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महात्‍मा गांधी पर टिप्‍पणी से भड़की भारत सरकार

यूएनएसआर राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छता नीति को समझने में असफल

सरकार ने की यूएनएसआर के आरोप की कड़ी निंदा

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Friday 10 November 2017 02:40:13 PM

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नई दिल्ली। भारत सरकार ने राष्ट्रपिता महात्‍मा गांधी पर संयुक्‍त राष्‍ट्र के विशेष प्रतिवेदक की टिप्‍पणियों की कड़ी निंदा की है। सुरक्षित पेयजल और स्वच्छता के मानवाधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र के विशेष प्रतिवेदक (यूएनएसआर) लियो हेलर ने राष्ट्रपिता के प्रति गंभीर असंवेदनशीलता दर्शाई है, जिसकी भारत सरकार कड़ी निंदा करती है। आज नई दिल्‍ली में जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में उन्‍होंने कहा था-‘अब उन चश्‍मों (गांधीजी के चश्‍मे) को मानवाधिकार के चश्‍मों से बदलने का महत्‍वपूर्ण समय है।’ जबकि सारे विश्‍व को पता है कि महात्‍मा गांधी मानवाधिकार के प्रमुख समर्थक थे, जिसमें असाधारण तरीके से स्‍वच्‍छता पर विशेष ध्‍यान केंद्रित करना शामिल था। गौरतलब है कि स्वच्छ भारत मिशन का अनूठा प्रतीक चिन्‍ह ‘गांधीजी का चश्मा’ मानवाधिकारों के मूल सिद्धांत का प्रतीक है। ज्ञातव्य है कि सुरक्षित पेयजल और स्‍वच्‍छता पर मानवाधिकार पर यूएनएसआर लियो हेलर ने 27 अक्‍टूबर से 10 नवंबर 2017 तक भारत का दौरा किया था, जहां यूएनएसआर ने ‘असाधारण प्रतिबद्धता’ के माध्‍यम से जल और स्‍वच्‍छता सेवाओं की खामियों से निपटने में भारत सरकार के प्रयासों की सराहना तो की है, लेकिन उन्होंने गलत तथ्‍यों, अधूरी जानकारी या जमीनी स्‍तरपर पेयजल तथा स्‍वच्‍छता की स्थिति के बारे में अतिरंजित टिप्पणी भी कर डाली है।
भारत सरकार ने यूएनएसआर की टिप्पणी पर कड़ा प्रतिवाद दर्ज किया है और कहा है ‌कि यूएनएसआर के यह स्‍वीकार करने के बावजूद कि ‘इतने बड़े, विविध और जटिल भारत देश में जल और स्‍वच्‍छता के मानवाधिकार की स्थिति के सभी पहलुओं को पूरी तरह से समझने के लिए दो सप्‍ताह पर्याप्‍त नहीं हैं।’ उन्‍होंने अप्रमाणित आरोप लगाया कि भारत के जल और स्‍वच्‍छता कार्यक्रमों में मानवाधिकार के सिद्धांतों पर उचित ध्‍यान नहीं दिया गया है। भारत सरकार ने एक वक्‍तव्‍य में उनके दावों को अस्‍वीकार कर दिया है और दोबारा इस बात पर बल दिया है कि स्‍वच्‍छ भारत मिशन यानी एसबीएम और ग्रामीण तथा शहरी पेयजल कार्यक्रम पूरी तरह से मानवाधिकार के उन मानदंडों और सिद्धांतों के अनुरूप है, जोकि संयुक्‍त राष्ट्र प्रणाली द्वारा स्‍थापित किए गए हैं, जिनके तथ्य इस प्रकार हैं-तीन वर्ष में 25 करोड़ से अधिक लोगों को स्‍वच्‍छता सुविधाएं प्राप्‍त हुई हैं, 2.7 लाख गांव, 227 जिले और 6 राज्‍य खुले में शौच से मुक्‍त यानी ओडीएफ हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में 77 प्रतिशत से अधिक आबादी के लिए कम से कम 40 लीटर प्रति व्‍यक्ति प्रति दिन जलापूर्ति है और शहरी क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक लोगों की सुरक्षित पेयजल तक पहुंच है। एसबीएम शौचालय के सुरक्षित डिजाइन को बढ़ावा देता है, संबंधित गुणवत्‍ता मानक स्‍थापित करने में राज्‍य स्थिति के अनुरूप रुख़ अपना सकते हैं। चार वर्ष में ग्रामीण जल से आर्सेनिक और फ्लोराइड के प्रदूषण को समाप्‍त करने के लिए भारत सरकार का राष्‍ट्रीय उप-मिशन है।
स्‍वच्‍छ भारत मिशन यानी एसबीएम समाज के सभी वर्गों में शौचालय की स्‍वीकार्यता तथा महिलाओं की निजता सुनिश्चित करने के लिए सामुदायिक जागरुकता के जरिये व्‍यवहार में बदलाव लाने पर जोर देता है। सभी संस्‍थानों में पुरुषों और महिलाओं के लिए अलग-अलग शौचालय हैं। पिछले तीन वर्ष में 5.3 करोड़ से अधिक व्‍यक्तिगत आवासों के लिए शौचालयों का निर्माण किया गया है। राष्‍ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के तहत आवासीय परिसर के भीतर या आवासों से अधिकतम 100 मीटर की दूरी पर पेयजल उपलब्‍ध कराया गया है। एसबीएम के तहत शौचालय के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में 12,000 रुपये और शहरी क्षेत्रों में 4,000 रुपये की प्रोत्‍साहन राशि प्रदान की गई है। शहरी आबादी के लिए निःशुल्‍क या अत्‍यधिक कम दर पर जल उपलब्‍ध है। एसबीएम ने स्‍वच्‍छता के लिए समाज के सभी वर्गों को साथ लेकर समुदायों पर ध्‍यान केंद्रित किया है। दिव्‍यांगजनों, ट्रांसजेंडर, ग़रीब और पिछड़े वर्गों के लिए स्‍वच्‍छता सुविधाओं की पहुंच सुनिश्चित है। एनआरडीडब्‍ल्‍यूपी के तहत अनुसूचित जाति की आबादी के आवासों के लिए 22 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति के लोगों के आवासों के लिए 10 प्रतिशत धनराशि रखी गई है। एसबीएम और एनआरडीडब्‍ल्‍यूपी दोनों के सार्वजनिक स्‍थानों पर मजबूत एमआईएस और डैशबोर्ड हैं। एसबीएम समुदायों को स्‍वच्‍छता पर जानकारी प्रदान करने के लिए स्‍थानीय स्‍तर के जमीनी प्रेरकों को प्रशिक्षित करता है। भारत में मानवाधिकार और जलआपूर्ति तथा स्वच्छता पर यूएनएसआर की रिपोर्ट में उल्लेखित ग़ल्तियों, सामान्यीकरण और पूर्वाग्रहों के कुछ उदाहरण हैं, जो कुछ राज्यों की क्षणिक यात्राओं तथा कुछ उपाख्‍यानात्‍मक संदर्भों से केवल दो सप्ताह के दौरे के बाद तैयार किए गए हैं।
भारत सरकार का कहना है कि ओडीएफ घोषित करने की प्रक्रिया पूरी तरह से विकेंद्रीकृत, लोकतांत्रिक और समुदाय संचालित है। जागरूकता फैलाने और निगरानी करने में महिलाएं, बच्‍चे और वंचित समूह अग्रणी हैं। ग्रामीण जल और स्‍वच्‍छता समितियां जलापूर्ति योजनाओं की योजना तैयार करती हैं तथा उनका संचालन एवं निगरानी करती हैं। एसबीएम की जिला, राज्‍य और राष्‍ट्रीय स्‍तर पर संपूर्ण सत्‍यापन प्रक्रिया है। प्रतिष्ठित एजेंसियों के जरिये तीसरे पक्ष