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सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।

सोमनाथ का द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान

सोमनाथ मंदिर सनातन धर्म का अटूट साहस, विश्वास और संकल्प

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Sunday 11 January 2026 01:29:05 PM

somnath swabhiman festival

प्रभास पाटन (गुजरात)। गुजरात के सोमनाथ को 'सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्। उज्जयिन्यां महाकालम्ॐकारममलेश्वरम्।।' द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम के इस आरंभिक श्लोक में बारह पवित्र ज्योतिर्लिंगों में प्रथम स्थान पर रखा गया है, जिससे भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में उसके महत्व का पता चलता है। यह उस सभ्यतागत विश्वास को प्रतिबिंबित करता है जिसमें सोमनाथ भारत के आध्यात्मिक भूगोल का आधार माना गया है। गुजरात में वेरावल के निकट प्रभास पाटन में स्थित सोमनाथ केवल एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक जीवंत प्रतीक है। सोमनाथ सदियों से करोड़ों लोगों की श्रद्धा और उपासना का केंद्र है। इसे बार-बार उन आक्रमणकारियों ने निशाना बनाया, जिनका उद्देश्य भक्ति नहीं, बल्कि विनाश था। इसके बावजूद सोमनाथ की कथा सनातन धर्म को मानने वाले करोड़ों लोगों के अटूट साहस, विश्वास और संकल्प से जानी जाती है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व 8 जनवरी से 11 जनवरी 2026 तक एक राष्ट्रीय उत्सव के रूपमें मनाया जा रहा है। यह स्मरणोत्सव जनवरी 1026 में सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले अभिलिखित आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने पर मनाया जा रहा है। इस आयोजन की परिकल्पना विनाश के स्मरण के रूपमें नहीं, बल्कि सहनशीलता, विश्वास और सभ्यतागत आत्मसम्मान पर की गई है। सदियों से सोमनाथ को बार-बार उन आक्रमणकारियों ने निशाना बनाया, जिनका उद्देश्य भक्ति के बजाय विनाश और कत्लेआम करके धन को लूटना था। हालांकि हरबार देवी अहिल्या बाई होल्कर जैसे भक्तों के सामूहिक संकल्प से सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। पुनरुद्धार के इस अटूट चक्र ने सोमनाथ को भारत की सभ्यतागत निरंतरता का एक शक्तिशाली प्रतीक बना दिया। यह वर्ष उस समय के भी 75 साल पूरे होने का अवसर है। स्वतंत्रता के बाद 11 मई 1951 को मौजूदा सोमनाथ मंदिर को भक्तों केलिए फिर से खोला गया था। ये दोनों अहम पड़ाव सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का आधार बने हैं।
सोमनाथ मंदिर के चार दिवसीय पर्व के दौरान सोमनाथ आध्यात्मिक गतिविधियों, सांस्कृतिक चिंतन और राष्ट्रीय स्मरण के केंद्र में परिवर्तित हो गया है। इसकी मुख्य विशेषता 72 घंटे का अखंड ओंकार जाप है, जो एकता और सामूहिक विश्वास का प्रतीक है। इसके साथ ही पूरे मंदिर परिसर और नगर में भक्ति संगीत, आध्यात्मिक विमर्श और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत की सनातन सभ्यता की यात्रा में गौरव, स्मरण और विश्वास की एक सामूहिक अभिव्यक्ति के रूप में खड़ा है। सोमनाथ की ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन भारतीय परंपरा में बहुत गहरी हैं। प्रभास तीर्थ, जहां सोमनाथ विराजमान हैं, भगवान शिव की चंद्रदेव द्वारा की गई आराधना से जुड़ा हुआ है। परंपरा के अनुसार चंद्रदेव ने यहां भगवान शिव की आराधना की थी और उन्हें उनके श्राप से मुक्ति मिली थी, जो इस स्थान को अपार आध्यात्मिक महत्व प्रदान करता है। सदियों से सोमनाथ मंदिर, अपने निर्माण के कई चरणों का साक्षी रहा, जिनमें से प्रत्येक उस समय की भक्ति, कलात्मकता और संसाधनों को दर्शाता है। प्राचीन वृत्तांत विभिन्न सामग्रियों का उपयोग करके बनाए गए क्रमिक मंदिरों का वर्णन करते हैं, जो नवीनीकरण और निरंतरता का प्रतीक हैं।
