भगवान बुद्ध सभीके हैं और सभी को एकताबद्ध करते हैं-प्रधानमंत्री
नई दिल्ली में भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों की अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनीस्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Sunday 4 January 2026 12:26:57 PM
नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तथागत भगवान बुद्ध से संबंधित पिपरहवा के पवित्र अवशेषों की भव्य अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनी का किला राय पिथौरा सांस्कृतिक परिसर दिल्ली में समारोहपूर्वक उद्घाटन किया। प्रदर्शनी का शीर्षक है ‘प्रकाश और कमल: ज्ञान प्राप्त व्यक्ति के अवशेष’। प्रधानमंत्री ने प्रदर्शनी का भ्रमण किया और बैठे हुए बुद्ध की मूर्ति पर खटाक और गुलाब की पंखुड़ियां अर्पित कीं। उन्होंने पिपरावा स्थल से प्राप्त एक प्राचीन मुहर को पवित्र किया, बोधि वृक्ष का पौधा लगाया, आगंतुक पुस्तिका पर हस्ताक्षर किए, प्रदर्शनी सूची जारी की और उपस्थित बौद्ध भिक्षुओं को चिवर दान दिया। प्रधानमंत्री ने इस अवसर पर कहाकि 125 वर्ष के लंबे इंतजार केबाद भारत की विरासत और अनमोल धरोहर वापस घर आई हैं, यहां प्रदर्शनी में भारत के लोग भगवान बुद्ध के इन पवित्र अवशेषों के दर्शन कर सकेंगे और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे। नरेंद्र मोदी ने बौद्ध परंपरा से जुड़े संत और धर्माचार्यों केप्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त की और इच्छा जताईकि भगवान बुद्ध के आशीर्वाद से वर्ष 2026 दुनिया केलिए शांति, समृद्धि और सद्भाव के युग की शुरुआत करे।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाकि जिस जगह पर यह प्रदर्शनी लगाई गई है, वह स्वयं ही विशेष है, क़िला राय पिथौरा भारत के गौरवशाली इतिहास की भूमि है, यहां लगभग एक हजार साल पहले शासकों ने एक शहर की स्थापना की थी, इसे मजबूत और सुरक्षित दीवारों से घेरा गया था। उन्होंने कहाकि इसी ऐतिहासिक शहर परिसर में इतिहास का एक आध्यात्मिक और पवित्र अध्याय जोड़ा जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने कहाकि यहां आनेसे पहले उन्होंने इस ऐतिहासिक प्रदर्शनी का बारीकी से अवलोकन किया। उन्होंने कहाकि हमारे बीच भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के होने से हम सभीको आशीर्वाद मिलता है। उन्होंने कहाकि उनका भारत से जाने और अंततः वापसी दोनों ही अपने आपमें महत्वपूर्ण पाठ हैं। नरेंद्र मोदी ने कहाकि गुलामी केवल राजनीतिक और आर्थिक हितों को ही नुकसान नहीं पहुंचाती है, बल्कि यह हमारी धरोहर को भी नष्ट कर देती है। उन्होंने कहाकि यही भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों केसाथ हुआ, जिन्हें गुलामी के समय में देश से बाहर ले जाया गया और लगभग 125 वर्ष तक अवशेष विदेश में रहे।
