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भाजपा के सामने मंदिर संकल्प का अवसर!

अयोध्या में अशांति की आशंका का शांति से दें जवाब

अयोध्या में शिवसेना ने भी अपना प्रभाव दिखाया

Saturday 24 November 2018 03:28:46 PM

दिनेश शर्मा

दिनेश शर्मा

ayodhya shriram janmabhoomi

अयोध्या। अयोध्या में उत्तर प्रदेश की मुलायम सरकार का रामभक्तों पर गोली चलाना, अयोध्या में केंद्र की कांग्रेस सरकार का श्रीराम मंदिर का शिलान्यास कराना और उसके कुछ ही घंटे बाद शिलान्यास का फैसला वापस भी ले लेना, अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर वि‌वादित ढांचे का ढहाना, अयोध्या में विवादित बाबरी मस्ज़िद गिराने के दौरान कारसेवकों की भारी भीड़ और संविधान का संकट, भारतीय राजनीतिक दलों का देश के इस ज्वलंत मुद्दे की उपेक्षा और अनिर्णय की स्थिति निर्मित करते हुए श्रीराम जन्मभूमि के मुद्दे का राजनीतिकरण करना, देश की सर्वोच्च अदालत में श्रीराम जन्मभूमि विवाद के आधे-अधूरे समाधान और तारीखों पर तारीख के कारण भारतीय हिंदू जनमानस में क्षोभ की स्थिति एवं उसका भाजपा को राजनीतिक लाभ मिलना और उसपर बाकी राजनीतिक दलों का दहाड़े मार कर विरोध तथा देश में अराजकता फैलाना। ये सारे कारण आज फिर अयोध्या में उस कालखंड को पुर्नजीवित कर रहे हैं, जो श्रीराम जन्मभूमि पर श्रीराम के भव्य मंदिर निर्माण को लेकर बलिदान और अंतहीन संघर्ष की कहानी है।
अयोध्या में रघुकुल राज परिवार के महाराज दशरथ के यहां श्रीराम का जन्म हुआ था, यह तथ्य तो ऐतिहासिक रूपसे प्रामाणिक है और श्रीराम के जन्म से जुड़ी असंख्य घटनाओं के भी यहां साक्ष्य मिलते रहे हैं। कोर्ट के आदेश से श्रीराम जन्मस्‍थान पर पुरातत्व विभाग से खुदाई कराकर यह भी देखा जा चुका है कि इस स्‍थान पर क्या कभी कोई मंदिर था तो यह बात भी सिद्ध हो चुकी है, जिसका अकाट्य तथ्य यह है कि यहां पर विशाल भव्य मंदिर तोड़कर उसके मलबे से उसपर बाबरी मस्जिद तामीर की गई थी। श्रीराम जन्मभूमि पक्ष का एक दमदार और अकाट्य पक्ष यह है कि अयोध्या में श्रीराम का जन्म और उनके शासन के हजारों वर्ष बाद मुस्लिम आक्रांता बाबर का जन्म हुआ और उसका शासनकर्ता मीरबाकी बहुत बाद कमजोर हिंदू राजाओं, रियासतों और हिंदुओं का कत्लेआम करते और जबरन धर्मपरिवर्तन कराते हुए एवं हिंदुओं के ऐतिहासिक धर्मस्‍थलों, शिक्षण संस्‍थानों का विध्वंस कर उनपर मस्जिदें खड़ी करते हुए अयोध्या में दाखिल हुआ था और उसने श्रीराम जन्मस्‍थान पर हिंदुओं से लड़ते हुए श्रीराम मंदिर को ध्वस्त करके उसपर बाबरी मस्जिद बनाई, जो अनेक संघर्ष के बाद पच्चीस वर्ष पहले एक बड़े हिंदू जनसमूह ने गिरा दी।