सोमनाथ के इतिहास का सबसे उथल-पुथल भरा चरण ग्यारहवीं शताब्दी में शुरू हुआ। सोमनाथ को जनवरी 1026 में आक्रमणकारियों के अपने पहले अभिलिखित हमले का सामना करना पड़ा। इसने एक लंबी अवधि की शुरुआत की, जिसके दौरान सदियों तक मंदिर को बार-बार नष्ट किया गया और फिर से बनाया गया। इसके बावजूद सोमनाथ लोगों की सामूहिक चेतना से कभी ओझल नहीं हुआ। मंदिर के विनाश और पुनरुद्धार का यह चक्र विश्व इतिहास में अद्वितीय है। यह दर्शाता हैकि सोमनाथ कभी भी केवल पत्थर की एक संरचना मात्र नहीं था, बल्कि आस्था, पहचान और सभ्यतागत गौरव का एक जीवंत प्रतीक था। वर्ष 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ के खंडहरों का दौरा किया और मंदिर के पुनर्निर्माण का अपना दृढ़ संकल्प व्यक्त किया। उनका दृष्टिकोण इस विश्वास पर आधारित थाकि सोमनाथ का पुनरुद्धार भारत के सांस्कृतिक विश्वास को बहाल करने केलिए अनिवार्य है। यह पुनर्निर्माण जनभागीदारी और राष्ट्रीय संकल्प केसाथ शुरू किया गया था। कैलाश महामेरु प्रसाद स्थापत्य शैली में निर्मित वर्तमान मंदिर की प्राणप्रतिष्ठा 11 मई 1951 को की गई थी। यह समारोह केवल एक मंदिर के पुनः खुलने का प्रतीक नहीं था, बल्कि भारत के सभ्यतागत आत्मसम्मान की पुष्टि थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 31 अक्टूबर 2001 को उस कार्यक्रम में भाग लिया था, जो 1951 में भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के पुन: खुलने के 50 वर्ष पूरे होने पर आयोजित किया गया था। इस अवसर पर मंदिर के पुनर्निर्माण में सरदार वल्लभभाई पटेल, केएम मुंशी और कई लोगों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला गया था। यह कार्यक्रम सरदार वल्लभभाई पटेल की 125वीं जयंती पर आयोजित हुआ था और इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और गणमान्य व्यक्तियों ने भाग लिया था। वर्ष 2026 में राष्ट्र 1951 के उस ऐतिहासिक समारोह के 75 वर्ष पूरे होने का उत्सव मना रहा है। यह न केवल सोमनाथ मंदिर के पुन: खुलने का प्रतीक था, बल्कि भारत के सभ्यतागत स्वाभिमान की पुनर्स्थापना भी थी। साढ़े सात दशक बाद सोमनाथ एक नए कायाकल्प के साथ खड़ा है, जो उस सामूहिक राष्ट्रीय संकल्प की चिरस्थायी शक्ति को प्रतिबिंबित करता है। सोमनाथ को भगवान शिव के 12 आदि ज्योतिर्लिंगों में प्रथमत: पूजा जाता है। मंदिर परिसर में गर्भगृह, सभामंडप और नृत्यमंडप है, जो अरब सागर के तट पर भव्यता के साथ खड़े हैं।
सोमनाथ मंदिर के शिखर की ऊंचाई 150 फीट है, जिसके शीर्ष पर 10 टन भारी कलश सुशोभित है। इसका 27 फीट ऊंचा ध्वजदंड मंदिर की आध्यात्मिक उपस्थिति का प्रतीक है। सोमनाथ परिसर 1,666 स्वर्णमंडित कलशों और 14,200 ध्वजाओं से सुसज्जित है, जो पीढ़ियों की भक्ति और उत्कृष्ट शिल्प कौशल का प्रतीक हैं। सोमनाथ निरंतर जीवंत उपासना का केंद्र बना हुआ है। श्रद्धालुओं की संख्या हमेशा से अधिक रही है, जो एक वर्ष में 92 से 97 लाख भक्तों के बीच रहती है यानी 2020 में लगभग 98 लाख तीर्थयात्रियों ने सोमनाथ मंदिर के दर्शन किए। बिल्व पूजा जैसे अनुष्ठानों में 13.77 लाख से अधिक भक्त हिस्सा लेते हैं। पिछले वर्ष 2025 की महाशिवरात्रि पर 3.56 लाख श्रद्धालु यहां आए थे। सोमनाथ के इतिहास से भक्तों को जोड़ने में सांस्कृतिक पहलों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्ष 2003 में शुरू किया गया प्रकाश एवं ध्वनि शो को 2017 में कथा वृतांत और 3डी लेज़र तकनीक केसाथ आधुनिक बनाया गया है। पिछले तीन वर्ष में इस शो को 10 लाख से अधिक दर्शक देख चुके हैं। 