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अच्छा तो हम चलते हैं ... किशोर दा!
किशोर
कुमार।
किशोर दा! क्या आप सुन रहे हैं कि आज दुनिया आपके सदाबहार
गीतों को कितनी शौक से गा रही है और गुनगुना रही है। आज का दिन
हम सबके लिए इसलिए भावनात्मक और यादगार है क्योंकि इस दिन आपने
हमसे अचानक कहा अच्छा तो हम चलते हैं। क्या आपने ये गाना आज के
लिए ही गाया था? आपको हरेक रूप में और हर रंग में ढूंढ लिया
जाता है। कौन कहता है कि आपकी आवाज़ में दर्द नही था? किसी
आलोचक ने उसे महसूस करने की कोशिश ही नहीं की। आपके गीतों में
सुनने वालो ने सबकुछ पाया है। जिंदगी तो बेवफा है एक दिन
ठुकराएगी, मौत महबूबा है एक दिन साथ लेकर जाएगी- इसमें क्या
नही है? हम लोग आपके सुर से अपना सुर मिलाते हैं और अपने में
आपकी छवि खोजते हैं। ख़ैर, आप जहां भी हैं वहां आपकी खूबसूरत
महफिल सजी होगी, हमने भी आपकी महफिल सजाई हुई है और हम उसमें
आपको सुन रहे हैं।
आवाज़ की दुनियां को अपने दिव्य सुरों की सौगात से नवाजने वाले
विख्यात गायक किशोर कुमार संगीत की महफिल को 13 अक्टूबर 1987
को सदा के लिए छोड़ कर किसी ’दूर गगन की छांव में’ चले गए, मगर
अंतस को छूकर दिल के तारों को झंकृत कर देने वाले उनके सैकड़ों
नगमें खुशमिजाज व्यक्तित्व के धनी किशोर दा की दिव्य स्मृतियों
को आज भी तरोताजा कर देते हैं। किशोर के गानों के सुर जब भी
कानों तक पहुंचते हैं, तो कदम बरबस ही बहकने लगते हैं। ऐसा
महसूस होता है, जैसे शीतल पवन का झोंका अपने ऑंचल को छू लेने
की दावत दे रहा हो।
देश
के लाखों-करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलों में किशोर दा
की छवि बहुमुखी प्रतिभा के धनी एक ऐसे फनकार की है, जिन्हें
जोखिम उठाने, चुनौतियों के पार एक नया जहां तलाशने और नए
प्रयोग करना सदैव रास आता था। ज़िंदगी में मंजिल-दर-मंजिल
लक्ष्यों को साध कर किशोर कुमार ने सफलताओं के नए बसेरे बनाए।
सही मायनों में उनका जीवन हम सभी के लिए एक प्रेरणादायी नज़ीर
है।
भारतीय
फिल्मों के महान पार्श्व गायकों के बीच एक अलग स्थान हासलि
करने वाले किशोर कुमार को दीन-दुखियों का दर्द बांटने में बड़ी
खुशी मिलती थी, ग़मज़दा लोगों को वे पल भर में हंसा देते थे।
कहना न होगा कि अपने जीवन में और रूपहले पर्दे पर उन्होंने
अपने फन से ऐसी भूमिकाओं को बखूबी अंजाम दिया। आज भी उनके
नग़में उनकी गैर मौजूदगी में ग़म के मारों के ज़ख्मों को
सहलाकर मरहम लगाने का काम करते हैं। मोहब्बत के दुर्लभ एहसास
को उनके गीत इस कदर गहरा करते हैं, कि श्रोताओं को महसूस होता
है, गोया ज़िंदगी में किशोर के सुरों से घुलने वाले दुर्लभ
एहसास को प्राप्त करने का और कोई विकल्प ही नही है।
किशोर कुमार
का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्यप्रदेश के खंडवा में कुंजीलाल
