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पृथ्वी से कहीं और जीवन अभी भी रहस्य!

एलयू की विशिष्ट व्याख्यान श्रृंखला में व्याख्यान

व्याख्यान श्रृंखला एलयू का उल्लेखनीय प्रयास

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Sunday 10 September 2017 05:15:46 AM

lectures in the special lecture series of lu

लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में इस शनिवार को विशेष व्याख्यान श्रृंखला में भूमंडल पर प्रत्येक की जिज्ञासा के विषय पृथ्वी से भी कहीं और जीवन होने की सच्चाई और संभावनाओं पर विशिष्ट विज्ञानियों के जोरदार व्याख्यान हुए। विज्ञानियों के तर्क दमदार थे और व्याख्यान नवीनतम जानकारियों से समृद्ध थे, मगर न तो यह बात खारिज हुई कि पृथ्वी से कहीं और भी जीवन है और ना ही यह सिद्ध हो पाया कि हां जीवन है। व्याख्यान का निचोड़ है कि संभव है कि जीवन के जिन रूपों और जिन अनुकूल परिस्थितियों को हम मानकर चल रहे हैं, जीवन उनसे भिन्न भी हो सकता है, आखिर समुद्र की ठंडी अंधेरी गहराईयों में भी बैक्टीरिया मिले हैं। वोस्तोक जैसी जमी हुई झील में लगभग पौने चार किलोमीटर की गहराई पर बैक्टीरिया मौजूद हैं, इसलिए विश्वास भी होता है कि जब समुद्र की ठंडी अंधेरी गहराईयों में बैक्टीरिया हो सकता है तो परिस्थितियों के अनुकूल अपने आपको ढालने की जीवन की असाधारण क्षमता को हम कम नहीं आंक सकते, ब्रह्मांड के असीम विस्तार में कहीं न कहीं जीवन की संभावना को सिरे से नकार देना भी उचित नहीं हो सकता है, जिससे अन्वेषण तो चलते रहना ही चाहिए, जैसा हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है-चरैवेति चरैवेति। बहरहाल लखनऊ विश्वविद्यालय के एपीसेन हॉल में विज्ञानी डॉ सीएम नौटियाल के विशेष व्याख्यान को बड़ी दिलचस्पी से सुना गया। व्याख्यान का विषय था-क्या पृथ्वी से प्यारा जीवन हो सकता है?
लखनऊ विश्वविद्यालय में अनुसंधान, योजना और विकास बोर्ड के निदेशक और भूवैज्ञानिक प्रोफेसर ध्रुवसेन सिंह का कहना है कि पृथ्वी पर जीवन अनेक संयोगों का परिणाम है, खरबों मंदा‌किनियों और हरएक में खरबों तारे होने के बाद भी अन्य कहीं भी जीवन की उपस्थिति होने की आजतक पुष्टि नहीं हुई है। उनका कहना है कि सौरमंडल में चंद्रमा और मंगल के अतिरिक्त शनि एवं बृहस्पति गृह के उपगृहों के अध्ययन से हम इस विषय को बेहतर तो समझे हैं, लेकिन अधिक नहीं समझे। डॉ ध्रुवसेन सिंह एक जानेमाने भूवैज्ञानिक हैं, जिनके तर्क दुर्लभ तथ्यों पर आ‌धारित हैं। उनका कहना है कुछ उपवराहों पर जीवन के अनुकूल कुछ परिस्थितियां तो हैं, लेकिन वहां भी जीवन के होने का मसला उलझा हुआ ही है। वे कहते हैं कि सच तो यह है कि जीवन को परिभाषित करना भी सरल नहीं है। यह व्याख्यान बड़ी ही सरल भाषा में और तकनीकी उलझनों से अलग व्याख्यान था। इसमें बहुत तर्क आए और कहीं और जीवन सिद्ध करने पर मामला अटका हुआ है।
व्याख्यान का सारांश है कि जीवन सदा एक पहेली रहा है और आज भी पहेली ही है। भूमंडल में कैसे अजीवित पदार्थ जैविक पदार्थ में बदल गए, इसका अभीतक कोई अच्छा उत्तर भू और जीवन विज्ञानियों के पास नहीं है। विज्ञानियों में कहा जाता रहा है कि पैनस्पर्मिया अर्थात सुदूर किसी धूमकेतु अथवा उल्का के अंदर छिपकर पृथ्वी तक जीवित पदार्थ से पृथ्वी पर जीवन आरंभ हुआ होगा, यह संभावना रोचक और फ्रेड हॉयल जैसे विज्ञानियों से समर्थित तो है, लेकिन इससे केवल जीवन के आरंभ की स्थली कहीं और खिसक जाती है, जीवन के आरंभ की गुत्थी नहीं सुलझती। व्याख्यान श्रृंखला में कहा गया कि पृथ्वी पर जीवन लगभग पौने चार अरब वर्ष पूर्व आरंभ हुआ माना जाता है, लेकिन पृथ्वीतर किसी स्थान पर जीवन का कोई पुष्ट प्रमाण नहीं मिला है। पास के चंद्रमा से लेकर सुदूर शनि तक को अंतरिक्षयान खंगाल आए हैं, पर जिन संयोगों से पृथ्वी पर जीवन संभव हुआ है, वे कहीं और नहीं मिले हैं, चाहे वह चुम्बकीय क्षेत्र की उपस्थिति हो, सही दूरी, तापमान या उचित तत्वों की उपस्थिति।