नरेंद्र मोदी ने कहाकि जो लोग इन्हें लेकर गए, उनके और उनके वंशजों केलिए ये अवशेष केवल निर्जीव प्राचीन वस्तुएं थीं, इसी कारण से उन्होंने इन पवित्र अवशेषों को अंतर्राष्ट्रीय बाजार में नीलामी केलिए पेश करने का प्रयास किया। प्रधानमंत्री ने कहाकि भारत केलिए ये अवशेष हमारे पूजनीय देवता, हमारी सभ्यता का अविभाज्य हिस्सा हैं। उन्होंने घोषणा कीकि भारत ने तय किया हैकि इनकी सार्वजनिक नीलामी की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने गोदरेज समूह केप्रति आभार व्यक्त किया और बतायाकि उनके सहयोग से भगवान बुद्ध से जुड़े ये पवित्र अवशेष उनकी कर्मभूमि, उनकी चिंतन भूमि, उनकी महाबोधि भूमि और उनकी महापरिनिर्वाण भूमि में लौट आए हैं। प्रधानमंत्री ने कहाकि भगवान बुद्ध का ज्ञान और मार्ग समस्त मानवता का है और पिछले कुछ महीने में जहां-जहां भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेष पहुंचे हैं, वहां श्रद्धा और भक्ति की भावना उठी है, थाईलैंड इन पवित्र अवशेषों को विभिन्न स्थानों पर रखा गया था, एक महीने से भी कम समय में चालीस लाख से अधिक भक्त इनका दर्शन करने आए।
प्रधानमंत्री ने कहाकि वियतनाम में जनता की भावना इतनी प्रबल थीकि प्रदर्शनी की अवधि बढ़ानी पड़ी और नौ शहरों में लगभग 1.75 करोड़ लोगों ने अवशेषों केप्रति श्रद्धा व्यक्त की। उन्होंने यह भी इंगित कियाकि मंगोलिया में हजारों लोग गंदन मठ के बाहर घंटों इंतजार करते रहे और कई लोग केवल इसलिए भारतीय प्रतिनिधियों को छूना चाहते थे, क्योंकि वे बुद्ध की भूमि से आए थे। उन्होंने रेखांकित कियाकि रूस के किल्मिकिया क्षेत्रमें केवल एक सप्ताह में ही 1.5 लाख से अधिक भक्तों ने पवित्र अवशेषों को देखा। उन्होंने कहाकि रूस के काल्मिकिया क्षेत्रमें केवल एक सप्ताह में ही 1.5 लाख से अधिक भक्तों ने पवित्र अवशेषों को देखा, जो स्थानीय जनसंख्या के आधे से अधिक है। नरेंद्र मोदी ने कहाकि विभिन्न देशों में इन आयोजनों में चाहे आम नागरिक हों या सरकार के प्रमुख, सभी समान श्रद्धा केसाथ एकजुट थे, इसबात पर ध्यान आकर्षित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहाकि भगवान बुद्ध सभीके हैं और सभीको आपस में जोड़ते हैं। उन्होंने कहाकि वे खुद को बहुत भाग्यशाली मानते हैं, क्योंकि भगवान बुद्ध का उनके जीवन में गहरा प्रभाव है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने याद कियाकि उनका जन्मस्थान वडनगर बौद्ध अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र था और सारनाथ जहां भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया, उनकी कर्मभूमि है। उन्होंने साझा कियाकि जबभी वे सरकारी जिम्मेदारियों से दूर थे तो वे बौद्ध स्थलों की यात्रा एक तीर्थयात्री के रूपमें करते थे और प्रधानमंत्री के रूपमें उन्हें दुनियाभर में बौद्ध तीर्थ स्थलों का दौरा करने का अवसर मिला है। उन्होंने नेपाल के लुंबिनी में पवित्र माया देवी मंदिर में नमन करने का अनुभव साझा किया और इसे एक असाधारण अनुभव बताया। नरेंद्र मोदी ने कहाकि जापान के तो-जी मंदिर और किंकाकु-जी में उन्होंने महसूस कियाकि बुद्ध के संदेश समय की सीमाओं को पार कर जाते हैं। उन्होंने चीन के शीआन में जाइंट वाइल्ड गूस पगोडा में अपनी यात्रा का उल्लेख किया, जहां से बौद्ध ग्रंथ पूरे एशिया में फैले थे और जहां भारत की भूमिका अभी भी याद की जाती है। उन्होंने मंगोलिया में गंदन मठ की अपनी यात्रा को याद किया, जहां उन्होंने बुद्ध की विरासत केसाथ लोगों के गहरे भावनात्मक जुड़ाव को देखा। उन्होंने कहाकि श्रीलंका के अनुराधापुरा में जयश्री महाबोधि को देखना सम्राट अशोक, भिक्षु महिंदा और संघमित्रा की बोई परंपरा से जुड़ने का अनुभव था।