गांगुली और गौरी देवी के घर हुआ। किशोर कुमार बचपन से ही बड़े
नटखट व चंचल थे और वो हा-हा, ही-ही, हू-हू करके गुनगुनाया करते
थे। लेकिन उन्होंने संगीत व गायन की तालीम कभी हासिल नही की।
एक बार प्रसिद्ध संगीतकार सचिन देव बर्मन उनके बड़े भाई अशोक
कुमार से मिलने के लिए उनके घर आए हुए थे। इसी दौरान गुनगुनाते
हुए किशोर कुमार के सुर उनके कानों तक पहुंचे। कहते हैं कि उस
समय सचिन दा को भ्रम हो गया कि कहीं महान गायक केएल सहगल तो
वहां मौजूद नहीं ! अपनी जिज्ञासा को शांत करने के लिए उन्होंने
बाकायदा अशोक कुमार से इसके बारे में पूछा। सचिन दा को जब यह
बताया गया कि यह युवा किशोर की आवाज़ है तो उन्होंने उनकी बड़ी
प्रशंसा की। सचिन दा ने किशोर कुमार की हौसला अफज़ाई करते हुए
उन्हें निरंतर रियाज़ के साथ स्वयं की एक अलग शैली विकसित करने
की सलाह दी। सचिन दा की सीख को जेहन में रखकर किशोर कुमार
गायकी के क्षेत्र में आगे बढ़ते रहे। बाद में उन्होंने हर मूड
के गीतों को सुर देते हुए 'यूडलिंग' के रूप में अपनी विशिष्ट
शैली विकसित की।
प्रसिद्ध
संगीतकार खेमचंद प्रकाश को किशोर कुमार की आवाज़ में असीम
सम्भावनाएं दिखाई दीं। खेमचंद प्रकाश को किशोर कुमार का गायन
ऐसा भाया कि उन्होंने अपनी फिल्म 'ज़िद्दी'(1948) में किशोर
कुमार को एक गीत 'मरने की दुआएं क्यों मॉगू, जीने की तमन्ना
कौन करे---’ गाने का अवसर दिया। इस तरह एक गायक के रूप में
किशोर कुमार का सफर शुरू हुआ। लेकिन महान गायक के रूप में
बुलंदियों की ओर कूच करने से पूर्व किशोर कुमार ने बहैसियत
नायक कई हिट फिल्में दीं।
अपने
बचपन के नाम आभास कुमार की जगह नया नाम किशोर कुमार चुनने
के बाद उन्होंने फिल्मों में कोरस सिंगर के रूप में पदार्पण
किया। अभिनेता के रूप में अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले
किशोर कुमार की पहली फिल्म शिकारी (1946) थी, जिसमें उनके बड़े
भाई अशोक कुमार मुख्य भूमिका में थे। सन् 1951 से 1962 के बीच
किशोर कुमार की 'मेमसाब', 'आंदोलन', 'गर्ल फ्रेंड', 'चलती का
नाम गाड़ी', 'लहरें', 'मुसाफिर' आदि फिल्में खूब चली। इन
फिल्मों में अपनी उछलकूद वाली चंचल अदाओं से किशोर कुमार ने
अभिनय को नए आयाम दिए। उनकी देखादेखी अन्य प्रसिद्ध अभिनेताओं
ने भी उनकी तरह हास्य अभिनय की राह अख्तियार की और सफलता के
सोपान तय किए। किशोर के हास्य अभिनय में एक तरह का जादू था, वे
अपनी हंसोड़ अदाओं से दर्शकों को हसा कर लोटपोट कर देते थे।
यही कारण था कि बतौर अभिनेता भी वे लोकप्रियता के शिखर पर रहे।
इन फिल्मों में अभिनय के साथ ही उनके गाए गीत भी खूब चले।
सन्
1968 में पंचम दा (आरडी बर्मन) ने किशोर कुमार को 'पड़ौसन'
एवं 'प्यार का मौसम' में फिल्मों में गाने का अवसर दिया। इसके
