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सांसारिक विविधता और शब्द संसार की शक्ति

'भारत को है एक नई पुस्तक संस्कृति की आवश्यकता'

'भाषा और बोली में समाया हुआ है संपूर्ण संसार'

Thursday 5 October 2017 06:45:44 AM

हृदयनारायण दीक्षित

हृदयनारायण दीक्षित

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संसार दो तरह का है। एक संसार प्रत्यक्ष है, जिसमें रूप हैं और लाखों जीव हैं। इसके साथ सूर्य, चंद्र, धरती, जल, अग्नि और आकाश भी है। मानव ज्ञान के विकास क्रम में यहां हरेक वस्तु, रूप, पदार्थ और भाव के नाम रखे गए हैं। तमाम वनस्पतियां और जीव बिना नाम के भी हो सकते हैं। पूर्वजों ने पुराणों में 84 लाख जीव-योनियां बताई हैं। वैज्ञानिकों की गणना अभी 80 लाख तक पहुंची है। संभव है कि वैज्ञानिकों को 4 लाख लगभग और जीवों की जानकारी मिल सकती है। संभव यह भी है कि पुराणकारों द्वारा बताई गई संख्या से भी कम या ज्यादा जीव हों। भूमँडल के ताप की बढ़त और तमाम विपरीत परिस्थितियों में अनेक जीव प्रजातियां समाप्त भी हो गई होंगी। सांसारिक विविधता का ज्ञान भाग ही प्रत्यक्ष संसार है। आईए अब दूसरे संसार की भी चर्चा करते हैं। दूसरा संसार इसी प्रत्यक्ष संसार का परिचय है। यहां शब्द ही शब्द हैं। प्रत्यक्ष संसार में नदियां हैं। शब्द संसार में नदी के प्रतिनिधि रूप में शब्द-'नदी' है। आकाश तारागण, चंद्र और सूर्य प्रत्यक्ष है। शब्द संसार में शब्द सूर्य या चंद्र हैं। भाषा बोली में पूरा संसार समाया हुआ है। परमाणु विस्फोट बड़ी घटना है। वैज्ञानिकों के लिए प्रत्यक्ष रही। हमारे पास इस घटना के लिए केवल शब्द हैं, जो संसार में है, वह शब्द में है। दोनो संसार वास्तविक हैं। दोनो की अपनी अस्मिता है।
शब्द संसार का जाना पहचाना शब्द है-जल या पानी। जल शब्द का उच्चारण ध्वनि है। जल उच्चारण वास्तविक जल नहीं है। हम वास्तविक जल की चर्चा के लिए शब्द जल का उपयोग करते है। वास्तविक जल रसपूर्ण है। शब्द जल पदार्थ या रस नहीं है, लेकिन अच्छे विद्यार्थी या आचार्य जल का उल्लेख करते हुए शब्द को भी रसपूर्ण बनाते हैं। चरक संहिता में रसों की व्याख्या है। काव्य साहित्य में भी रसों का विवेचन है। पदार्थ रस की व्याख्या विज्ञान का काम है। इस रस की व्याख्या के लिए रचे गए शब्द भी सरस होने चाहिए। सभी रस उपयोग किए जाने पर काया में रासायनिक परिवर्तन लाते हैं। साहित्य में भी रस हैं। वे वाक्य को सरस बनाते हैं और रसपूर्ण वाक्य कविता होते हैं। शब्द भले ही पदार्थ न हों लेकिन रसपूर्ण होते हैं। कभी कभी कविता में प्रयुक्त शब्दों का मधुरस वास्तविक मधुरस से भी ज्यादा जीवन को मधुमय बनाता है। कभी कभी प्रत्यक्ष रूप उतना आनंदित नहीं करता जितना शब्दों में किया गया रूप चित्रण। शब्द प्रयोग का माधुर्य मानव जीवन को प्रीतिपूर्ण बनाता है। मधु पदार्थ का सेवन मानव जीवन को वैसा ही रसपूर्ण नहीं बनाता।
ज्ञान वाणी में प्रकट होता है और वाणी शब्द में। शब्द या वाणी की शक्ति का धारक प्राण है। प्रश्नोपनिषद् में ऋषि भार्गव ने रोचक प्रश्न पूछा कौन देवता प्रजा धारण करते हैं, कौन प्रकाशित करते हैं? इनमें वरिष्ठ कौन हैं? इस प्रश्न के उत्तर में पिप्पलाद ने बताया कि सबका आधार आकाश है। उससे उत्पन्न वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी धारक देवता हैं। वाणी आदि 5 कामेंद्रियां नेत्र, कान आदि 5 ज्ञानेंद्रियां और मन आदि अन्त:करण कुल 14 देवता देह के प्रकाशक हैं। यहां आकाश और वाणी की महत्ता आकाश देवों में वरिष्ठ हैं। वाणी प्रकाशक देव हैं। फिर बताते हैं कि लेकिन प्राण श्रेष्ठ हैं-अरा इव रथ नामौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम्। प्राण न रहे तो सब साथ छोड़ जाते हैं। बताते हैं कि ऋग्वेद की ऋचाएं यजुष के मंत्र, सामगान और इनसे सिद्ध प्रसिद्ध प्रज्ञा सबके सब प्राण आश्रित हैं।'' आकाश से ही वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का विकास हुआ। यह हुआ प्रत्यक्ष संसार का विकास क्रम। आकाश का गुण शब्द है। ऋचाएं आकाश में रहती हैं। शब्द से शुरू करे तो दूसरा गुण स्पर्श है। यह गुण वायु का है। तीसरा गुण ताप है, यह अग्नि का है, चौथा जल का रस गुण है और पांचवा गुण है गंध। यह पृथ्वी का है। जैसे प्रत्यक्ष जगत् का प्रथम प्रकाश आकाश है वैसे ही वाक् जगत् का प्रथम गुण शब्द है। जैसे आकाश वरिष्ठ देव हैं वैसे ही शब्द भी प्रणाम योग्य देवता हैं।
