साहित्य में घुसा बाज़ारवाद और जुगाड़वाद

  • अंबा प्रसाद श्रीवास्तव

नए संदर्भों में एक नया प्रश्न बहुत तेजी से उभर रहा है जो पहले प्रश्न से भी अधिक जटिल है किन्तु उसकी ओर किसी का ध्यान नहीं जाता। जीवन के दूसरे क्षेत्रों पर बाजारवाद का पहले ही कब्जा हो चुका है और अब उसने चुपके-चुपके साहित्य सृजन के क्षेत्र पर भी अपना आधिपत्य जमा लिया है। भौतिकवाद की आँधी से उठी क्रान्ति की लहर ने प्रकाशकों को ही नहीं, लेखकों और समीक्षकों की दृष्टि भी बदल दी है। आमतौर पर कहा जाता है कि मुद्रणकला के विकास ने साहित्य को समृद्ध करने में ऐतिहासिक योग दिया है, जबकि वास्तविकता ठीक इसके विपरीत है। आज से डेढ़-दो-सौ वर्ष पहले प्रतिभा-विहीन व्यक्ति, कवि या लेखकों की जमात में शामिल होने की बात सोच भी नहीं सकता था और यदि किसी ने कवि होने के भ्रम में किसी कृति की रचना भी की तो पाठकों ने पहली ही नजर में उसे खोटे सिक्के की तरह नकार दिया।
ऐसी सैकड़ों पुस्तकें नष्ट हो चुकीं और जो किसी तरह बची रहीं, वे किसी संग्रहालय में ममी की तरह रखी हुई हैं। मुद्रण कला के विकास ने अब हर किसी को अपनी पुस्तक छपाने की सहज सुविधा उपलब्ध करा दी, जिसके कारण प्रायः हर रोज सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित होती हैं, जिनका मूल्य किसी न किसी अंश में पाठकों को चुकाना पड़ता है। ऐसे अनेक कारण हैं जिनके आधार पर यह बेहिचक कहा जा सकता है कि कतिपय प्रकाशक जो येन-केन प्रकारेण धन अर्जित करने के लिए इस व्यवसाय में हैं, वे लेखकों का शोषण करने के साथ पाठकों का भी शोषण कर रहे हैं। पुस्तक का प्रकाशन और विक्रय व्यवसाय होता है किन्तु लेखन को किसी भी दृष्टि से व्यवसाय या धन अर्जित करने का जरिया मानना रचनाधर्मिता की अवमानना है।
अरस्तू और भरत मुनि से लेकर पूर्व या पश्चिम के किसी भी चिन्तक ने लेखन को व्यवसाय नहीं माना। आचार्य मम्मट के ‘अर्थकृते’ का आशय भी आजकल की तरह रायल्टी या पारिश्रमिक के रूप में रुपया कमाना नहीं रहा है। यह मार्क्सवादी दर्शन की देन है कि प्रत्येक कर्म को, वह किसी भी नीयत या उद्देश्य से किया जाय, श्रम से जोड़ दिया जाता है। इस दर्शन में लेखक की भावयित्री प्रतिभा को तो स्वीकार किया ही नहीं जाता, उसकी कारयित्री प्रतिभा को भी श्रम कौशल मान लिया जाता है। रचनाकार की कारयित्री प्रतिभा और सड़क पर गिट्टी तोड़ने वाले श्रमिक के कौशल में कोई अन्तर नहीं माना जाता। अच्छे-बुरे, सकाम-निष्काम, स्वार्थ और परार्थ सभी कर्मों का मूल्य पैसे में आँकने की मानसिकता ने ही मार्क्स को धर्म को भी व्यवसाय मानने के लिये प्रेरित किया था।
मार्क्स ने जिस संस्कृति को जन्म दिया है उसमें केवल शारीरिक श्रम का ही नहीं चिन्तन, मनन, बुद्धि और समय का मूल्य भी पैसे में आँका जाता है। लेखन या रचना-धर्मिता को भी इस संस्कृति ने अपनी चपेट में ले लिया है। साहित्य सृजन व्यवसाय बन गया है और प्रकाशक की भूमिका एक ऐसे फैक्टरी मालिक की बन गई है जो मजदूरों को मजदूरी का भुगतान कर माल का उत्पादन करता है। शोषण भी मार्क्सवादी दर्शन का ही शब्द है। इस संस्कृति के बीज साहित्य के क्षेत्र में कला, कला के लिये या कला जीवन के लिये विषय पर बहस के रूप में पिछली सदी के प्रारम्भिक दशकों में बोये गये थे जो अब वटवृक्ष की तरह चारों ओर जड़ जमा कर विशाल आल-बाल की शक्ल में बदल गये हैं। आज न तो कोई तुलसी की तरह ‘स्वान्तःसुखाय रघुनाथगाथा’ लिखने के लिये तैयार है और न भवभूति की भाँति भविष्य में कृति का मूल्यांकन करनेवालों की आशा में निश्चिन्त होकर बैठ जाने को तैयार है। उसकी रचनाधर्मी की भूमिका खत्म हो चुकी है और वह लेखकीय कौशल की पूँजी के बल पर, दूकानदार बन कर, पाठकों को उपभोक्ता मान कर, साहित्य के बाजार में बैठ गया है।
नई संस्कृति में लेखन का उद्देश्य बदल गया है और लेखकीय प्रतिभा के मानदण्ड भी बदल गये हैं। जिस प्रकार अमृत की प्राप्ति के लिये भेष बदलकर देवताओं की पंक्ति में बैठे राहु को देवता भी नहीं पहचान सके थे, उसी प्रकार आज पाठकों के लिये असली और नकली लेखकों की पहचान कठिन हो गई है। यह समस्या उन लोगों ने पैदा की है जो अपनी गाँठ का रुपया खर्च कर अथवा प्रभुता या किसी अन्य जुगाड़ से ऐसी पुस्तकें छपा लेते हैं जो सृजन की किसी कोटि में नहीं आती और उन्हें साहित्य के क्षेत्र में फैलती या फैलाती ‘प्रदूषण’ कहने में कोई हर्ज नहीं होगा। आजकल एक ओर केवल रुपया के लिये लिखने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है और दूसरी ओर ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो अपना रुपया खर्च करके लेखकों की पंक्ति में बैठने के लिये छटपटाते रहते हैं। ऐसी ढेरों कविता पुस्तकें प्रकाशित हो रही है, जिनसे छायावादी युग की वे कवितायें ही हजार गुना अच्छी थीं जिन्हें एकान्त में गुनगुनाने से ही लोगों को कुछ क्षण के लिये ही सही, आनन्द की अनुभूति होती थी।
ईमानदार असली टिकाऊ लेखन की कमी आज हर पाठक को खलने लगी है, जबकि नकली लेखकों की मुलम्मा चढ़ी पुस्तकों से बाजार पटा रहता है। व्यवसाय की दृष्टि से हटकर पिछली सदी के चौथे दशक के आस-पास ही विदेशी भाषा और साहित्य के प्रभाव से हिन्दी में भी ऐसी पुस्तकें लिखी गई और प्रकाशित हुई जो पाठकों को आकृष्ट तो अवश्य करती रहीं किन्तु नैतिकता, सांस्कारिकता की दृष्टि से उनका कभी स्वागत नहीं किया गया। ऐसी पुस्तकों के लेखन की प्रेरणा अंग्रेजी और उर्दू के उन लेखकों से मिली थी, जो शराबखोरी और यौन सम्बन्धों के धरातल पर ही अपनी कहानियाँ और उपन्यास लिखते रहे तथा जिसे यथार्थवादी लेखन कहा जाता रहा। लेखन और प्रकाशन को व्यवसाय बनते ही सृजन के सम्पूर्ण क्षेत्र पर बाजारवाद ने कब्जा कर लिया और इसी के साथ समीक्षकों ने भी बिचौलिया दलाल की भूमिका अख्तियार कर ली।
आजकल किसी भी पुस्तक की समीक्षा लिखी नहीं जाती, लिखाई जाती है। ऐसी समीक्षाएँ ऐकान्तिक रूप से लेखक और समीक्षक के सम्बन्धों पर आधारित होती है, जिसमें या तो समीक्ष्य कृति को वर्ल्ड-क्लासिक सिद्ध किया जाता है या उसे पूरी तरह घटिया मानकर खारिज कर दिया जाता है। कला या समीक्षा के कोई मानदण्ड नहीं हैं। जब ‘कला के लिए’ या ‘कला जीवन के लिए’ मुद्दे पर बहस छिड़ी थी, तभी कविता और सृजन की अन्य विधाओं को उपयोगितावाद अर्थात् व्यवसाय से जोड़ने की शुरुआत हो चुकी थी। मार्क्सवादी समीक्षा के सिद्धान्त इस मान्यता पर आधारित हैं कि मनुष्य के जीवन में आर्थिक प्रेरणा ही मुख्य है और इसी के प्रभाव से कला तथा मानव-संस्कृति का विकास होता है। इस नीति से विकसित समाज के स्वरूप को प्रतिबिम्बित करने वाला साहित्य ही उच्च कोटि का होता है।
इससे पहले यूनानी आलोचक लांजायनस ने कहा था कि अर्थ के प्रति आकर्षण अच्छे साहित्य की सर्जना में सबसे बड़ा अवरोध होता है। दूसरे समीक्षक भी इससे सहमत रहे किन्तु मार्क्सवादियों ने अर्थप्रधान राजनीति के बल पर सभी मानदण्डों को एक ही झटके में तोड़कर फेंक दिया। कदाचित् यह भी मार्क्सवादी ‘थ्योरी-ऑफ-इवोल्यूशन’ का नतीजा है कि कुछ समय पहले तक मार्क्सवादी समीक्षा का जो रूप था वह भी अब बदलने लगा है और लेखक, समीक्षक के परस्पर सम्बन्ध तथा राजनीतिक आस्थाएँ ही समीक्षा का प्रमुख मानदण्ड बनते जा रहे हैं। लेखक और समीक्षक के सम्बन्ध बहुत कुछ अंशों में ठीक वैसे ही बनते जा रहे हैं जैसे औद्योगिक प्रतिष्ठान और विज्ञापन एजेन्सियों में होते हैं।
साहित्य के क्षेत्र पर बाजारवाद का कब्जा होने से लेखकों, प्रकाशकों और पाठकों के सामने अनेक समस्याएँ पैदा हो गई हैं। लेखक परेशान है कि उसके सृजन का समुचित समादर नहीं हो रहा, प्रकाशक परेशान है कि पुस्तक खरीदने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है और पाठक परेशान है कि उसे नयी समीक्षा-शैली और विज्ञापन-कला के जाल में उलझ कर निहायत ही घटिया पुस्तकें खरीदनी पड़ती है। इस बात को सभी वर्ग स्वीकार करते हैं कि पुस्तकों के प्रति पाठकों का रुझान कम होता जा रहा है, किन्तु इसके लिये कभी दूरसंचार संस्कृति को दोषी ठहराया जाता है, कभी सूचना-प्रौद्योगिकी के विस्तार को जिम्मेदार माना जाता है या कभी कोई दूसरा कारण बतला दिया जाता है। इस बात की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा कि साहित्य में बाजारवाद के पनपते ही ‘लेखकों, समीक्षकों और प्रकाशकों’ के प्रति पाठकों का विश्वास उठता जा रहा है।

 

डेविड फ्राली यानि वामदेव शास्त्री से मिलिए!

डेविड फ्राली (वामदेव शास्त्री) पश्चिम के कुछ उन चुने हुए वेदाचार्यों में हैं जिनकी वेदों के महापंडित के रूप में मान्यता एवं प्रतिष्ठा है। उनके ज्ञान की विस्तृत परिधि में आयुर्वेद, वैदिक-ज्योतिष, तंत्र, योग तथा वैदिक दर्शन समाहित है। उनके अध्ययन का मुख्य आधार वेद है और उसमें अधुनातन पुरातात्विक अन्वेषणों के आलोक में भारत के प्राचीन इतिहास एवं वेदों का आलोचनात्मक अध्ययन भी जुड़ा हुआ है। पिछले पंद्रह वर्षों में उन्होंने दस से भी अधिक ग्रंथों का लेखन किया है। भारत एवं अमरीका की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर उनके लेख प्रकाशित हुए हैं। भारत में वेदों पर उनके भाष्य एवं अनुवादों की आध्यात्मिक और विद्वत् समुदाय में यथोचित मान्यता हुई है। आजकल वे सांटा फे, न्यू मेक्सिको 87504-8356 (यूएसए) में अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ वैदिक स्टडीज के निदेशक हैं।
प्रस्तुत पुस्तकद्वय के विषय से संबंधित उनके अन्य ग्रंथ हैं-हिंदूइज्म, द एटर्नल टे्रेडिशन (सनातन धर्म), सनातन धर्म (व्हायस ऑफ नॉलेज फॉर द मॉडर्न एज), विज़डम ऑफ द एसिंयेंट सीयर्स सेलेक्टेड मंत्रास फ्राम द ऋग्वेद, वैदिक आर्यंस एंड द ओरिजिन ऑफ सिविलिजेशन (नवरत्न एस राजाराम के साथ सह लेखन-इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन स्टडीज 1994) अवेकेन भारत ए कॉल फॉर इंडियाज़ रीबर्थ (व्हायस ऑफ इंडिया 1997)।
डेविड फ्राली भारतीय आध्यात्म, संस्कृति और हिंदू-धर्म के एक अद्यतन उत्कृष्ट चिंतक हैं। विभिन्न धर्मों और आध्यात्मिक मूल्यों का जितना मार्मिक और निर्भीक तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया है, उससे आपके गहन अध्ययन और गंभीर चिंतन पर प्रकाश डालता है। अभारतीय होते हुए भी हिंदू धर्म के उदात्त तत्वों को महत्ता प्रदान करने की जो आकुलता इनमें दिखाई देती है, वह किसी बिरले भारतीय में ही विद्यमान हो सकती है।

 

बदरीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’ की छाया-स्मृति

  • आचार्य रामचंद्र शुक्ल

मेरे पिताजी फारसी के अच्छे ज्ञाता और पुरानी हिन्दी-कविता के बड़े प्रेमी थे। आधुनिक हिन्दी-साहित्य में भारतेन्दुजी के नाटक उन्हें बहुत प्रिय थे। उन्हें वे कभी-कभी सुनाया करते थे। जब उनकी बदली हमीरपुर जिले के राठ तहसील से मिरजापुर हुई तब मेरी अवस्था आठ वर्ष की थी। उसके पहले ही से भारतेन्दु के सम्बन्ध में एक अपूर्व मधुर भावना मेरे मन में जगी रहती थी। सत्य हरिश्चन्द्र नाटक के नायक राजा हरिश्चन्द्र और कवि हरिश्चन्द्र में मेरी बाल-बुद्धि कोई भेद नहीं कर पाती थी। मिरजापुर आने पर कुछ दिनों में सुनाई पड़ने लगा कि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के एक मित्र यहाँ रहते हैं, जो हिन्दी के प्रसिद्ध कवि हैं और जिनका नाम है उपाध्याय बदरीनारायण चौधरी।
भारतेन्दु-मंडल की किसी सजीव स्मृति के प्रति मेरी कितनी उत्कंठा रही होगी, यह अनुमान करने की बात है। मैं नगर से बाहर रहता था। एक दिन बालकों की मंडली जोड़ी गई, जो चौधरी साहब के मकान से परिचित थे। वे अगुवा हुए। मील-डेढ़-मील का सफर तै हुआ। पत्थर के एक बड़े मकान के सामने हम लोग जा खड़े हुए। नीचे का बरामदा खाली था। ऊपर का बरामदा सघन लताओं के जाल से आवृत्त था। बीच-बीच में खंभे और खुली जगह दिखाई पड़ती थी। उसी ओर देखने के लिए मुझसे कहा गया। कोई दिखाई न पड़ा। सड़क पर कई चक्कर लगे। कुछ देर बाद एक लड़के ने उंगली से ऊपर की ओर इशारा किया। लता-प्रतान के बीच एक मूर्ति खड़ी दिखाई पड़ी। दोनों कंधों पर बाल बिखरे हुए थे। एक हाथ खंभे पर था। देखते-ही-देखते वह मूर्ति दृष्टि से ओझल हो गई। बस, यही पहली झांकी थी।
ज्यों-ज्यों मैं सयाना होता गया, त्यों-त्यों हिन्दी के नूतन साहित्य की ओर मेरा झुकाव बढ़ता गया। एक बार एक आदमी साथ करके मेरे पिताजी ने मुझे एक बारात में काशी भेजा। मैं उसी के साथ घूमता-फिरता चौखंभे की ओर जा निकला। वहीं पर एक घर में से पं केदारनाथ पाठक निकलते दिखाई पड़े। पुस्तकालय में वे मुझे प्रायः देखा करते थे। इससे मुझे देखते ही वे वड़ीं खड़े हो गये। बात-ही-बात में मालूम हुआ कि जिस मकान में से वे निकले थे, वह भारतेन्दुजी का घर था। मैं बड़ी चाह और कुतूहल की दृष्टि से कुछ देर तक उस मकान की ओर, न जाने किन भावनाओं में लीन होकर देखता रहा।
सोलह वर्ष की अवस्था तक पहुँचते-पहुँचते तो समवयस्क हिन्दी-प्रेमियों की एक खासी मंडली मुझे मिल गई, जिनमें काशीप्रसाद जायसवाल, बाबू भगवानदास हालना, पं बदरीनाथ गौड़, पं उमाशंकर द्विवेदी मुख्य थे। हिन्दी के नये-पुराने लेखकों की चर्चा बराबर इस मंडली में रहा करती थी। मैं भी अब अपने को लेखक मानने लगा था। हम लोगों की बातचीत प्रायः लिखने-पढ़ने की हिन्दी में हुआ करती, जिसमें ‘निःसंदेह’ इत्यादि शब्द आया करते थे। जिस स्थान पर मैं रहता था, वहाँ अधिकतर वकील-मुख्तारों तथा कचहरी के अफसरों और अमलों की बस्ती थी। ऐसे लोगों के उर्दू-कानों में हम लोगों की बोली कुछ अनोखी लगती थी। इसी से उन्होंने हम लोगों का नाम ‘निःसंदेह लोग’ रख छोड़ा था।
चौधरी साहब से तो अब अच्छी तरह परिचय हो गया था। अब उनके यहाँ मेरा जाना लेखक की हैसियत से होता था। हम लोग उन्हें एक पुरानी चीज समझा करते थे। इस पुरातत्त्व की दृष्टि में प्रेम और कुतूहल का एक अद्भुत मिश्रण रहता था। यहाँ पर यह कह देना आवश्यक है कि चौधरी साहब खासे हिन्दुस्तानी रईस थे। वसंत पंचमी, होली इत्यादि अवसरों पर उनके यहाँ खूब नाच रंग और उत्सव हुआ करते थे। उनकी हर एक अदा से रियासत और तबीयतदारी टपकती थी। कन्धों तक बाल लटक रहे हैं। आप इधर से उधर टहल रहे हैं। एक छोटा-सा लड़का पान तश्तरी लिये पीछे-पीछे लगा हुआ है। बात की कांट-छांट का क्या कहना है! जो बातें उनके मुँह से निकलती थीं, उनमें एक विलक्षण वक्रता रहती थी। उनकी बातचीत का ढंग उनके लेखों के ढंग से एकदम निराला होता था। नौकरों तक के साथ उनका ‘संवाद’ सुनने लायक होता था। अगर किसी नौकर के हाथ से कभी कोई गिलास वगैरह गिरा. तो उनके मुँह से यही निकलता कि ‘कारे बचा त नाहीं।’ उनके प्रश्नों के पहले ‘क्यों साहब’ अक्सर लगा रहता था।
वे लोगों को प्रायः मज़ाक बनाया करते थे, इससे उनसे मिलने वाले लोग भी उन्हें मज़ाक बनाने की फिक्र में रहा करते थे। मीरजापुर में पुरानी परिपाटी के बहुत ही प्रतिभाशाली कवि रहते थे, जिनका नाम था—वामनाचार्य गिरि। एक दिन वे सड़क पर चौधरी साहब के ऊपर एक कवित्त जोड़ते चले जा रहे थे। अन्तिम चरण रह गया था कि चौधरी साहब अपने बरामदे में कंधों पर बाल छिटकाये खंभे के सहारे खड़े दिखाई पड़े। चट कवित्त पूरा हो गया और वामनजी ने नीचे से वह कवित्त ललकारा, अन्तिम अंश था—‘खम्भा टेकि खड़ी जैसे नारि मुगलाते की।’
एक दिन कई लोग बैठे बातचीत कर रहे थे, कि इतने में एक पंडितजी आ पहुँचे। चौधरी साहब ने पूछा—‘कहिये, क्या हाल है?’ पण्डितजी बोले—‘कुछ नहीं, आज एकादशी थी, कुछ जल खाया है और चले आ रहे हैं।’ प्रश्न हुआ—‘जल ही खाया है कि कुछ फलाहार भी पिया है।’
एक दिन चौधरी साहब के एक पड़ोसी उनके यहाँ पहुँचे। देखते ही सवाल हुआ—‘क्यों साहब, एक लफ्ज मैं अक्सर सुना करता हूँ, पर उसका ठीक अर्थ समझ में न आया। आखिर घनचक्कर के क्या मानी है, उसके क्या लक्षण हैं?’ पड़ोसी महाशय बोले—‘वाह, यह क्या मुश्किल बात है। एक दिन रात को सोने के पहले कागज-कलम लेकर सबेरे से रात तक जो-जो काम किये हों, सब लिख जाइये और पढ़ जाइये।’
[विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी के सद्यः प्रकाशित कथाशिल्पी प्रेमचंद द्वारा सम्पादित ‘हंस-आत्मकथा अंक (1932)’ से]

 

दिनकरजी की जन्मशति पर कानपुर में संगोष्ठी

  • स्‍वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

कानपुरराष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर‘ के जन्म शताब्दी वर्ष पर मेधाश्रम संस्था ने ‘‘राष्ट्रकवि दिनकर की रचनाधर्मिता के विविध आयाम‘‘ पर यहां एक संगोष्ठी का आयोजन किया। कार्यक्रम को बतौर मुख्य वक्ता सम्बोधित करते हुए उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन के पूर्व अध्यक्ष डा0 बद्री नारायण तिवारी ने कहा कि दिनकर जी की कवितायें सुनने और पढ़ने- दोनों स्तरों पर प्रभावित करती हैं। वे स्वतंत्रता पूर्व विद्रोही कवि तो स्वतंत्रता पश्चात राष्ट्रकवि रूप में प्रतिष्ठित हुए। दिनकरजी की कविताओं में राष्ट्रवादी, क्रान्तिकारी, मार्क्‍सवादी, प्रगतिवादी और रोमांटिक सभी भावनाओं की अनुपम अभिव्यक्ति है। जहाँ ‘रेणुका‘ में साम्यवादी स्वर है, वहीं ‘कुरूक्षेत्र‘ में उन्होंने चरित्र को ऊपर रखा। ‘रश्मिरथी‘ में मार्क्‍सवादी प्रभाव से निकलकर दिनकर गांधीवादी मूल्यों के हिमायती बने तो उनकी ‘नीलकुसुम‘ में रोमांटिक कल्पना के दर्शन हुए।
साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी कृष्ण कुमार यादव ने बतौर मुख्य अतिथि संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि दिनकरजी हिन्दी के उत्तर छायावादी कवियों में पहले ऐसे कवि हैं जिनकी काव्यभाषा सहजता व संप्रेषणीयता होने के कारण लोगों की जुबान पर खूब चढ़ीं। दिनकरजी की कविताओं में अगर राष्ट्र का स्वाभिमान था तो गरीब जनता का हाहाकार भी शामिल था। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में दिनकरजी की कविताओं के सम्बन्ध में कृष्ण कुमार यादव ने कहा कि दिनकरजी की कवितायें आज भी नव-औपनिवेशिक शक्तियों के विरोध में वैचारिक प्रतिरोध की व्यापक भावभूमि तैयार करती हैं। युवा कवयत्री एवं लेखिका आकांक्षा यादव ने कहा कि दिनकरजी का गद्य और पद्य पर समान रूप से अधिकार था। यही कारण है कि उनकी गद्य रचना ‘संस्कृति के चार अध्याय‘ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ तो उनकी चर्चित पद्य कृति ’उर्वशी’ हेतु भारतीय साहित्य का सर्वोच्च ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त हुआ।
डा जेएस चैहार ने दिनकरजी की रचनाओं में सहजता को व्याख्यायित करते हुए उन्हें क्रान्ति का उद्घोषक कवि कहा, जो बाद में गाँधीवाद के दर्शन से प्रभावित हुए। मेधाश्रम संस्था के सचिव अनुराग ने संगोष्ठी का समापन करते हुए कहा कि दिनकरजी को हिन्दी के तथाकथित आधुनिक आलोचकों की मार भी झेलनी पड़ी, पर पाठकों और हिन्दी के शुभेच्छुओं के बीच उन्हें बेहद सम्मान और गौरव प्राप्त है। इसी कारण उन्हें इतिहास बदलने वाला कवि भी कहा जाता है। इस अवसर पर अपनी क्रान्तिकारी कविताओं से लोकप्रियता हासिल करने वाले राष्ट्रकवि दिनकर के तैल चित्र का संसद के केन्द्रीय कक्ष में अनावरण होने पर प्रसन्नता जाहिर की गयी। संगोष्ठी का संचालन मेधाश्रम के सचिव अनुराग ने और धन्यवाद ज्ञापन विजय नारायण तिवारी ‘मुकुल‘ ने किया। इस अवसर पर सत्यकाम पहारिया, डा विवेक सिंह, अंजू जैन, एमएस यादव, डा विद्याभाष्कर बाजपेयी सहित तमाम साहित्यकार, पत्रकार व बुद्धिजीवी उपस्थित थे।

चांदपुर में कुर्रतुल एन हैदर पर सेमिनार
चांदपुर, बिजनौर, उप्र। उर्दू की विख्‍यात और महान लेखिका, ज्ञानपीठ से सम्‍मानित एवं बिजनौर जनपद की गौरव, पद्मश्री कुर्रतुल एन हैदर पर एक राष्‍ट्रीय सेमिनार, रहमानिया गर्ल्स इंटर कालेज, चांदपुर में आयोजित हुआ, जिसमें देश भर से अंतरराष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त प्रोफेसर, डाक्‍टर्स एवं पी-एचडी स्‍कालर्स ने कुर्रतल एन हैदर व उनके साहित्‍य पर मकालात प्रस्‍तुत किये और उनसे जुड़े संस्‍मरण सुनाकर उन्‍हें याद किया। अपना खिराज ए अकीदत पेश किया।
कौमी कौन्‍सिल बराय फरोग उर्दू ज़बान, नई दिल्‍ली के सहयोग से नगर की प्रतिष्‍ठित सामाजिक, शैक्षिक, सांस्‍कृतिक संस्‍था मंडलीय विकास संस्‍थान के संयोजन में कुर्रतुल एन हैदर की उर्दू अफसाने को देन विषय पर राष्‍ट्रीय सेमिनार का दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के प्रोफेसर डा खालिद अलवी ने उद्घाटन किया। सेमिनार की अध्‍यक्षता रुहेलखण्‍ड विश्‍वविद्यालय की प्रोफेसर डा लुबना हामिद, अब्‍बासी गर्ल्स डिग्री कालेज, अमरोहा की प्रिसिंपल नायाब ने की एवं संचालन संस्‍था के सचिव इलियास अंजुम ने किया।
सेमिनार में नई दिल्‍ली से सुश्री वसीम राशिद, सिराज अंसारी-मुंबई, प्रोफेसर डा अब्‍दुल हक अंजुम रुहेलखण्‍ड विश्‍वविद्यालय, डा अफशां मलिक अलीगढ़ उर्दू की विख्‍यात अफसाना निगार सुश्री कमर कदीर इरम, डा अफसर अली मुरादाबाद मौ अहमद दानिश, सुश्री शबनम राही, जाकिर फैजी, मौ रिजवान अंसारी जबलपुर, कीर्ति वर्मा, शकील जमाली, सुभाष जावा आदि ने कुर्रतुल एन हैदर को उर्दू भाषा ही नहीं बल्‍कि तमाम हिंदुस्‍तानी भाषाओं की सर्वश्रेष्‍ठ साहित्‍यकार व गंगा जमनी तहजीब का अलम्‍बरदार बताया।
डा खालिद अलवी ने अपने शोध पत्र में कहा कि कुर्रतुल एन हैदर की अदबी जिंदगी का आगाज अफसाना निगारी से हुआ, फिर वे नाविलनिगारी की तरफ आयीं और आग का दरिया जैसा लाजवाब नाविल लिखा, जिसे बिलासुबा उर्दू का सबसे बड़ा नाविल कहा जा सकता है, जिसमें हिंदुस्‍तान की ढाई हजार साल की तहजीबी तारीख अपने मुज्‍बत और मन्‍फी पहलुओं के साथ इस तरह सिमट आयी हैकि उसके तमाम महर्रिकात और मुजम्‍मिरात रोशन हो गये हैं। तारीख और तहजीब, इंसान और उसके माहौल के नये-पुराने रिश्‍तों की जिस तरह वजाहत और वकालत करते हैं वो अपनी मिसाल आप हैं। प्रोफेसर डा लुबना हामिद ने अपने शोध पत्र में कहा कि कुर्रतुल एन हैदर आज हमारे दरमियान नहीं है उनकी वाबिकार शख्‍सियत पूरे मौजूदा अदबी मंजरनामे पर इस तरह हावी थी, के अब वो नहीं है तो ये मंजर अधूरा-अधूरा सा लगता है।
सेमिनार के संयोजक इलियास अंजुम ने कुर्रतुल एन हैदर को बिजनौर का गौरव बताते हुए कहा कि सत्रहवीं सदी के विख्‍यात शायर कायम चांदपुरी, जिनको कि हजरत गालिब ने भी अपना उस्‍ताद माना था, के बाद, कुर्रतुल एन हैदर, उर्दू साहित्‍य में ही नहीं बल्‍कि दुनिया के किसी भी हिस्‍से में बोली जाने वाली भाषाओं के साहित्‍य में हिमालय पर्वत जैसी महान और सूरज जैसी चमकती रहेगी।
सेमिनार के दूसरे सत्र की अध्‍यक्षता चांदपुर नगर की पूर्व अध्‍यक्ष शादाब अंजुम ने की और संचालन डा अब्‍दुल हक अंजुम ने किया। उन्‍होंने कहा कि कुर्रतुल एन हैदर के अफसाने, सितारों से आगे, शीशे घर, पतझड़ की आवाज, रोशनी की रफ्तार आदि विश्‍वविख्‍यात नाविलों में सीता हरण, आग का दरिया, दिलरूबा, मेरे भी सनम खाने, अगले जनम मोहे बिटिया न दीजो, आखिरी शब के हमसफर, कारे जहां दरारज है, चांदनी बैगम जैसे नाविल लिखकर उर्दू अदब को माला माल किया है। कुर्रतुल एन हैदर के दयारे हयात ने अपना रुख जरूर मोड़ लिया है लेकिन उसके लाये हुए लाल ओ गौहर की रौशनी हमारे दिलो दिमाग और हमारे दिलों को मुद्दतों तक आबाद करती रहेगी।
कार्यक्रम में हाजी नसीमुद्दीन, डा अली कुरैशी, डा मुनीर खालिद, सैयद वजीर हैदर जैदी, शाहिद हसन, तनवीर अहमद, जुबैर कासिम, अतीक अहमद, इमरान अहमद सहित बड़ी संख्‍या में गणमान्‍य व्‍यक्‍ति मौजूद थे।

