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'जलियांवाला बाग: स्वतंत्रता का महत्वपूर्ण मोड़'

स्वतंत्रता दिवस समारोह पर पर्यटन मंत्रालय की वेबिनार श्रृंखलाएं

ब्रिटिश राज के खिलाफ एकजुटता पर हुई थी बेगुनाहों की हत्या

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Tuesday 18 August 2020 03:14:30 PM

'jallianwala bagh: the turning point of independence'

नई दिल्ली। केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय ने स्वतंत्रता दिवस समारोह में देखो अपना देश वेबिनार श्रृंखला में स्वतंत्रता दिवस की थीम पर 'जलियांवाला बाग: स्वतंत्रता संग्राम में एक महत्वपूर्ण मोड़' का आयोजन किया। इस श्रृंखला का यह 48वां वेबिनार था, जिसे अध्यक्ष द पार्टिशन म्यूजियम/ आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज और जलियांवाला बाग 1919 द रियल स्टोरी किताब की लेखिका किश्वर देसाई ने प्रस्तुत किया। किश्वर देसाई ने उस भयावह कृत्यों के बारे में बताया, जिनके कारण सैकड़ों बेगुनाहों की हत्या की गई थी और कैसे इस सामूहिक नरसंहार ने बाद के दिनों में पूरे देश को ब्रिटिश राज के खिलाफ लड़ने के लिए एकजुट कर दिया था। किश्वर देसाई ने बताया कि कैसे प्रथम विश्व युद्ध के दौरान भारतीय सैनिक, विदेशी धरती के साथ-साथ बंगाल और पंजाब में अंग्रेजों की ओर से लड़ रहे थे और पंजाब औपनिवेशिक विरोधी गतिविधियों का अबतक स्रोत बना हुआ था।
बंगाल में क्रांतिकारी हमले, जोकि पंजाब में हो रही गड़बड़ियों के साथ मजबूती के साथ जुड़े हुए थे, क्षेत्रीय प्रशासन को लगभग पंगु बनाने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे। भारत में 1918 और 1920 के बीच इन्फ्लूएंजा महामारी के कारण लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी थी, बहुत से सैनिकों को अलोकतांत्रिक रूपसे भर्ती किया गया था और उनमें से कुछ ने जबरन भर्ती के खिलाफ अपनी नाराज़गी जाहिर करनी शुरू कर दी। वर्ष 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के शुरू होने के बाद गदर पार्टी के कुछ सदस्य भारतीय स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र क्रांति को चिंगारी देने के लिए पंजाब लौट आए। गदर के सदस्यों ने भारत में हथियारों की तस्करी की और भारतीय सैनिकों को अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह के लिए उकसाया। किश्वर देसाई ने जलियांवाला बाग नरसंहार से पहले अमृतसर और शेष भारत की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने रॉलेट एक्ट या काला अधिनियम के बारे में बताया जो ब्रिटिश सरकार का एक कठोर अधिनियम था, जिसमें पुलिस को बिना किसी कारण के किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करने का अधिकार प्रदान कर दिया था। इस अधिनियम का उद्देश्य देश में बढ़ती हुए राष्ट्रवादी लहर पर अंकुश लगाना था। गांधीजी ने लोगों से ऐसे दमनकारी अधिनियम के खिलाफ सत्याग्रह करने का आह्वान किया था।
किश्वर देसाई ने बताया कि कैसे जलियांवाला बाग उस समय एक बंजर भूमि थी, जहां पर लोग प्रायः मिलते रहते थे और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन के लिए उसका उपयोग करते रहते थे, इससे अंग्रेजों में घबराहट फैल गई, क्योंकि उन्होंने अबतक कभी किसी प्रकार के प्रतिरोध का सामना नहीं किया था। डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल अमृतसर शहर के जाने-माने राष्ट्रीय नेता थे, उन्होंने रॉलेट एक्ट के खिलाफ सत्याग्रह का आयोजन किया। जलियांवाला बाग में हुई शांतिपूर्ण सभा में सभी संप्रदायों के लोगों ने भाग लिया, इससे अंग्रेजों के बीच बहुत सारी भ्रांतियां और गलतफहमी फैल गई। ब्रिटिश सरकार ने डॉ किचलू और डॉ सत्यपाल की गिरफ्तारी का आदेश दिया, उनकी गिरफ्तारी की ख़बर से अमृतसर के लोगों के बीच से कड़ी प्रतिक्रिया आई। महात्मा गांधी को 9 अप्रैल 1919 को गिरफ्तार कर लिया गया और लोगों को उनकी गिरफ्तारी के पीछे का कोई भी कारण समझ में नहीं आ रहा था। गांधीजी की गिरफ्तारी की ख़बर जब 10 अप्रैल को अमृतसर पहुंची तो सड़कों पर बड़ी संख्या में उग्र हुए लोगों की भीड़ जमा हो गई। ब्रिटिश बैंकों में आग लगा दी गई और तीन बैंक प्रबंधकों की हत्या कर दी गई। हिंसा 10 और 11 अप्रैल तक जारी रही। पुलिस द्वारा भीड़ को नियंत्रित करने में असमर्थ होने के बाद शहर को वास्तविक रूपसे मार्शल लॉ के हवाले कर दिया गया। कलेक्टर ने ब्रिगेडियर-जनरल रेजिनाल्ड एडवर्ड डायर को कार्यभार सौंप दिया, जो गोरखा और पठान सैनिकों की टुकड़ी के साथ आए थे।
