स्वतंत्र आवाज़
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'अगस्त क्रांति के बाद समाजवादी क्रांति'

'आज हमें तय करना है कि हमें किधर जाना है?'

'अखिलेश यादव हुए युवा क्रांति के आदर्श'

Wednesday 9 August 2017 01:33:39 AM

राजेंद्र चौधरी

राजेंद्र चौधरी

august revolution

भारत की अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति के लिए पहली जनक्रांति 1857 में हुई थी। कांग्रेस की स्थापना के वर्षों बाद 1885 में जनक्रांति में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का प्रवेश हुआ और जनअसंतोष की आवाज़ उभरने लगी। आज़ादी के लिए महात्मा गांधी के सन् 1919 में असहयोग आंदोलन और सत्याग्रह ने लाखों लोगों को अपनी ओर आकृष्ट किया। गांधीजी पहले ऐसे नेता थे, जिनकी भारत के किसानों, गरीबों, वंचितों समाज के हर वर्ग में पैठ बनी। उन्होंने अपने आंदोलनों से जनता को संगठित किया। अपने लंबे राजनीतिक संघर्ष से गांधीजी ने जनता के उत्साह को विशेषकर नौजवानों को आजादी के अंतिम संघर्ष के लिए तैयार कर लिया था। भारत छोड़ो आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की निर्णायक लड़ाई थी। क्रिश मिशन की विफलता से भारत में क्षोभ की लहर थी। दूसरे महायुद्ध में जापान प्रारंभिक तौर पर अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था।
महात्मा गांधी ने 5 जुलाई 1942 को हरिजन समाचार पत्र में लिखा कि अंग्रेजों भारत को जापान के लिए मत छोड़ो, बल्कि भारतीयों के लिए भारत को व्यवस्थित रूप से छोड़ जाओ। भारतीय नेशनल कांग्रेस कमेटी की 8 जुलाई 1942 को बंबई में बैठक हुई। इसमें निर्णय लिया गया कि भारत अपनी सुरक्षा स्वयं करेगा। अंग्रेज भारत छोड़ें अन्यथा उनके खिलाफ सिविल नाफरमानी आंदोलन किया जाएगा। बंबई के ऐतिहासिक ग्वालिया टैंक में कांग्रेस के अधिवेशन में गांधीजी का ऐतिहासिक भारत छोड़ो प्रस्ताव 8 अगस्त 1942 को स्वीकार कर लिया गया। इस प्रस्ताव पर गांधीजी ने अपने भाषण में देश को करो या मरो का मंत्र दिया। कांग्रेस के सभी बड़े नेता 9 अगस्त 1942 की भोर से ही पकड़ लिए गए थे। इसके बाद तो देश में भूचाल आ गया, जिसको जो सूझा उसने अपने ढंग से अंग्रेजीराज की खिलाफत शुरू कर दी। उत्तर प्रदेश के बलिया और बस्ती में तो अस्थायी सरकारें तक स्थापित हो गईं। कांग्रेस के बड़े नेताओं की गिरफ्तारी के बाद समाजवादी विचारधारा के नेता जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया, अरूणा आसिफ अली आदि ने आंदोलन का नेतृत्व संभाला। यह ऐसा आंदोलन था, जिसमें देश का हर वर्ग स्वतः स्फूर्त सक्रिय था।
भारत छोड़ो आंदोलन के इस विशाल जनांदोलन से अंग्रेज समझ गए थे कि उनको भारत छोड़ने में अब देर नहीं होगी, इसलिए जाते-जाते उन्होंने भारत विभाजन का षड़यंत्र रच दिया और 15 अगस्त 1947 को देश की आजादी की घड़ी आ गई। आजादी के बाद भारत के समक्ष कई गंभीर चुनौतियां उठ खड़ी हुईं। गांधीजी ने स्वराज के साथ ग्राम राज का जो सपना देखा था, वह कांग्रेस के नए नेतृत्व को रास नहीं आया और देश उनके पश्चिमी प्रभाव वाले रास्ते पर चल पड़ा। स्वतंत्रता आंदोलन में भारत के सभी समुदायों ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया था। इसमें हिंदू और मुस्लिम दोनों ने अपनी कुर्बानी देकर भारत को आजाद कराने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आजादी के बाद जिनके हाथ में देश का नेतृत्व आया, उन्होंने उन मूल्यों एवं आदर्शों को परे रख दिया, जिनके आधार पर गांधीजी ने नए भारत के निर्माण का सपना देखा था। देश में गरीबी, बीमारी, भूख, अशिक्षा की लड़ाई मंद पड़ गई। गैर बराबरी का दैत्य सब पर भारी पड़ने लगा। जाति और संप्रदाय की राजनीति ने समाज को बांटने और सद्भाव तथा परस्पर सहयोग की भावना को धूमिल कर दिया, मगर भारत की आजादी के साथ ही कुछ प्रबुद्ध युवा नेतृत्व ने विचारधारा के आधार पर राजनीति चलाने का मन बना लिया था।
