भाषाएं संस्कृति, परंपरा और पहचान की वाहक-उपराष्ट्रपति
सिंधी भाषा दिवस पर भारत की भाषाई विविधता का सम्मानस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Friday 10 April 2026 04:24:15 PM
नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने देवनागरी और फारसी लिपियों में भारतीय संविधान का सिंधी भाषा में भी नवीनतम संस्करण जारी कर दिया है। उपराष्ट्रपति ने सिंधी भाषा दिवस पर आज उपराष्ट्रपति भवन में एक कार्यक्रम में सिंधी भाषी समुदाय को शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहाकि सिंधी सबसे प्राचीन भाषाओं में से एक है और इसकी साहित्यिक परंपरा वेदांतिक दर्शन और सूफी विचारों के अनूठे संगम को दर्शाती है, जो एकता प्रेम और भाईचारे के सार्वभौमिक मूल्यों को बढ़ावा देती है। उपराष्ट्रपति ने कहाकि स्वतंत्रता केबाद पहलीबार सिंधी भाषा में विशेष रूपसे देवनागरी लिपि में संविधान का प्रकाशन भाषाई समावेशिता को बढ़ावा देने वाला एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहाकि संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि राष्ट्र की जीवंत आत्मा है, जो इसकी आकांक्षाओं को समाहित करती है, अधिकारों की रक्षा करती है और लोकतांत्रिक शासन का मार्गदर्शन करती है
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने नरेंद्र मोदी सरकार के संविधान को अनेक भारतीय भाषाओं में सुलभ बनाने के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कहाकि इस प्रकार की पहल नागरिकों और शासन केबीच अंतर को कम करने में सहायक होती है, क्योंकि इससे लोग संविधान को अपनी मातृभाषा में समझ पाते हैं, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी और विश्वास मजबूत होता है। उपराष्ट्रपति ने संविधान को बोडो, डोगरी, संथाली, तमिल, गुजराती और नेपाली आदि भाषाओं में उपलब्ध कराने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहाकि ये प्रयास भारत की भाषाई विविधता का सम्मान करते हैं और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ बनाते हैं। सिंधी समुदाय की ऐतिहासिक यात्रा का वर्णन करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहाकि विभाजन केबाद के कठिन समय में यह भाषा दृढ़ता और एकता का प्रतीक रही। उन्होंने कहाकि सिंधी भाषा को 1967 में 21वें संवैधानिक संशोधन से संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया था, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व को मान्यता मिली और आनेवाली पीढ़ियों केलिए इसका संरक्षण सुनिश्चित हुआ।
उपराष्ट्रपति ने कहाकि मातृभाषा केसाथ-साथ सभी भाषाओं को समान महत्व और सम्मान मिलना चाहिए। उन्होंने कहाकि भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है और भाषाएं संस्कृति, परंपरा और पहचान की वाहक हैं। उपराष्ट्रपति ने संविधान को क्षेत्रीय भाषाओं में सुलभ बनाने केलिए विधि एवं न्याय मंत्रालय, विशेषकर क्षेत्रीय भाषा अधिकारियों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि ऐसी पहल नागरिकों को सशक्त बनाने और वर्ष 2047 तक विकसित भारत के दृष्टिकोण को मजबूत करने में योगदान देगी। उपराष्ट्रपति ने विविधता में एकता की भावना और राष्ट्र प्रथम के मार्गदर्शक सिद्धांत को दोहराते हुए नागरिकों से अपनी मातृभाषाओं केसाथ-साथ राष्ट्र की सामूहिक भाषाई विरासत का सम्मान करने का आग्रह किया। इस अवसर पर केंद्रीय विधि एवं न्याय राज्यमंत्री अर्जुनराम मेघवाल, राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष वासुदेव देवनानी, लोकसभा सांसद शंकर लालवानी और विधायी विभाग के सचिव डॉ राजीव मणि भी उपस्थित थे।