से सत्‍यापन करवाना एसबीएम का महत्‍वपूर्ण पहलू है। कड़ी शर्त हैकि एसबीएम के अंतर्गत निर्मित सभी शौचालय जीओ टैग होने चाहिएं। निरंतरता एसबीएम की पहचान है। ओडीएफ के बाद निरंतर आईईसी और ओडीएफ सत्यापित गांवों का निरंतरता सत्यापन सहित विस्तृत निरंतरता प्रोटोकॉल है। एनआरडीडब्ल्यूपी स्रोत और प्रणाली निरंतरता के माध्यम से जल सुरक्षा के लिए 10 प्रतिशत के आवंटन का प्रावधान करता है। भारत के जल और स्‍वच्‍छता की अधूरी जानकारी का हवाला देते हुए वक्‍तव्‍य में कहा गया है कि यूएनएसआर राष्‍ट्रीय स्‍वच्‍छता नीति में हुए संपूर्ण बदलाव को समझने में असफल रहा है, जिसके तहत शौचालयों के निर्माण से लेकर समुदायों को खुले में शौच से मुक्‍त कराया गया है। लेकिन ऐसा लगता है कि यूएनएसआर एसबीएम को रंगीन चश्‍मे से देख रहा है। उन्‍होंने तीसरे पक्ष भारतीय गुणवत्‍ता परिषद के 1,40,000 आवासों पर किए गए राष्‍ट्रीय सर्वेक्षण के निष्‍कर्षों पर भी प्रश्‍न उठाने की कोशिश की है, जिसमें कहा गया है कि शौचालयों का उपयोग 91 प्रतिशत से अधिक था। उन्‍होंने इसकी तुलना भ्रामक ढंग से वॉटर ऐड द्वारा केवल 1,024 आवासों में कराए गये सर्वेक्षण से की है, जो शौचालय प्रौद्योगिकी पर केंद्रित था, न कि इसके इस्‍तेमाल पर केंद्रित था।
भारत सरकार ने सरकारी स्कूलों में शौचालयों की कमी के आरोप के बारे में एक निजी संगठन की रिपोर्ट के हवाले से यूएनएसआर के दावे का खंडन किया है। भारत सरकार का कहना है कि यह ध्‍यान देने योग्‍य है कि अगस्त 2014 से अगस्त 2015 तक प्रत्येक स्कूल में लड़कों और लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालय सुनिश्चित करने के लिए एक अभूतपूर्व कार्यक्रम सफलतापूर्वक लागू किया गया था। यूएनएसआर का यह भी कहना ग़लत है कि जलापूर्ति पर पूरा ध्यान नहीं दिया गया और धन भी पर्याप्‍त नहीं है, जबकि वास्तविकता यह है कि 2009 में राष्ट्रीय ग्रामीण पेयजल कार्यक्रम के शुभारंभ के बाद से 1,20,000 करोड़ रुपये का केंद्र और राज्यों ने ग्रामीण पेयजल में निवेश किया है तथा 2005 से शहरी जलापूर्ति पर केंद्र सरकार ने 40,000 करोड़ रूपए का निवेश किया है। इसके अलावा पानी और स्वच्छता सहित बुनियादी सेवाएं प्रदान करने के लिए 14वें वित्त आयोग के माध्यम से लगभग 40,000 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष ग्रामीण स्थानीय निकायों को हस्‍तां‍तरित किये जाते हैं, इसके अतिरिक्‍त अधिकतर राज्यों ने ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के लिए स्वयं के संसाधनों से पेयजल पर भारी निवेश किया है। भारत सरकार ने दृढ़तापूर्वक कहा है कि सरकार सामान्य रूप से मानवाधिकारों और विशेष रूपसे जलआपूर्ति तथा स्वच्छता के क्षेत्रों में मानवाधिकारों के लिए सबसे अधिक प्रतिबद्ध है और वह यूएनएसआर की रिपोर्ट तथा उसकी प्रेस विज्ञप्ति को दृढ़ता से खारिज करती है।

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