भारत देश की माटी और परंपराओं से चूंकि समाजवादी विचारधारा की ज्यादा निकटता थी, इसलिए देश में समाजवादी आंदोलन को बल मिला। जयप्रकाश नारायण, डॉ राममनोहर लोहिया और आचार्य नरेंद्रदेव ने इस आंदोलन की कमान संभाली। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जिसकी अगुवाई महात्मा गांधी ने की थी, कई मूल्य एवं आदर्श स्थापित हुए थे। गांधीजी सिद्धांतहीन राजनीति को सामाजिक पाप मानते थे। उनका मानना था कि राजनीति सेवा का माध्यम है। गांधीजी साध्य साधन की पवित्रता पर बल देते थे। नैतिक मूल्यों के प्रति उनका आग्रह था। वे मानते थे कि किसी भी कार्य या योजना के केंद्र में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को रखना चाहिए। भारत के संविधान में एक व्यक्ति एक वोट के माध्यम से व्यक्ति की गरिमा को जाति-धर्म के भेदभाव के बिना, सम्मान दिया गया। लोकतंत्र, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता को संविधान की मूल प्रस्तावना में शामिल किया गया। वैसे भी आज दो तरह की विचारधाराओं में टकराव है। एक तरफ लोकतंत्र है तो दूसरी तरफ अपने को सर्वोपरि दिखने की संलिप्सा।
हमें तय करना है कि हमें किधर जाना है? मूल अधिकार उस समाज और व्यक्ति द्वारा प्रयोग किए जा सकते हैं, जो कानून के प्रति आदर रखते हैं, जो जिम्मेदारी तथा नियंत्रण के सम्यक व्यवहार के लिए तैयार हों, लेकिन जब कोई एक समूह या दल राज्य को क़ैद करने को संगठित होते हैं या इसे अपना लक्ष्य बना लेते हैं तो किसी समाज के लिए इनका सामना करना बिना किसी अहिंसक प्रतिरोध के संभव नहीं हो सकता है। हम लोकतंत्र की परिधि में रहकर ही संविधान के मूल उद्देश्यों को बचा सकते हैं। आज देश के समक्ष जो समस्याएं और चुनौतियां हैं, उनके समाधान का रास्ता सिर्फ समाजवादी विचारधारा के पास ही है। जेपी-लोहिया की समाजवादी रीति-नीति पर चलने का काम राजनैतिक दल के रूप में समाजवादी पार्टी ही कर रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन को आगे बढ़ाने को संकल्पित है।
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव यह मानते हैं कि सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक लोकतंत्र के प्रमुख तंत्र हैं, इसलिए वे समाजवादी व्यवस्था और समतामूलक समाज के निर्माण पर बराबर जोर देते रहते हैं। वे डॉ लोहिया के इस सिद्धांत के कायल हैं कि गैरबराबरी मिटनी चाहिए तो संभव बराबरी लक्ष्य होना चाहिए, उनकी सप्तक्रांति समानता, राष्ट्र और लोकतंत्र के उन्नयन की कुंजी मानी जा सकती है। अखिलेश यादव ने अपने मुख्यमंत्रित्वकाल में सामाजिक न्याय की दिशा में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए थे। उन्होंने पिछड़ों और वंचितों के सम्मानपूर्वक जीने के लिए विशेष अवसर प्रदान करने का कार्य किया। वे मानते हैं कि सामाजिक प्रगति के साथ व्यक्ति और समाज की आर्थिक प्रगति भी होनी चाहिए तभी लोकतंत्र फलफूल सकता है। आखिर किसानों की हितों की रक्षा का नीतियों, नेतृत्व और नियत से गहरा संबंध है।
किसान भारत का प्राण है। प्राणहीन समाज में कोई जीवन नहीं हो सकता। ऐसी स्थिति में विचारधारा के आधार पर नीतिगत बंटवारा आवश्यक हो चला है। गांव, कृषि और किसान की आवाज़ की चिंता खुद चौधरी चरण सिंह ने राष्ट्रीय फलक पर उठाई थी, बाद में उनके अनुयायी समाजवादी आंदोलन के साथ जुड़ गए। आज वे अखिलेश यादव की अगुवाई में उसी रास्ते पर चलने का प्रयास कर रहे हैं। युवा पीढ़ी की चिंता भी अखिलेश यादव ही करते नज़र आते हैं। वे मानते हैं कि समाजवाद का रास्ता ही शोषणविहीन समाज का निर्माण कर सकेगा। लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत ही आर्थिक विषमता और सामाजिक गैरबराबरी मिटाने में सफल हो सकती है। लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि सभी प्रकार की सत्ता का विकेंद्रीकरण हो। इसमें ही अगस्त क्रांति की सार्थकता निहित है। (राजेंद्र चौधरी, उत्तर प्रदेश समाजवादी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री हैं)।

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