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शांतिपूर्ण चर्चा ही द्वंद्व का मार्गदर्शक सिद्धांत-योगी

म्यांमार में यांगून में 'संवाद' कार्यक्रम में योगी का चीन पर इशारा

'भगवान गौतम बुद्ध से उत्तम शांति मार्गदर्शक कोई नहीं'

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Sunday 6 August 2017 07:49:34 AM

cm yogi adityanath in myanmar

यांगून/ लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज म्यांमार के यांगून नगर में एक ‘संवाद’ कार्यक्रम को संबोधित किया और कहा कि शांतिपूर्ण चर्चा ही किसी भी द्वंद्व का मार्गदर्शक सिद्धांत है और भगवान गौतम बुद्ध से उत्तम शांति मार्गदर्शक मार्ग कोई नहीं है। कदाचित उनका इशारा चीन पर था। उन्होंने धर्म और आध्यात्म पर प्रकाश डाला और कहा कि हिंदू धर्म में कर्मयोग अथवा कर्ममार्ग आध्यात्म का मार्ग है, जो आकांक्षा से रहित होकर उचित समय पर उचित कार्य करने पर बल देता है। उन्होंने कहा कि इस मार्ग पर सफलतापूर्वक चलने के लिए आत्मचेतना तथा आत्मबोध की आवश्यकता होती है और सभी को ज्ञान का मार्ग दिखाने के लिए तथागत, जिन्हें हम भगवान बुद्ध के रूप में पूजते हैं, से उत्तम मार्गदर्शक कौन हो सकता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि भगवान बुद्ध के तीनों महत्वपूर्ण उपदेश धम्मम् शरणम् गच्छामि, संघम् शरणम् गच्छामि और बुद्धम् शरणम् गच्छामि तत्कालीन परिस्थितियों के साथ-साथ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
योगी आदित्यनाथ का उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में म्यांमार यह पहला विदेश दौरा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश के लिए यह गौरव का विषय है कि भगवान गौतम बुद्ध के जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण स्थल यहां ही अवस्थित हैं। उन्होंने कहा कि वाराणसी के समीप सारनाथ में भगवान बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था, तथागत की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर सहित श्रावस्ती, कपिलवस्तु, कौशाम्बी, संकिसा आदि प्रसिद्ध बौद्ध धार्मिक स्थल उत्तर प्रदेश में ही हैं और भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुम्बनी एवं तपस्या स्थली बोधगया भी यहां से दूर नहीं हैं। योगी आदित्यनाथ ने बताया कि उत्तर प्रदेश में भगवान बुद्ध से जुड़े स्थलों को बौद्ध सर्किट के माध्यम से जोड़ने का काम किया जा रहा है, जिससे देश-विदेश के पर्यटकों एवं श्रद्धालुओं को भगवान बुद्ध से जुड़े इन स्थलों तक पहुंचने में आसानी होगी। योगी आदित्यनाथ ने यहां के लोगों में उत्तर प्रदेश के पर्यटन को खूब प्रोत्साहित किया और यहां के पौराणिक स्‍थलों एवं घटनाओं को भगवान बुद्ध के शांति संदेश से जोड़ा।
योगी आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में म्यांमार में अपने अनोखे व्यक्‍तित्व के साथ आध्यात्मिक और पौराणिक ज्ञान की छटा बिखेरी। उन्होंने कहा कि नाथ संप्रदाय के अनुयायी साझी हिंदू एवं बौद्ध दार्शनिक तथा धार्मिक परंपरा का उत्तम उदाहरण हैं, महायोगी गुरु गोरखनाथ, जो इस परंपरा के आरंभिक गुरु थे, महायान बौद्ध परंपरा में 84 महासिद्धों में माने जाते हैं, तिब्बती बौद्ध परंपरा में उन्हें गोरक्ष भी कहा जाता है। उन्होंने कहा कि हिंदू धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों ही प्राच्य परंपरा के अटूट अंग हैं, जो दूसरों के विचारों को सुनने में विश्वास करते हैं। