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अखबारों की बिक्री संख्या की जांच हो-आलोक मेहता

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नेहरू सेंटर में गोष्ठी-seminar in nehru center london

लंदन। भारत के वरिष्ठ पत्रकार और हिंदी समाचार पत्र नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता ने कहा है कि समाचार पत्रों की इन्फ़लेटिड बिक्री संख्या की जांच होनी चाहिये सरकारी या गैर सरकारी विज्ञापन पाने के लिये समाचार पत्र अपनी बिक्री संख्या कहीं बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं जबकि सच यह है कि दिल्ली जैसे शहर में टेम्पो प्रिटिंग प्रेस से अख़बार ले कर चलता है और शाहदरा के किसी गोदाम में डम्प कर देता है। आलोक मेहता इन दिनों लंदन की यात्रा पर हैं और कल शाम वे यहां नेहरू सेंटर में पत्रकारों और साहित्यकारों के बीच एक गोष्ठी में बोल रहे थे। इस गोष्ठी का आयोजन कथा यूके एवं एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स ने मिल कर किया था।

कथा यूके के महासचिव एवं कथाकार तेजेन्द्र शर्मा ने आलोक मेहता से उनकी कृति पत्रकारिता की लक्ष्मण रेखा के हवाले से भारत में हाल ही में हुई घटनाओं पर भारतीय मीडिया की भूमिका पर टिप्पणी करने को कहा जिनमें रामजन्म भूमि.बाबरी मस्जिद विवाद पर उच्च न्यायालय का फ़ैसलाए कॉमनवेल्थ खेलए आतंकवाद आदि शामिल हैं। आलोक मेहता का कहना है कि यदि बाबरी मस्जिद के गिराए जाने के समय की पत्रकारिता की आज की पत्रकारिता से तुलना करें तो हम पाएंगे कि मीडिया ने ख़ासे सयंम का परिचय दिया है। अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के संपादकों को भी हमने अपने साथ जोड़ा है ताकि सेसेनलिज़म से बचा जाए। सरकार को खासा डर था कि इस निर्णय के बाद देश में दंगों की आग फैल सकती है। मीडिया ने मस्जिद टूटने के पुराने चित्रों का इस्तेमाल नहीं किया और कुल मिला कर समाचार कवरेज परिपक्व रहा।

आलोक मेहता ने स्वीकार किया कि कॉमनवेल्थ खेलों के कवरेज में कुछ अति अवश्य हुईए मगर यह ज़रूरी भी थी। यह ठीक है कि खेलों और भारत की छवि विश्व में कुछ हद तक धूमिल हुईए मगर इसी वजह से सरकारी मशीनरी हरक़त में आई और अंततः खेल सही ढंग से संपन्न हो पाए। उन्होंने कहा कि जब वे नई दुनियां में खेलों की तैयारी के बारे में समाचार प्रकाशित करते थे तो राजनीतिज्ञ सवाल भी करते थे कि उनके विरुद्ध क्यों समाचार प्रकाशित किए जा रहे हैं। दरअसल सरकार की हालत ऐसी है जैसे इन्सान एंटिबॉयटिक से इम्यून हो जाता है ठीक वैसे ही सरकार भी आलोचना से इम्यून हो चुकी है।

वरिष्ठ पत्रकार विजय राणा का मत था कि डीएवीपी के माध्यम से सरकार समाचार पत्रों को विज्ञापन दे कर अपने विरुद्ध लिखने से रोकने में सफल हो जाती है। हिन्दुस्तान टाइम्स एवं टाइम्स ऑफ़ इंडिया जैसों को तो करोड़ों के विज्ञापन मिलते हैंए क्या ये विज्ञापन भी भ्रष्टाचार नहीं फैलातेघ् मधुप मोहता का सवाल था कि सत्तर हज़ार करोड़ रुपये ख़र्च कर कॉमनवेल्थ खेल करवाए जा सकते हैं तो केवल सौ करोड़ का ख़र्चा कर के हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा क्यों नहीं बनवाया जा रहाघ् इस पर आलोक मेहता का कहना था कि इसमे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। यदि सरकार 10 बड़े व्यापारी घरानों से पैसा इकट्ठा करने को कहे तो सौ करोड़ रुपये महीने भर में इकट्ठे हो सकते हैं। शिवकांत को समस्या इस बात में दिखाई देती है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी को कैसे मनाया जाए कि वे व्यापारी घरानों को इस विषय में संपर्क करें।

कथा यूके की उपाध्यक्ष डा अचला शर्मा ने चिन्ता व्यक्त की कि महत्वाकांक्षा की भाषा अंग्रेज़ी बन गई है और जब तक हिन्दी तरक्की और बेहतरी से नहीं जुड़ेगी उसे उसका सही दर्जा नहीं मिल पाएगा। डा सत्येन्द्र श्रीवास्तव कह रहे थे कि भाषा में दिनमान के ज़माने से आज तक ख़ासा परिवर्तन आ गया है। अब प्रिन्ट मीडिया की भाषा आम इन्सान की भाषा हो गई है। आलोक मेहता ने कहा कि हमें सतर्कता बरतनी होगी। हिन्दी में अन्य भाषाओं के शब्द आने से हिन्दी अधिक समृद्ध होगी मगर यह हमें सावधानी से करना होगा। जो नये शब्द हैं उन्हें हिन्दी में ज़रूर शामिल किया जाए जैसे कि मेट्रो के लिये नया शब्द गढ़ने की ज़रूरत नहीं। मगर हिन्दी के प्रचलित शब्दों को हटा कर उनके स्थान पर अंग्रेज़ी के शब्द न थोपे जाएं। नेहरू सेन्टर की निदेशक मोनिका मोहता ने धन्यवाद ज्ञापन दिया। एक शानदार और सार्थक शाम पूरी होने का अहसास सबके मन में था।

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