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चिदंबरम दोषी नहीं, एनडीए के आरोप ग़लत

टू-जी मुद्दे पर कपिल सिब्बल का प्रेस वक्तव्य

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नई दिल्ली। केंद्रीय दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने 2-जी मुद्दे पर सरकार की ओर से वक्तव्य में कहा है कि 'लाइसेंस जारी करने और 2-जी स्पेक्ट्रम आवंटन' पर कैग की कार्य-निष्पादन लेखा रिपोर्ट सौंपने के बाद से इस मुद्दे पर काफी विवाद और आलोचनाएं सामने आ रही हैं। यह विवाद एक विकृत रुप ले रहा है और कुछ अन्य व्यक्तियों के अतिरिक्त राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन, गृह मंत्री पी चिदंबरम की छवि को धूमिल करने की कोशिशों में लगा है। कपिल सिब्बल ने कहा है कि हम सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं, पी चिदंबरम हमारे महत्वपूर्ण सहयोगी हैं और बिना किसी डर या बिना किसी पक्षपात के उन्होंने पूरी ईमानदारी एवं निष्ठा से अपना उत्तरदायित्व निभाया है, सरकार को इस बात की चिंता है कि सार्वजनिक मंच का इस्तेमाल आरोपो और प्रत्यारोपों की सार्वजनिक सुनवाई के लिए किया जा रहा है, जिसमें से अधिकांश का तथ्यों से कोई संबंध नहीं है, इसलिए सरकार का ऐसा मानना है, कि मामले को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया जाना चाहिए और इस संबंध में तथ्यों को प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि दूरसंचार क्षेत्र को 1994 में सार्वजनिक भागीदारी के लिए खोला गया था, सभी चार मुख्य शहरों में दो-दो लाइसेंसों को स्वीकृत किया गया था, तीसरे लाइसेंस को एमटीएनएल, बीएसएनएल के लिए स्वीकृत किया गया था और प्रवेश शुल्क को एकल नीलामी मानदंड मानकर 2001 में नीलामी प्रक्रिया के आधार पर चौथे मोबाइल ऑपरेटर को लाइसेंस प्रदान किया गया था, यह प्रवेश शुल्क लगभग 1650 करोड़ रुपए था। इक्तीस अक्तूबर 2003 के मंत्रिमंडलीय निर्णय के अनुसार 11 नवंबर 2003 को एकीकृत अभिगम्य सेवा लाइसेंस के दिशा निर्देश जारी किए गए। इक्तीस अक्तूबर 2003 के प्रवेश शुल्क पर मंत्रिमंडलीय निर्णय इस प्रकार था-आधारभूत और मोबाइल सेवाओं के लिए एकीकृत अभिगम्य सेवा लाइसेंस को लागू करने के संबंध में ट्राई की संस्तुतियों को मंजूर किया जा सकता है, इस संबंध में संचार और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री की मंजूरी से इस प्रक्रिया को पूरा कर लागू करने के संबंध में दूरसंचार विभाग को अधिकृत किया जा सकता है, जिसमें ट्राई की संस्तुतियों में दिए गए सिद्धांतों के आधार पर भुगतान की तिथि के अनुसार इस संबंध में प्रवेश शुल्क का निर्धारण भी शामिल है।
स्पेक्ट्रम की कीमत के संबंध में निर्णय इस प्रकार था- दूरसंचार विभाग और वित्त मंत्रालय स्पेक्ट्रम के कीमत निर्धारण की प्रक्रिया को भी अंतिम रुप देंगे, जिसमें स्पेक्ट्रम के अधिकतम इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहन और इसके अन्य कमतर इस्तेमाल के लिए निरुत्साहन भी शामिल है। (मंत्रिमंडलीय नोट का अनुच्छेद 2.1.3) नए शासन में लगभग 1650 करोड़ रुपए के इसी प्रवेश शुल्क को प्राप्त करने के पश्चात पहले आओ पहले पाओ आधार पर सभी यूएएस लाइसेंसों का आवंटन किया गया था, उपलब्धता की स्थिति में लाइसेंस में स्पेक्ट्रम की कुछ मात्रा के आवंटन का प्रावधान था। सन 2007 में दोहरे तकनीकी स्पेक्ट्रम के इस्तेमाल के लिए अनुमति जारी करने के संदर्भ में वित्त मंत्रालय ने एकमुश्त शुल्क का मुद्दा उठाया और यह कहा कि यदि इसकी मौजूदा कीमत निर्धारण को छोड भी दिया जाए तो भी 2001 में काफी पहले निर्धारित 1600 करोड़ रुपए की दर को 2007 में दिए गए लाइसेंस में बगैर किसी सूचीकरण के लागू किया गया। इसके जवाब में दूरसंचार विभाग ने कहा कि दोहरे तकनीकी लाइसेंसों को ट्राई की संस्तुतियों के आधार पर जारी किया गया था, जिसने प्रवेश शुल्क में किसी भी बदलाव की संस्तुति नहीं की है। वित्त मंत्रालय और दूरसंचार विभाग (डीओटी) के बीच अधिकारी स्तर पर पत्राचार के माध्यम से इस संबंध में संवाद हुआ। डीओटी ने इस बात को दोहराया कि शुरुआती प्रवेश शुल्क में कोई बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।
