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स्वाधीनता के आंदोलनों से भरा राजस्‍थान

बिजोलियां के किसान आंदोलन से शुरू हुआ संग्राम

अधिकांश बड़े नेता निर्वासित या जेल में रहे

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Saturday 5 August 2017 02:10:32 AM

farmers movement in rajasthan

जयपुर। संपूर्ण भारत वर्ष की तरह 19वीं शताब्‍दी से ही राजस्‍थान में भी दासता से मुक्ति के प्रयास प्रारंभ हो गए थे, यहां की जनता अंग्रेजी हुकूमत की बेड़ियों में तो जकड़ी थी ही, साथ ही उन्‍हें यहां के शासकों एवं जागीरदारों के दमनकारी कृत्‍यों से भी जूझना पड़ता था, इस दोहरी मार के फलस्‍वरूप ऐसे अनेक जन आंदोलन हुए, जिनका प्रभाव स्‍वतंत्रता की अंतिम लड़ाई पर भी स्‍पष्‍ट दिखाई दिया। राजस्‍थान में अहिंसक आंदोलन की शुरूआत बिजोलियां के किसान आंदोलन से हुई। राजस्‍थान के शासकों ने 19वीं शताब्‍दी के प्रारंभ में अंग्रेजों से संधि कर ली थी, इससे उन्हें बाहरी आक्रमणों एवं मराठों के आतंक से मुक्ति मिल गई थी। निर्भय हो जाने के कारण इन राजाओं ने आम जनता पर नए-नए करों का बोझ डालना प्रारंभ कर दिया, इससे जनता में असंतोष बढ़ता गया और पहला विस्‍फोट हुआ सन् 1897 में मेवाड़ की जागीर क्षेत्र बिजालियां में। विभिन्न लगानों के विरुद्ध बिजोलियां के किसानों ने 2-3 छोटे आंदोलन किए।
राजस्‍थान के महान सपूत विजय सिंह पथिक ने वर्ष 1916 में आंदोलन की बागडोर संभाली और असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। उनके आह्वान पर जनता ने लगान तथा अन्‍य प्रकार के कर देना बंद कर दिया। इसके कारण बड़ी संख्‍या में किसान दमन के शिकार हुए और जेल गए। अधिकांश बड़े नेता या तो निर्वासित किए गए या जेल भेजे गए। यह आंदोलन 1941 में किसानों की जीत के साथ समाप्‍त हुआ। बिजोलियां के किसान आंदोलन का प्रभाव मेवाड़ तथा आसपास की रियासतों पर भी पड़ा। बेगूं के किसानों ने भी लाग बाग के विरुद्ध एक संगठित आंदोलन शुरू किया। इसको दबाने के लिए सरकार ने बल प्रयोग किया, जिससे रूपाजी और करमाजी नामक दो किसान शहीद हुए। इसके साथ ही बूंदी, सिरोही, अलवर, भोमठ, सीकर और दुधवारिया में किसान आंदोलन हुए, जिसमें अंतत: विजय किसानों की हुई। भोमठ और सिरोही के भील बहुल क्षेत्र में किसानों पर की गई गोलीबारी में लगभग 2 हजार किसान मारे गए। इस आंदोलन का नेतृत्‍व ‘मेवाड़ के गांधी’ के नाम से प्रसिद्ध मोतीलाल तेजावत ने किया।
राजस्‍थान के कई राजाओं ने 1857 की क्रांति में अंग्रेजों की मदद की थी, लेकिन कुछ क्षेत्रों में बगावत भी हुई। जोधपुर राज्‍य में 21 अगस्‍त 1857 में एरिनपुरा छावनी में ब्रिटिश फौज के कुछ भारतीयों ने बगावत कर दिल्‍ली की ओर कूच किया, रास्‍ते में वे बागी सैनिक आउवा पर ठहरे, जहां के ठाकुर कुशल सिंह चापावत उनके नेता बने। आसपास के अन्‍य ठाकुर भी अपनी सेना लेकर उनके साथ हो गए। अजमेर के चीफ कमिश्‍नर सर पैट्रिक लारेंस ने जोधपुर के महाराजा से सेना भेजने की प्रार्थना की। उन्‍होंने जो सेना भेजी वह बागी सैनिकों से हार गई। उसके बाद सर पैट्रिक लारेंस और जोधपुर का राजनीतिक एजेंट मेसन सषैत्‍य आउवा पहुंचे। दोनों सेनाओं में युद्ध हुआ, जिसमें अंग्रेजी सेना हार गई। गवर्नर जनरल लार्ड कैनिंग को जब यह पता चला तो उसने जनवरी 1858 को पालनपुर और नसीराबाद से एक बड़ी सेना आउवा भेजी। राज्य के कोने-कोने में स्थापित प्रजा मंडलों ने राजस्थान में स्वाधीनता आंदोलन को सही दिशा प्रदान की।
