रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में समारोहपूर्वक अवतरण हुआ
भारतीय नौसेना में अग्रिम पंक्ति के युद्धपोत का असाधारण डिजाइनस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Saturday 11 July 2026 05:20:31 PM
विशाखापत्तनम। भारतीय नौसेना ने आज विशाखापत्तनम में स्वदेश निर्मित उन्नत स्टील्थ फ्रिगेट 'आईएनएस महेंद्रगिरि' को समारोहपूर्वक अपने पूर्वी बेड़े में शामिल कर लिया। रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने इसे अग्रिम पंक्ति के युद्धपोत को असाधारण डिजाइन क्षमताओं, विनिर्माण उत्कृष्टता, नौसेना औद्योगिक तंत्र के तीव्र विकास और समय पर अत्याधुनिक प्लेटफॉर्म प्रदान करने की क्षमता वाला जहाज और भारत की बढ़ती आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया। आईएनएस महेंद्रगिरि प्रोजेक्ट 17ए के अंतर्गत छठा स्वदेशी स्टील्थ फ्रिगेट है, जिसे मात्र डेढ़ वर्ष के अंतराल में भारतीय नौसेना में शामिल किया गया है। इस श्रृंखला का पहला जहाज 'आईएनएस नीलगिरि' जनवरी 2025 में शामिल किया गया था, जिसके बाद अगस्त में आईएनएस उदयगिरि और आईएनएस हिमगिरि इसवर्ष अप्रैल में आईएनएस तारागिरि और पिछले महीने आईएनएस दुनागिरि को शामिल किया गया।
भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा डिजाइन और मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड निर्मित यह जहाजी बेड़ा वायु रक्षा, सतह विरोधी युद्ध, पनडुब्बीरोधी युद्ध, समुद्री अवरोधन, निगरानी और मानवीय सहायता एवं आपदा राहत सहित समुद्री अभियानों को पूरा करने में सक्षम है। करीब 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री से निर्मित इस युद्धपोत का विस्थापन लगभग 6,670 टन है और यह 28 समुद्री मील प्रति घंटे तक की गति प्राप्त करने में सक्षम है। यह सुपरसोनिक सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइलों, मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों, पनडुब्बीरोधी युद्ध क्षमताओं और एक बहुभूमिका वाले हेलीकॉप्टर से सुसज्जित है, इसमें उन्नत स्टील्थ विशेषताएं, आधुनिक सेंसर, नेटवर्क केंद्रित युद्ध प्रणाली और अत्याधुनिक हथियार भी मौजूद हैं।
राजनाथ सिंह ने विश्वास व्यक्त कियाकि आईएनएस महेंद्रगिरि को दुनिया की सबसे तेज और सबसे घातक क्रूज मिसाइलों में से एक ब्रह्मोस सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल से सुसज्जित किया जा सकता है, इसमें बहुक्रियाशील रडार और सतह से वायु में मार करने वाली मिसाइलें लगी हैं, जो लंबी दूरी पर हवाई खतरों का पता लगाने और उन्हें निष्क्रिय करने में सक्षम है। इसके शस्त्रागार में स्वदेशी रॉकेट लॉंचर, टॉरपीडो लॉंचर, एकीकृत पनडुब्बी रोधी रक्षा प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और क्लोजइन वेपन सिस्टम भी शामिल हैं। उन्होंने कहाकि ये सभी क्षमताएं युद्धपोत को दुर्जेय और अभेद्य बनाती हैं, यह समुद्री पोत न केवल तट केपास, बल्कि गहरे महासागरों में भी भारत के समुद्री हितों की रक्षा करेगा। रक्षामंत्री ने कहाकि ड्रोन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, साइबर युद्ध, अंतरिक्ष आधारित क्षमताएं, हाइपरसोनिक हथियार और मानवरहित प्रणालियां जैसी उभरती प्रौद्योगिकियों ने युद्ध के स्वरूप को काफी हद तक बदल दिया है, फिरभी पारंपरिक सैन्य क्षमताएं प्रभावी रक्षा का आधार है। उन्होंने कहाकि भविष्य के युद्ध कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लड़े जा सकते हैं, लेकिन उन्हें राष्ट्रीय संकल्प, प्रशिक्षित सैनिकों और विश्वसनीय सैन्य शक्ति से ही जीता जाएगा।
