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भारत सहित दुनिया में नौकरियों का संकट?

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नौकरि

नई दिल्ली। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) ने मई दिवस पर दुनिया भर में रोज़गार संकट पैदा होने की चेतावनी दी है। उसका कहना है कि ग्लोबल आर्थिक मंदी के बाद कई देश आर्थिक विकास की पटरी पर तो लौट आए, मगर नौकरियों की ‌‌स्थिति में कोई भी सुधार नहीं आया है। आशा की जा रही थी कि आर्थिक मंदी की वापसी के बाद रोज़गार के अवसरों का सृजन होगा, लेकिन इस दौरान जिन्होंने अपना रोज़गार गंवाया है, उनमें से अधिकांश सड़क पर हैं और जिन्हें रोज़गार मिला भी है तो उन्हें आधे से भी कम ‌वेतन या पैकेज पर काम करना पड़ रहा है।
आइएलओ के अनुसार वर्ष 2008-2009 तक चली भयानक मंदी के दौरान नौकरी गंवाने वाले करीब पांच करोड़ लोग अब भी बेरोज़गार हैं। आइएलओ ने ‘वर्ल्ड ऑफ वर्क रिपोर्ट 2012 बेटर जॉब्स फॉर अ बेटर इकोनॉमी’ रिपोर्ट में इस स्थिति को चिंताजनक बताया है, साथ ही कहा है कि निकट भविष्य में इसमें सुधार के कोई संकेत भी नहीं हैं। रोज़गार से जुड़ी कंपनियों का कहना है कि कार्पोरेट घरानों ने भारी छटनी की है और यही नहीं बल्कि कार्मिकों से इस्तीफे लेकर अपनी मनमर्जी की शर्तों पर रोज़गार का अवसर दिया है। कई बड़ी कं‌पनियां अब अपने यहां सीधे रोज़गार न देकर बल्कि रोज़गार कंपनियों के माध्यम से ही रोज़गार दे रही हैं, जिसे थर्ड पार्टी रोज़गार कहा जाता है।
भारतीय प्रबंध संस्‍थानों और तकनीकी संस्‍थानों से सीधे चयन के आंकड़ों में भी गिरावट बनी हुई है। कैंपस से सीधे रोज़गार की गारंटी देने वाले अनेक संस्‍थान झूठे आंकड़े पेशकर अपने यहां श्रेष्ठ प्रशिक्षण का भ्रम बनाए रखने में जरूर सफल हैं, मगर वास्तविकता यह है कि भारी धनराशि खर्च करने वाले बेरोज़गारों को रोज़गार मिलने या कंपनी में रोज़गार के चलते रहने की कोई गारंटी नहीं है। प्रबंध संस्‍थानों में अपना डिप्लोमा या डिग्री ले चुके बहुत से अभ्यर्थी बहुत कम पैकेज पर बाबू जैसी नौकरी करने पर मजबूर हैं। कुछ समय पहले भारत के नारायण मूर्ति ने एक सेमिनार में कहा था कि भारत में प्रबंध संस्‍थानों से आने वाले उम्मीदवारों की गुणवत्ता का स्तर बहुत निम्न पाया जा रहा है, जिन्हें रोज़गार देकर कंपनियां घाटे का जोखिम उठाने का तैयार नहीं हैं। कई बड़ी कंपनियों का मंदी के दौर में पहले ही बड़ा नुकसान हुआ है और इस कारण भी नुकसान हुआ है कि उसके कार्मिक कंपनी को आशाजनक परिणाम देने में विफल रहे।
रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व के तमाम देशों की सरकारों ने कठोर वित्तीय नीति अपनाई है, इस कारण भी दुनियाभर में बेरोज़गारी बढ़ रही है, स्थिति इतनी बुरी है कि नौकरी तलाशने वाले अपना आत्मविश्वास खो रहे हैं। विकसित देशों में ऐसे हालात तो कुछ ज्यादा ही हावी हैं, आगे चलकर यह सामाजिक अस्थिरता का एक बड़ा कारण साबित हो सकते हैं। भारत में सरकारी नौकरियों एवं निजी क्षेत्र में आरक्षण के दबाव से भी रोज़गार कंपनियां पेरशान हैं। भारत के सरकारी क्षेत्र में उच्च प्रशिक्षित अभ्यर्थियों की कोई पूछ नहीं है और निजी क्षेत्र में उनको उतना पैसा नहीं मिल रहा है जोकि प्रतिभाओं को कुंठाग्रस्त कर रहा है। यह स्थिति सामाजिक वैमनस्यता का भी रूप लेती जा रही है। कई देशों में आंतरिक संघर्ष और गृह युद्ध के चलते रोज़गार का संकट बढ़ा है। एशियायी देश इसकी अच्छी खासी चपेट में है।
रोज़गार और कॅरियर विशेषज्ञों का मत है कि कार्पोरेट अब उस स्थिति में नहीं है कि वह रोज़गारों का ज्यादा से ज्यादा सृजन कर सके या अपने कार्मिकों को बड़ा वेतन पैकेज दे सके। कार्पोरेट कोई झंझट मोल लेना नहीं चाहता है, सरकारी क्षेत्र में रिश्वत का चलन अपने चरम की ओर बढ़ रहा है, जिससे प्रतिभाएं अवसर नहीं पा रही हैं, या तो वह देश छोड़कर भाग रही हैं या फिर वे अनचाहे समझौतों के लिए तैयार हैं। भारत में राज्य सरकारें भी अपनी कमजोर आर्थिक स्थितियों के कारण ज्यादा रोज़गार देने की स्थिति में नहीं हैं, वे अपने यहां बेरोज़गारों के आक्रोश से बचने के लिए और राजनीतिक दल उनका वोट हासिल करने के लिए, रोज़गार प्रदान करने का भरोसा देने जैसे असंभव हथकंडे अपना रहे हैं, मगर रोजगार नहीं मिल रहा है। कार्पोरेट जगत की भी अपनी सीमाएं हैं, जो रोज़गार देने में एक सीमा तक ही जोखिम ले सकता है और वह ज्यादा कार्मिक रखकर अपने को आर्थिक संकट में खड़ा रखने को तैयार नहीं है, इसलिए आने वाले समय में निजी या सरकारी क्षेत्र में रोज़गार की स्थिति में किसी बड़े सुधार की आशा नज़र नहीं आती है।

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