स्वतंत्र आवाज़
word map

चौटालाओं को मिली सजा एक‌ चेतावनी !

Friday 25 January 2013 08:16:54 AM

अवधेश कुमार

अवधेश कुमार

om prakash chautala

नई दिल्ली। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री व इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के प्रधान ओमप्रकाश चौटाला और उनके विधायक पुत्र अजय चौटाला को सीबीआई की विशेष अदालत से 10-10 वर्ष के कारावास की सजा पर हमारी-आपकी जो भी प्रतिक्रिया हो, न्यायालय से यही अपेक्षित था। न्यायालय का पिता-पुत्र सहित 55 आरोपियों को दोषी करार दिए जाने के बाद केवल सजा सुनाया जान शेष था। यह संभव नहीं कि एक बार दोषी करार देने के बाद न्यायालय इन्हें सजा नहीं देता। फैसले के बाद आम राजनीतिक प्रतिक्रिया उम्मीदों के अनुरुप ही है। कांग्रेस और अन्य चौटाला विरोधी पार्टियों ने इसका स्वागत करना बिल्कुल स्वाभाविक है। ऐसी ही सजा किसी कांग्रेस के नेता को मिली होती तो चौटाला या अन्य कांग्रेस विरोधियों की प्रतिक्रियाएं भी ऐसी ही होतीं।
वैसे न्यायालय के फैसले में किंतु परंतु की गुंजाइश कम होती है, इसलिए यह मानने में तो कोई आपत्ति नहीं हो सकती कि जेबीटी (जूनियर बेसिक ट्रेंड) शिक्षक भर्ती में घोटाले और अनियमितताएं हुईं। अदालत ने यदि इन सभी को धारा 120 बी (आपराधिक साजिश) 420 (धोखाधड़ी), 467 (जालसाजी), 468 (धोखाधड़ी के लिए जालसाजी) 471 (फर्जी दस्तावेजों को सही बताकर इस्तेमाल करने) तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं के तहत दोषी माना है, तो यह बिना आधार के नहीं हो सकता। आखिर नवंबर 2003 में दर्ज मामले का फैसला 2013 में हुआ तो इस बीच इतने प्रभावशाली आरोपियों ने अपने बचाव में जितनी शक्ति लग सकती थी, लगाई होगी। दस्तावेजी सबूतों के अलावा 68 गवाहों से दोनों पक्षों की जिरह हुई और तब फैसला दिया गया है। एक आरोपी को न्यायालय ने दोषमुक्त किया भी है।
हालांकि इनके पास उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय तक जाने का विकल्प बचा हुआ है, पर इस समय तो विशेष न्यायालय का फैसला ही हमारे सामने है। इस फैसले को आधार मान लिया जाए तो इस समय यह शीर्ष राजनीतिक प्रशासनिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध अब तक का सबसे बड़ा फैसला लगता है। इसके तीन पहलू हैं। पहला है, यह मामला जिसमें दोष सिद्ध हुआ है। दूसरा है, इस मामले के सबक, क्योंकि यह युवा वर्ग की नियुक्तियों में राजनीतिक-प्रशासनिक हस्तक्षेप व पक्षपात का मामला है और तीसरा पहलू शीर्ष भ्रष्टाचार का है। भारत में नेताओं और उच्च प्रशासनिक अधिकारियों के बारे में आम धारणा इतनी खराब हो गई है कि इनके खिलाफ न्यायालय की टिप्पणियों तक को व्यापक जन समर्थन मिल जाता है और इस मामले में तो वे दोषी साबित किए गए हैं।
आप देख लीजिए, आम जन की प्रतिक्रिया! भारत के इतिहास में ऐसे अवसर कम ही आए हैं, जब किसी मुख्यमंत्री और उनके परिवार को उनके कार्यकाल के दौरान बड़े भ्रष्टाचार के मामले में न्यायालय ने इस तरह दोषी करार दिया हो। लालू प्रसाद यादव चारा घोटाले एवं आय से अधिक संपत्ति मामले में जेल अवश्य गए, पर उन्हें सजा नहीं मिली है। सन् 1982 में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एआर अंतुले को सीमेंट घोटाले में उच्च न्यायालय ने दोषी माना, पर बाद में वे मुक्त हो गए। सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री नरबहादुर भंडॉरी को वर्ष 2011 में उनके मुख्यमंत्रित्व काल के ग्रामीण जल वितरण योजना में भ्रष्टाचार के लिए केवल एक महीने की हल्की सजा दी। अन्नाद्रमुक की नेत्री एवं तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, वे जेल भी गईं, पर सजा नहीं हुई और उसके बाद दूसरी बार विजित होकर मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं। पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भ्रष्टाचार के आरोप में जेल भिजवाया, पर वे सजा से वंचित हैं।
