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बाल
सखा
फूलों
की
घाटी
अरूण बहुखंडी
गरमी की छुट्टियां थी। दक्षिण भारत के बच्चों का एक दल पिकनिक
में उत्तराखंड स्थित फूलों की घाटी आया। बच्चों के साथ
दयास्वामी व अन्नास्वामी 2 शिक्षक भी थे। वे रेल से हरिद्वार
पहुंचे वहां से जोशीमठ की बस में बैठे। सभी विद्यार्थी
अध्यापकों से कई प्रश्न पूछ रहे थे।
'सर, हमें उत्तराखंड के बारे में बताइए', एक छात्र ने कहा-
भारतवर्ष में 28 प्रदेश व 7 केंद्र शासित प्रदेश हैं। इन 28
राज्यों में से 11 पर्वतीय राज्यों में से एक नया पर्वतीय
राज्य उत्तराखंड का निर्माण दिवस 09 नवंबर वर्ष 2000 में हुआ।
दयास्वामी ने बताया।
सर, हमें उत्तराखंड के बारे में और भी ज्यादा से ज्यादा
जानकारी दीजिए, बस में बैठे सभी बच्चों ने एक स्वर में कहा। इस
प्रदेश में 13 जिले हैं, जो दो मंडल गढ़वाल व कुमाऊं मंडल में
विभाजित हैं। राज्य की रराजधानी देहरादून व हाईकोर्ट नैनीताल
में है। राज्य का क्षेत्रफल 53483 वर्ग किमी है। यहां विकास
खंड 95, तहसील 69, जनसंख्या 84,79562, साक्षरता 72028 प्रतिशत
घनत्व 159 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी, वनक्षेत्र 6 प्रतिशत, 70
विधानसभा, 5 संसदीय व 3 राज्यसभा क्षेत्र हैं। राज्य में 14
रेलवे स्टेशन व दो हवाई अड्डे हैं। राज्य में 6 राष्ट्रीय
उद्यान व 6 वन्य जीव विहार एक बायोस्फीयर, 10 तीर्थ स्थल व 60
से अधिक पर्यटन स्थल हैं। अन्नास्वामी सर ने उन्हें ढेरों
जानकारी दी।
उनकी बस जोशीमठ पहुंची। वहां वह एक होटल में रूके यहां उनको
बताया गया कि यहां से 45 किमी बद्रीनाथ मंदिर है, जबकि 22 किमी
मार्ग पर पांडुकेश्वर के समीप अलकनंदा नदी के तट पर गोविन्दघाट
से ही 'फूलों की घाटी' की यात्रा प्रारंभ होती है, गोविन्दघाट
से 10 किमी रास्ते की चढ़ाई के बाद भ्यूंधार गांव तथा उससे 4
किमी आगे घांघरिया है- घांघरिया जो कि 10,000 फुट की ऊंचाई पर
स्थित है, से एक मार्ग लक्ष्मण गंगा पार कर बांई और 'फूलों की
घाटी' है जो कि 13000 फुट की ऊंचाई पर लगभग 87 वर्ग किमी लंबे
क्षेत्रफल पर फैला है।
घांघरिया से फूलों की घाटी की दूरी 3.5 किमी है। घांघरिया से
ही दूसरा मार्ग पुल के दाहिनी ओर हेमुकुंड साहिब (लोकपाल) को
जाता है जो कि 5.5 किमी की दूरी पर स्थित है। हेमकुंड साहिब
लगभग 15,000 फुट की संसार की सबसे अधिक ऊंचाई पर स्थित सिखों
का ख्याति प्राप्त तीर्थ स्थल हैं, यहां पर एक सुंदर सरोवर
'लोकपाल' के नाम से प्रसिद्ध है तथा एक विशाल गुरुद्वारा भी
बना हुआ है। यहां हिंदुओं का लक्ष्मण मंदिर भी हैं, वहां
उन्होंने जोशीमठ के बाजार व शंकराचार्य मंदिर देखा। उन्होंने
वह वृक्ष भी देखा जो 5000 वर्ष पुराना है जहां शंकराचार्य ने
तपस्या की थी। तत्पश्चात वे बस में बैठकर शाम 4 बजे गेट सिस्टम