उन्होंने कहाकि उन्नत प्रौद्योगिकियां और पारंपरिक प्रणालियां एकदूसरे की पूरक हैं, न कि प्रतिस्पर्धी। राजनाथ सिंह ने अगली पीढ़ी की प्रौद्योगिकियों में निवेश करते हुए अपनी पारंपरिक क्षमताओं को मजबूत करने केप्रति संतुलित दृष्टिकोण बनाए रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की। उन्होंने कहाकि ऑपरेशन सिंदूर राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा केलिए पारंपरिक और आधुनिक क्षमताओं के प्रभावी एकीकरण का एक उत्कृष्ट उदाहरण था। उन्होंने कहाकि आईएनएस महेन्द्रगिरि तकनीकी रूपसे उन्नत और युद्ध केलिए तैयार नौसेना के निर्माण के प्रति राष्ट्र की प्रतिबद्धता का प्रतीक है। रक्षामंत्री ने कहाकि समुद्री और आर्थिक सुरक्षा आपस में घनिष्ठ रूपसे जुड़ी हुई है और समुद्र न केवल राष्ट्रीय सुरक्षा बल्कि व्यापार, आपूर्ति श्रृंखला, ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए भी महत्वपूर्ण है। उन्होंने हिंद-प्रशांत क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का उल्लेख करते हुए क्षेत्र में सभी केलिए सुरक्षा और विकास (सागर) की परिकल्पना केप्रति सरकार की प्रतिबद्धता को दोहराया।
राजनाथ सिंह ने कहाकि भारत एक मजबूत सुरक्षा प्रदाता और एक विश्वसनीय भागीदार है, जो पूरे क्षेत्र में सुरक्षा और विकास सुनिश्चित करने केलिए समर्पित है। पश्चिम एशिया संघर्ष के दौरान भारतीय नौसेना की भूमिका का उल्लेख करते हुए रक्षामंत्री ने कहाकि ऊर्जा सुरक्षा अभियान के तहत नौसेना ने 9,000 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के आवश्यक माल से लदे 18 व्यापारिक जहाजों की रक्षा की। उन्होंने कहाकि ये प्रयास न केवल एक लड़ाकू बल, बल्कि भारत के आर्थिक हितों के प्रमुख रक्षक के रूपमें भी नौसेना की भूमिका को दर्शाते हैं। उन्होंने विश्वास व्यक्त कियाकि आईएनएस महेन्द्रगिरि इस समग्र समुद्री रणनीति को और मजबूत करेगा, यह पूर्वीतट की शक्ति को बढ़ाएगा, भारत की समुद्री पहुंच को बढ़ाएगा और हिंद महासागर क्षेत्र में इसकी उपस्थिति को और मजबूत करेगा। राजनाथ सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि स्वदेशी युद्धपोत निर्माण केवल युद्धक मंचों के निर्माण तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह डिजाइन क्षमताओं, तकनीकी विशेषज्ञता, कुशल मानव संसाधन और समग्र समुद्री औद्योगिक तंत्र को भी मजबूत करता है।
रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहाकि देश मैरीटाइम इंडिया विजन 2030 जैसी पहलों के माध्यम से प्रगति कर रहा है, इसका उद्देश्य बंदरगाहों का आधुनिकीकरण करना, अंतर्देशीय जलमार्गों का विस्तार करना, रसद नेटवर्क को मजबूत करना और विश्वस्तरीय समुद्री तंत्र विकसित करना है। उन्होंने समुद्री विकास कोष, जहाज निर्माण वित्तीय सहायता योजना और जहाज निर्माण विकास योजना सहित प्रमुख उपायों का भी उल्लेख किया, जिनका उद्देश्य औद्योगिक क्षमता को बढ़ाना, आत्मनिर्भरता को मजबूत करना और आर्थिक हितों की रक्षा करना है। राजनाथ सिंह ने देश के युवा उद्यमियों, इंजीनियरों, नवोन्मेषकों, शोधकर्ताओं और निवेशकों से भविष्य के युद्ध की दिशा तय करने वाली प्रौद्योगिकियों को विकसित करके राष्ट्र निर्माण में योगदान देने और भारत को आत्मनिर्भर बनाने वाली प्रणालियों का निर्माण करने का आह्वान किया। नौसेना प्रमुख एडमिरल कृष्ण स्वामीनाथन ने आईएनएस महेन्द्रगिरि को भारत की बढ़ती समुद्री क्षमता और तकनीकी आत्मनिर्भरता का प्रतीक बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दियाकि भारतीय नौसेना युद्ध के लिए तैयार, विश्वसनीय, एकजुट और भविष्य केलिए तैयार बल है।
नौसेना प्रमुख ने कहाकि 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री केसाथ साथ एमडीएल और नौसेना ने इस परियोजना में कई नए मानदंड स्थापित किए हैं, जिनमें शुरू करने से लेकर सुपुर्दगी तक की समयावधि में लगभग 50 प्रतिशत की कमी शामिल है, यह अवधि 63 महीने से घटकर 31 महीने हो गई है। उन्होंने यहभी बतायाकि कुल निर्माण समय में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आई है, यह 95 महीने से घटकर 75 महीने हो गया है और सभी तकनीकी विश्लेषण सामान्यतः लगने वाले पांच से सात समुद्री परीक्षणों के बजाय केवल एक ही समुद्री परीक्षण में पूरे कर लिए गए हैं। समारोह में कमीशनिंग पताका को पारंपरिक रूपसे तोड़कर जहाज पर राष्ट्रीय ध्वज को पहली बार फहराया गया। इस अवसर पर पूर्वी नौसेना कमान के फ्लैग ऑफिसर कमान इन चीफ वाइस एडमिरल संजय भल्ला, सीएमडी, एमडीएल कैप्टन जगमोहन, वरिष्ठ नौसेना अधिकारी, पूर्व सैनिक, जहाज निर्माण उद्योग के प्रतिनिधि उपस्थित थे।