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प्रौद्योगिकी में भारतीय प्रतिभाएं आगे-राज्यपाल

मौलाना आजाद इंस्टिट्यूट सीतापुर का वार्षिक दिवस समारोह

बच्चों की निःशुल्क शिक्षा के पक्षधर थे मौलाना अबुल कलाम

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Monday 10 April 2017 03:04:52 AM

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सीतापुर (यूपी)। उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने मौलाना आजाद इंस्टिट्यूट ऑफ साईंस एंड टेक्नोलॉजी ह्युमैनिटीज़ महमूदाबाद सीतापुर के वार्षिक दिवस समारोह का उद्घाटन किया और मौलाना अबुल कलाम आजाद को श्रद्धांजलि पुष्प और शब्द समर्पित किए। उन्होंने कहा कि मौलाना आजाद प्रसिद्ध कवि, लेखक, पत्रकार, स्वतंत्रता सेनानी एवं देश के पहले शिक्षामंत्री थे, जिनका अनेक भाषाओं पर प्रभुत्व प्राप्त था, उन्होंने ही भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान तथा विश्वविद्यालय अनुदान आयोग की स्थापना की थी तथा 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों की निःशुल्क शिक्षा पर जोर दिया था। राज्यपाल ने कहा कि उन्होंने हमेशा सांप्रदायिक सौहार्द को बढ़ावा दिया और कभी नहीं चाहा कि भारत देश का विभाजन हो, वे पूरी तरह भारत विभाजन के खिलाफ थे।
राज्यपाल राम नाईक ने कहा कि मौलाना अबुल कलाम आजाद का शुमार देश के महान शिक्षाविद् के रूप में किया जाता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा देने में लड़के और लड़कियों में कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि पहले लड़कियों को शिक्षा नहीं दी जाया करती थी, मगर लड़कियों को भी उच्च शिक्षा देने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि भारत के राष्ट्रपति और शिक्षाविद् डॉ राधाकृष्णन ने उसी समय इस दृष्टि में बदलाव लाने को कहा था कि जब एक लड़का शिक्षित होता है तो सिर्फ एक परिवार शिक्षित होता है पर जब एक लड़की शिक्षित होती है तो दो परिवारों में शिक्षा का चलन बढ़ता है। उन्होंने कहा कि कुलाधिपति होने के नाते उन्होंने विश्वविद्यालयों के दीक्षांत समारोह में यह पाया है कि लड़के और लड़की समान रूपसे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं, किंतु स्वर्ण, रजत एवं कांस्य पदक लगभग 65 प्रतिशत लड़कियों को प्राप्त हो रहे हैं, जो प्रसन्नता की बात है।
राम नाईक ने कहा कि उच्च शिक्षा की जो नींव मौलाना अबुल कलाम आजाद ने डाली थी, हमें उसका अनुसरण करना चाहिए। राज्यपाल ने कहा कि इस समय दुनिया में तकनीक और प्रौद्योगिकी पर आधारित अधिक से अधिक शिक्षित और प्रशिक्षित जनशक्ति की आवश्यकता है और तकनीकी शिक्षा का यह परिणाम देखने को मिला है कि अमेरिका जैसे विकासशील और आधुनिक देश में भी आईटी एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में सबसे ज्यादा काम करने वाले भारतीय हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थान अपने विद्यार्थियों को गुणवत्तायुक्त सर्वोत्तम ज्ञान देने का प्रयास करें, छात्रों की शैक्षिक गुणवत्ता से ही संस्थान की पहचान होती है। उन्होंने छात्रों से भी कहा कि विद्यार्थी अच्छी शिक्षा ग्रहण करके अपना छात्र धर्म निभाएं और छात्र सुविधाओं की मांग न करते हुए विद्या अर्जित करें। उन्होंने कहा कि छात्र केवल किताबी कीड़े न बनें, बुद्धि और शरीर को स्वस्थ रखने के लिए अन्य गतिविधियों में भी भाग लें। उन्होंने विद्यार्थियों को व्यक्तित्व विकास के मंत्र भी बताए।
राज्यपाल ने कहा कि शहीदों ने देश को आजाद कराने के लिए वंदे मातरम् कहते-कहते फांसी के फंदे को स्वीकार किया। उन्होंने बताया कि 1950 में संविधान में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत को मान्यता दी गई थी, किंतु आजादी के 45 वर्ष बाद तक संसद में ‘जन गण मन’ एवं ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाया जाता था। राज्यपाल ने बताया कि उनका मत था कि देश की सबसे बड़ी पंचायत यानी संसद में यह गीत गाये जाएंगे तो उसका पूरे देश में राष्ट्रवाद और एकीकरण का संदेश पहुंचेगा, इस प्रयास के बाद संसद में 24 नवंबर 1992 में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ तथा 23 दिसंबर 1992 को राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ गाये जाने का शुभारंभ हुआ। उन्होंने कहा कि संविधान की मान्यता का सम्मान सबको करना चाहिए।
डॉ अम्मार रिज़वी ने राज्यपाल राम नाईक की विद्वता, कुशल प्रशासक एवं एक बेहतर इंसान के रूप में प्रशंसा करते हुए कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने सराहनीय कदम उठाए हैं। उन्होंने कहा कि राम नाईक की पुस्तक ‘चरैवेति! चरैवेति!!’ सामाजिक क्षेत्र में काम करने वालों के साथ-साथ आम आदमी एवं छात्र-छात्राओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। कार्यक्रम में प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा जितेंद्र कुमार, लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर एसपी सिंह, प्रोफेसर आरिफ नकवी ने भी अपने विचार रखे। राज्यपाल ने विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट योगदान देने वाले महानुभावों को सम्मानित किया। इस अवसर पर छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के कुलपति प्रोफेसर जेवी वैशम्पायन, उर्दू अंजुमन जर्मनी के महासचिव प्रोफेसर आरिफ नकवी और गणमान्य नागरिक एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।

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