अयोध्या के इतिहास को अंग्रेजों से लेकर इस्लामिक शासनकर्ताओं और भारतीय न्यायिक फैसलों में भी स्वीकार किया गया है। मुद्दा केवल इतना था कि वहां श्रीराम जन्मस्‍थान है या बाबरी मस्जिद। इस मुद्दे का समाधान बातचीत से नहीं हो सका है और इसे समाधान के लिए कोर्ट पर छोड़ा गया। आशा थी कि कोर्ट उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर तय कर देगा कि उस स्‍थान पर क्या था। यह तय करने में कोर्ट ने बहुत समय लगाया और कोर्ट केवल यह तय कर पाया कि वहां भगवान श्रीराम का जन्‍मस्‍थान तो है, लेकिन कोर्ट ने वहां की जमीन तीन हिस्सों में बांट दी और एक हिस्सा जमीन सुन्नी वक्फ बोर्ड को देने का फैसला सुना दिया, जिससे यह मामला कोर्ट से हल हुआ न हुआ बराबर हो गया। भारतीय जनमानस ने सवाल उठाया कि ये क्या फैसला हुआ और श्रीराम जन्मस्थान पर सुन्नी वक्फ बोर्ड का क्या काम? बात भी सही है नौ दिन चले अढ़ाई कोस उसमें भी मंजिल नहीं मिली। अयोध्या में श्रीराम जन्मस्‍थान पर और भी लोगों ने दावे किए, जैसेकि बौद्ध धर्म के लोगों का कहना है कि वहां बौद्ध मंदिर था। बहरहाल सारे दावे एक तरफ हुए और श्रीराम जन्म स्‍थान का विवाद खत्म नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने कहां रोज सुनवाई की बात कर फैसला करने की बात की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के नए मुख्य न्यायाधीश की बेंच ने मामला अगले साल जनवरी तक टाल दिया।
सुप्रीमकोर्ट के फैसले से भारतीय जनमानस में क्षोभ का एक भारी उबाल देखने को मिल रहा है। भारत में हिंदूवादी भाजपा गठबंधन का शासन है और अगले साल लोकसभा के आम चुनाव होने हैं। भारतीय जनता पार्टी के चुनाव घोषणापत्र में यह संकल्प था कि वह अयोध्या में भगवान श्रीराम के जन्मस्‍थान पर श्रीराम का भव्य मंदिर बनवाने के लिए कृत संकल्प है। देश की जनता ने जहां भाजपा को देश के विकास के लिए निर्णायक वोट दिया, उसके विश्वास का एक बड़ा पक्ष यह भी था कि यदि भाजपा की सरकार आती है तो वह अयोध्या में अवश्य ही श्रीराम मंदिर का निर्माण करा देगी, लेकिन अगले लोकसभा चुनाव होने में कुछ ही महीने बचे हैं और श्रीराम मंदिर निर्माण के कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं, जिससे देश की हिंदू जनता का पारा सातवें आसमान पर है और वह भाजपा को जुमलेबाज पार्टी बताकर उसका विरोध करने पर उतारू है। भाजपा भी समझ रही है कि जनता का श्रीराम मंदिर को लेकर बहुत दबाव है, लेकिन कोर्ट ने मामला टाल दिया है और उसके सहयोगी दल भी मंदिर के लिए कानून बनाने के विकल्प पर चुनाव में वोटों का नफानुकसान देखते हुए श्रीराम मंदिर निर्माण का समर्थन करने से कतरा रहे हैं। पिछले चार महीने से भारी द्वंद्व की स्थिति है, जिससे अयोध्या के संतों, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और उसके सहयोगी संगठन, देश की कट्टर हिंदूवादी शिवसेना ने श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए सरकार पर हल्ला बोल दिया है और पच्चीस नवंबर को अयोध्या में भक्त माल की बगिया में धर्मसभा बुलाई गई है।