 

देवनागरी लिपि के अव्यवस्थित की-बोर्ड

  • जगदीश्वर जौहरी

संसार की सर्वोत्कृष्ट, सुव्यवस्थित और सुनियोजित लिपि देवनागरी मानी जाती है। उसकी ध्वन्यात्मक वैज्ञानिकता असंदिग्ध है। पर यन्त्रों में उसके इन गुणों की झलक नहीं मिलती। अपार क्षमतावाले कम्प्यूटर में भी देवनागरी सहज, सरल और त्वरित गतिशील नहीं है। आज के यान्त्रिक युग में यह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है। कम्प्यूटर के लिए तो देवनागरी की-बोर्ड आदर्श होना चाहिए किन्तु यहाँ भी अक्षरों का स्थान असंगत, बेतरतीब, शि़फ्ट का अत्यधिक इस्तेमाल, इतना कि शायद ही कोई शब्द बिना शि़फ्ट के बन सके; कई वर्णों, मात्राओं को टुकड़ों में कई कुञ्जियों से पूरा करना; पंक्चुएशन चिह्न—यहाँ तक कि पूर्ण विराम तक का अभाव, विशेषताएँ हैं।
कम्प्यूटर के दो तरह के कुञ्जी-पटल आमतौर पर प्रचलित हैं। एक तो टाइपराइटर वाला की-बोर्ड है। इसमें महाप्राण व्यञ्जन—ख, घ, ण, थ, ध, भ, श, ष और क्ष केवल अर्धाक्षर रूप में हैं जिन्हें मात्राएँ लगाने से पूर्व पहले अकार की विशेष मात्रा से पूरा बनाना पड़ता है। कुञ्जियों में ऊपर और नीचे के अक्षरों-मात्राओं में घोर अनियमितता है; असम्बद्ध अक्षर अव्यवस्थित ढंग से ठूँस दिये गए हैं—ट/अ, ठ/इ, ड/उ, छ/द, ढ/ए, झ/, थ/, ज्ञ/, भ् / आदि। सहज कल्पना की जा सकती है कि ऐसी दुरवस्था में त्रुटिहीन यन्त्र सञ्चालन (टंकन, मुद्रण) कितना धीमा और कठिन होगा।
दूसरा की-बोर्ड शुषा नाम से उपलब्ध है, जो रोमन आधारित है; अर्थात् अंग्रेजी अक्षरों की निर्धारित कुञ्जियों में ध्वन्यात्मक रूप से समतुल्य देवनागरी अक्षर बिठाने का प्रयास किया गया है, यथा aA, bB, cC आदि के स्थान पर अ/, ब/भ, च/छ आदि। स्पष्ट है कि यह ऐडजस्टमेंट आंशिक ही हो सकता है अतएव अनेक अक्षरों का सामञ्जस्य नहीं बन पाया है। इसमें ‘पाई’ वाले सभी अक्षर अर्धाक्षर रूप में हैं और अल्पप्राण व्यञ्जनों के साथ उनके महाप्राण सहरूप अधिकांशतः उसी कुञ्जी में रखे गये हैं। फलस्वरूप कुञ्जी सञ्चालन और शि़फ्ट-की के इस्तेमाल का परिमाण और भी अधिक बढ़ गया है। पंक्चुएशन चिह्न भी चार अंकों के विशेष कोडों से कण्ट्रोल-की द्वारा उपलब्ध होते हैं।
देवनागरी की-बोर्डों में सहज, सरल, गतिशील सञ्चालन (टंकन, मुद्रण) के लिए, लिपि के वैज्ञानिक गुणों के अनुरूप, निम्नलिखित बातें होनी चाहिए—
(1) एक कुञ्जी में एक ही अक्षर रूप हो और यदि दो हों तो वे वार्णिक दृष्टि से परस्पर सम्बन्धित हों। (2) एक व्यञ्जनाक्षर पूर्ण रूप से (अकार सहित) एक ही कुञ्जी से प्राप्त हो—टुकड़े जोड़कर नहीं। (अधोबिन्दु वाले ड़, ढ़, ज़, फ को छोड़ कर)। (3) अर्धाक्षर प्राप्त करने की एक ही विधि हो (र का रेफ अपवाद रहेगा)। (4) स्वराक्षर और उनकी मात्रा एक ही कुञ्जी में हो। (5) बारह खड़ी की कोई भी स्वर-मात्रा एक ही कुञ्जी से पूरे रूप में प्राप्त हो, दो मात्राएँ जोड़ कर नहीं। आगत-निर्गत स्वर ऑ, हस्व ऍं, ऑ की मात्राएँ क्रमशः आ, ए, ओ की मात्राओं में अर्धचन्द्र जोड़ कर बना ली जाएँ। (6) सम्पूर्ण वर्णमाला उपलब्ध हो, और (7) पंक्चुएशन चिह्न सीधे ही प्राप्त हों।
प्रस्तुत लेख में ऐसे ही एक सम्भावित की-बोर्ड का प्रारूप प्रस्तुत है। इसमें अर्धाक्षर बनाने के लिए हॉ़फ लेटर, हॉ़फ शि़फ्ट के प्रावधान को समावेश करने का सुझाव है। शि़फ्ट-की की दो कुञ्जियों में से दाहिनी ओर की कुञ्जी को हॉ़फ-शि़फ्ट-की में बदला जा सकता है। इसी तरह संयुक्ताक्षर बनाने वाले सभी व्यञ्जनाक्षरों को प्रारूप में केवल लोअर शि़फ्ट में ही रखा गया है। हॉ़फ-शि़फ्ट-की दबाने से ये अक्षर आधे हो जायेंगे वरना पूरे आयेंगे। यह तीसरी शि़फ्ट के विकल्प जैसा होगा।
ज़ाहिर है कि सरलता, सहजता और गतिशीलता के अलावा इसमें अन्य विशेषताएँ भी होंगी। (1) आँकड़ों का समस्त फ‌िगर वर्क एक ही (अपर) शि़फ्ट पर कैप लॉक द्वारा हो सकेगा। (2) संस्कृत जन्य अन्यान्य भाषाओं की लिपियों के लिए इसे मामूली फेरबदल से अपनाया जा सकेगा। (3) जेबी (मोबाइल) तथा मैन्युअल यन्त्रों के लिए भी इसे सरलता से परिवर्धित किया जा सकेगा।
(2) प्रसंगवश, यदि इकार की मात्रा को दक्षिणांगी किया जा सके तो अनेक वर्तमान तथा भावी समस्याओं से निजात मिल सकेगी। इस मात्रा चिह्न से खड़ी पाई हटा देने मात्र से यह मात्रा बिना किसी भ्रम या विकार के वामांगी से दक्षिणांगी हो जायेगी। इसका प्रभाव दूरगामी होगा। सभी स्वर-मात्राओं की संयोजन-विधि एक समान हो जायेगी। तब की-बोर्ड में केवल अर्धाक्षर रूप ही पर्याप्त होंगे और कम्प्यूटर की मेमोरी व्यवस्था से पाई सहित उपयुक्त स्वर-मात्रा स्वतः ही लग जायेगी और ‘हॉ़फ-शि़फ्ट’ की भी आवश्यकता न रहेगी। प्रस्तावित की-बोर्ड से यह भी सम्भव हो सकेगा। ध्यातव्य है कि इ की मात्रा भी आजकल दो प्रकार की चल पड़ी है, एकाक्षर के लिए छोटी और संयुक्ताक्षर के लिए लम्बी यथा—थिर, स्थिर। उधर भारत सरकार का केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय हल चिह्न से बनने वाले संयुक्ताक्षरों में यह मात्रा दो अक्षरों के बीच में डलवा कर स्कूली पाठ्य पुस्तकें छपवाने पर ज़ोर दे रहा है, यथा द्वितीय, बुद्धिमान, पद्मिनी, चिह्नित आदि जिससे अब विस्मित, लज्जित, सम्मिलित आदि भी दिखने लगे हैं। इस मात्रा को अक्षर के बाद लगाने से अनेक समस्याओं का निराकरण हो जायगा। इसे वैकल्पिक रूप में स्वीकारा जा सकता है।
(3) एक बात और। अभी तक अन्तर्राष्ट्रीय अंकों का जो रूप देवनागरी की-बोर्डों में रखा जा रहा है—समान, लम्बे आकार का (1234567890) वह देवनागरी अक्षरों की प्रकृति के अनुकूल नहीं है। अन्तर्राष्ट्रीय अंकों का ही एक फॉण्ट और होता है जिसमें अंकों की आकृति गोलाकार और असमान लम्बाई के होते हैं (1234567890) जो देवनागरी अंकों (1234567890) के अधिक अनुरूप हैं। हमको अंकों के लिए इसी फॉण्ट को अपनाना चाहिए क्योंकि ये फिर भी देवनागरी अक्षरों से उतने बेमेल नहीं हैं।
 

राष्ट्रभाषा हिन्दी को अंग्रेजी विधा में न लिखें

  • गगनेंद्र कुमार केडिया

हर भाषा की अपनी विधा होती है। हिंदी के लेखकों का दायित्व है कि हिंदी में लिखते समय हिन्दी भाषा की विधा का अनुकरण करें, न कि अंग्रेजी भाषा की विधा का जो हिन्दी को अंग्रेजी में लिखने के समतुल्य है। एक शाब्दिक उदाहरण लें। हिन्दी में जिसे हम ‘मुसलमान’ बोलते हैं, अंग्रेजी में उसे ‘मुस्लिम’। पर हिन्दी के लेखक धड़ल्ले से ‘हिन्दू-मुस्लिम’ लिखते हैं, ‘हिन्दू-मुसलमान’ बहुत ही कम लिखते हैं। अंग्रेजी का ज्ञान हमारे लिए अनिवार्य है, क्योंकि विदेशों के साथ हमारा सम्पर्क-सूत्र अंग्रेजी ही है। योरोप के देशों की भाषा अंग्रेजी नहीं है। फ्रांस की फ्रेंच है, जर्मनी की जर्मन है, इटली की इटैलियन है। पर इन देशों से भी हमारा सम्पर्क अंग्रेजी भाषा के ही माध्यम से ही होता है, वहाँ के निवासी अंग्रेजी समझ लेते हैं।
उच्च शिक्षा के पाठ्यग्रन्थ, चाहे सामान्य हों या तकनीकी, अंग्रेजी में ही उपलब्ध हैं। ‘आक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी’ में 100 के लगभग हिन्दी के शब्द समाहित हो चुके हैं। इनमें ब्राह्मन्, बनिया, संन्यासी, योगी, होली, ब्रह्मा, बाजार, घी, चटनी जैसे शब्द सम्मिलित हैं। ‘टाइम्स आफ इंडिया’ जैसे अंग्रेजी के सर्वश्रेष्ठ समाचारपत्र में न केवल समाचारों में, वरन् सम्पादकीय तक में हिन्दी के शब्दों का प्रयोग होने लगा है। समाचारों में, बिना अंग्रेजी अनुवाद के, हिन्दी के पूरे वाक्य तक रोमन लिपि में लिखे जाने लगे हैं। कारण यह है कि हर भाषा में अनेक ऐसे शब्द होते हैं जिनकी सही अभिव्यक्ति दूसरी भाषा में अनूदित शब्द से नहीं हो सकती। ‘जिजीविषा’ (जीने की इच्छा) के लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है। आपको लिखना पड़ेगा ‘दि डिजायर टू लिव’। अंग्रेजी के रेलगाड़ी से सम्बन्धित ‘सिग्नल’ शब्द के लिए हिन्दी में कोई सटीक शब्द नहीं है। ट्रेन के लिए ‘रेलगाड़ी’ और ‘रेलवे’ के लिए ‘रेलमार्ग’ शब्दों का प्रयोग ठीक है। पर ‘सिग्नल’ के लिए हम ‘सिग्नल’ शब्द का ही प्रयोग करते हैं।
किसी भी भाषा की समृद्धि के लिए दूसरी प्रादेशिक एवं विदेशी भाषाओं के शब्दों को अपनाना कोई वर्जित नहीं है। क्रिकेट में क्षेत्ररक्षण के नियत स्थानों जैसे, ‘स्लिप, थर्डमैन, स्क्वायरलेग’ आदि का अनुवाद नहीं हो सकता, कर देंगे तो बड़ा अटपटा लगेगा। क्या ‘स्लिप’ के लिए ‘फिसलना’ या ‘चूकना’ लिखेंगे? इससे कुछ समझ में आएगा? इन शब्दों को हमें अपनी हिन्दी भाषा में सम्मिलित करना ही पड़ेगा। अंग्रेजी भाषा से, एक बहुप्रचलित अंतर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में, मेरा कोई विरोध नहीं है, न उसके आवश्यक शब्दों के हिन्दी में समावेश से ही। मेरा विरोध हिन्दी भाषा की विधा को छोड़कर, अनावश्यक एवं अस्वीकार्य रूप में उसे अंग्रेजी की विधा में लिखने से है। अंग्रेजी के व्यामोह में हम अपनी विधा को भूलकर, हिन्दी को अंग्रेजी की विधा में लिखने लगे हैं। यही नहीं, हिन्दी को अंग्रेजी के माध्यम से सिखाने के प्रयास भी हो रहे हैं। कुछ उदाहरण पढि़ए।
अंग्रेजी विधा में ‘गोइंग टू’ का प्रयोग होता है। इसका भूत इस कदर हिन्दीवालों पर सवार हुआ है कि क्या कहूँ। किसी गोष्ठी के आरम्भ की घोषणा करते हुए, उद्घोषक सामान्यतया कहता है ‘अब हम गोष्ठी का प्रारम्भ करने जा रहे हैं।’अरे भाई गोष्ठी का प्रारम्भ जहाँ बैठे हैं, वहीं होगा, कहीं जा नहीं रहे हैं। यह जा रहे हैं अंग्रेजी विधा है—‘वी आर गोइंग टू स्टार्ट द मीटिंग।’ सीधे-सीधे बोलिए ‘अब हम गोष्ठी का आरम्भ कर रहे हैं।’ अब मान्यवर ग्रन्थ का विमोचन करने जा रहे हैं।’ मान्यवर कहीं जा नहीं रहे हैं, जहाँ बैठे हैं वहीं विमोचन करेंगे। बोलना चाहिए ‘अब मान्यवर ग्रन्थ का विमोचन कर रहे हैं या करेंगे।’ ‘एक नया नाम जुड़ने जा रहा है।’ होगा ‘एक नया नाम जुड़ने वाला है।’ ‘हड़ताल पर जा रहे हैं।’ होना चाहिए ‘हड़ताल पर जाने वाले हैं।’ पता नहीं अंग्रेजी का ‘गोइंग टू’ हिन्दी में इतने जोर-शोर से क्यों चल पड़ा। एक वाक्य प्रकाशित हुआ है ‘जहाज का कप्तान भाग लिया।’ यह भाग लिया कहाँ से आया? अंग्रेजी में लिखेंगे ‘कैप्टेन आफ दी शिप टुक आफ।’ टुक अर्थात् लिया। हमें लिखना चाहिए भाग गया।
एक और उदाहरण देखें। हिन्दी में ‘अमेरिका’, ‘चीन’ और ‘यूरोप’ से ‘अमेरिकी’, ‘चीनी’ और ‘यूरोपी’ बनेगा। पर हम हिन्दी में भी अंग्रेजी शब्द ‘अमेरिकन’ ‘चाइनीज’ और ‘यूरोपियन’ का प्रयोग करने के आदी हैं। अंग्रेजी का ज्ञान न होते हुए भी हम उससे मोहग्रस्त हैं। हिन्दी फिल्मों का एक गाना है ‘गाना आये या ना आये, गाना चाहिए।’ वही बात अंग्रेजी के मोह की भी है—अंग्रेजी आये या न आये, बोलनी चाहिए। मुझे बड़ी हँसी आती है जब कार के चालक, मिस्त्री और मालिक तक ‘रैडिएटर’ को ‘रेडीवाटर’ बोलते हैं। इससे तो सीधे-सीधे ‘पानी की टंकी’ बोलते। एक अन्य बड़ा रोचक उदाहरण है, एक गहने की दुकान पर नामपट्ट लगा है ‘एक्टिव आर्नामेन्ट्स’। ऐक्टिव का अर्थ हुआ सक्रिय। यह भूल से अट्रैक्टिव (आकर्षक) के स्थान पर लिखा गया है। इससे तो अच्छा होता ‘एक्टिव आर्मामेन्ट्स’ (सक्रिय हथियार) लिख देते। कुछ अर्थ तो निकलता।
 

रोमन बनाम नागरी

नागरी लिपि विश्व की सबसे वैज्ञानिक लिपि है जिसमें हिन्दी लिखी जाती है और अंग्रेजी रोमन लिपि में। इसकी वर्णमाला सबसे बड़ी है। जहाँ रोमन लिपि में केवल पाँच स्वर (वावेल) हैं, नागरी में तेरह हैं। व्यंजन भी जहाँ अंग्रेजी में केवल 21 हैं, नागरी में 31। नागरी में हम जो लिखते हैं, वही पढ़ते हैं। रोमन में ऐसा नहीं है। एक ही अक्षर का अलग-अलग शब्दों में भिन्न-भिन्न उच्चारण होता है। ‘‘सी यू टी - कट’’ में ‘सी’ का उच्चारण ‘क’ है, ‘‘सी ए एल एल - काल’’ में ‘का’ है, ‘‘सी ए टी - कैट’’ में ‘कै’ है, ‘‘सी आइ जी ए आर - सिगार’’ में ‘सि’ है। नागरी में अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः ऋ इतने स्वर हैं। हमें एक ही ध्वनि का अलग-अलग स्वरों के लिए प्रयोग नहीं करना पड़ता। अंग्रेजी में ‘अ’ के लिए ‘ए’, ‘आ’ के लिए ‘ए ए’, ‘इ’ के लिए ‘आइ’, ‘ई’ के लिए ‘ई ई’, ‘उ’ के लिए ‘यू’, ‘ऊ’ के लिए ‘ओ ओ’, ‘ए’ के लिए ‘इ’, ‘ऐ’ के लिए ‘ए आइ’, ‘ओ’ के लिए ‘ओ’, ‘औ’ के लिए ‘ओ यू’, ‘अं’ के लिए ‘यू एन’, ‘अः’ के लिए ‘ए एच’, व ‘ऋ’ के लिए ‘आर आई’ लिखना पड़ेगा। फिर भी कइयों का सटीक उच्चारण नहीं होगा। ‘श’ के लिए टेन्शन में ‘एस’ का प्रयोग है—टी इ एन एस आइ ओ एन। पर ‘अटेन्शन’ की वर्तनी में ‘एस’ नदारद है—ए टी टी इ एन टी आइ ओ एन। इसमें एस की जगह ‘‘टी आइ ओ’’ का उच्चारण ‘श’ है।
हिन्दी पर अंग्रेजी के हावी होने का एतत्सम्बन्धी एक और नमूना देखें। मैंने अन्यत्र लिखा है कि अ और आ स्वरों के लिए, अंग्रेजी में एक ही वावेल है ए। अतः अ के लिए ए और आ के लिए ए ए का प्रयोग होना चाहिए। पर ऐसा होता नहीं। राम, कृष्ण, बुद्ध, योग आदि को रोमन में लिखने पर शब्द के अन्त में ए आता है। अंग्रेजी बोलनेवालों ने, विशेष रूप से विदेशों में, इसका उच्चारण रामा, कृष्णा, बुद्धा और योगा कर दिया। देखादेखी हम हिन्दीवाले भी इनका अनुकरण करने लगे। यह अत्यन्त दुःखद है कि हिन्दीवाले रामा, कृष्णा, बुद्धा और योगा बोलने लगे हैं। काशी में जेसी के एक अध्याय ने तो अपना नाम ही ‘शिवा जेसी’ रख दिया। भूतपूर्व राज्यपाल स्व० विष्णुकान्त शास्त्री ने इस पर उन्हें लताड़ भी लगाई थी। शिव जो पुल्लिंग है उसे शिवा स्त्रीलिंग कर दिया, वह भी काशी में जो हिन्दी के दिग्गज विद्वानों की नगरी है।
‘सी एच’ का उच्चारण ‘‘सी एच इ एम आइ सी ए एल’’ - ‘केमिकल’ में क होगा, ‘‘सी एच यू सी के’’ - ‘चक’ में च होगा, ‘‘सी एच ए एफ इ’’ - शेफ में श होगा, ‘‘सी इ आर टी’’ सर्ट में स होगा। एक ही संयुक्ताक्षर के अलग-अलग उच्चारण हैं, नागरी में ऐसा नहीं है। कितने शब्दों की वर्तनी ऐसी है जिसमें कुछ अक्षरों का उच्चारण ही नहीं होता, वे व्यर्थ लिखे जाते हैं, जैसे ‘‘एफ ओ आर ई आई जी एन’’ - फारेन में ‘आई जी’ का उच्चारण ही नहीं होता। ‘‘एन यू टी सी एच - नाच’’ में ‘यू टी’ का उच्चारण नहीं होता। ‘च’ के लिए ‘सी एच’ का प्रयोग होता है, जैसे ‘सी एच ए टी - चैट’ में। पर ‘सी एच ओ आर डी’ ‘कोर्ड’ में इसका उच्चारण ‘को’ हो जाता है।
रोमन की वर्णमाला में ‘क्ष’, ‘त्र’ और ‘ज्ञ’ अक्षर है ही नहीं। इसी कारण अंग्रेज ‘ज्ञ’ का सही उच्चारण नहीं कर पाते थे। वे ‘ज्ञान’ को ‘ज्नान’ बोलते थे और वर्तनी थी ‘‘जे एन ए एन ए’’। ज्ञानमंडल यंत्रालय ने सीधे-सीधे ‘‘जी वाइ ए एन’’ न लिखकर अंग्रेजियत वाली वर्तनी अपनाई थी। मजाक में लोग उसे ‘जनानामंडल’ कहते थे। काशी की सुप्रतिष्ठित संस्था ‘ज्ञानप्रवाह’ ने भी अंग्रेजियत वाली वर्तनी अपनाई है।

 

हिन्दी चलचित्र
हिन्दी चलचित्र और दूरदर्शन ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और निभा रहे हैं। पर हिन्दी चलचित्रों में दो नई अंग्रेजियत वाली प्रवृत्तियाँ चली हैं। पहले तो हिन्दी नाम के साथ अंग्रेजी में उसका अर्थ लिखना आरम्भ हुआ है। उदाहरण पढ़ें—
‘रिश्ता—ए बांड आफ लव’, ‘खामोश—दि साइलेन्ट’, ‘मित्र—माई फ्रैन्ड’, ‘बेवफा—दी अनफेथफुल’, ‘मोड़—दि टर्निंग प्वाइंट’, ‘इन्साफ—दी जस्टिस’, ‘मुद्दा—दि इस्यू’, ‘गर्व—प्राइड ऐंड आनर’, ‘अनजाने—दि अननोन’।
क्या हमें हिन्दी चलचित्र वाले हिन्दी को अंग्रेजी में पढ़ा रहे हैं? क्या हिन्दी के दर्शकों को हिन्दी नहीं, अंग्रेजी समझ में आती है? या हिन्दी के स्थान पर अंग्रेजी के जानकारों को हिन्दी चलचित्र देखने के लिए आकृष्ट करने की यह चेष्टा है? दूसरी प्रवृत्ति तो और भी भीषण है। पूरा नाम ही अंग्रेजी में लिखा जा रहा है। उदाहरण देखें—कैश, हनीमून, राक डांसर, दि पार्टी, हनीमून ट्रैवेल्स प्राइवेट लिमिटेड, मिस्टर हाट मिस्टर कूल, दी रीबेल, रिस्क, बैड ब्वायज गुड ब्वायज, जस्ट मैरिड, हुक ऐंड क्रुक आदि। क्या हिन्दी चलचित्र के दर्शकों को अंग्रेजी नामों से आकर्षित करना पड़ेगा? अंग्रेजी न जाननेवाले दर्शक इनका अर्थ कैसे समझेंगे और कैसे चयन करेंगे?
स्वतन्त्रता के 61 वर्षों बाद भी हिन्दी चलचित्रों एवं दूरदर्शन के धारावाहिकों की नामावली अंग्रेजी में दिखाई जा रही है। विदेशी भाषाओं की बात छोड़ भी दें तो भारत में ही प्रादेशिक भाषाओं के चलचित्रों एवं दूरदर्शन के धारावाहिकों की नामावली भी प्रादेशिक भाषाओं में ही दिखाई जाती है, यथा बंगला, मलयालम, तेलगू आदि। यदा-कदा ही कोई निर्देशक हिन्दी में नामावली दिखाते हैं। वी शांताराम इनमें से एक थे। क्या हिंदी चलचित्रों के निर्माता-निर्देशक यह नहीं समझते कि इन्हें देखने वाले शत-प्रतिशत दर्शक हिन्दी अवश्य जानते हैं। परन्तु इसके विपरीत संभ्रान्त-शिक्षित वर्ग को छोड़कर, बहुसंख्य दर्शक अंग्रेजी नहीं जानते। उन्हें चलचित्र में भाग लेने वाले कलाकारों एवं प्रविधिज्ञों तकनीशियनों) का ज्ञान कैसे होगा?