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि प्राचीन भारतीय दर्शन, प्रतिक्रिया देने से पूर्व दूसरों की मनःस्थिति तथा विचार प्रक्रिया को समझने पर बल देता है, वह किसी भी व्यक्ति के विचारों को पूरी तरह सुनने से पहले उसके विषय में कोई धारणा बनाने की अनुमति भी नहीं देता, उसके बाद ही वह दूसरों के दृष्टिकोण के प्रति पर्याप्त सम्मान प्रदर्शित करते हुए अपना दृष्टिकोण रखने देता है, क्योंकि वह मानता है कि परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी संपूर्ण नहीं है, इस प्रकार ‘द्वंद्व’ के स्थान पर ‘मीमांसा’ अथवा ‘विवेचना’ को श्रेष्ठ कहा गया है। उन्होंने कहा कि इसके लिए 4 चरण बताए गए हैं, जो उपरोक्त चर्चा की सटीक व्याख्या करते हैं, पहला श्रवण अर्थात ध्यानपूर्वक सुनना, दूसरा मनन अर्थात गहन मीमांसा, तीसरा चिंतन अर्थात विचार करना और चौथा कीर्तन अर्थात अपने विचार प्रस्तुत करना है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भारत और चीन के बीच डोकलाम में सैन्य तनाव का सीधे उल्लेख नहीं करते हुए इशारतन कहा कि हमारी परंपरा में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जहां तलवार की नोक पर किसी के विचार थोपने के स्थान पर विचारों के आदान-प्रदान को सर्वश्रेष्ठ साधन माना गया है। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण चर्चा को ही सदैव मार्गदर्शक सिद्धांत माना जाना चाहिए और चर्चा के सभी मार्ग खुले रखकर द्वंद्व से यथासंभव बचा जाना चाहिए। मुख्यमंत्री ने महाकाव्य महाभारत का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें उल्लेख है कि स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने समस्त शक्तियां एवं सिद्धियां होते हुए भी विवाद के शांतिपूर्ण समाधान के लिए कौरवों को अंतिम क्षण तक मनाने का प्रयास किया, जिसके लिए वे स्वयं दूत एवं मध्यस्थ बनकर हस्तिनापुर के राजदरबार में पहुंचे। वह भगवान थे, वह अकेले ही पांडवों की अभिलाषा पूरी कर सकते थे, किंतु वह झुक गए, क्योंकि शांति का कोई विकल्प नहीं होता। उन्होंने कहा कि भगवान जानते थे कि ऐसा कोई भी प्रयास करना ही चाहिए, जिसका परिणाम शांति हो, इसी प्रकार भगवान बुद्ध द्वंद्व टालने के प्रबल समर्थक थे, उनका सदियों पुराना संदेश था कि ‘हजारों युद्धों में विजय प्राप्त करने से श्रेयस्कर स्वयं पर विजय प्राप्त करना है’ और यह संदेश आज भी प्रासंगिक और सही है।
योगी आदित्यनाथ ने विचार वार्ता और शांति प्रक्रिया पर अपना महत्वपूर्ण उद्बोधन जारी रखते हुए कहा कि सभी जानते हैं कि अद्वैत दर्शन के अनुकरणीय प्रतिपादक आदि शंकराचार्य ने पूर्व मीमांसा परंपरा के अनुयायी एवं उद्भट विद्वान मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया था, कहा जाता है कि दोनों के बीच शास्त्रार्थ कई महीनों तक चलता रहा था, विचारों के जीवंत एवं शांतिपूर्ण आदान-प्रदान की यही परंपरा हमें विरासत में प्राप्त हुई है, जो वर्तमान विश्व में दुर्लभ है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि धम्म के वास्तविक स्वरूप को समझने के लिए भगवान बुद्ध के अष्टांग मार्ग को जानना और अपनाना जरूरी है, उनके बताए अष्टांग मार्ग में सम्यक दृष्टि एवं सम्यक संकल्प सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं, तथागत की इसी शिक्षा को अंगीकार करके आपसी विवादों को सुलझाने एवं पर्यावरण को सुधारने में मदद मिलेगी। उन्होंने कहा कि पर्यावरण का संरक्षण और संवर्द्धन काफी व्यापक एवं बहुआयामी शब्द है, हमारे आसपास की वे सभी वस्तुएं, जो जीवन की उत्पत्ति एवं विकास के लिए सहायक होती हैं, वे पर्यावरण के तहत ही आती हैं, इनमें वातावरण, जल, वायु, पृथ्वी, वनस्पतियां, जीव-जंतु आदि सभी को समाहित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक दृष्टि से देखा जाए तो प्रकृति के सभी पदार्थ एक-दूसरे पर निर्भर भी हैं और पूरक भी, इनमें परस्पर समन्वय स्थापित रहने पर ही प्रकृति में संतुलन बना रह सकता है, इस संतुलन को बनाए रखने में मनुष्य की सबसे अहम भूमिका है।
मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने कहा कि मनुष्य की विचारशीलता को और अधिक परिमार्जित करने एवं संवेदनशील बनाने में धर्म की विशेष भूमिका होती है, लेकिन यह भी एक कटु सच्चाई है कि नई पीढ़ी के पास अपने धार्मिक ग्रंथों का गहन अध्ययन करते हुए उनके अनुरूप अनुसरण करने का समय नहीं रह गया है, इसलिए प्रकृति को समझने की संवेदना भी कम होती जा रही है, जिसका सीधा प्रभाव हमारे पर्यावरण पर पड़ रहा है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि विश्व की विभिन्न संस्थाओं पर एक गुरुतर दायित्व आ पड़ा है कि वे विश्व में आपसी सहयोग एवं समन्वय स्थापित कर हर नागरिक में पर्यावरण को लेकर एक चेतना जाग्रत करने का प्रयास करें, मानव सभ्यता के संरक्षण एवं आर्थिक तथा सामाजिक उन्नति के लिए यह न केवल लाभकारी बल्कि एक अनिवार्य शर्त भी है। उन्होंने कहा कि अब लगभग यह स्पष्ट हो चुका है कि विश्व में शांति, समन्वय और सुरक्षा के लिए राष्ट्राध्यक्षों की पहल की अपेक्षा जनता की जागरूकता एवं आपसी संवाद अधिक परिणामोत्पादक होता है, जनता के सहयोग के बिना न तो हम पर्यावरण की रक्षा कर सकते हैं और न ही विभिन्न धर्मों एवं राष्ट्रों के बीच शांति एवं समन्वय कायम कर सकते हैं। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि बौद्ध धर्म में अभिधम्मपिटक और हिंदू धर्म में षड्दर्शन का कहना है कि निराकार से ही आकार अर्थात् संपूर्ण जगत की उत्पत्ति सबसे मूलभूत आध्यात्मिक घटना है, इससे हमें ध्यान आता है कि हम सभी एक ही ऊर्जा स्रोत से उत्पन्न हुए हैं और अन्य किसी भी प्रकार की भिन्नता का कोई अर्थ नहीं है, इससे हम स्वाभाविक रूप से अपने आसपास के वातावरण के साथ एकाकार हो जाते हैं।
योगी आदित्यनाथ ने कहा कि भगवान बुद्ध का उनके प्रथम पांच शिष्यों को दिया गया पहला उपदेश भी किसी भी प्रकार अति से दूर रहने के सुझाव के साथ आरंभ होता है और उसके लिए उन्होंने ‘मध्यम पद मार्ग’ का प्रतिपादन किया है, जिसमें लोगों को स्वर्णिम माध्य का अनुसरण करने की शिक्षा दी गई है, यह स्वर्णिम माध्य अथवा संतुलन विकास की आवश्यकता एवं मूल वातावरण के संरक्षण के मध्य होना चाहिए। उन्होंने कहा कि सत्य की प्राप्ति होने के बाद भगवान बुद्ध इस सत्य को लोगों के साथ साझा करना चाहते थे, उन्हें ज्ञात था कि कार्य दुष्कर है, किंतु उनके भीतर मानवता के प्रति इतनी करुणा थी कि वह बिल्कुल भी नहीं हिचकिचाए, लोगों के बीच अपने विचारों के प्रसार हेतु उन्हें निष्ठावान शिष्यों की आवश्यकता थी। उन्होंने कहा कि हमें भगवान बुद्ध, भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण की विरासत मिली है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की समृद्ध, सांस्कृतिक विविधता और विरासत के संरक्षण पर उनकी सरकार विशेष ध्यान दे रही है, वर्ष 2019 में तीर्थराज प्रयाग में अर्द्ध कुम्भ भी आयोजित होने जा रहा है, जिसमें करोड़ों श्रद्धालु शामिल होंगे, यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक एवं आध्यात्मिक आयोजन होगा, जो बंधुत्व एवं सहअस्तित्व का एक जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करेगा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि 3 और 4 सितम्बर 2015 को नई दिल्ली में इस श्रृंखला का पहला आयोजन संपंन हुआ था, जिसमें उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी भी सम्मिलित हुए थे, इसके तत्काल बाद 5 सितम्बर 2015 को प्रधानमंत्री ने बोधगया के बौद्ध समागम में कहा था कि हिंदू और बौद्ध दर्शन के मूल और समान सिद्धांतों के अंगीकरण के कारण कॉंफ्लिक्ट अवॉयडेंस तथा इनवॉयरमेंट कॉंशियसनेस जैसे विषयों का समाधान हो सकता है, इन सिद्धांतों को अपनाकर विश्व में शांति एवं पर्यावरण का संरक्षण व संवर्धन सम्भव है। योगी आदित्यनाथ ने कहा कि म्यांमार की पावन धरती पर कदम रखकर वे गौरवांवित महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि म्यांमार वह देश है, जिसे अब भी ब्रह्मदेश पुकारा जाता है, जो सभी भारतीयों के हृदय के बहुत निकट है। उन्होंने कहा कि भारतवासी धम्म और धर्म द्वारा एक दूसरे से बंधे हैं। इस अवसर पर उन्होंने वह‌ां के विशिष्टजनों तथा अन्य नागरिकों को विविधता एवं सद्भाव की विशिष्ट पहचान रखने वाले उत्तर प्रदेश के भ्रमण के लिए आमंत्रित भी किया।

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