कुल मिलाकर सजायाफ्ताओं की श्रृंखला काफी छोटी है। इस नाते चौटाला पिता-पुत्र को सजा अत्यंत महत्वपूर्ण फैसला है। ध्यान रखिए कि चौटालाओं के साथ साज पाने वालों में आइएएस अधिकारी व तत्कालीन प्राथमिक शिक्षा निदेशक संजीव कुमार और मुख्यमंत्री के तत्कालीन विशेष कार्याधिकारी विद्याधर तथा विधायक शेर सिंह बड़शामी भी शामिल हैं। बड़शामी तब मुख्यमंत्री के राजनीतिक सलाहकार थे। न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री चौटाला व संजीव कुमार को आपराधिक साजिश रचने व भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धाराओं के तहत दोषी करार दिया, जबकि अजय चौटाला, विद्याधर व बड़शामी को आपराधिक साजिश रचने का दोषी पाया। इसके अलावा अन्य आरोपियों को आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, नकली दस्तावेजों का इस्तेमाल और दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ आदि अपराध का दोषी करार दिया है। न्यायाधीश विनोद कुमार ने 308 पन्नों के अपने फैसले में जो टिप्पणियां की हैं, उसकी दो पंक्तियों पर ध्यान दीजिए-चौटाला के नेतृत्व की राज्य सरकार के अधिकारी घोटाले को अंजाम रहे थे। परिस्थितियों की एक मुकम्मल श्रंखला है, जो अभियुक्त ओम प्रकाश चौटाला को मुख्य षडयंत्रकारी ठहराती है। इसके बाद कुछ कहने की आवश्यकता रह जाती है क्या?
मामले का एक रोचक पहलू यह है कि इसकी शुरुआत सरकार की ओर से नहीं हुई, बल्कि उच्चतम न्यायालय के आदेश से हुई। वस्तुतः संजीव कुमार स्वयं इस अपील के साथ न्यायलय गए थे कि चौटाला उन्हें परेशान कर रहे हैं। मुख्यमंत्री चौटाला ने उन्हें निलंबित कर दिया था। संबंधित घोटाले के आरोप पर उन्होंने न्यायालय को कहा कि मुख्यमंत्री ने उन पर दबाव डॉला था। उच्चतम न्यायालय ने इस मामले की जांच करने का आदेश सीबीआई को 25 नवंबर 2003 को दिया। सीबीआई ने जनवरी, 2004 में ओमप्रकाश चौटाला सहित कुल 62 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। विडंबना देखिए कि न्यायालय ने संजीव को भी अपराधी माना और उनके खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला भी बन गया। संभव था, यदि संजीव उच्चतम न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटाते तो मामला यहां तक नहीं पहुंचता। वैसे मामला दर्ज होने के करीब साढ़े चार वर्ष बाद सीबीआई ने आरोप पत्र दायर किया। बस इसी से सीबीआई की राजनीतिक भूमिका संदेह के घेरे में आती है। सवाल उठता है कि आखिर हरियाणा विधानसभा चुनाव के निकट आने पर ही सीबीआई इतनी सक्रिय क्यों हुई?
ध्यान रखिए कि चौटालाओं के खिलाफ सीबीआई ने 2005 में आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया और 2010 में आय से 150 करोड़ रूपये अधिक की संपत्ति का आरोप पत्र भी दाखिल कर दिया। इसमें भी मामला चल रहा है और इस वर्ष या अगले वर्ष फैसला आ सकता है। तब तक लोकसभा चुनाव का भी समय आ जाएगा। वैसे वर्तमान फैसले के बाद ही तत्काल प्रदेश से एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रतिरोध के क्षीण होने की पूरी संभावना बन गई है। जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा आठ के अनुसार अदालत से दोषी ठहराए जाने और दो साल या उससे ज्यादा की क़ैद की सजा पाया व्यक्ति चुनाव लड़ने के अयोग्य हो जाता है, इसलिए चौटाला समर्थक यदि सीबीआई के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं, तो उसे एकबारगी खारिज करना भी कठिन है। हालांकि इससे शिक्षक भर्ती मामले में भ्रष्टाचार एवं अनियमितता गलत साबित नहीं होती।
