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मदर टेरेसा का उपहार
रंगीन
मनकों में शायद कोई शक्ति नहीं होती, शक्ति तो वस्तुतः उनके
भीतर से उत्सर्जित होती है जिनके पास मनकों की वह माला होती
है।
सन् 1981 की उस रात
जब जिम कैसल सिनसिनाटी, ओहियो, से अपने हवाई जहाज में सवार
हुआ, तो काफी थका हुआ था। पैंतालीस वर्षीय प्रबंधन परामर्शदाता
सप्ताह भर चलने वाले व्यवसाय श्रृंखला में उलझा रहा था, और अब
वह राहत की सांस लेकर कंसास सिटी जाने वाले जहाज की सीट पर धस
सा गया।
जैसे ही और यात्री
प्रविष्ट हुए, वार्तालाप और बैग रखने की आवाजों से जहाज गूंज
उठा। फिर अचानक ही सन्नाटा छा गया। जहाज में शांति धीरे-धीरे
नाव के पीछे किसी अदृश्य लहर की भांति पसर गई। जिम ने यह देखने
के लिए गरदन मोड़ी कि हो क्या रहा है! और उस का मुंह खुला रह
गया।
संकरे पथ पर नीली
किनारी वाली श्वेत साडि़यों में लिपटी दो नन आ रही थीं। जिम ने
एक का परिचित चेहरा तत्काल पहचान लिया। झुर्रियोंदार त्वचा,
आंखें मृदु ऊष्मा से भरी। यह चेहरा उसने समाचारों में तथा टाइम
पत्रिका के मुखपृष्ठ पर भी देखा था। दोनों नन रूकीं और जिम समझ
गया कि उस की साथ वाली सीट मदर टेरेसा की है।
जब बाद के रहे सहे यात्री भी
बैठ गए, तब मदर टेरेसा तथा उनके साथ वाली नन ने मनकों की माला
निकाल ली। जिम ने ध्यान दिया, माला के हर दस मनकों के बाद अलग
रंग के मनके थे। यह दस मनकों का समूह विश्व के विभिन्न
क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करता था-बाद में मदर टेरेसा ने जिम
को बताया, और कहा, ‘मैं हर महाद्वीप के दीन हीन एवं मृत्यु की
ओर उन्मुख लोगों के लिए प्रार्थना करती हूं।’
जहाज रनवे पर दौड़
पड़ा, और दोनों महिलाएं प्रार्थना करने लगीं-धीमी गुनगुनाहट,
हालांकि जिम स्वयं को एक निर्लिप्त सा कैथोलिक मानता था, जो
प्रायः सिर्फ आदत होने के कारण चर्च जाता था, किंतु इस समय
उसने अपने आप को अनायास ही इस प्रार्थना पर्व से जुड़ता अनुभव
किया।
प्रार्थना समाप्त होते-होते
जहाज उड़ान की सामान्य ऊंचाई तक पहुंच चुका था।
मदर टेरेसा उस की तरफ
मुड़ीं। अपने जीवन में जिम पहली बार समझ पाया कि लोग जब ऐसे
लोगों की बात करते हैं, जो तेज मंडल से संपन्न होते हैं तो
वस्तुतः उन का क्या आशय होता है। मदर टेरेसा की दृष्टि पड़ते
ही जिम को लगा मानो शांति की प्रतीति उसके भीतर समा सी गई। वह
उसे देख नहीं पाया, जैसे हवा को नहीं देखा जा सकता, किंतु उसने
उसे अनुभव किया, बिलकुल वैसे ही, जैसे कोई मृदु समीर को
प्रत्यक्ष अनुभव करता है। उसने पूछा, ‘क्या तुम अकसर माला
फेरते हो?’ ‘नहीं, वास्तव में नहीं’, उसने माना।
उन्होंने उस का हाथ
थाम लिया। उन की आंखें उस की आंखों में पैठ सी गईं। फिर वह
मुसकराई, ‘ठीक है, अब तुम फेरा करोगे।’ और उनहोंने अपनी माला
उस की हथेली पर रख दी।
एक घंटे बाद, हवाई
अड्डे पर जिम को उस की पत्नी रूथ मिली। ‘यह दुनिया कैसे पलट
गई?’ रूथ उसके हाथ में माला देख कर चौंकी। उन्होंने एक दूसरे
का चुंबन लिया, और जिम ने मदर टेरेसा से अपनी मुलाकात के बारे
में बताया। कार से घर जाते समय वह बोला, ‘मुझे लगता है, मानो
मैं पहली बार ईश्वर की सच्ची सिस्टर से मिला!’