 

उड़ीसा नहीं ओडि़शा

हिन्दी में प्रचलित ‘उड़ीसा और उडि़या’ गलत प्रयोग है। हिन्दी में इसे संशोधित करने की ज़रूरत है क्योंकि ‘उड़ीसा’ में ‘उडि़या’ भाषा में ‘ओडि़शा’ और ‘ओडि़या’ ही शुद्ध रूप है। अब तो ओडि़शा विधानसभा ने भी तदाशय का प्रस्ताव पारित कर केन्द्र को भेज दिया है। असल में यह आन्दोलन ओडि़या दैनिक ‘संवाद’ ने ORISSA के स्थान पर ODISHA के लिए आरम्भ किया था। बरसों पूर्व,मैंने स्वयं ओडि़शा के एकमात्र हिन्दी दैनिक ‘उत्कलमेल’ के कार्यकारी सम्पादक के पद पर रहते हुए पाँच वर्ष पूर्व ही अपनी भूल को सुधार लिया था। हिन्दी के विद्वत्जनों से प्रार्थना है कि कृपया वे अपने लेखन में ‘उड़ीसा’ और ‘उडि़या’ के स्थान पर ‘ओडि़शा’ और ‘ओडि़या’ का ही प्रयोग करें। यही शुद्ध रूप और शुद्ध प्रयोग है। —सुशील दाहिमा ‘अभय’, राउरकेला


अत्र-तत्र-सर्वत्र

‘ज्ञानप्रवाह’ में काशी

वाराणसी। सांस्कृतिक अध्ययन एवं शोध केन्द्र ‘ज्ञानप्रवाह’ के कलामंडप का कायाकल्प काशी दर्शन के रूप में हो गया है। इसके ‘काशी कक्ष’ में कला, साहित्य, संस्कार, धरोहर को इस तरह से व्यवस्थित किया गया है कि यदि काशी के रंग में रंगना हो तो बस कक्ष का अवलोकन कर लें। संस्था के नवसत्रारंभ के अवसर पर तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार ‘काशी की कला एवं पुरातत्त्व’ पर होगा।

यूपी में ग्रामीण विश्वविद्यालय
इलाहाबाद। केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने इलाहाबाद को एक बड़ा तोहफा दिया है। यूपी का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय गंगापार में खुलने की अनुमति मिल गई है। इसका नाम नेहरू ग्राम भारती विश्वविद्यालय होगा। सन 1962 में इसकी आधारशिला जवाहरलाल नेहरू ने ही रखी थी। इसको मूर्त रूप में आने में पूरे 46 वर्ष लग गए। इस सम्बन्ध में 27 जून को अधिसूचना जारी हो गयी है। जेएन मिश्र इस विश्वविद्यालय के चांसलर बनाए गए हैं।

नौ दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय रामलीला मेला

भोपाल। मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग ने यहां नौ दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय रामलीला मेले का आयोजन किया। विश्व में रामकथा पर केन्द्रित इस समारोह का शुभारम्भ पूर्व केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह ने किया। नौ दिन चले इस समारोह में कंबोडिया के क्लासिकल गु्रप ऑफ कंबोडिया, बाली के आईएसआई डेपनसर ग्रुप, श्रीलंका के अरुषी आर्ट थिएटर, सिंगापुर की भास्कर आर्ट अकादमी, जावा का जोगिया टूरिज्म बोर्ड ग्रुप, लाओस का रायल बेले थिएटर ग्रुप, केरल का मधु मार्गी ग्रुप और अयोध्या की अवध आदर्श रामलीला मंडली की रामलीलाओं का मंचन उल्लेखनीय रहा। इसके अलावा भारतीय लघुचित्र शैलियों में रामकथा चित्रांकन पर केन्द्रित प्रदर्शनी और विश्व में रामकथा के विभिन्न आयामों पर केन्द्रित परिसंवाद का भी आयोजन किया गया। मुल्ला रमूजी संस्कृति भवन में आयोजित विमर्श सत्र में इंद्रनाथ चौधरी, रमेशचंद्र शाह, रामभद्राचार्य, कपिला वात्स्यायन, आचार्य राममूर्ति त्रिपाठी, राधावल्लभ त्रिपाठी, वागीश शुक्ल और मंदाकिनी रामकिंकर ने सहभागिता की।

गाँधीजी के भाषण की दुर्लभ रिकॉर्डिंग
वाशिंगटन। महात्मा गांधी के एक ऐतिहासिक भाषण की दुर्लभ रिकार्डिंग वाशिंगटन में मिली है। यह भाषण अंग्रेजी में है और इसे उनकी हत्या से कुछ महीने पहले रिकार्ड किया गया था। गांधीजी की मातृभाषा गुजराती थी, पर वह हिन्दी में भाषण करते थे। उन्होंने सिर्फ दो मौकों पर अंग्रेजी में भाषण किया।
यह अंग्रेजी में गांधीजी के दो दुर्लभ भाषणों में से एक है। इस टेप को नेशनल प्रेस क्लब के पूर्व प्रमुख जान कोसग्रोव ने 60 वर्षों तक संभाले रखा। उन्हें बापू के इस भाषण की ऐतिहासिक महत्ता तब समझ में आई, जब इत्तेफाक से उनकी मुलाकात गांधीजी के पौत्र एवं उनके जीवनीकार राजमोहन गांधी से हुई। अल्फ्रेड वाग नामक पत्रकार ने दिल्ली में 2 अप्रैल, 1947 को गाँधीजी का भाषण रिकार्ड किया था। यह रिकार्डिंग उसी भाषण की है।
गांधीजी ने यह भाषण जवाहरलाल नेहरू द्वारा आयोजित एशियाई नेताओं के सम्मेलन में दिया था। गाँधीजी इस टेप में दर्ज भाषण में कह रहे हैं, ‘‘मैं आपको पूरब या फिर कहें एशिया का सन्देश देना चाहता हूँ। हमें पश्चिम के तनाव का अनुकरण नहीं करना है। हम पश्चिमी दुनिया की बारूद, बम और गोले की नीति का अनुकरण न करें। अगर आप पश्चिम को कोई सन्देश देना चाहते हैं तो यह सन्देश प्यार का ही हो सकता है।’’

तो क्या तुलसीदास अविवाहित थे?
आजमगढ़ (उप्र)। महाकवि तुलसीदास के विवाह पर नया विवाद खड़ा हो गया है। यूपी बोर्ड की पाठ्यपुस्तकों में रत्नावली से तुलसीदास के विवाह पर कुछ विद्वानों ने आपत्ति दर्ज की है। उनका दावा है कि तुलसीदास अविवाहित थे। उन्हें पुस्तकों में तुलसीदास के जन्मस्थान सूकरक्षेत्र (आजमगढ़) के उल्लेख पर भी आपत्ति है। अब यूपी बोर्ड की हिन्दी पाठ्यक्रम समिति भी इस दावे के आगे झुक रही है। उसने इन अंशों को गलत मानते हुए उन्हें पुस्तकों से हटाने की सिफारिश की है।
हाई स्कूल की पुस्तक ‘काव्य संकलन’ और इंटर की ‘काव्यांजलि’ बता रही है कि तुलसीदास का जन्म आजमगढ़ में हुआ था। पाठ्यपुस्तक के अनुसार ‘‘तुलसी का विवाह रत्नावली से हुआ था जिस पर वह इतना अनुरक्त थे कि उनके मायके चले जाने पर रात में बढ़ी हुई नदी को भी पार कर ससुराल पहुँच गए। रत्नावली ने उनकी भर्त्सना करते हुए कहा—‘लाज न आवत आपकौं, दौरे आयहु साथ। धिक् धिक् ऐसे प्रेम कौं, कहा कहौं हौं नाथ॥’ इससे प्रभावित होकर वह विरक्त हो गए और काशी चले आए।’’ सनातन धर्म परिषद के अध्यक्ष डॉ० स्वामी भगवदाचार्य व तुलसीदास जन्मभूमि सूकर खेत विकास समिति ने पाठ्यपुस्तकों में छपे इन अंशों पर आपत्ति दर्ज की। विधायक राम विशुन आजाद ने भी नियम-51 के तहत इस पर आपत्ति दर्ज की थी।
पाठ्यपुस्तकों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के हवाले से कहा गया है कि ‘‘यह सूकर क्षेत्र (आजमगढ़) वह स्थान है जो सरयू के किनारे है और जहाँ मेला लगता है।’’ आजाद ने दावा किया था कि पाठ्यपुस्तक में आचार्य शुक्ल को गलत सन्दर्भित किया गया है। पाठ्यक्रम समिति का मानना है कि तुलसीदास के विवाह के पक्ष में कोई भी अकाट्य प्रमाण नहीं है, अतः तुलसी रत्नावली के बारे में कोई भी निर्णायक बात नहीं कही जानी चाहिए। समिति ने माना है कि पाठ्यपुस्तकों में सूकर क्षेत्र (आजमगढ़) बताया गया है जो गलत है।
हिन्दी साहित्य के इतिहास में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सूकर क्षेत्र (गोण्डा) का उल्लेख किया है। तुलसीदास बांदा और सूकर क्षेत्र (गोंडा) दोनों से जुड़े थे। दोनों ही जगह राजापुर गाँव है और दोनों सरयूपारीण शांडिल्य गोत्र के ब्राह्मणों के गाँव हैं। राजापुर, बांदा में तुलसीदास के वंशज जो माफीनामा दिखाते हैं उसकी जब तक प्रामाणिकता की जाँच न हो जाए तब तक राजापुर, बांदा के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

प्रो चंद्रदेव सिंह बने कुलपति
रीवां (मप्र)। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र प्रो० चंद्रदेव सिंह को मध्यप्रदेश स्थित इंदिरा गांधी जनजातीय केन्द्रीय विश्वविद्यालय (अमरकंटक) का कुलपति बनाया गया है। आजमगढ़ निवासी प्रो० सिंह वर्तमान में मध्य प्रदेश के ही अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय (रीवां) में कार्यरत हैं।

कुटुम्ब शास्त्री संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति
काशी। संस्कृत के प्रख्यात विद्वान प्रो विम्पटि कुटुंब शास्त्री को कुलाधिपति व उत्तर प्रदेश के राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया है। आन्ध्र प्रदेश के मूल निवासी प्रो शास्त्री वेदांत व साहित्य के विद्वान हैं। उन्होंने अध्यापन-कार्य सदाशिव केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, पुरी से बतौर लेक्चरर शुरू किया। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में अध्यापन के दौरान उन्होंने अपने प्रयासों से इस संस्था को न सिर्फ मानित विश्वविद्यालय का दर्जा दिलाया बल्कि यहाँ के प्रथम कुलपति भी नियुक्त किए गए।

पाण्डुलिपियों के संरक्षण और प्रकाशन जरूरी
वाराणसी। पांडुलिपियाँ हमारे देश की अमूल्य धरोहर हैं। लखनऊ विश्वविद्यालय के पुरातत्त्व विभाग के पूर्व प्रोफेसर किरणकुमार थपलियाल का कहना है कि देश के अनेक हिस्सों में संरक्षित काफी पांडुलिपियाँ नष्ट होने के कगार पर हैं। उन्हें संरक्षित करने की आवश्यकता है अन्यथा आने वाली पीढ़ी इस बौद्धिक सम्पदा में छिपे ज्ञान-विज्ञान से वंचित रह जाएगी।
सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में स्थापित राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन की ओर से परिसर में पाण्डुलिपियों का महत्त्व, संरक्षण व सम्पादन विषयक संगोष्ठी में मुख्य अतिथि प्रो थपलियाल ने कहा कि पाण्डुलिपियों के प्रकाशन से नवीन ज्ञान सामने आएंगे। अशोक के शिलालेख व अन्य के अभिलेखों में भारतीय इतिहास व ज्ञान-विज्ञान वर्णित है। वर्तमान समय में पाण्डुलिपियों के अध्ययन की आवश्यकता है।
सुदूर गाँव, अनजाने इलाकों से धूल से अटी पड़ी पुरानी पेटियों, कंदराओं में छिपे पड़े और लोगों की आँखों से ओझल इतिहास को बयान करती पाण्डुलिपियों की खोज का कार्य अब दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में केन्द्रित किया गया है। राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन ने योजना के तहत दिल्ली, गुड़गांव और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपास के शहरों में खजूर या ताड़ के पत्तों आदि पर लिखे इतिहास के अनजाने और अनसुने तथ्यों को खोज निकालने का कार्य शुरू किया है।
केन्द्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री अम्बिका सोनी का कहना है कि देश के अनेक भागों से पाण्डुलिपियों को खोजने का काम राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के 33 केन्द्रों के जरिये किया जा रहा है। इसके तहत इन दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षण और उनका इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस तैयार करने को प्राथमिकता दी जा रही है। उन्होंने कहा कि पाण्डुलिपियों का संरक्षण एक अनवरत प्रक्रिया है। इसके लिए कोई समय सीमा तय नहीं की जा सकती है। हजारों की संख्या में पाण्डुलिपियों को खोजा गया है। आगे बड़े पैमाने पर इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाने की योजना है।

वाशिंगटन में ‘न्यूजियम’
वाशिंगटन। यहां पर पत्रकारिता के लिए समर्पित अनूठे संग्रहालय की स्थापना हुई है। संग्रहालय में बालकन्स में अमेरिकी पत्रकारों द्वारा इस्तेमाल की गई गोलियों से छलनी हुई कार, रुपर्ट मर्डोक का टेलीफोन, जो उनके अरबों रुपयों के मीडिया साम्राज्य को खड़ा करने में प्रयुक्त हुआ, प्रदर्शित है। बर्लिन की दीवार का अवशेष और 11 सितम्बर को न्यूयार्क के आतंकी हमले में ध्वस्त संचार टावर के अवशेष भी इस संग्रहालय में हैं। इस ‘न्यूजियम’ पर पैंतालीस करोड़ डॉलर की लागत आई है। इसे ‘न्यूजियम’ नाम दिया गया है। ‘न्यूजियम’ में उदासी का बोध कराती दीवारें उन पत्रकारों की स्मृति को समर्पित हैं जिन्होंने समाचार संकलन करते हुए प्राण गँवाए। इस ‘न्यूजियम’ की स्थापना फ्रीडम फाउन्डेशन ने की है जिसे स्वतंत्र अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने के लिए जाना जाता है।

पहला बुक मॉल कोलकाता में
कोलकाता। भारत का पहला समन्वित बुक मॉल कोलकाता में किताबों के प्रसिद्ध मोहल्ले कालेज स्ट्रीट में बन रहा है। दस लाख वर्ग फुट क्षेत्रफल में बन रहे इस माल का नाम ‘वर्ण परिचय’ रखा गया है। इसके निर्माण पर 289 करोड़ रुपये की लागत आ रही है। बुक मॉल के निर्माण का एक चौथाई काम पूरा हो गया है। नगर निगम के आयुक्त अलापन बंद्योपाध्याय का कहना है कि भारत का यह पहला समन्वित पुस्तक मॉल पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप के तहत बनाया जा रहा है। इस सात मंजिले मॉल में किताबों की दुकानों के अलावा लाइब्रेरी, 1100 सीटोंवाला मल्टीप्लेक्स, फूड पार्क, पब, सेमिनार हाल, पुस्तक नीलामी केन्द्र, किताबों के कवर की गैलरी, म्यूजिक शॉप होगा।

साठोत्तरी हिंदी कविता
भागलपुर। बिहार में भागलपुर विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ गणेशानन्द झा, वरिष्ठ साहित्यकार राधेलाल नवचक्र एवं कवि उमेश प्रसाद शर्मा ‘उमेश’ ने ‘साठोत्तरी हिंदी कविता का संक्षिप्त इतिहास’ लिखने का निर्णय लिया है। इसके लिए इन लेखकों ने ऐसे कवियों, जो उन्नीस सौ साठ के बाद के दशक में काव्य सृजन में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा कर चुके हैं और किसी कारणवश हिन्दी साहित्य के इतिहास में आने से वंचित रह गए हैं, उनसे उनका आत्मकथ्य, नाम, जन्मस्थान, जन्म तिथि, प्रकाशित पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित प्रतिनिधि कविताओं का उल्लेख आमंत्रित किया गया है।

कबीर की सामाजिक चेतना’ विषयक संगोष्ठी

सीतापुर (उप्र)। हिंदी सभा के तत्त्वावधान में कबीर जयन्ती पर ‘कबीर की समाजिक चेतना’ विषयक संगोष्ठी आयोजित की गयी। इसमें मुख्य वक्ता स्तम्भकार एवं हिन्दीसेवी डॉ हरिप्रसाद दुबे थे। डॉ दुबे ने अपने उद्बोधन में कहा कि कबीर कथनी से अधिक करनी में विश्वास करते थे। सत्य एवं आवश्यकता भर धन में अटूट आस्था थी। जैसे-जैसे जगत में जीवन मूल्यों का संकट बढ़ेगा वैसे-वैसे कबीर जैसे महापुरुषों की आवश्यकता बढ़ेगी।

उद्भ्रांत के काव्य-नाटक पर चर्चा
आगरा। इप्टा और केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आगरा में पिछले दिनों जाने-माने कवि और दूरदर्शन महानिदेशालय के वरिष्ठ निदेशक उद्भ्रान्त ने अपने काव्य-नाटक ‘ब्लैकहोल’ का पाठ किया। संस्थान के नजीर सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में नाटक पर विचारपूर्ण चर्चा हुई। अध्यक्षीय भाषण में प्रो रामवीर सिंह ने लम्बे अंतराल के बाद काव्य नाटक आने की सराहना की। उन्होंने कहा कि रचना वही है, जो आलोचक का सामना कर सके। लेखक उद्भ्रान्त का कहना था कि उन्होंने मनुष्य के अन्तः और बाह्य संघर्ष को उजागर करने की कोशिश की है।

साहित्य और संस्कृति संकट के घेरे में
वाराणसी। भारतीय साहित्य परिषद के सचिव प्रवीण आर्य ने वाराणसी में विभिन्न इकाइयों की संगठनात्मक बैठकों को सम्बोधित करते हुए कहा कि साहित्यकारों में भी अब राष्ट्रीय विचारधारा का हृस दिखने लगा है। उनके द्वारा सृजित साहित्य एक वर्गविशेष या समस्याविशेष तक अपनी लक्ष्मणरेखा खींच चुका है। ऐसे वातावरण में भारतीय संस्कृति और भारत देश दोनों आरक्षित हो गए हैं। वाराणसी के साहित्यकार आज ही नहीं सदियों से राष्ट्रीय मानस पर छायी तन्द्रा को तोड़ते रहे हैं, आज भी उन्हें इस अन्धकारमय वातावरण को प्रकाशित करने की जरूरत है।
‘भारत राष्ट्र, वर्तमान संकट और साहित्य की भूमिका’ संगोष्ठी में परिषद के सदस्य डॉ उदयप्रताप सिंह ने कहा कि आज देश बाह्य संकट का मुकाबला तो कर सकता है, पर आंतरिक संकट, जिससे परिवारों का टूटना, संस्कृति की उपेक्षा, स्वत्व का अभाव, गुलामी का मानस और यूरोपीय विचारों के अंधानुकरण ने संकट को बढ़ा दिया है। इसका सही उत्तर सत्साहित्य ही दे सकता है। भाव-सभ्यता का पुनरोदय साहित्य और साहित्यकार ही कर सकता है। संगोष्ठी में प्रो पूर्णमासी राय, प्रो युगेश्वर, डॉ बदरीनाथ कपूर, डॉ अशोककुमार सिंह, परमानंद आनंद ने साहित्य और साहित्यकार को जागरूक होने पर बल दिया।

माया गोविंद का एकल काव्यपाठ
नई दिल्ली। गोपालप्रसाद व्यास की तीसरी पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम ‘काव्ययात्रा कवि के मुख से’ में हिन्दी भवन सभागार में वरिष्ठ और लोकप्रिय कवयित्री माया गोविंद ने अपने एकल काव्यपाठ से ऐसा समाँ बाँधा कि श्रोता झूम उठे। मुख्य अतिथि व्यंग्य कवि अशोक चक्रधर ने माया गोविंद की रचनाशीलता और लोकप्रियता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का सभापतित्व हिन्दी भवन के अध्यक्ष त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी ने किया।

‘विभाजन की असली कहानी’
लखनऊ। क्या भारत-विभाजन की सच्चाई प्रचलित मान्यताओं से अलग है? क्या इसमें अमेरिका की भूमिका थी? क्या वह रूस के खिलाफ मुस्लिम राज्य के निर्माण की राजनीति का हिस्सा था? विभाजन के इन तथ्यों की गहराई से छानबीन करने और कई नए मामलों को प्रकाश में लाने वाली पुस्तक ‘विभाजन की असली कहानी’ का लोकार्पण राज्यपाल टीवी राजेश्वर ने किया। राजकमल प्रकाशन की नरेंद्र सिंह सरीली की यह पुस्तक वर्ष 2005 में प्रकाशित उनकी अंग्रेजी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद है।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस
लखनऊ। कोलकाता से प्रकाशित हिन्दी के प्रथम समाचारपत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ की स्मृति में आयोजित हिन्दी पत्रकारिता दिवस का आयोजन हिन्दी-क्षेत्र के विभिन्न शहरों, अंचलों में हुआ। इस अवसर पर भारतीय पत्रकार संघ (आई-एफ-डब्ल्यू-जे) के अध्यक्ष के० विक्रमराव ने कहा कि हिन्दी भाषा को दूसरी भाषाओं के ज्यादा से ज्यादा शब्दों को स्वीकार करना चाहिए जैसा कि अंग्रेजी भाषा में देखा जाता है। पत्रकार संघ की उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष अशोक मधुप ने आयोजन की अध्यक्षता की। यह कार्यक्रम लखनऊ, बिजनौर, सीतापुर, देहरादून आदि क्षेत्रों में अलग-अलग आयोजित किया गया जिसमें प्रिंट मीडिया से जुड़े पत्रकारों ने विभिन्न समस्याओं पर विचार-विमर्श किया।

बाल-साहित्य संवर्धन कार्यशाला
करनाल (हरियाणा)। बाल साहित्य के विकास, संवर्धन और बच्चों में पुस्तकों के प्रति लगाव उत्पन्न करने के उद्देश्य से नेशनल बुक ट्रस्ट की शाखा राष्ट्रीय बाल साहित्य केन्द्र (एन-सी-सी-एल) द्वारा प्रतिवर्ष भारत के विभिन्न क्षेत्रों में बाल साहित्य लेखकों, तत्संबंधी चित्रकारों की कार्यशालाओं का आयोजन किया जाता है, जिनमें परिचर्चा-सत्र भी आयोजित किये जाते हैं। ऐसी कार्यशालाओं में बच्चों की भागीदारी बाल-साहित्य की सर्जना, पाठ और पाठक का सम्बन्ध स्थापित करने में सहायक होती है। पिछले दिनों ये कार्यशालाएँ जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर, उत्तर प्रदेश के मऊ एवं आगरा और हरियाणा (करनाल) में आयोजित की गयी।

बाल-साहित्य अनुवाद कार्यशाला
अहमदाबाद। नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा अहमदाबाद के गुजरात विद्यापीठ में पिछले दिनों गुजराती भाषा में बच्चों के बेहतर साहित्य अनुवाद को लेकर कार्यशाला का आयोजन किया गया। अहमदाबाद आकाशवाणी के केन्द्र निदेशक भगीरथ पंड्या ने अध्यक्ष पद से सम्बोधित करते हुए कहा कि आज की पीढ़ी के बच्चे अपनी मातृभाषा से वंचित हो रहे हैं। वे प्रायः अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से भाषा को विकृत कर देते हैं, भाषा के इस भ्रष्ट-स्वरूप को परिवार और माता-पिता की स्वीकृति प्राप्त है, बच्चे के मुँह से अंग्रेजी शब्द सुनकर स्वजनों की प्रसन्नता ही भाषिक-विकृति का कारण है। दूसरी ओर समाज में केवल वरिष्ठ-जन ही मातृभाषा और संस्कृति के गौरव की बात करते हैं जबकि हमें अपने बच्चों में भाषा और संस्कृति के गौरव-बोध को जागृत करना चाहिए। इस विचार-सत्र में अनुवादक और शिक्षाशास्त्री जीतेन्द्र देसाई, बाल साहित्यकार यशवंत मेहता, कलाकार रजनी व्यास ने विचार व्यक्त किये। इस कार्यशाला के समन्वयक थे एन-बी-टी के गुजराती सम्पादक भाग्येन्द्र पटेल।

बाणभट्ट एवं षष्ठ कबीर समारोह
रीवां (मप्र)। ‘प्राणलोक’ संस्था के तत्वावधान में मध्यप्रदेश शासन, संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से महाकवि बाणभट्ट की 1417वीं जयन्ती तथा कबीर की 611वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में षष्ठ राष्ट्रीय कबीर समारोह का संयुक्त आयोजन रीवा में सम्पन्न हुआ। समारोह के मुख्य अतिथि प्रो० हेमलता बोलिया तथा अध्यक्ष प्रो० देवनारायण झा थे। इस अवसर पर ‘कादम्बरी का प्रीति सौन्दर्य’ एवं ‘कबीर का रचना संसार’ विषयों पर वक्ताओं के व्याख्यान हुए। समारम्भ सत्र एवं संगोष्ठी का संचालन दर्शन राही ने किया। राही ने बताया कि भमरसेन के सोन नद के तट पर ‘प्रीतिकूट’ है जहाँ बाणभट्ट का जन्म हुआ और हर्ष की राजसभा से लौटने के बाद उन्होंने वहीं प्रीति काव्य ‘कादम्बरी’ का सृजन किया।

अध्यात्म-प्रेम-रामायण का विमोचन
इलाहाबाद। हिन्दी साहित्य के जाने-माने कवि डॉ० जे०एल० त्रिपाठी ‘प्रेमानन्द’ के महाकाव्य अध्यात्म-प्रेम रामायण एवं धर्मगीता का लोकार्पण हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के प्रधानमंत्री श्रीधर शास्त्री के आयोजकत्व में इलाहाबाद में केशर विद्यापीठ के सभागार में हुआ।

‘गज़ल-गुलज़ार’ लोकार्पित
लखनऊ। हिंदी साहित्य सम्मेलन एवं चेतना साहित्य परिषद् के संयुक्त तत्त्वावधान में कवि डॉ० मिज़र् हसन नासिर के गज़ल-संग्रह ‘गज़ल-गुलज़ार’ का लोकार्पण उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ० शम्भुनाथ ने किया।

कथा-संग्रह प्रेम-सेतु का लोकार्पण
रोपड़ (पंजाब)। हिन्दी की लब्धप्रतिष्ठ लेखिका निर्मला कपिला की सोलह कहानियों के संग्रह ‘प्रेम सेतु’ का लोकार्पण नया-नंगल रोपड़ (पंजाब) में साहित्यिक समारोह में वरिष्ठ लेखक डॉ० चक्रधर नलिन ने किया।