न्यायालय ने सीबीआई के आरोप पत्र में लगाए गए जिन आरोपों को स्वीकार किया है, उनके अनुसार वर्ष 1999-2000 के बीच राज्य के 18 जिलों में हुई 3206 जेबीटी शिक्षकों की भर्ती के मामले में मानदंडों को ताक पर रखकर मनचाही बहाली की गई। इसके लिए शिक्षकों की भर्ती की जिम्मेदारी कर्मचारी चयन आयोग से लेकर जिला स्तर पर बनाई गई चयन कमेटी को सौंपी गई थी। इसने फर्जी साक्षात्कार के आधार पर चयनित अभ्यर्थियों की दूसरी सूची तैयार की। राजधानी दिल्ली के हरियाणा भवन और चंडीगढ़ के एक गेस्ट हाउस में 18 जिलों की जिला स्तरीय चयन समितियों के अध्यक्षों और सदस्यों को बुलाकर यह सूची तैयार की गई। अगर नई सूची बनी तो फिर सीबीआई की यह बात भी सही ही मानी जाएगी कि इसके लिए जिला स्तरीय चयन कमेटी में शामिल शिक्षा विभाग के अधिकारियों पर दबाव भी बनाया गया था। वैसे पिता-पुत्र दोनों को एक-एक अभ्यर्थी की जानकारी रही होगी, यह संभव नहीं लगता, इसलिए मामले में दूसरे अधिकारियों-कर्मचारियों ने भी लाभ उठाया, लेकिन चूंकि मुख्यमंत्री ने कर्मचारी चयन आयोग की जगह जिला स्तर पर चयन समिति बनाई, इसलिए अंतिम दोष उनके सिर पर ही जा पहुंचा।
यह बात भी सही है कि इस मामले में किसी उम्मीदवार ने नहीं माना है कि उसने भर्ती के लिए चौटाला द्वय में से किसी को घूस दी या उनसे इनके लिए घूस मांगी गई, लेकिन यह सामान्य अनुभव की बात है कि वैसी भर्तियों में भारी धन का लेन-देन हुआ होगा। उस समय हरियाणा में यह आम धारणा थी कि शिक्षक के रुप में नियुक्त होना है, तो फिर इनेलो में पहुंच हो या जेब में मोटी रकम हो। यदि यह साफ हो जाए कि भर्ती केवल नियत परीक्षा एवं साक्षात्कार के प्राप्तांक व अनुभव के दायरे तक सीमित नहीं होगी तो फिर आम उम्मीदवार किसी न किसी तरह नेताओं या अधिकारियों के पास पैरवी या जुगाड़ करने की कोशिश करते हैं और उसी में वारा-न्यारा होता है। निस्संदेह, इसमें अधिकारियों-कर्मचारियों और नीचे स्तर के नेताओं ने भी कमाई की। पूरी कथा समझने के बाद किसी का भी अंतर्मन जुगुप्सा से भर जाता है। मुख्यमंत्री के नाते चयन प्रक्रिया का स्थानीयकरण करना गलत नहीं था, पर उसमें पारदर्शिता, ईमानदारी तो सुनिश्चित होनी चाहिए थी, ताकि सही एवं योग्यतम का चयन प्राथमिकता बन सके। यहां तो राजनीतिक और प्रशासनिक हस्तक्षेप और पक्षपात के कारण योग्य उम्मीदवार ही वंचित हुए होंगे। पता नहीं उनमें से कितने अवसादग्रस्त होकर अपनी कार्यक्षमता तक से भी विमुख हो चुके होंगे, इसलिए यह मामला ज्यादा चिंताजनक है।
वास्तव मे न्यायालय के फैसले से सबक लेकर केंद्र एवं राज्यों में ऐसे कदम उठाने चाहिएं, ताकि नौकरियों के चयन में किसी प्रकार के राजनीतिक-प्रशासनिक पक्षपात की गुंजाइश न रहे। वस्तुतः उम्मीदवारों के चयन को शत-प्रतिशत प्रतियोगिता आधारित व पारदर्शी बनाया जाना सुनिश्चत करना चाहिए।इससे तीन बातें साफ होती हैं। पहला, यदि राजनीतिक शह, समर्थन, स्वीकृति या सहानुभूति नहीं हो, तो बड़े प्रशासनिक भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं होगी। दो, जांच एजेंसियां निर्भय होकर काम करें तो न्यायालय से उनका बच निकलना संभव नहीं होगा, किंतु इसका तीसरा बिंदु यह है कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष में न्यायालयों की भूमिका तो है, पर उसकी सीमाएं हैं और जांच एजेंसियों के चरित्र पर वह बहुत हद तक निर्भर हैं, इसलिए शीर्ष भ्रष्टाचार का अंत केवल सतत् जन संघर्ष से ही संभव हो सकता है।

हिन्दी या अंग्रेजी [भाषा बदलने के लिए प्रेस F12]