से वाहनों के काफिले के साथ जोशीमठ से चले। एक घंटे बाद उनकी
बस पांडुकेश्वर के गोविन्दघाट पहुंची वहां रात को वे होटल में
रूके।
रात्रि में सभी ने रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम में अपने
दक्षिण भारतीय गीतों से सबका भरपूर मनोरंजन किया। कार्यक्रम के
अंत में अन्नास्वामी के आग्रह पर होटल के वृद्ध चौकीदार ने
उन्हें 'फूलों की घाटी' की कथा सुनाई।
पौराणिक कथाओं एवं महाकाव्यों के अनुसार महाभारत में भी 'फूलों
की घाटी' का विस्तृत एवं रोमांचकारी वर्णन है। विश्वविख्यात
संस्कृत-महाकवि कालिदास ने अपनी 'मेघदूत' पुस्तक में इसका सजीव
एवं रोमांचकारी वर्णन किया है 'फूलों की घाटी' की खोज
सर्वप्रथम वर्ष 1931 में फ्रैंक स्माइथ ने की। यह विश्वविख्यात
पर्वतारोही अपने दल के साथ 'कामेट पर्वत विजय' प्राप्त कर
लौटते हुए नीति घाटी में धवनी नदी के समीप गमसाली स्थान पर
पहुंचे और भटकते हुए उनहोंने पश्चिमी पर्वतीय मार्ग पकड़ा।
लगभग 16800 फुट की ऊंचाई पर भ्यूंधार दर्रे को पार कर
गंधमार्दन पर्वत श्रृंखला से जब वे नर-नारायण पर्वत व बद्रीनाथ
की ओर आ रहे थे कि उन्हें उनके साथियों ने नीचे हेमकुंड शिखर
से उस नरणीक घाटी को फूलों से भरी हुई देखा वे आश्चर्य चकित
एवं आनंद विभोर हो गए। उन्होंने उस घाटी को 'फूलों की घाटी' का
नाम दिया।
'यहां सैकड़ों प्रजाति के विभिन्न रंगीन फूलों से शोभायमान
संपूर्ण घाटी एक विचित्र एवं रंगीन पुष्पोधान का स्वरूप धारण
कर धरती पर एक अलौकिक एवं दिव्य सौन्दर्य बिखेर देती है, इसलिए
इस रमणीक घाटी को 'फूलों का स्वर्ग'/'वैली ऑफ फ्लावर' एवं
'नंदन-कानन' भी कहते हैं'।
वृद्ध चौकीदार से इस कथा को सुनकर वे रोमांचित हो गए और अंत
में वृद्ध ने बताया कि 'फ्रैंक स्मिथ कुछ पुष्पों के नमूने भी
अपने साथ ले गए थे। इस रमणीक घाटी को देखकर वह इतने
मंत्र-मुग्ध हो गए कि पुन: वर्ष 1937 में एडिनबरा के बॉटनिकल
गार्डन की ओर से वह इस घाटी में लगभग 3 माह विश्राम कर लगभग
350 किस्म के फूलों के बीज स्वदेश ले गए। इस पर उन्होंने एक
सुंदर एवं सचित्र पुस्तक 'फूलों की घाटी' नाम से लिखी। जिसके
फलस्वरूप यह छिपी हुई सुंदर घाटी कालांतर में अंतरराष्ट्रीय
ख्याति वाला स्थान बन गया। स्मिथ से पूर्व कई भारतीय इस घाटी
से परिचित तो थे किंतु इसकी ख्याति तथा रहस्योद्घाटन स्माइथ की
इस महत्वपूर्ण एवं सचित्र-दुर्लभ पुस्तक के माध्यम से ही हुआ।'
सभी बच्चों ने वृद्ध की कथा पर जोरदार ताली बजाकर अपनी खुशी
जाहिर की। तत्पश्चात सभी बच्चे अपने कमरों में सोने चले गए।
अगले दिन सभी 4 बजे उठ गए उन्होंने सुबह 6 बजे से 'फूलों की
घाटी' की यात्रा शुरू की। कठिन चढ़ाई के बावजूद बच्चों के
उत्साह से पिकनिक दल 9 बजे 10 किमी दूर भ्यूंधार गांव पहुंचा।