'वंदे सोमनाथ कला महोत्सव' जैसे कार्यक्रमों ने लगभग 1,500 वर्ष पुरानी नृत्य परंपराओं को पुनर्जीवित किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, श्रीसोमनाथ ट्रस्ट के प्रमुख हैं। उनके नेतृत्व में सोमनाथ अपने पुनरुद्धार के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व से पहले सोमनाथ में एक अनूठा आध्यात्मिक उत्साह का वातावरण देखा गया। गिरनार तीर्थक्षेत्र और अन्य पवित्र केंद्रों के संतों ने शंख चौक से सोमनाथ मंदिर तक पदयात्रा की। यह शोभायात्रा भगवान शिव के प्रिय डमरू, पारंपरिक वाद्ययंत्रों और भक्ति संगीत की ध्वनि से गुंजायमान थी। सिद्धिविनायक ढोल समूह के लगभग 75 ढोल वादकों ने इसमें भाग लिया, जिससे एक लयबद्ध और आध्यात्मिक रूपसे ऊर्जामय वातावरण निर्मित हुआ। पूरा मंदिर परिसर में हर हर महादेव का जयकारा गूंज उठा। संतों और विशिष्ट प्रतिभागियों ने गहरी श्रद्धा केसाथ आराधना की। इस पदयात्रा का स्वागत पुष्प वर्षा केसाथ किया गया और मंदिर परिसर दिव्य भव्यता में बदल गया। उपस्थित श्रद्धालुओं ने आध्यात्मिक संतोष और पूर्णता की एक गहरी सांस ली है। प्रधानमंत्री ने सोमनाथ में स्वाभिमान पर्व पर प्रमुख आध्यात्मिक कार्यक्रमों में भाग लिया। वे मंदिर परिसर में ओंकार मंत्र जाप में शामिल हुए। वे 72 घंटे के अखंड ओंकार जाप में भी शामिल हुए, जो आस्था की निरंतरता, एकता और सभ्यता की शक्ति का प्रतीक है। प्रधानमंत्री ने स्वाभिमान पर्व समारोह में भव्य ड्रोन शो का भी अवलोकन किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शौर्य यात्रा का नेतृत्व किया। यह यात्रा सोमनाथ स्वाभिमान पर्व का एक प्रतीकात्मक जुलूस थी। यह साहस, बलिदान और अदम्य भावना का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने सदियों से विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सोमनाथ को सुरक्षित रखा। प्रधानमंत्री ने सोमनाथ मंदिर में पूजा अर्चना की। सोमनाथ में जन समूह को संबोधित किया। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में प्रधानमंत्री की भागीदारी उसके राष्ट्रीय महत्व को रेखांकित करती है। सोमनाथ स्वाभिमान पर्व भारत के सभ्यतागत आत्मविश्वास की पुष्टि करता है। यह विनाश पर जीवंतता और भय पर आस्था की विजय का सम्मान है। सौराष्ट्र के तट पर अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर दुनियाभर में भारतीयों को प्रेरित करता है। यहां विनाशकारी शक्तियां इतिहास के पन्नों में ओझल हो जाती हैं। आदिनाथेन शर्वेण सर्वप्राणिहिताय वै। आद्यतत्त्वान्यथानीयं क्षेत्रमेतन्महाप्रभम्। प्रभासितं महादेवि यत्र सिद्ध्यन्ति मानवाः॥ अर्थ है-सर्वशक्तिमान भगवान शिव ने अपने आदिनाथ स्वरूप में समस्त प्राणियों के कल्याण हेतु अपने शाश्वत सिद्धांत और संकल्प से इस अत्यंत शक्तिशाली और पवित्र क्षेत्र को प्रकट किया, जिसे प्रभास खंड के नाम से जाना जाता है। दिव्य आभा से आलोकित यह पुण्य भूमि वह स्थान है, जहां मनुष्यों को आध्यात्मिक पूर्णता, पुण्य और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

हिन्दी या अंग्रेजी [भाषा बदलने के लिए प्रेस F12]