आरएसएस, विहिप और शिवसेना का कहना है कि भाजपा गठबंधन सरकार कोर्ट का इंतजार नहीं करे और अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए संसद में अध्यादेश लाए, जिससे श्रीराम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो। शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे यहां आ चुके हैं और आगे के कार्यक्रम की तैयारी में जुट गए हैं। नरेंद्र मोदी सरकार के सामने संकट है कि वह संविधान की रक्षा करते हुए इस मामले का कैसे समाधान करे। मोदी सरकार के पास अध्यादेश लाकर श्रीराम मंदिर निर्माण कराने का ही विकल्प बचा है, ऐसा नहीं होने पर लोकसभा चुनाव में भाजपा के सामने पराजय का संकट खड़ा है। भाजपा का भी यही अनुमान है कि ऐसा नहीं होने पर बड़े नुकसान को रोका नहीं जा सकता। यह ऐसी स्थिति है कि भाजपा सरकार करे तो क्या करे, क्योंकि कोर्ट ने तो एक तरह से हाथ खड़े कर दिए हैं और उसे जो मामला प्राथमिकता देकर हल करना था, उसे वह अपनी प्राथमिकता में नहीं मान रहा है। पच्चीस नवंबर को अयोध्या में जो भीड़ एकत्र हो रही है, यद्यपि उससे शांति व्यवस्‍था की आशा की जानी चाहिए और ऐसा होगा भी, लेकिन आखिर कबतक? यह प्रश्न हरएक से उत्तर मांग रहा है। इस मामले में देश के बाकी राजनी‌तिक दल अपनी जिम्मेदारी से विमुख हैं, यह देश देख रहा है। मोदी सरकार पर पच्चीस नवंबर का दबाव कोई कम बड़ा दबाव नहीं है, यदि मोदी सरकार अध्यादेश के जरिए ही सही अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का संकल्प पूरा होने की तरफ बढ़ती है तो यह देश के एक बड़े मामले के समाधान में मील का पत्थर होगा, तब बाकी दलों की क्या उपयोगिता और प्रासंगिकता रह जाएगी, यह समय तय कर देगा।
अयोध्या में धर्मसभा में सबका ध्यान शिवसेना की ओर होगा, क्योंकि शिवसेना उस समय भी यहां मौजूद थी, जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी। उस समय शिवसेना प्रमुख बाला साहेब ठाकरे और भाजपा में गहरी दोस्ती हुआ करती थी। उद्धव ठाकरे के भी भाजपा से अच्छे संबंध रहे हैं, लेकिन एक कालखंड ऐसा आया‌ जिसके बाद से संबंध तो हैं पर दोनों संबंधों में वह बात नहीं रही है। शिवसेना शुरू से ही कहती आ रही है कि अयोध्या में कानून बनाकर भगवान श्रीराम का मंदिर बनाया जाए, क्योंकि कोर्ट इसका समाधान नहीं कर पा रहा है। शिवसेवा प्रमुख उद्धव ठाकरे अयोध्या पहुंच गए हैं। अयोध्या में लक्ष्मण किला में उनका संतों से आशीर्वाद कार्यक्रम है, शाम को सरयू तट पर आरती कार्यक्रम है अयोध्या में ही रात्रि प्रवास के बाद कल सुबह रामलला का दर्शन करेंगे। उद्धव ठाकरे ने 'पहले मंदिर, फिर सरकार' का नारा दिया है। अयोध्या में शिवसेना, उद्धव ठाकरे और उनके पुत्र के बड़े-बड़े पोस्टर लगे हैं। कहने का मतलब यह है कि अयोध्या में शिवसेना का रंग जमा है। उद्धव ठाकरे पुणे जिले के शिवनेरी किले से एक कलश मिट्टी लाए हैं, जिसे वह श्रीराम जन्मभूमि के महंत को सौंपेंगे। बहरहाल आशा की जाती है कि अयोध्या में धर्मसभा में शांति बनी रहेगी और उन लोगों को करारा जवाब मिलेगा, जो यहां अशांति की बात कर रहे हैं और आगे चलकर वह उद्देश्य भी पूरा हो जाएगा, जिसके लिए यह धर्मसभा हो रही है।

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