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असमिया इतिहास से परे लाचित बरफुकन की वीरता!

'लाचित बरफुकन: औरंगज़ेब की सेना को पराजित करने वाले महान योद्धा'

दिल्ली में लाचित बरफुकन को भावपूर्ण श्रद्धांजलि और पुस्तक विमोचन

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Saturday 29 November 2025 01:55:39 PM

heartfelt tribute to lachit barphukan and book release in delhi

नई दिल्ली। असम के वीर अहोम सेनापति लाचित बरफुकन की वीरता पर केंद्रित जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ रक्तिम पातर की लिखित और प्रभात प्रकाशन की प्रकाशित पुस्तक ‘लाचित बरफुकन: औरंगज़ेब की सेना को पराजित करने वाले महान योद्धा’ का दिल्ली के केशव कुंज स्थित विचार विनिमय सभागार में समारोहपूर्वक विमोचन किया गया। यह पुस्तक लाचित बरफुकन को एक भावपूर्ण श्रद्धांजलि है, उन्हें अपने अद्वितीय सैन्य नेतृत्व और देशकी सभ्यतागत विरासत की रक्षा में निभाई गई अनुकरणीय भूमिका केलिए जाना जाता है। यह पुस्तक उनकी रणनीतिक प्रतिभा और राष्ट्र की सामूहिक स्मृति में उनके अमिट योगदान के वृत्तांत को प्रस्तुत करती है। पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र की प्रमुख डॉ वैलेंटिना ब्रह्मा के उत्साहपूर्ण स्वागत भाषण से कार्यक्रम की शुरुआत हुई।
केंद्रीय विदेश राज्यमंत्री पबित्रा मार्गेरिटा कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहाकि लाचित बरफुकन का सर्वोच्च समर्पण मूलतः राष्ट्र की आत्मा की विजय है। उन्होंने कहा चूंकि वह स्वयं अहोम वंश से हैं, इसलिए यह विषय उनके लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहाकि लाचित बरफुकन की वीरता असमिया इतिहास से परे है, यह समस्त भारत की शौर्यगाथा की पुनर्स्थापना का प्रतिनिधित्व करती है। पबित्र मार्गेरिटा ने कहाकि लाचित बरफुकन की विजय केवल एक सेना पर नहीं, बल्कि उस अदम्य राष्ट्रीय भावना का प्रदर्शन थी, जिसे कभी पराजित नहीं किया जा सकता। प्रोफेसर धनंजय सिंह ने कहाकि लाचित बरफुकन एक सैन्य कमांडर से कहीं बढ़कर थे, वे साहस, कर्तव्यनिष्ठा और अटूट देशभक्ति की शाश्वत प्रतिमूर्ति हैं। उनका जीवन हमें सिखाता हैकि सच्चा शौर्य हथियारों में नहीं, बल्कि अपनी मातृभूमि और सांस्कृतिक विरासत केप्रति अगाध और अटूट प्रेम में निहित होता है।
लेखक डॉ रक्तिम पातर ने इस अवसर पर उल्लेख कियाकि असम केवल एक क्षेत्रीय राज्य नहीं, बल्कि भारत का पूर्वी सभ्यतागत प्रवेशद्वार है, एक ऐसा स्रोत जहां से सदियों से भक्ति, संस्कृति और ज्ञान प्रवाहित होता रहा है। उन्होंने कहाकि भारत में ऐतिहासिक आख्यानों में अक्सर पूर्वोत्तर क्षेत्र को वंचित रखा गया, यह पुस्तक उस उपेक्षा के भाव को सीधे चुनौती देती है और यह स्थापित करती हैकि यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय सभ्यता का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है। गौरतलब हैकि हिंदी में इस पुस्तक का प्रकाशन भारत के गौरवशाली इतिहास को व्यापक राष्ट्रीय पाठक वर्ग तक पहुंचाने की समर्पित पहल है। विमोचन कार्यक्रम का आयोजन सेंटर फॉर नॉर्थ ईस्ट स्टडीज़ (सीएनईएस), फोन फाउंडेशन और प्रभात प्रकाशन ने संयुक्त रूपसे किया था, जिसमें दिल्ली एनसीआर क्षेत्र के विद्वानों, शिक्षाविदों, लेखकों और विचारकों का प्रतिष्ठित समूह शामिल हुआ। भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद के सदस्य सचिव प्रोफेसर धनंजय सिंह भी उपस्थित थे। पुस्तक विमोचन कार्यक्रम का समापन पूर्वोत्तर अध्ययन केंद्र के अध्यक्ष सुरेंद्र घोंगक्रोक्ता ने धन्यवाद ज्ञापन से किया।

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