बाद किशोर की आवाज़ का जादू सिर चढ़कर बोला और सैकड़ों-हज़ारों
गीतों को उन्होंने स्वर देकर अमर बनाया। किशोर कुमार ने प्यार
के रंग में डूबे ’मेरे सपनों की रानी कब आएगी तू---’ और ’रूप
तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना---’ (आराधना,1970), ’फूलों के
रंग से दिल की कलम से---’ और ’शोखियों में घोला जाए फूलों का
शबाब ---’ (प्रेम पुजारी, 1970) आदि गीत गाए जो युवाओं के
दिलों की धड़कन बनकर आज भी गुनगुनाए और सुने जाते हैं।
किशोर कुमार
ने आरडी बर्मन के निर्देशन में ’ये शाम मस्तानी मदहोश किए
जाए---’(कटी पतंग,1971), हमें तुमसे प्यार कितना ये हम नहीं
जानते---(कुदरत,1979), और ’हमें और जीने की चाहत न होती, अगर
तुम न होते---’(अगर तुम न होते, 1983), कल्याणजी आनंदजी के लिए
’समां है सुहाना सुहाना---’(घर घर की कहानी, 1971), और ’पल भर
के लिए कोई हमें प्यार कर ले, झूंठा ही सही---’(जॉनी मेरा
नाम,1971), राजेश रोशन के निर्देशन में ’दिल क्या करे जब किसी
को किसी से प्यार हो जाए---’(जूली, 1975), लक्ष्मीकांत
प्यारेलाल के लिए ’छूकर मेरे दिल को किया तूने क्या
इशारा--’(याराना, 1981), बप्पी लहरी के साथ’चलते चलते मेरे ये
गीत याद रखना---’(चलते चलते,1977), और शिव हरि के लिए ’देखा एक
ख्वाब तो ये सिलसिले हुए---’ (सिलसिला,1985) आदि प्रेम रस के
गीतों की सौगात दी।
अपनी
अमर गायकी के जरिए उन्होंने राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन,
शशि कपूर, देवानंद, संजीव कुमार, धर्मेन्द्र, और जितेन्द्र को
सुपर स्टार की पदवी तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा की। इसके
अलाव सुनील दत्त, राजेन्द्र नाथ, विनोद खन्ना, अशोक कुमार, ऋषि
कपूर और अमोल पालेकर के लिए भी उन्होंने कई हिट गीत गाएं।
’सागर’, ’शराबी’, ’अगर तुम न होते’, ’नमक हलाल’, ’थोड़ी सी
बेवफाई’, ’डॉन’, ’अमानुष’ और ’आराधना’ जैसी फिल्मों में उनके
गीतों के कारण उन्हें सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायक के पुरस्कार
मिले।
किशोर कुमार
ने हिंदी के साथ-साथ बंगाली, असमी, गुजराती, मराठी,
कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उडि़या में भी उसी महारत के साथ
गीत गाए और वे 1950 से 1980 के बीच के तीन दशकों में रफी और
मुकेश के साथ देश के शीर्ष गायक के रूप में अपने वर्चस्व को
स्थापित किया। इसके बावजूद भी किशोर कुमार को रफी और मुकेश के
मुकाबले कम प्रतिभावान गायक कहा जाता रहा। तुलना करने वालों का
तर्क था कि किशोर के सुर में दर्द की गहराई उतनी नही है जितनी
रफी व मुकेश अपने गीतों में उड़ेल देते हैं। लेकिन आज भी सिने
प्रेमियों की जुबां पर किशोर के कई दर्दीले नग़मे बरबस ही आ
जाते हैं, जिनकी गहराई किसी भी नजरिए से रफी या मुकेश से कमतर
