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जेएनयू के दीक्षांत में स्नातकों को दी गईं उपाधियां

'जेएनयू की समावेशिता, सामाजिक न्याय और दायित्व बोध की विरासत'

उपराष्ट्रपति व शिक्षामंत्री की बौद्धिक अखंडता व राष्ट्र निर्माण की अपील

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Tuesday 13 January 2026 01:13:49 PM

convocation ceremony of jawaharlal nehru university

नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में स्नातक छात्र-छात्राओं को डिग्रियां व उपाधियां बांटी और उन्हें बधाई दी। उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से अपने ज्ञान और कौशल को राष्ट्रसेवा में समर्पित करने का आग्रह किया। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के उपदेशों का स्मरण करते हुए कहाकि शिक्षा को केवल डिग्री तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसका उद्देश्य चरित्र निर्माण करना, बुद्धि को सुदृढ़ करना और व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। उन्होंने कहाकि उचित शिक्षा और कौशल ही भारतीय युवाओं को वर्ष 2047 तक विकसित भारत सपने को साकार करने केलिए सक्षम बनाएगा। उपराष्ट्रपति ने भारत की ज्ञान सभ्यतागत परंपराओं को रेखांकित करते हुए नालंदा और तक्षशिला जैसे प्राचीन शिक्षा केंद्रों का जिक्र किया और कहाकि उपनिषद, श्रीमद भागवद्गीता से कौटिल्य के अर्थशास्त्र और तिरुवल्लुवर के तिरुक्कुरल तक भारतीय धर्मग्रंथों और प्राचीन पुस्तकों ने निरंतर शिक्षा को सामाजिक और नैतिक जीवन के केंद्र में रखा। उन्होंने यह भी कहाकि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक मूल्यों का साथ-साथ विकास होना चाहिए।
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में लोकतांत्रिक मूल्यों का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहाकि बहस, चर्चा, असहमति और यहां तककि टकराव भी एक स्वस्थ लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं, यद्यपि इनका अंततः एक निष्कर्ष पर पहुंचना अनिवार्य है। उन्होंने कहाकि एकबार निर्णय ले लेने केबाद सुचारू और प्रभावी प्रशासन सुनिश्चित करने केलिए इसके कार्यांवयन में सहयोग करने की सामूहिक इच्छाशक्ति होनी चाहिए। उपराष्ट्रपति ने जेएनयू के समावेशी वातावरण और छात्र प्रवेश तथा संकाय भर्ती दोनों में समानता और सामाजिक समावेश को बढ़ावा देने केलिए विश्वविद्यालय के प्रयासों की सराहना की। उपराष्ट्रपति ने उभरते और सभ्यतागत क्षेत्रों में जेएनयू के शैक्षणिक विस्तार केलिए विश्वविद्यालय के नेतृत्व की सराहना की, इनमें संस्कृत और भारतीय अध्ययन संकाय में हिंदू, जैन और बौद्ध अध्ययन के नए केंद्रों की स्थापना भी प्रमुख है। उन्होंने तमिल अध्ययन के विशेष केंद्र और असमिया, ओडिया, मराठी, कन्नड़ में पाठ्यक्रमों, कार्यक्रमों से भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने के जेएनयू के प्रयास भी सराहे।
उपराष्ट्रपति सीपी राधाकृष्णन ने कहाकि देशभर में राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुरूप मातृभाषाओं में ज्ञान सृजन को बढ़ावा मिलना चाहिए। उपराष्ट्रपति ने स्नातकों से तीन प्रमुख उत्तरदायित्वों-सत्य की खोज में बौद्धिक ईमानदारी, असमानताओं को कम करने केलिए सामाजिक समावेश और राष्ट्रीय विकास में सक्रिय योगदान का आग्रह किया। उन्होंने छात्र-छात्राओं का संवैधानिक मूल्यों और भारत की सभ्यतागत नैतिकता का पालन करने और हमेशा अपने माता-पिता व शिक्षकों का सम्मान करने का आह्वान किया। उपराष्ट्रपति ने स्नातकों को उनके भविष्य के प्रयासों में सफलता की शुभकामनाएं देते हुए भारत की एकता और एकसाथ प्रगति करने के सामूहिक संकल्प को दोहराया। इस अवसर पर शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, जेएनयू के कुलाधिपति कंवल सिबल, कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धुलिपुडी पंडित, वरिष्ठ अधिकारी, संकाय सदस्य, स्नातक छात्र-छात्राएं और उनके परिजन भी उपस्थित थे।
शिक्षामंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी स्नातकों को शुभकामनाएं दीं और कहाकि जेएनयू ने दशकों के निरंतर अकादमिक योगदान से बेहतरीन प्रदर्शन की एक ठोस और विशिष्ट विरासत स्थापित की है और आंतरिक अनुशासन की एक जीवंत परंपरा में अकादमिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों में से एक बना हुआ है, यहां आलोचनात्मक सोच इसकी पहचान का मुख्य हिस्सा है। शिक्षामंत्री ने स्नातकों से आशा व्यक्त कीकि वे जेएनयू की समावेशिता, सामाजिक न्याय और दायित्व बोध की विरासत को बनाए रखेंगे, उसे और मज़बूत करेंगे एवं हाशिये पर पड़े लोगों की आवाज़ बनेंगे और समाज में असमानताओं को कम करने में सक्रिय रूपसे योगदान देंगे। धर्मेंद्र प्रधान ने विश्वास जतायाकि जेएनयू के स्नातक राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाएंगे, इनमें कई स्टार्टअप, यूनिकॉर्न बनकर नवाचार और उद्यमिता बढ़ाएंगे, जबकि कई लेखक, पत्रकार और थॉट लीडर के तौरपर देश की बौद्धिक चर्चा को आकार देंगे।

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