28 अगस्त 2007 में ट्राई ने इस आधार पर कि नवीन प्रवेशकों के लिए समान स्तर बरकरार रखना चाहिए, 2-जी स्पेक्ट्रम ने संस्तुति की कि आवंटन की नीति में कोई भी बदलाव नहीं किया जाना चाहिए। डीओटी ने इस संस्तुति पर पूरी तरह से विश्वास करते हुबिना किसी नीलामी, लाइसेंसों की अधिकतम संख्या की पाबंदी बिना, पहले आओ पहले पाओ आधार, समान प्रवेश शुल्क और स्पेक्ट्रम के साथ लाइसेंस की नीति को दोहराया। इस अवधि से लेकर 10 जनवरी 2008 में आशय पत्रों को जारी करने की अवधि तक तत्कालीन दूरसंचार मंत्री ए राजा ने उस समय के वित्त मंत्री पी चिदंबरम के साथ कोई बैठक नहीं की। ट्राई की संस्तुतियों के आधार पर दूरसंचार विभाग ने प्रवेश शुल्क में संशोधन के सुझाव को अस्वीकृत कर दिया और उसी नीति को जारी रखा जो 2003 से अमल में लाई जा रही थी। ए राजा ने प्रधानमंत्री को यह आश्वासन भी दिया था कि यह नीति पूरे निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से लागू की जाएगी। नए प्रवेशकों को आशय-पत्र 10 जनवरी, 2008 को जारी किए गए थे। इन आशय-पत्रों की वैधता ही अब मुद्दा है।
कपिल सिब्बल ने कहा कि पूर्ववर्ती घटनाक्रमों से यह साफ हो जाएगा कि 10 जनवरी, 2008 को आशय-पत्र जारी करने या 1,650 करोड़ रुपए का प्रवेश शुल्‍क वसूलने के लिए पी चिदंबरम किसी भी तरह से जवाबदेह नहीं थे, वास्‍तव में, रिकॉर्ड साबित करते हैं कि वित्त मंत्रालय को इन आशय-पत्रों के 10 जनवरी, 2008 को जारी होने के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। दस जनवरी, 2008 को जारी हुए ए आशय-पत्र 2003 से अनुसरण की जा रही नीति के आधार पर ही जारी किए गए थे। सरकार नीति बनाती है, वास्‍तव में, प्रधानमंत्री का यह वक्तव्य रिकॉर्ड में है कि-जहां तक संयुक्‍त प्रगतिशील गठबंधन द्वारा कार्यान्वित की जा रही नीति का सवाल है, मेरी अपनी राय रही है कि मूल नीति में कुछ भी गलत नहीं था, यह ट्राई की सलाह के अनुरूप और हमारे द्वारा महसूस की जा रही दूरसंचार घनत्‍व बढ़ाने की जरूरत के अनुरूप थी। सिब्बल ने कहा कि सरकार नीति की जिम्मेदारी लेते हुए इस बात के प्रति सचेत है कि इस नीति के कार्यान्‍वयन में कुछ अनियमितताएं या गलतियां हुई हों। ए राजा ने प्रधानमंत्री को स्‍पष्‍ट आश्‍वासन दिया था कि इस नीति का कार्यान्‍वयन निष्‍पक्ष और पारदर्शी तरीके से किया जाएगा, परंतु इस नीति के कार्यान्‍वयन में कई अनियमितताएं और विसंगतियां पाई गईं। सभी ऐसे मसले हैं, जिनकी जांच की जा रही है और उपयुक्‍त अदालत में कानून के अनुसार इसका निर्णय होगा। सरकार इस बात पर जोर देना चाहती है कि इन मुद्दों का निर्धारण आम बहस में नहीं किया जा सकता, इन मसलों को अदालत के ऊपर छोड़ देना चाहिए।
सिब्बल ने कहा कि वित्‍त मंत्री के रूप में यह पी चिदंबरम ही थे, जिन्‍होंने प्रवेश शुल्‍क के संशोधन का मसला उठाया था, हालांकि दूरसंचार विभाग की अंतिम राय थी कि 1,650 करोड़ रुपए के समान प्रवेश शुल्‍क लगाने के मसले सहित नीति को 2003 से जारी नीति के अनुरूप ही चलाया जाएगा, इसलिए यह कहना निरर्थक होगा कि 10 जनवरी, 2008 को जारी किए गए आशय-पत्र के लिए प्रवेश शुल्‍क ‘तय करने’ में पी चिदंबरम की कोई भूमिका थी। यह उल्‍लेख करना उचित होगा कि सीबीआई ने सर्वोच्‍च न्‍यायालय को बताया कि मामले को विस्‍तार से देखने, तत्‍कालीन वित्‍त सचिव का बयान लेने के बाद इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा गया कि वित्‍त मंत्री सहित वित्‍त मंत्रालय के किसी भी अधिकारी ने कोई अनियमितता या गलती नहीं की थी, इसलिए पी चिदंबरम को दोषी ठहराने का कोई प्रयास न केवल गैर-जवाबदेह है, बल्कि संसदीय लोकतंत्र की संस्‍था को निष्‍प्रभावी बनाने की पुरजोर कोशिश है। उन्होंने कहा कि संसद में विपक्ष को महत्‍वपूर्ण दायित्‍व निभाना है, सरकार सभी महत्‍वपूर्ण मुद्दों पर नियमों के मुताबिक विचार करने हेतु विपक्ष के साथ सहयोग करने का इच्‍छुक है, विपक्ष को भी सरकार से अवश्‍य सहयोग करना चाहिए, ताकि सरकारी काम और महत्‍वपूर्ण विधेयकों का पारित होना सुनिश्चित किया जा सके।

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