स्वतंत्रता-आंदोलन और हिंदी-साहित्य

कालडी (दक्षिण भारत) के श्री शंकराचार्य विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के तत्त्वावधान में ‘स्वतंत्रता आंदोलन और हिन्दी साहित्य’ विषय पर त्रिदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी हुई। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की 150वीं तथा भारतीय स्वतंत्रता की 60वीं सालगिरह के सन्दर्भ में स्वतंत्रता-पूर्व व परवर्ती हिन्दी साहित्य पर विचार-विमर्श, इस संगोष्ठी का मुख्य उद्देश्य था। स्वतंत्रता आन्दोलन में साहित्य का जो योगदान रहा तथा देश की स्वतंत्रता पर मंडरानेवाली साम्राज्यवाद, नवउपनिवेशवाद, सांप्रदायिकता जैसी चुनौतियों का प्रतिरोध करने में हिन्दी साहित्य की सक्षम भूमिका पर संगोष्ठी केन्द्रित रही। इस अवसर पर देशभर से विशिष्ट साहित्यकार आए।
राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारम्भ संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति डॉक्टर केएस राधाकृष्णन ने किया। उन्होंने कहा कि हमें स्वाधीनता के शत्रु अर्थात् व्यक्ति के भीतरी शत्रु को पहले पहचानना है और फिर उस पर विजय प्राप्त करनी है।
संगोष्ठी सत्र की अध्यक्षता जेएनयू के भारतीय भाषा केंद्र के अध्यक्ष डॉ वीर भारत तलवार ने की। ‘समयान्तर’ पत्रिका के संपादक पंकज बिष्ट ने बीज-भाषण में ‘स्वतंत्रता आन्दोलन, नवउपनिवेशवाद और हिन्दी साहित्य’ पर अपने विचार प्रस्तुत किये। युवा आलोचक डॉ विनोद तिवारी ने अपना आलेख ‘उपनिवेश और हिंदी उपन्यास’ प्रस्तुत किया। ‘स्वाधीनता संग्राम और स्त्री साहित्य’ शीर्षक आलोक में डॉ गरिमा श्रीवास्तव ने स्त्री वैचारिकता के ठोस प्रमाण पर अपनी बात रखी। उपन्यास पर केन्द्रित दूसरे सत्र की अध्यक्षता इलाहाबाद विवि के प्रोफेसर डॉ राजेंद्र कुमार ने की। पय्यन्नूर कॉलेज के डॉ के जनार्दन ने ‘राष्ट्रीय आंदोलन की चेतना-प्रेमचंदयुगीन उपन्यास में (गांधीवादी कृतियों के सन्दर्भ में)’ तथा ‘ज़िन्दगी एक ज़िन्दा शब्द’ शीर्षक से क्रमशः अपने आलेख प्रस्तुत किये।
दूसरे दिन संगोष्ठी कविता पर केन्द्रित रही। कवि, आलोचक और कोच्चिन विवि के प्रोफेसर डॉ ए अरविन्दाक्षन, डॉ राजेन्द्र कुमार और गुरूवायूर श्रीकृष्णा कालेज की डॉ हरिणी मेनन ने आलेख प्रस्तुत किये। अरविंदाक्षनजी ने कविता को सशक्त अभिव्यंजना बताया। दूसरे सत्र में प्रोफेसर अरविंदाक्षनजी की अध्यक्षता मे दुर्ग, छत्तीसगढ़ के प्रोफेसर डॉ सियाराम शर्मा, केरल विश्वविद्यालय की रीडर डॉ जे उमा तथा कवि, आलोचक और सागर विवि के प्रोफेसर डा वीरेन्द्र मोहन ने ‘स्वाधीनता का स्वप्न’, नवउपनिवेशवाद की गुलामी और हिंदी कविता पर ‘स्वतंत्रता आंदोलन और नयी कविता’ पर तथा ‘स्वतंत्रता आंदोलन और द्विवेदीयुगीन साहित्य’ पर अपने आलेख प्रस्तुत किये। तीसरे दिन का पहला सत्र उपन्यास पर केन्द्रित रहा जिसकी अध्यक्षता डॉ विनोद तिवारी ने की। डॉ के मोहनन पिल्लै तथा डॉ षीला टी नायर के ‘साम्यवादी उपन्यासकारों की देनः स्वाधीनता के परिप्रेक्ष्य में’ तथा ‘स्वतंत्रता आन्दोलन और सत्तरोत्तर उपन्यास’ विषय पर क्रमशः आलेख प्रस्तुतिकरण हुए।
दूसरा सत्र नाटक पर केन्द्रित रहा। सत्र में डॉ वीरेन्द्र मोहन ने अध्यक्ष पद संभाला। कालिकट विवि में प्रोफेसर रहे डॉ टीएन विश्वम्भरन तथा डॉ एनएम सण्णी ने ‘स्वतंत्रता आन्दोलन और प्रसादोत्तर नाटक’ तथा ‘भारतेंदु के मौलिक नाटकों में उपनिवेश-विरोधी स्वर’ विषय पर क्रमशः आलेख प्रस्तुत किये। तीसरे अन्तिम सत्र में डॉ प्रभाकरन ने अध्यक्ष की जिम्मेदारी निभायी। इस सत्र में कोच्चिन विवि के प्रोफेसर आर शशिधरन ने ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी नाटक और स्वतंत्रता आन्दोलन’, डॉके अजिता ने ‘नव-औपनिवेशिक सन्दर्भ में यादों की दुरुस्ती’ तथा डॉ प्रणीता ने ‘प्रसाद और छायावाद का पुनर्वाचन’ शीर्षक आलेख क्रमशः प्रस्तुत किये।
राष्ट्रीय संगोष्ठी के संयोजक थे डॉक्टर वी०जी० गोपालकृष्णन।

 

 ‘हंस’ का आत्मकथा अंक अतीत का पुनरवलोकन

  • डा भवानीलाल भारतीय

अतीत को स्मरण करना मनुष्य का स्वभाव है। समय आने पर साहित्यकार अन्यों की गाथा लिखने के साथ-साथ अपने विगत का भी स्मरण करता है। ‘हंस’ के यशस्वी संस्थापक और संपादक मुंशी प्रेमचंद ने जब 1932 ई० में अपने इस मासिक पत्र का ‘आत्मकथा अंक’ प्रकाशित किया था तब विभिन्न लेखकों एवं रचनाकारों से उनका संक्षिप्त आत्मवृत्त तथा रोचक संस्मरण जुटाने के लिए कितना श्रम किया होगा, यह जानना कठिन नहीं है। आज हिन्दी के कितने वरिष्ठ प्राध्यापक तथा उच्च श्रेणियों के छात्र हैं जो उन रायबहादुर सीताराम बीए के बारे में जानते हैं जिन्होंने शेक्सपियर के नाटकों को हिन्दी में लाने का श्रम किया था। काशी के नागरी प्रचारिणी सभा के तीन संस्थापकों (बाबू श्यामसुन्दर दास तथा ठाकुर शिवकुमार सिंह के साथ) में से एक पं रामनारायण मिश्र के बारे में हम कितनी जानकारी रखते हैं? शिवपूजन सहाय की सम्पादन कला तथा ग्रन्थ-संशोधन-क्षमता की जानकारी भी कितनों को है? इस ‘आत्मकथा अंक’ में प्रेमचंद ने अपने समानधर्मा कथा-लेखक त्रयी के अन्य दो कथाकारों पं सुदर्शन तथा पं विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ के आत्मवृत्तान्त तो दिये ही हैं, हिन्दी में जासूसी उपन्यासों के प्रवर्तक गोपालराम गहमरी तथा अपने से बाद के मनोविज्ञान-आश्रित उपन्यासों के लेखक जैनेन्द्र के आत्मकथानकों को भी स्थान दिया है। हास्य रस के उस युग के प्रगल्भ लेखक अन्नपूर्णानन्द का अपनी परीक्षा का संस्मरण कम रोचक नहीं है।
किन्तु ‘हंस’ के इस विश्रुत विशेषांक का दायरा इतना ही नहीं है। उर्दू से हिन्दी में आये बाबू धनपत राय उर्फ नवाबराय उर्फ प्रेमचंद यदि इस अंक में ‘ज़माना’ के सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम, बीएचयू में फारसी-अरबी के प्रोफेसर मौलवी महेश प्रसाद तथा इकबाल वर्मा सेहर के संस्मरण सम्मिलित नहीं करते तो यह कार्य अधूरा ही रहता। ‘ज़माना’ वह पहला उर्दू रिसाला था जिसने प्रेमचंद की उर्दू रचनाओं को स्थान दिया था। इस अंक में विशुद्ध साहित्य से हटकर वाङ्मय की अन्य विधाओं को अपने रचनाकौशल से समृद्ध करनेवाले लेखकों को भी स्थान मिला है। प्रसिद्ध देशभक्त भाई परमानन्द (एक जेल से दूसरे जेल में), दर्शनशास्त्र के प्रसिद्ध लेखक किन्तु इण्डियन प्रेस, इलाहाबाद के अनुरोध पर हिन्दी व्याकरण पर अपनी कलम चलानेवाले पं गंगाप्रसाद उपाध्याय, रामायण की कथा को अपनी वाचनशैली से जन-जन तक पहुँचानेवाले पं राधेश्याम कथावाचक तथा आर्य संन्यासी स्वामी आनन्द भिक्षु सरस्वती के इतिवृत्त कम रोचक नहीं है। उपाध्यायजी तो बीटी की क्लास में प्रेमचंद के सहपाठी ही थे।
‘हंस’ के इस आत्मकथा अंक की एक अन्य विशेषता की ओर हमारा ध्यान स्वभावतः जाता है। उस युग में जब भारत की आम जनता ऐलोपैथी के बनिस्पत आयुर्वेद का अधिक विश्वास करती थी, हमारे देश ने कुछ ऐसे पीयूषपाणि वैद्यों का कृतित्व देखा जिन्होंने आयुर्वेद की औषधियों में नये प्रयोग किये, अपने व्यवसाय को सफलता की ऊँची मंजिलों तक पहुँचाया, साथ ही स्वास्थ्य एवं चिकित्साविषयक उच्च कोटि का साहित्य भी लिखा। ऐसे ही वैद्यों में परिगणित होते हैं—पं० ठाकुरदत्त शर्मा, लाहौरवाले ‘अमृतधारा’ के आविष्कारक तथा लगभग पांच दर्जन पुस्तकों के लेखक। ‘अमृतधारा’ की लोकप्रियता को इसी तथ्य से आंका जा सकता है कि इस औषधालय के स्थान को अमृतधारा भवन, वहाँ के मार्ग को अमृतधारा रोड तथा वहाँ के पोस्ट आफिस को अमृतधारा डाकखाना कहा जाता था। साहित्यिक अभिरुचि के अन्य वैद्य थे बाबू हरिदास वैद्य जिन्होंने सात भागों में ‘चिकित्सा-चन्द्रोदय’ लिख कर ख्याति के साथ द्रव्योपार्जन भी किया। भर्तृहरि के शतकत्रय (शृंगार, नीति, वैराग्य) का विशद अनुवाद उन्हें सफल टीकाकार का स्थान दिला चुका है। आयुर्वेद तथा लेखन दोनों में समान रुचिवाले मथुरा के पं० क्षेत्रपाल शर्मा का नाम उस युग में जाना माना था।
आत्मकथा अंक के प्रारम्भ में जयशंकर प्रसाद की पद्यात्मक आत्मकथा छायावादी शैली में दी गई है। साहित्य के इतिहास के अध्येताओं को ज्ञात है कि उस युग में हंस, सुधा, माधुरी, सरस्वती आदि पत्रों में गद्य काव्य पर्याप्त संख्या में लिखे जाते थे। सर्वश्री राय कृष्णदास, दिनेश नन्दिनी चोरडिया (बाद में डालमिया), शंकरदेव विद्यालंकार (मातृभाषा गुजराती थी) तथा तेजनारायण काक (बाद में राजस्थान काडर के आई०ए०एस० अफसर) आदि उस युग के प्रसिद्ध गद्य काव्यकार थे। आत्मकथा अंक में इन लेखकों की भावस्फूर्त रचनाएँ स्थान प्राप्त कर सकी हैं। संस्मरणों का अपना महत्त्व होता है जो सम्बन्धित व्यक्ति के जीवन की अनेक अज्ञात परतों को खोलता है। इस सन्दर्भ में पं० रामचन्द्र शुक्ल का लेख ‘प्रेमघन की छायास्मृति’, लंदन में रहकर हिन्दी लिखनेवाले धनीराम प्रेम का लेख ‘मेरा साहित्य जीवन’, सद्गुरुशरण अवस्थी का ‘दरिद्र दर्पण’ आदि विशेष रूप से रोचक तथा पठनीय हैं। पौन शती पहले छपे इस दुर्लभ स्मृति-भण्डार को पुनः उपलब्ध कराने के लिए विश्वविद्यालय प्रकाशन साधुवाद का पात्र है, जिससे इसी क्रम में ‘हंस’ का काशी अंक तथा पं० बाबूराव विष्णु पराड़कर द्वारा सम्पादित प्रेमचंद स्मृति अंक भी हमें उपलब्ध हो सकेंगे।
 

 ‘आधुनिक पत्रकारिता’

  • डॉ अर्जुन तिवारी

आजकल कम्प्यूटर, इन्टरनेट, साइबर, डिजिटल उपक्रम, उपग्रह एवं अन्तरिक्ष संसाधनों के चलते संवादों का तत्काल विस्तार हो रहा है जिसके फलस्वरूप मानव अधिक चैतन्य है। नित-नूतन परिवर्तित परिवेश में मानव-मन चमत्कृत और स्तब्ध है। साम्प्रतिक संचार-साधनों को जीवन-जगत् सम्बन्धी मानव-जिज्ञासा का सूत्रधार माना जा रहा है। प्रयोग, शोध, अध्ययन और विश्लेषण-वैशिष्ट्य से संश्लिष्ट आधुनिक पत्रकारिता अब सशक्त पत्रकारिता विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित है। अंग्रेजी का ‘जर्नलिज़्म’ शब्द पत्रकारिता सुलभ सत्कार्य, विचार, दर्शन का भाव नहीं वहन करता। ‘इज़्म’ ‘जर्नल’ से जुड़कर ‘फासिज़्म’, ‘मार्क्सिज़्म’, ‘कम्यूनिज़्म’, ‘एथेइज़्म’ जैसे गंध देता है। वादों-प्रतिवादों से दूर पत्रकारिता प्रौद्योगिकी, कला और शिल्प की त्रिवेणी है। अपने विकास-क्रम में संवाद-कला, सम्पादन-कला, जनसंचार एवं मीडिया के महत्त्वपूर्ण सोपानों को तय कर पत्रकारिता अब जीवन कला एवं प्रौद्योगिकी विज्ञान है जिसके लिए ‘जर्नोलॉजी’ शब्द उपयुक्त है। ‘सोसियोलॉजी’, ‘साइकोलॉजी’, ‘ज़ियोलॉजी’, ‘फिलोलॉजी’ के समान जर्नोलॉजी में ‘ऑन लाइन जर्नलिज़्म’, ‘ई-जर्नलिज़्म’, ‘वेब जर्नलिज़्म’, ‘डिजिटल जर्नलिज़्म’ समाहित है। सम्प्रति पत्रकारिता के स्थान पर ‘पत्रकारिता विज्ञान’ एवं जर्नलिज़्म के स्थान पर ‘जर्नोलॉजी’ शब्द वरेण्य है।
‘नया नजरिया-नयी तकनीक’, ‘हर खबर ताजा-खबर’, ‘सच्ची खबरें-पक्की खबरें’ तथा ‘देश की धड़कन के साथ धड़कता सूचना-स्रोत’ से संदर्भित कृति ‘आधुनिक पत्रकारिता’ का पंचम संस्करण जनसंचार-जगत् में सुनिश्चित ही उल्लेख्य है। पाठकों ने इस ग्रन्थ को ‘आचार-ग्रन्थ’, ‘फाउंडेशन बुक’ के रूप में सम्मानित किया है।
‘पत्रकारिता के विविध रूप’, ‘पत्रकारिता-शीघ्रता में प्रस्तुत साहित्य’, ‘पीत पत्रकारिता’, ‘फोटो पत्रकारिता’, ‘फिल्म पत्रकारिता’, ‘आधुनिक सूचना प्रौद्योगिकी’ एवं ‘ई-जर्नलिज़्म’ जैसे सामयिक तथ्यों से सम्बद्ध अध्याय जोड़कर ग्रन्थ को हर प्रकार से परिपूर्ण बनाने का प्रयास किया गया है।
इलेक्ट्रॉनिक स्नूपिंग, ऑपरेशन पिन, तहलका, कोबरा, स्टिंग ऑपरेशन दुर्योधन सन्दर्भित महत्त्वपूर्ण बातें स्टिंग ऑपरेशन में प्रस्तुत हैं। प्रशासनीय गोपनीयता अधिनियम १९२३ के परिप्रेक्ष्य में सूचना का अधिकार सूचना का तोहफा है, एक कारगर हथियार है। ब्लॉगिंग जैसे अद्यतन विषय पर सामग्री प्रस्तुत कर ग्रन्थ को अत्याधुनिक बनाया गया है।
बहुविध रस-गंध से सम्पृक्त हिन्दी पत्रकारिता विषय-वस्तु, शिल्प, प्रौद्योगिकी और दृष्टिबोध के चलते विस्तृत आयामी हो चली है। जीव-जगत् की आशा-निराशा, मोह-मोहभंग, सफलता-असफलता को अभिव्यक्ति देकर हिन्दी के माध्यम सर्वहित के प्रति समर्पित है। सरल-तरल हिन्दी के विकास के साथ ही पत्रकारिता जन-सेवा, सुधार, नवोन्मेष एवं कलात्मक अभिरुचि के साथ ज्ञान-विस्तार की दिशा में हर क्षण अग्रसर है। ताजगी, गहराई, पैनापन और विस्तारवाली पत्रकारिता के सर्वांग अनुशीलन से ही पत्रकार यशस्वी हो सकता है जिसके लिए आवश्यक सभी संसाधन इस ग्रन्थ में हैं।
संचार, मुद्रण, प्रसारण के क्षेत्र में क्षण-प्रति क्षण हो रहे आविष्कारों से मीडिया-जगत् में अप्रत्याशित क्रान्ति है। ‘पेनलेस’ और ‘पेपरलेस’ पत्रकारिता की बात देखी जा रही है। द्रुत संवाद-व्यवस्था में प्रशिक्षित होकर पत्रकारों को कदम से कदम मिलाकर चलना होगा ताकि २१वीं सदी की आपाधापी और अपसंस्कृति की हलचल में उनके विचार समय और समाज को स्वस्थ दिशा दे सकें।