प्रधानमंत्री ने कहाकि थाईलैंड में वाट फो और सिंगापुर में बुद्ध टूथ रिलिक मंदिर की उनकी यात्राओं ने भगवान बुद्ध की शिक्षाओं के प्रभाव को समझने में उनके अनुभव को और गहरा किया। प्रधानमंत्री ने कहाकि जहां भी वे यात्रा करते हैं, वे भगवान बुद्ध की विरासत का एक प्रतीक लाने का प्रयास करते हैं। उन्होंने बतायाकि वे चीन, जापान, कोरिया और मंगोलिया बोधि वृक्ष के पौधे साथ लेकर गए थे। उन्होंने कहाकि कोईभी मानवता केलिए इसके गहरे संदेश की कल्पना कर सकता है, जब हिरोशिमा के बोटैनिकल गार्डन में एक बोधि वृक्ष मौजूद हो, जो परमाणु बम से प्रभावित शहर है। प्रधानमंत्री ने कहाकि भगवान बुद्ध की यह साझा विरासत इस बातका प्रमाण हैकि भारत केवल राजनीति, कूटनीति और अर्थव्यवस्था के माध्यम से नहीं जुड़ा है, बल्कि गहरे संबंधों से भी जुड़ा है। नरेंद्र मोदी ने कहाकि भारत मन और भावनाओं, आस्था और आध्यात्मिकता से जुड़ा हुआ है। प्रधानमंत्री ने उत्साहित होकर कहाकि भारत न केवल भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों का संरक्षक है, बल्कि उनकी परंपरा का जीवित संवाहक भी है।
नरेंद्र मोदी ने कहाकि पिपरहवा, वैशाली, देवनी मोरी और नागार्जुनकोंडा में पाए गए भगवान बुद्ध के अवशेष बुद्ध के संदेश की जीवित उपस्थिति है। प्रधानमंत्री ने कहाकि भारत ने लगातार विश्वभर में बौद्ध धरोहर स्थलों के विकास में योगदान देने का प्रयास किया है। उन्होंने उल्लेख कियाकि जब नेपाल में भयंकर भूकंप ने एक प्राचीन स्तूप को नुकसान पहुंचाया तो भारत ने इसके पुनर्निर्माण केलिए समर्थन प्रदान किया। उन्होंने कहाकि बागन म्यांमार में भूकंप केबाद भारत ने ग्यारह से अधिक देवस्थलों के संरक्षण का कार्य किया। प्रधानमंत्री ने कहाकि भारत के भीतर भी बौद्ध परंपरा से जुड़े स्थलों और अवशेषों की खोज और संरक्षण का कार्य लगातार प्रगति कर रहा है। उन्होंने याद कियाकि उनका जन्मस्थान गुजरात का वडनगर बौद्ध परंपरा का एक प्रमुख केंद्र था और मुख्यमंत्री के रूपमें उनके कार्यकाल के दौरान वहां बौद्ध धर्म से जुड़े हजारों अवशेषों की खोज की गई थी। उन्होंने कहाकि आज सरकार उनके संरक्षण पर ध्यान केंद्रित कर रही है और वर्तमान पीढ़ी को उनसे जोड़ रही है। उन्होंने उल्लेख कियाकि वहां एक शानदार अनुभव संग्रहालय बनाया गया है, जो लगभग 2500 साल के इतिहास का अनुभव प्रदान करता है।
प्रधानमंत्री ने कहाकि केवल कुछ महीने पहले जम्मू और कश्मीर के बारामुला में बौद्ध युग के एक प्रमुख बौद्ध स्थल की खोज हुई थी और अब उसके संरक्षण का कार्य तेजी से किया जा रहा है। नरेंद्र मोदी ने बतायाकि बोधगया में एक सम्मेलन केंद्र और ध्यान एवं अनुभव केंद्र स्थापित किए गए हैं। सारनाथ में धमेक स्तूप पर लाइट और साउंड शो और एक बुद्ध थीम पार्क बनाया गया है। उन्होंने कहाकि श्रावस्ती, कपिलवस्तु और कुशीनगर में आधुनिक सुविधाएं विकसित की गई हैं। उन्होंने कहाकि तेलंगाना के नलगोंडा में एक डिजिटल अनुभव केंद्र स्थापित किया गया है। उन्होंने बतायाकि पर्यटकों केलिए नई सुविधाएं सांची, नागार्जुन सागर और अमरावती में विकसित की गई हैं। प्रधानमंत्री ने कहाकि देश में बौद्ध सर्किट बनाया जा रहा है, ताकि भारत के सभी बौद्ध तीर्थ स्थलों केबीच बेहतर परिवहन संपर्क सुनिश्चित किया जा सके तथा देश-विदेश से आनेवाले भक्तों और तीर्थयात्रियों को आस्था और आध्यात्मिकता का गहरा अनुभव प्राप्त हो सके।