पंजाब में मार्शल लॉ का शासन बहुत ही कठोर था। डाक पर प्रतिबंध लगा दिया गया। मंदिरों और मस्जिदों में उपासकों का जाना प्रतिबंधित कर दिया गया। जिन लोगों की राजनीतिक संबद्धता संदिग्ध पाई गई थी, उनके घरों में बिजली और पानी की आपूर्ति को रोक दिया गया। इससे भी बदतर स्थिति तब उत्पन्न हुई जब चुनिंदा विद्रोहियों पर सार्वजनिक रूपसे कोड़े बरसाए गए और एक आदेश जारी किया गया, जिसमें उन सभी भारतीयों को सड़क पर रेंगने के लिए मजबूर कर दिया गया, जिन्होंने महिला मिशनरी पर हमला होते हुए देखा था। डायर ने यह अनुमान लगाया कि एक बड़ा विद्रोह हो सकता है, इसलिए सभी प्रकार की बैठकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इस नोटिस को व्यापक रूपसे फैलाया नहीं गया था और इसलिए कई ग्रामीण इस बाग में भारतीय त्योहार बैसाखी को मनाने और दो राष्ट्रीय नेताओं, सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी और निर्वासन का शांतिपूर्ण विरोध करने के लिए एकत्रित हुए। जनरल डायर और उसके सैनिकों ने बाग में प्रवेश किया, उनके बाद मुख्य प्रवेश द्वार को अवरुद्ध कर दिया, एक ऊंचाई पर स्थित एक जगह पर मोर्चा संभाल लिया और बिना किसी चेतावनी के भीड़ पर दस मिनट तक लगातार गोलीबारी की, उसने अपनी गोलियों का रुख बहुत हद तक उन कुछ खुले हुए फाटकों की ओर रखा, जिसके माध्यम से लोग वहां से भागने की कोशिश कर रहे थे, गोलियां तबतक बरसती रहीं, जब तककि गोला-बारूद लगभग समाप्त नहीं हो गया। लगभग 1,650 राउंड गोलियां चलाई गईं। कई छोटे-छोटे बच्चों की मौतें हुईं और केवल दो महिलाओं के ही शव प्राप्त हो सके।
जलियांवाला बाग़ नरसंहार के तीन महीने बाद मौतों की संख्या की जानकारी के लिए मृत शरीरों की गिनती की गई, यह एक बहुत बड़ा नरसंहार था और इसमें 1,000 से ज्यादा लोग मारे गए। घायल लोगों को दवा के रूपमें भी कोई सहायता प्रदान नहीं की गई, इसमें स्थानीय भारतीय डॉक्टरों ने भाग लिया था। ब्रिटिश सरकार ने 13 अप्रैल 1919 को पंजाब के अधिकांश क्षेत्रों को मार्शल लॉ के अधीन कर दिया, इस कानून ने कई नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रतिबंधित कर दिया, जिसमें विधानसभा की स्वतंत्रता भी शामिल थी, चार से ज्यादा लोगों के इकट्ठा होने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था। ब्रिटिश सरकार द्वारा इन घटनाओं की जांच के लिए एक समिति का गठन किया गया और हंटर कमीशन रिपोर्ट में अमृतसर की घटनाओं से संबंधित प्राप्त साक्ष्यों को शामिल किया गया। मार्च 1920 में प्रस्तुत की गई अंतिम रिपोर्ट में समिति ने सर्वसम्मति से डायर के कार्यों की निंदा की। हालांकि हंटर समिति ने जनरल डायर के खिलाफ कोई भी दंडात्मक या अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा नहीं की। गुरु रबिंद्रनाथ टैगोर ने इसके विरोध में अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि का त्याग कर दिया था और महात्मा गांधी ने कैसर-ए-हिंद की उपाधि वापस कर दी थी, जो उन्हें बोअर युद्ध के दौरान उनके काम के लिए अंग्रेजों ने सम्मान के रूपमें प्रदान की थी।
पर्यटन मंत्रालय में अपर महानिदेशक रुपिंदर बरार ने अमृतसर के दर्शनीय स्थलों के बारे में बताया जोकि हवाई, रेल और सड़क के माध्यम से बहुत अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जलियांवाला बाग, पार्टिशन म्यूजियम, हरिमंदिर साहिब और वाघा बॉर्डर, ग्रैंड ट्रंक रोड के साथ चल रही भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमाओं को चिह्नित करती हैं। सूर्यास्त से पहले प्रत्येक दिन आयोजित होने वाली वाघा बॉर्डर सेरेमनी या बीटिंग रिट्रीट सेरेमनी यहां का मुख्य आकर्षण है। प्रत्येक शाम सूर्यास्त से ठीक पहले, भारतीय और पाकिस्तानीसेना के सैनिक इस सीमा चौकी पर मिलते हैं और 30 मिनट के सैन्य सौहार्द और कला प्रदर्शन में शामिल होते हैं। आगंतुक को ढाबों में अद्भुत भोजन का आनंद लेने का अवसर भी प्राप्त होता है। पर्यटन मंत्रालय अपनी विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत पर्यटन अवसंरचनाओं और सुविधाओं के विकास पर आवश्यक बल दे रहा है। वर्तमान में जलियांवाला बाग का जीर्णोद्धार और उन्नयन किया जा रहा है और स्मारक स्थल पर संग्रहालय/ दीर्घाएं और साउंड एंड लाइट शो स्थापित किए जा रहे हैं।

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