वहां के ग्राम प्रधान सहित गांववासियों ने उनका स्वागत किया।
वहां लंच के बाद वे 4 किमी की यात्रा कर घांघरिया पहुंचे।
रात्रिविश्राम उन्होंने घाघरिया में किया।
अगले दिन घाघरिया में लक्ष्मण गंगा पुल पार कर वे लोग बाएं
मार्ग पर आ गए क्योंकि दाहिने मार्ग से 5.5 किमी दूरी पर
हेमकुंड साहिब है और उन्हें तो 'फूलों की घाटी' जाना था।
उन्होंने बाएं मार्ग पर 3.5 किमी की यात्रा पूरी की। अब वे
फूलों की घाटी पहुंचे चुके थे।
दोनों अध्यापक सहित सभी विद्यार्थी इस नैसर्गिक सुषमा से भरपूर
'फूलों की घाटी' को देखकर खुशी एवं उत्साह से झूम उठे।
'बच्चों, यह बड़ा पीला फूल देख रहे हो, यह 'ब्रह्मकमल' है जो
उत्तराखंड का राज्य पुष्प है। सामने जो वृक्ष है जिसमें खूब
लाल-लाल फूल लदे पड़े हैं। वह 'बुरांश' है यह उत्तराखंड का
राज्य वृक्ष है, अन्नास्वामी सर ने कहा-
थोड़ा आगे चलने पर उन्हें एक पक्षी दिखाई दिया जिसके सिर पर
कलगी थी। यह पक्षी 'मोनाल' है यह राज्य पक्षी है। एक हिरण का
बच्चा दौड़ते हुए देखा 'कस्तूरी मृग' राज्य पशु है। दयास्वामी
सर ने बच्चों को बताया।
'बच्चों, हम सभी यहीं बैठकर खाना खाते हैं। किंतु सभी ध्यान
रखें, कागज व पौलीथीन फेंकना मत, अपने बैग में ही रखना, जिसे
हम यात्रा समाप्ति पर उचित स्थान पर नष्ट करेंगे। धार्मिक व
पर्यटन स्थलों में गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। अन्नास्वामी सर ने
समझाया। सभी बच्चों ने वैसा ही किया खाना खाने के बाद वे 3
किमी आगे तक 'फूलों की घाटी' के अंदर तक पहुंच चुके थे।
'बच्चों! यहां 'फूलों की घाटी' में फूलों की हजारों किस्में
हैं, कुछ नाम हैं। हौलीहुक, आइरिश, डायन्यस, डेकी, लिली, पौपी,
कैन्डुल, जीनिया, कैरोसिस, पैटोनिया, मेंहदी, गेंदा, सूर्यकमल,
तुलसी, कुमुदनी इत्यादि इनके अलावा सैकड़ों जड़ी-बूटियां हैं।
जिनमें कुछ प्रसिद्ध नाम हैं। कीड़ा जड़ी, अतीस, सिलाजीत,
संजीवनी कूटी, बज्रदंती, शिवधतूरा, भूतकेश इत्यादि है।
'बच्चो! ध्यान रहें कोई भी फूल व जड़ी बूटियों को सूंघने की
कोशिश न करें क्योंकि यहां कुछ फूल व जड़ियां ऐसी है जिसके
सूंघने मात्र से मनुष्य बेहोश हो जाता है। यह बात मुझे
गोविन्दघाट होटल के वृद्ध चौकीदार से बताई थी।' अन्नास्वामी सर
बच्चों को जब यह हिदायत दे रहे थे तब तक उनके पिकनिक दूर के दो
विद्यार्थी मणि और रत्नम अपने कैमरो से फूलों के फोटो लेने के
लिए घाटी में दूर तक निकल चुके थे।
वे दोनों अपने-अपने रूमाल में कुछ फूल व उनके बीजों को इकट्ठा
कर रहे थे। सायंकाल सभी घांघरिया पर्यटक आवास पहुंचे सभी ने
वहीं विश्राम किया। अगले दिन सुबह यह पिकनिक दल दोनों
अध्यापकों के साथ वापस हरिद्वार को लौटा। गोविंदघाट को मीठी
यादें सभी को बहुत रोमांचित कर रही थी।

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