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहाकि ने भारत का प्रयास यह सुनिश्चित करना हैकि बौद्ध धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक प्राकृतिक तरीके से पहुंचे। उन्होंने कहाकि वैश्विक बौद्ध सम्मेलन और वैशाख व आषाढ़ पूर्णिमा जैसे अंतर्राष्ट्रीय आयोजन इसी विचार से प्रेरित हैं। उन्होंने उल्लेख कियाकि भगवान बुद्ध की अभिधम्म, उनके शब्द और उनके उपदेश मूल रूपसे पाली भाषा में थे, भारत आम लोगों केलिए पाली को सुलभ बनाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने बतायाकि इसी कारण पाली को एक प्राचीन भाषा का दर्जा दिया गया है, जिससे धम्म को उसके मूल सार में समझना, समझाना आसान होगा और बौद्ध परंपरा से जुड़े शोध को भी मजबूत किया जा सकेगा। नरेंद्र मोदी ने युवाओं से इस प्रदर्शनी को जरूर देखने का अनुरोध किया और कहाकि यह प्रदर्शनी हमारे अतीत की महिमा को हमारे भविष्य के सपनों से जोड़ने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। उन्होंने संपूर्ण देशवासियों से इस प्रदर्शनी में भाग लेने का आग्रह किया।
भगवान बुद्ध के पवित्र अवशेषों के संग्रह में कपिलवस्तु में 1898 में हुए उत्खनन से प्राप्त अवशेष, 1972-75 के उत्खनन से मिली वस्तुएं, कोलकाता के भारतीय संग्रहालय में संरक्षित खजाने और पेप्पे परिवार का संग्रह शामिल है, जिसे भारत सरकार के निर्णायक हस्तक्षेप केबाद जुलाई 2025 में भारत वापस लाया गया, जिसने विदेशों में उनकी नीलामी को रोक दिया था। प्रदर्शनी में छठी शताब्दी ईसा पूर्व से वर्तमान तककी 80 से अधिक असाधारण वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। इनमें मूर्तियां, पांडुलिपियां, थांगका चित्र, धार्मिक वस्तुएं, अवशेष पात्र और रत्नजड़ित खजाने शामिल हैं। प्रदर्शनी का केंद्रबिंदु वह अखंड पत्थर का संदूक है, जिसमें पवित्र अवशेष मूल रूपसे पाए गए थे। कपिलवस्तु के नाम से जाने जानेवाले प्राचीन स्तूप स्थल पर विलियम क्लैक्सटन पेप्पे के 1898 में खोजे गए पिपरावा अवशेष, बुद्ध के जीवन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोजों में से हैं। इनका पुनः एकीकरण भारत की अपनी सांस्कृतिक धरोहर को पुनः प्राप्त करने, संरक्षित करने और सम्मानित करने की अटूट प्रतिबद्धता का एक सशक्त प्रमाण है।
पिपरहवा प्रदर्शनी विरासत संरक्षण और सांस्कृतिक नेतृत्व के प्रति केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है, साथही बुद्ध धम्म के जन्मस्थान के रूपमें भारत की अनूठी स्थिति और दुनिया केसाथ अपनी सभ्यतागत विरासत को साझा करने केप्रति इसके अटूट समर्पण का जश्न मनाती है। प्रदर्शनी के उद्घाटन कार्यक्रम में केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू, दिल्ली के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, संस्कृति राज्यमंत्री राव इंद्रजीत सिंह, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्यमंत्री रामदास अठावले और बौद्ध भिक्षु, वरिष्ठ अधिकारी, विद्वान, विरासत विशेषज्ञ, कला जगत के सदस्य, छात्र और देश-विदेश से बौद्ध धर्म के अनुयायी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।