क्रांतिकारी इस सेना का सामना नहीं कर पाए और उन्हें जानमाल की भारी क्षति हुई। इस प्रकार कोटा एवं अजमेर-मेरवाड़ा की नसीराबाद की सेना के सैनिकों ने भी मेरठ में सैनिक विद्रोह का समाचार सुनकर विद्रोह कर दिया। राजस्थान में सशस्त्र क्रांति का प्रारंभ शाहपुरा के केसरीसिंह बारहठ ने किया। उन्होंने अर्जुनलाल सेठी एवं खरवा राव गोपालसिंह के साथ एक क्रांतिकारी संगठन 'अभिनव भारत समिति' की स्थापना की। उन्होंने एक विद्यालय भी खोला, जहां युवकों को प्रशिक्षण दिया जाता था, इनमें से कुछ युवकों को प्रशिक्षण के लिए रास बिहारी बोस के साथी मास्टर अमीचंद के पास दिल्ली भेजा जाता था। दिल्ली में केसरीसिंह बारहठ के भाई जोरावर सिंह एवं पुत्र प्रतापसिंह रास बिहारी बोस के नेतृत्व में गवर्नर जनरल लार्ड हार्डिंग्स पर फेंके गए बम की घटना में शामिल हुए। राज्यों के प्रति कांग्रेस की नीति महात्मा गांधी ने 1920 में बनाई। हरिपुरा कांग्रेस ने 1938 में राज्यों को भारत का अभिन्न अंग मानते हुए इन राज्यों में अपने-अपने संगठन स्थापित करने तथा स्वतंत्रता आंदोलन चलाने का प्रस्ताव पारित किया, जिसके बाद प्रजा मंडलों की स्थापना हुई।
माणिक्यलाल वर्मा ने अप्रैल 1938 में अपने कुछ साथियों के सहयोग से उदयपुर के मेवाल प्रजा मंडल की स्थापना की, जिसके अध्यक्ष बलवंत सिंह मेहता थे। संस्था को प्रारंभ से ही गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया। सरकार ने प्रजा मंडल पर जो पाबंदी लगाई थी, उसको हटाने की मांग करते हुए 4 अक्टूबर 1938 को सत्याग्रह आंदोलन किया गया। मेवाड़ सरकार ने सितंबर 1941 में प्रजा मंडल पर से पाबंदी हटा दी। हालांकि जयपुर में प्रजा मंडल की स्थापना 1931 में हो गई थी, लेकिन इसकी गतिविधियां 1938 में सेठ जमनालाल बजाज के नेतृत्व संभालने के बाद ही शुरू हो पाई। सरकार ने सेठ जमनालाल बजाज के जयपुर प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन उन्होंने इन आदेशों की अवहेलना कर एक फरवरी 1939 को जयपुर में प्रवेश किया। उनकी गिरफ्तारी हुई और राज्य में सत्याग्रह शुरू हुआ। यह सत्याग्रह 18 मार्च 1939 तक चला और इसी वर्ष अगस्त में हुए एक समझौते के बाद जमनालाल बजाज और उनके साथियों को रिहा किया गया।
कोटा प्रजा मंडल की स्थापना 1936 में की गई। इस संस्था ने साक्षरता, दवाइयों की आपूर्ति, सिंचाई के लिए जल की आपूर्ति आदि कुछ अन्य प्रस्ताव भी पारित किए। कोटा प्रजा मंडल ने उत्तरदायी शासन के लिए हड़ताल व सत्याग्रह भी किए। अलवर एवं भरतपुर में 1938 प्रजा मंडलों की स्थापना की गई। बीकानेर में 1936 और 1942 में प्रजा मंडलों की स्थापना के प्रयास किए गए, लेकिन वे राज्य की नीतियों के कारण असफल हो गए। जैसलमेर में महारावल की दमनकारी नीतियों के कारण वहां कोई संगठन बनाना अत्यंत कठिन कार्य था। सागरमल गोपा ने अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। जब 1939 में प्रजा मंडल की स्थापना हुई तो उस पर पाबंदी लगाई गई। सागरमल गोपा को सन् 1941 में गिरफ्तार किया गया। जेल में जुल्मों को सहन करते हुए 3 अप्रैल 1946 को उनकी मुत्यु हो गई।

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