चंद्रमा पर चंद्रयान के प्रयोगों से और मंगल पर भेजे गए रोवर स्पिरिट, ऑपर्चुनिटी आदि के माध्यम से पानी की उपस्थिति की पुष्टि जरूर हुई है। मंगल का जहां तक प्रश्न है तो वह खगोलविदों, ज्योतिषियों, विज्ञान कथा लेखकों एवं सामान्य व्यक्ति की कल्पनाओं का अभिन्न अंग ही रहा है, चाहे इसलिए हो कि इसका रंग ललछौहां है या इसलिए कि इतालवी खगोलविद् शियापारेली ने जब मंगल पर चैनल होने के बात कही तो उसको नहर समझ लिया गया। मंगल पर तो पानी में ही बन सकने वाला खनिज गोथाईट भी मिला है, वहां के गड्ढों में जमा तलछट से भी प्राचीनकाल में पानी होने की पुष्टि होती है। करोड़ों वर्ष या उससे पहले मंगल पर पानी लहलहाता था, यह भी मान लिया गया है, परंतु आज वहां जीवन या उसके अनुकूल परिस्थिति नहीं दिखाई देती हैं। बीस वर्ष पहले अंटार्कटिका में एलन हिल क्षेत्र से मिली उल्का में एक बैक्टीरिया की उपस्थिति का संदेह हुआ था, परंतु एकाएक कुछदिनों की गहमा-गहमी के बाद समझ आया कि यह बैक्टीरिया नहीं था, बल्कि अध्ययन के दौरान कोटिंग की प्रक्रिया से बनी संरचना थी, मगर यह हुआ कि इससे फिर एक बार मंगल पर जीवन सुर्ख़ियों में आ गया।
भारतीय विज्ञानी प्रोफ़ेसर जयंत नार्लीकर ने लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व अनेक विज्ञानियों के साथ उच्च वातावरण में गुब्बारा भेजकर हवा के नमूने इकठ्ठे करके उनमें अपरिचित बैक्टीरिया खोजे थे, लेकिन अभी इस खोज को संपूर्ण नहीं माना गया है। संभव है कि अतिरिक्त सावधानियों के साथ इस प्रयोग को फिर से दोहराया जाए, लेकिन हाल की कुछ प्रगति रोचक है। सौरमंडल के बाहर हज़ारों ग्रहों को ढूंढा जा चुका है। बृहस्पति के उपग्रह यूरोपा पर भूगर्भीय सक्रियता के प्रमाण मिले हैं, वहां पर पानी की झील होने की संभावना है। सबसे नया परिणाम यह है कि शनि के केवल पांच सौ किलोमीटर के उपग्रह एंसिलेडस के दक्षिणी गोलार्ध से उष्णजल के सोते फूटते मिले हैं। यह पानी खारा है और इसमें नैनो सिलिका कण भी देखे गए हैं। यह खोज तब हुई जब 1997 में छोड़े गए कैसिनी अंतरिक्षयान ने 7 साल में शनि के पास पहुंचकर उसकी तथा उसके ग्रहों की पड़ताल आरंभ की। एल 1140 बी जैसे ग्रह भी मिले हैं, जो हमसे तो 40 प्रकाश वर्ष दूर हैं, उनपर परिस्थितियां जीवन के लिए सहायक हो सकती हैं, क्योंकि अपने तारे से सही दूरी के कारण वहां का तापमान ठीक है, पानी द्रव रूपमें रह सकता है, जीवन का वातावरण संभव है, लेकिन एक और महत्वपूर्ण विचार है और वह यह है कि हमारी जीवन के रूपों को ढूंढने के लिए जीवन की अवधारणा ग़लत तो नहीं है?
लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रत्येक शनिवार को विश्वविद्यालय के सभी सदस्यों, छात्रों के लिए विद्वानों और विषय विशेषज्ञों के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैज्ञानिक पहलुओं पर जागरुक उद्बोधन ग्रहण करने के लिए प्रासंगिक विशेष व्याख्यान श्रृंखला शुरू की गई है। लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एसपी सिंह ने हाल ही में मीडिया से कहा था कि किसी भी सामाजिक और वैज्ञानिक मुद्दे पर समाज में भय और रहस्यमयता को दूर करना शिक्षकों का नैतिक कर्तव्य है, छात्रों के सुझाए गए विषयों को भी इस व्याख्यान श्रृंखला में शामिल किया जाएगा। प्रोफेसर एसपी सिंह ने इस शैक्षणिक और बहुआयामी व्याख्यान श्रृंखला में शिक्षकों और छात्रों की गहरी दिलचस्पी और उपस्थिति की सराहना की है। व्याख्यान श्रृंखला में प्रोफेसर कीर्ति सिन्हा, प्रोफेसर ओमकार, प्रोफेसर केके अग्रवाल, प्रोफेसर एनके पिंडे, प्रोफेसर पद्मकांत, प्रोफेसर राकेश चंद्र, डॉ दुर्गेश कुमार सहित अनेक प्रोफेसर, विश्वविद्यालय के विभिन्न विभागों और संकायों के छात्रों की उल्लेखनीय भागीदारी रही।

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