवंशिकी केलिए भी प्रासंगिक हैं। अधिकारियों ने कहाकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और भारतीय मानवविज्ञान सर्वेक्षण केबीच यह सहयोग भारत के प्राचीन इतिहास के अध्ययन में पुरातत्व, मानव विज्ञान, आनुवंशिकी और पर्यावरण विज्ञान को एकीकृत करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। राखीगढ़ी अवशेषों से प्राप्त निष्कर्षों से विश्व की सबसे प्राचीन शहरी सभ्यताओं में से एककी उत्पत्ति, स्वास्थ्य, गतिशीलता और जैविक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण योगदान मिलने की उम्मीद है।