नौ महीने बाद जिम और रूथ
अपनी वर्षों पुरानी मित्र कोनी से मिलने गए। कोनी ने बताया कि
डॉक्टर का निदान है कि उसे गर्भाशय का कैंसर है। ‘डॉक्टर कहते
हैं कि केस बहुत पेचीदा है।’ कोनी ने कहा, ‘लेकिन मैं रोग से
लड़ूंगी। मैं यो ही घुटने टेकने वाली नहीं।’
जिम ने उसके हाथ थाम
लिए और फिर अपनी जेब में हाथ डालकर उसने धीरे से मदर टेरेसा की
माला उसकी उंगलियों पर लपेट दी। उसने कोनी को पूरी कहानी
सुनाकर कहा, ‘इसे अपने साथ रखना, कोनी। इससे तुम्हारा भला ही
होगा।’ कोनी यद्यपि कैथोलिक नहीं है, तो भी उसने प्लास्टिक के
नन्हे-नन्हे मनकों को मुट्ठी में भींच लिया। ‘धन्यवाद!’ वह
बुदबुदाई, ‘आशा करती हूं कि मैं इसे वापस करने के लिए जीवित
रहूंगी।’
इसके बाद कोई एक वर्ष
से भी अधिक समय बीत जाने पर जिम की भेंट कोनी से हुई। इस बार
कोनी का चेहरा दमक रहा था। वह लपककर जिम के पास पहुंची और माला
उसे थमा दी। ‘मैं इसे साल भर अपने साथ रखे रहीं।’ वह बोली,
‘मेरी शल्यक्रिया हुई और केमोथेरेपी भी। पिछले महीने डॉक्टरों
ने दोबारा शल्यक्रिया की और ट्यूमर खत्म हो गया- पूरी तरह जड़
से।’ उसकी आंखें जिम की आंखों से मिलीं, ‘और तब मुझे लगा कि
माला वापस करने का समय आ गया है।’ लेने के बाद गहन अवसादग्रस्त
हो गई। उस ने जिम से अनुरोध किया कि वह मदर टेरेसा वाली माला
कुछ दिनों के लिए उसे दे दे। जिम ने माला भेजी तो लिज ने उसे
एक मखमली थैले में रखकर अपने सिरहाने लटका दिया।
‘रात को मैं इस का
सहारा लेती। भौतिक रूप से इसे थामे रहती। मैं इतनी एकाकी और
भयभीत थी,’ वह बताती है, ‘तो भी जब मैं इस माला को पकड़ती,
लगता, मानो मैंने किसी प्रियजन का हाथ थाम रखा हो।’ धीरे-धीरे
लिज की जीवन चर्या सहज सामान्य हो गई और उसने माला जिम को लौटा
दी। बोली, ‘किसी और को इसकी जरूरत हो सकती है।’
फिर 1988 की एक रात।
किसी अजनबी ने रूथ को फोन किया। उसने अपने पड़ोसी से इस माला
के बारे में सुना था। उसने रूथ से आग्रह किया कि वह इसे अपने
साथ अस्पताल ले जाना चाहती है जहां उसकी मां कॉमा में पड़ी है।
उस परिवार को विश्वास था कि माला के प्रभाव से मृत्यु शय्या पर
पड़ी उनकी मां को अंतिम क्षणों में शांति मिलेगी।
कुछ दिन बाद उस महिला
ने माला वापस करते हुए कहा, ‘नर्सों ने मुझे बताया कि रोगी
कॉमा में होते हुए भी सुन सकता है, सो मैंने मां को उस हालत
में भी बता दिया कि मेरे पास मदर टेरेसा की माला है और यह कि
मैं यह माला उसे दूंगी तब वह शांतिपूर्वक जा सकती है- सब कुछ
ठीक हो जाएगा। फिर मैंने माला मां के हाथ में रख दी। तुरंत ही
हमने उन का चेहरा शांत होते देखा। रेखाएं लुप्त हो गईं। वह
एकदम शांत और युवा सी लगने लगीं।’ महिला का गला रुंध गया, ‘और
कुछ ही मिनट बाद वह प्रस्थान कर गईं।’ भावावेश में उसने रूथ का
हाथ थाम लिया। बोली, ‘धन्यवाद।’
क्या उन साधारण मनकों
में कोई विशिष्ट शक्ति है? या जो भी उस माला को लेता है उस में
मानवीय आत्मा एवं भावनाओं का पुनरोदय हो जाता है? जिम बस, इतना
जानता है कि माला के लिए अनुरोध आते ही रहते हैं-प्रायः
अप्रत्याशित रूप से। वह हमेशा तत्परता से उनका उत्तर देता है,
किंतु माला उधार देते समय वह आग्रह अवश्य करता है। ‘आप की
आवश्यकता पूरी हो जाए तो इसे वापस जरूर भेज दें। किसी और को भी
इस की जरूरत हो सकती है।’
हवाई जहाज में उस
अद्भुत मुलाकात के बाद से जिम का अपना जीवन भी बदल गया है। जब
से उसने यह अनुभव किया कि मदर टेरेसा अपनी आवश्यकता का सारा
सामान एक छोटे से बैग में लेकर चलती हैं, तब से वह अपने जीवन
को भी अधिक से अधिक सादगी भरा और सरल बनाने का प्रयास करता रहा
है।
‘मैं यह याद रखने की
कोशिश करता हूं कि महत्व वास्तव में है किस बात का-पैसों का,
उपाधि का या
वस्तुओं का नहीं, महत्व है इस बात का कि हम दूसरों
को किस प्रकार प्यार करते हैं।’
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