शब्दों का अपना संसार है। ऋग्वेद में एक देवी हैं-वाणी। वे कहती हैं कि मैं सारा विश्व धारण करती हूं। इस सूक्त को जल्दबाजी में पढ़ने से सही अर्थ नहीं खुलते। विद्वान अपनी व्याख्या करते हैं। बताते हैं कि सीमा से असीम हो जाना ऋग्वेद के देवतंत्र की विशेषता है। वाणी यहां देव प्रकृति के अनुसार असीम नहीं है। वाणी वास्तव में समूचे विश्व को धारण करती है। वाणी में दुनिया के सभी रूपों के लिए शब्द हैं। वाणी शब्द में प्रकट होती है और शब्दों का संसार वाणी के संसार के अलावा और कुछ नहीं है। शब्द किसी भी वस्तु के ध्वनि प्रतिनिधि हैं। लिपि के आविष्कार के बाद शब्दों ने भी रूप पाया। फिर प्रत्येक ध्वनि रूपवती हो गई। यहां दो रूप हो गए। एक रूप वस्तु का जैसे पर्वत या भवन का रूप। फिर पर्वत के लिए 'पर्वत' का उच्चारण हुआ। यह पर्वत नाम की ध्वनि हुई। फिर पर्वत को लिखा गया। पर्वत लिखित शब्द हो गया नये रूप में। बोले और लिखे गए शब्दासें का संसार भौतिक संसार का पर्यायवाची है। शब्द रूप पर्वत हम डायरी में रख लेते हैं। असली पर्वत विशालकाय है। हम उसे जेब में नहीं रख सकते। लिखित शब्दों का संकलित रूप हैं-पुस्तकें या सीडी। बोले गए शब्दे का सुने जाने योग्य संकलन भी अब सीडी में संभव है। पुस्तकें भी सारा संसार धारण करती हैं, इसीलिए प्रणम्य हैं।
सारी दुनिया को जानने का माध्यम हैं पुस्तकें, लेकिन दुर्भाग्य से भारत में आनंदवर्द्धन पुस्तक संस्कृति नहीं है। पाउडर या क्रीम लगाने, बाल रंगने या गोरा हो जाने के आभासी उपायों पर मध्यवर्गीय भारतीय भी ढेर सारा खर्च करते हैं, लेकिन घर में 10-20 पुस्तकें भी रखने पर विचार नहीं करते। वे दूसरी उपभोक्ता सामग्री की तरह जल्दी नष्ट भी नहीं होती। वे संभालकर रखने से 70-80 वर्ष से ज्यादा समय तक श्रेष्ठ परिसम्पत्ति बनी रहती हैं। वे आनंदवर्द्धन तो हैं ही साथ में पढ़ने वाले को तमाम ज्ञान से भी परिपूर्ण करती हैं। पुस्तकें ज्ञानकोष हैं तो भी घर में एक छोटा सा 'पुस्तक कोना' या पुस्तक घर बनाना सामान्यतया किसी भी सम्पन्न व्यक्ति की महत्वाकांक्षा नहीं होता। सारी दुनिया में ज्ञान की आंधी है। पुस्तक प्रेमी बढ़े हैं। पुस्तकों से समृद्ध होना प्रतिष्ठित माना जा रहा है। पुस्तकें 'स्टेटस सिम्बल' हो रही हैं लेकिन अपने यहां कोई पुस्तक प्रीति नहीं। लेखक बढ़े हैं, पाठक घटे हैं। लगातार घट रहे हैं। यह विषय चिन्ता का है। क्या यही ठीक समय नहीं है कि बिना पुस्तकों वाले घरों को अपूर्ण घोषित कर दिया जाये? पुस्तकहीन घर रहने लायक हो ही नहीं सकता।
शब्द आकाश का गुण है। आकाश पिता हैं, पिता से यही गुण माता पृथ्वी होते हुए हम तक आया है। माता पिता ने अपने गुण हस्तांतरित कर दिए। यह उनकी अनुकम्पा है। हमने शब्द गुण का संवर्द्धन नहीं किया। यह हमारी ही गल्ती है। शब्द की शक्ति और सामर्थ्य हम सब जानते हैं। दिन भर गप करते हैं। यह शब्द विलास नहीं तो और क्या है? दुनिया की सारी संस्कृतियां शब्द सृजन ही हैं। प्रीति रीति और आत्मीयता के संवाहक शब्द ही हैं। इतिहास, भूगोल आदि सारे ज्ञान अनुशासन शब्दों में हैं। हम शब्दानुशासन की ओर ध्यान नहीं देते। शब्द योग व्यक्तित्व के चरम परम विकास का विज्ञान है। इसके लिए जरूरी है योगानुशासन। इसी तरह शब्द चरम परम ज्ञान विज्ञान के संवाहक है। इसके लिए जरूरी है शब्दानुशासन। आश्चर्य है कि शब्दानुशासन और योगानुशासन शब्द एक ही महाविज्ञानी पतंजलि ने दिये हैं। पुस्तकें शब्द रूप ज्ञानकोष हैं। भारत को एक नई पुस्तक संस्कृति की आवश्यकता है। मांग कर नहीं मूल्य देकर खरीदने व पढ़ने की आवश्यकता।

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