नही कही जा सकती।
’जीवन
के सफर में राही, मिलते है बिछुड़ जाने
को---’(मुनीमजी,1955), ’दुखी मन मेरे सुन मेरा
कहना---’(फंटूश,1956), ’कोई हमदम न रहा, कोई सहारा न
रहा---’(झुमरू,1961), ’चिंगारी कोई भड़के तो सावन इसे
बुझाएं---’ (अमर प्रेम,1972),’कोई होता जिसको अपना हम अपना कह
लेते यारों---’(मेरे अपने,1972),मेरी भीगी भीगी सी पलकों पे रह
गए जैसे मेरे सपने---’(अनामिका,1973),’ मीत न मिला रे मन
का---’(अभिमान,1973),’मेरा जीवन कोरा कागज़ कोरा ही रह
गया--’(कोरा कागज,1973),’दिल ऐसा किसी ने मेरा
तोड़ा---’(अमानुष, 1975),’मेरे नैना सावन भादो फिर भी मेरा मन
प्यासा---’(महबूबा,1976),’घुंघरू की तरह बजता ही रहा हूं
मैं---’(चोर मचाए शोर,1980),’मंजिले अपनी जगह है, रास्ते अपनी
जगह जब कदम ही साथ न दे---’(शराबी,1984) जैसे दर्द से सराबोर
अनेक गीतों को किशोर कुमार ने जिस सहज भाव से दिल की गहराईयों
से गाया है, उन्हें सुनकर कोई कैसे कह सकता है कि इस पैमाने पर
उनके सुरों की सच्चाई भारतीय फिल्म जगत के महानतम गायकों से कम
है। अलग अलग मूड के गानों की चर्चा करें तो 'हम सब उस्ताद
है'(1965) में किशोर कुमार का गीत' हे प्यार बांटते चलो, क्या
हिंदू क्या मुसलमां हम सब हैं भाई-भाई---'उनके गाए देशभक्ति के
गीतों की लड़ी को आज भी विशेष तौर पर सुना जाता है।
किशोर कुमार
एक ऐसे जिंदादिल इंसान थे, जिनका स्मरण आज भी मन में
गुदगुदी भरा एहसास पैदा करता है। कॉमेडी गीतों की उन्होंने एक
सर्वथा अलग सल्तनत कायम की। किशोर कुमार की ज़िंदादिल जीवन
शैली से मेल खाने वाले इन तरानों को सुनते हैं तो ज़ेहन में
हर्ष की तरंगे हिलोरे लेने लगती हैं। सच तो यह है कि हास्य
गीतों में किशोर ने अपनी अद्भुत प्रतिभा से ऐसा जीवंत हास्य रस
पैदा किया कि उनका इस क्षेत्र में आज भी कोई सानी नज़र नही
आता। उनके अंदाज़ का कॉमेडी अभिनय और गायन भारतीय फिल्मों की
अमूल्य धरोहर है। किशोर कुमार की ’हुडलिंग’ की नकल करने का
प्रयास कई गायकों ने समय-समय पर किया है, मगर जिस नैसर्गिक
ईश्वरीय देन के रूप में किशोर कॉमेडी गीतों को संजो गए, वह
मुकाम आज तक कोई नही हासिल कर सका है।
किशोर कुमार
ने गीतकार, संगीतकार, फिल्म निर्माता, निर्देशक, पटकथा
लेखक, और अभिनेता के बतौर रजत पट पर अपनी बहुआयामी भूमिकाओं को
साकार कर कामयाबी और लोकप्रियता के नए आयाम स्थापित किए। गायक
के रूप में विशिष्ट मुकाम हासिल करने की अपनी तमन्ना को किशोर
ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा के दम पर साकार किया, लेकिन फिल्मी
पर्दे और पार्श्व में मिली प्रत्येक भूमिका को जीवंत बनाकर
किशोर कुमार अमर हो गए।
संगीत के जादूगर किशोर कुमार आप हमे हमेशा याद आते हैं, आपको
हमारा नमन।
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