प्रेरणादायी व अनुकरणीय शिक्षा सेवाओं के लिए राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार
शिक्षक दिवस पर समस्त शिक्षक समुदाय के प्रति सम्मान व्यक्त कियास्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम
Saturday 5 September 2026 06:13:41 PM
नई दिल्ली। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने शिक्षक दिवस पर आज प्रेरणादायी और अनुकरणीय शिक्षा सेवाओं केलिए चयनित शिक्षकों को राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्होंने शिक्षकों को संबोधित करते हुए कहाकि देश के द्वितीय राष्ट्रपति रहे डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को शिक्षक दिवस के रूपमें मनाकर उनके प्रति एवं समस्त शिक्षक समुदाय केप्रति सम्मान व्यक्त करते हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि जो समाज शिक्षकों का सम्मान करता है, वह समाज सही अर्थों में प्रगतिशील होता है। उन्होंने कहाकि शिक्षकों केबीच आकर उनके अंदर विद्यमान विद्यार्थी और शिक्षक दोनों ही जीवंत हो जाते हैं, उन्हें अपने शिक्षकों का सादर स्मरण होता है, उनके स्नेह और मार्गदर्शन के बल पर ही वे अपनी जीवनयात्रा में यहां तक पहुंच पाई है। द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि उन्हें अपने विद्यार्थी भी याद आते हैं, जिन्हें उन्होंने ओड़िशा के राइरंगपुर में श्रीऑरोबिंदो इंटीग्रल स्कूल में पढ़ाया था, वे उनसे भी बहुत कुछ सीखा है, उनके प्यार को वे अपने जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि मानती हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि वे भी कभी शिक्षक समुदाय की सदस्य रही हैं, इससे उन्हें विशेष सार्थकता का अनुभव होता है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जिक्र कियाकि सावित्रीबाई फुले आधुनिक युग में विद्यालय में पढ़ाने वाली भारत की पहली शिक्षिका के रूपमें जानी जाती हैं, बालिकाओं की शिक्षा के क्षेत्रमें उन्होंने क्रांतिकारी पहल की थी और 19वीं सदी में बालिका विद्यालयों की स्थापना की थी, आज केदिन क्रांतिज्योति स्वरूपा महान शिक्षिका सावित्रीबाई फुले को, मैं सादर नमन करती हूं। उन्होंने कहाकि बीसवीं सदी के आरंभ में पश्चिम बंगाल के बोलपुर जिले में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने शांति निकेतन की तथा ओड़िशा के पुरी जिले में प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी उत्कल मणि पंडित गोपबंधु दास ने वन विद्यालय यानी ओपन एयर स्कूल की स्थापना की थी। उन्होंने कहाकि उन विद्यालयों की स्थापना के पीछे यह उदात्त विचार थाकि प्रकृति की गोद में विद्यार्थियों का सहज विकास होता है। राष्ट्रपति ने कहाकि यहां लद्दाख से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक पूरे देश में शिक्षण के श्रेष्ठ प्रतिमान स्थापित करने वाले शिक्षक उपस्थित हैं। उन्होंने प्रसन्नता व्यक्त कीकि पुरस्कृत शिक्षकों में गांव के स्कूलों में पढ़ाने वाले शिक्षकों की संख्या अधिक है और उन्हें आशा हैकि उनकी अध्यापन एवं प्रशिक्षण पद्धतियां और उपलब्धियां अन्य शिक्षकों को भी शिक्षण में उत्कृष्टता केलिए प्रेरित करेंगी।
राष्ट्रपति ने कहाकि स्कूली शिक्षा, शिक्षा व्यवस्था का आधार है, ज्ञान और कौशल तो कभीभी प्राप्त किए जा सकते हैं, परंतु बचपन में ही सदाचार की शिक्षा देना अधिक प्रभावी सिद्ध होता है। उन्होंने कहाकि प्रारंभिक कक्षाओं में बच्चों के बौद्धिक, शारीरिक और नैतिक विकास पर निष्ठापूर्वक ध्यान देकर हमारे शिक्षक अच्छे विद्यार्थियों और कर्तव्यनिष्ठ नागरिकों की भावी पीढ़ियां तैयार कर सकते हैं। राष्ट्रपति ने इस बात का उल्लेख कियाकि अनेक विद्यार्थी आर्थिक दृष्टि से कमजोर परिवारों से आते हैं, कुछ अपने परिवार में पहली पीढ़ी के विद्यार्थी होते हैं, कुछ विद्यार्थी गांव के किसी सामान्य स्कूल से शहर के बड़े स्कूल में आते हैं, कुछ विद्यार्थी स्वभाव से ही संकोची होते हैं, कुछ विद्यार्थियों में बहुत प्रतिभा होती है, लेकिन उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है तथा कुछ विद्यार्थी ऐसे होते हैं, जिनकी विशेष जरूरतें होती हैं। उन्होंने कहाकि ऐसे सभी विद्यार्थी, जो किसी कारण से कोई कमी महसूस करते हैं, उनमें आत्मविश्वास जगाना और उन्हें आगे बढ़ाना शिक्षकों का विशेष दायित्व है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने कहाकि देश के विकास में शैक्षणिक उत्कृष्टता, कौशल विकास और उद्यमिता का बहुत महत्व है। उन्होंने कहाकि भारत को ज्ञान की महाशक्ति बनाने केसाथ-साथ विश्व के कौशल केंद्र के रूपमें स्थापित करना, हमारी राष्ट्रीय प्राथमिकताओं में शामिल है। राष्ट्रपति ने कहाकि हम सभी देशवासी विकसित भारत के निर्माण के लक्ष्य की ओर आगे बढ़ रहे हैं। राष्ट्रपति ने कहाकि विश्वस्तरीय शिक्षा व्यवस्था के बल पर ही विकसित राष्ट्र का निर्माण संभव है। उन्होंने कहाकि हमारे शिक्षक, शिक्षा व्यवस्था में प्राण वायु का संचार करते हैं और हमारा यह प्रयास होना चाहिएकि हमारे देश में एकभी विद्यार्थी अच्छी शिक्षा के अवसरों से वंचित न रहे। उन्होंने इस बात पर जोर दियाकि हमारे शिक्षक अपने स्नेह और समर्पण से सभी विद्यार्थियों में ज्ञान, प्रेरणा, नैतिकता और संवेदनशीलता का संचार करें।