 

रज्जब तैं गज्जब किया

  • डॉ० नन्दकिशोर पाण्डेय

संत रज्जब को भजनानन्दी संत कहा गया है। उन्होंने परमात्मा के चिंतन का मूलाधार भजन स्वीकार किया था। रज्जब का जन्म जयपुर के निकट सांगानेर में हुआ था। वह जब युवा हुए तो पिता ने आमेर में उनका विवाह तय किया। उन दिनों संत दादू दयाल का आश्रम आमेर में था। रज्जब की बारात संत दादू के आश्रम के पास से गुजरी। अचानक उनका घोड़ा आश्रम के सामने रुक गया। रज्जब घोड़े से उतर कर संत दादू दयाल का आशीर्वाद लेने गये। रज्जब ने ज्यों ही दादू दयाल के चरणों की धूलि मस्तक पर लगाई तो उन्हें लगा कि जैसे संत दादू से उनका जन्म-जन्म का संबंध है। तभी दादू दयाल ने कहा—
रज्जब तैं गज्जब किया, सिर पर बांधा मौर।
आया था हरिभजन कूं, करै नरक की ठौर॥

यह सुनकर रज्जब का मन पलट गया और उन्होंने शादी करने से मना कर दिया। दादू दयाल ने बहुत समझाया कि गृहस्थ बनकर भजन करो। लेकिन रज्जब नहीं माने। वह संत दादू दयाल के आश्रम में ही रहने लगे। दादू ने उन्हें दीक्षा दी। फिर तो रज्जब उनके प्रमुख शिष्यों में से एक बन गए। वह दूल्हा-वेष में रहने लगे—क्योंकि उनको इसी वेष में गुरु ने स्वीकार किया था।
संत रज्जब ने कहा कि जिसके हृदय में हरि का निवास नहीं है, वह तो सूने घर के समान है। परमात्मा तो अपना रस देने के लिए, आनन्द बाँटने के लिए सदा उत्सुक रहते हैं। वह आनन्द रस देते नहीं थकते और उनका दास-प्रेमी भी उसे लेते नहीं थकता। परमात्मा तो रसरसिया हैं, वह युगों-युगों से हमारी प्यास पूरी करते आ रहे हैं-
साईं देता ना थकै, लेता थकै न दास।
रज्जब रसरसिया अमित, जुग-जुग पूरे प्यास॥

रज्जब को भजन करना अत्यन्त प्रिय था। वह कहते थे कि ब्रह्म सबसे अलग भी है और सबसे मिला हुआ भी है। वह साकार भी है, निराकार भी है। उसकी ही शक्ति से पूरा जगत प्राणमय है। इसलिए ब्रह्म के चिंतन, स्मरण, भजन और मनन में ही परम सुख सन्निहित है।
संत रज्जब ने अपने पदों में निर्गुण-सगुण से परे निराकार चिन्मय परमात्मा की महिमा गाई। वह कहते थे कि मेरे परमात्मा तो मायारहित हैं, घट-घट में रहने वाले हैं, परम पवित्र हैं, पूर्ण ब्रह्म हैं, निर्गुण और सगुण होकर भी दोनों से परे हैं।
संत रज्जब ने कहा कि राम-रस पीते रहना ही सच्ची साधना का स्वरूप है।
राम रस पीजिए रे, पीए सब सुख होई।
पीवत ही पातक कहै, सब संतनि दिसिजोई॥
संत
रज्जब ने कहा कि साधना को तब तक पूर्ण न समझिए, जब तक आप यह कहते रहें कि मैंने तत्व जान लिया है। जानना तो तब होता है, जब जानने वाला ज्ञान की सीमा पार कर जाए। उसे अपना कुछ न याद रहे। संत रज्जब ने कहा कि राम-नाम ही भवसागर से पार उतारने में समर्थ है। रज्जब अनुभवी संत और प्रेमी महात्मा थे।
—डॉ० हरिकृष्ण देवसरे
 

कवि बनारसीदास की आत्मकथा

  • ज्ञानचन्द जैन

ज्ञानचन्द जैन ने कवि बनारसीदास की आत्मकथा (1586-1643 ई० के लगभग) के सम्बन्ध में बड़ी कुशलता और दूरदर्शिता का परिचय देते हुए पूर्ण वास्तविकता सामने रखी है। यह बनारसीदास की तीन पीढि़यों की (व्यापारिक वर्ग) सही स्थिति देने के साथ-साथ ऐतिहासिक, सामाजिक तथा साहित्यिक वास्तविकता की स्थिति बड़ी विशद रूप में सामने रखती है।
ज्ञानचन्दजी ने लगातार कई वर्षों तक साहित्यिक स्थिति आदि का अध्ययन करने के उपरान्त अपने अनुभवजन्य ज्ञान का परिचय देकर 88वें वर्ष में ये आत्मकथा सामने रखी है जिसका नाम अर्ध-कथानक दिया है। इसे बनारसीदास ने लगातार साहित्यिक क्षेत्र में कदम रखकर अपने 55 वर्ष में आश्विनी सुदी 13 संवत् 1693 में पूर्ण किया था।
इस आत्मकथा का सम्पादन नाथूराम प्रेमी, विद्वान व अनुभवी सम्पादक ने किया था। यह हिन्दी की पहली आत्मकथा मानी जाती है जो आज से साढ़े तीन सौ से कुछ अधिक वर्षों पहले लिखी गई थी। उस समय हिन्दुस्तान में मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर ने अपनी आत्मकथा मातृभाषा तुर्की में ‘तुजुकेबाबरनामा’ से लिखी थी जो एक साहित्यकार के रूप में अधिक जानी जाती है। इसके बाद बाबर के परपोते जहाँगीर बादशाह की आत्मकथा ‘तुजुके जहाँगीरी’ भी तुर्की भाषा में ही थी।
हिन्दी भाषा में सबसे प्रथम बनारसीदास की आत्मकथा सबसे पहले लिखी गई। इसकी भाषा प्रचुरता से खड़ी बोली में है जो इसकी विशेषता है।
इस आत्मकथा से जानकारी मिलती है कि बनारसीदास का जन्म जौनपुर में हुआ था और उनके पिता खरगसेन मोती, मानिक चुन्नी का व्यापार करते थे। उनके नाना भी एक प्रसिद्ध जौहरी थे। सबसे प्रथम उनका नाम विक्रमाजीत रखा था, बाद में भगवान जितेन्द्र की जन्म नगरी के नाम पर बनारसीदास रखा गया।
बनारसीदास को 30 वर्ष की आयु तक अपने पिता की छत्रछाया प्राप्त रही, वैसे उन्होंने 24 वर्ष की अवस्था में व्यापार जीवन में प्रवेश किया था। वह जहाँगीर बादशाह का जमाना था। सबसे पहले उन्होंने कौडि़यों का व्यापार शुरू किया और बाद में वे भी बढ़ते-बढ़ते अपना व्यापार करने लगे थे। उनके व्यापार का केन्द्र आगरा था। उनके पिता खरगसेन की मृत्यु 65 वर्ष की आयु में हुई थी, परन्तु बनारसीदास व्यापार क्षेत्र में लगे रहे थे। उन्होंने जौनपुर, पटना, बनारस शहरों में भी व्यापार किया।
बनारसीदास की आत्मकथा से स्पष्ट होता है कि व्यापारी वर्ग राज्याधिकारियों की आए दिन लूट खसोट से त्रस्त रहता था। अकबर के 43वें राज्यवर्ष में बनारसीदास को स्थनीय मुगल अधिकारियों की लूट-खसोट का पहला अनुभव हुआ था। उनके पिता खरगसेन को भी इसी लूट-खसोट के दौरान जौनपुर से भागना पड़ा था।
जहाँगीर बादशाह के 10वें राज्यवर्ष में बनारसीदास जब नेमा साहू के साझीदार बनकर बनारस, पटना, जौनपुर में व्यापार करते थे, उन्हें राज्याधिकारियों की लूट-खसोट का दूसरी बार अनुभव हुआ था।
एक बादशाह के मरने पर और नये बादशाह के तख्त पर बैठने और उसके नाम की दुहाई फिरने तक नगरों में अराजकता फैली रहती थी। नगरवासी नगर छोड़कर भाग जाते थे और सामान्य स्थिति होने पर लौटकर फिर अपने स्थान पर आकर कारोबार करने लगते थे।
सामाजिक दृष्टि से उनकी आत्मकथा में उनके काल के समाज का विश्लेषण करने के लिए मूल्यवान सामग्री मिलती है। उस काल का समाज केवल शासक वर्ग तथा प्रजा वर्ग में ही नहीं उसी के समानान्तर प्रजा वर्ग धनी और निर्धन वर्ग, ऊँची जातियों और नीची जातियों के लोगों में विभाजित था। गुणी, शिल्पकारों तथा कुशल कारीगरों की गणना शूद्र वर्ग में होती थी। यद्यपि वे मुगलकाल की आर्थिक स्थिति सुधारने में योगदान देते थे। देखा जाय तो सामान्य प्रजाजन का जीवन किस प्रकार व्यतीत होता था, इस सम्बन्धी जानकारी आत्मकथा से अच्छी मिलती है।
आत्मकथा से जानकारी मिलती है कि 14 वर्ष की आयु में बनारसीदास ने पण्डित देवदत्त के पास बैठकर विद्या का अभ्यास किया था। उस काल का राघव पांडवाय नामक संस्कृत के प्रसिद्ध द्वयार्थक काल के रचयिता महाकवि धनंजय का बनाया कोशग्रन्थ नाममाला के 200 श्लोक उन्होंने कंठस्थ कर लिए थे। उन्होंने ज्योतिष शास्त्र, अलंकार शास्त्र तथा लघुकोष शास्त्र (कामशास्त्र) का भी अध्ययन किया। उन्होंने आचारनीति, समाजनीति तथा राजधर्म का ज्ञान कराने वाले 400 स्फुट श्लोक भी कंठस्थ कर लिये थे।
चौदह वर्ष की आयु में विद्या से सम्पन्न बनने के साथ ही वह आशिकबाज भी बन गए। जतीजी के एक शिष्य मुनि भानचन्द्र से बनारसीदास का स्नेहभाव हो गया और वह उनके काव्य गुरु बन गए। यह बात उनके पिता खरगसेन को भी ज्ञात थी जो उनके साथ उनसे मिलने गए थे।
बनारस और जौनपुर के मुगल हाकिम ने सुकवि बन जाने पर बनारसीदास को सम्मानित किया और उन्हें अपना हिन्दी शिक्षक बनाया था तो उसे वे इसी नाममाला के दोहे और कभी छन्द शास्त्र या ग्रन्थ श्रुतबोध पढ़ाया करते थे।
बनारसीदास के काव्य-गुरु मुनि भानचन्द्र के सम्पर्क में आने पर उन्होंने जैन धर्म अंगीकार कर लिया था और मुनि ने उनके लिए संस्कृत, प्राकृत तथा देशभाषाओं की रचनाओं का एक गुटका अपने हाथ से लिखकर उनको दिया था। बाद में श्री बनारसीदास के अनुभव और बढ़ी हुई काव्य प्रवृत्ति के कारण लोग उन्हें जैन धर्म के ज्ञानी तथा अध्यात्मवादी कवि के रूप में जानते थे। इस सम्बन्धी विवरण श्री बनारसीदास ने सौ छन्दों की एक रचना में व्यक्त किया है।
इस प्रकार उनकी साहित्यिक रुचि बढ़ती गई और वह आत्मकथा के रूप में सामने आई। ये आत्मकथा दोहा, चौपाई के 675 छन्दों में लिखी गई है जिसका सम्पादन ऊपर उल्लिखित श्री नाथूराम प्रेमी ने किया था। बनारसीदास ने 57-58 वर्ष की आयु पाई थी। अर्ध कथानक के बाद उन्होंने नाटक समय सार काव्य रचना की। उनकी स्फुट काव्य कृतियों का संकलन उनके देहान्त के बाद एक भक्त ने बनारसी विलास के नाम से किया जो चैत सुदी 8 संवत् 1701 (सन् 1644) में ग्रन्थ रूप में सामने आया।
इस प्रकार हम देखते हैं कि अर्धकथानक आत्मकथा जहाँ बनारसीदास के घरेलू व व्यापारिक जीवन-तीन पीढि़यों की स्थिति तो सामने रखती ही है। साथ ही ऐतिहासिक दृष्टि से बाबर, अकबर, जहाँगीर जैसे मुगल शासकों के राज्यों की वास्तविकता, उस समय की सामाजिक स्थिति जनता की वास्तविकता का दिग्दर्शन कराने के साथ-साथ हिन्दी खड़ी बोली में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। सबसे प्रथम आत्मकथा के रूप में जानी जाती है। हिन्दी साहित्य में उसने विशिष्ट स्थान पाया है। हमें श्री बनारसीदासजी का इस अर्थ में ऋणी होना चाहिए कि उन्होंने साहित्य की नई विधा का जन्म बहुत वर्ष पूर्व ही कर दिया था जिसे साहित्यकार अध्ययन उपरान्त ही जान पाये। निश्चय ही इसको जानने का श्रेय विद्वान् स्वर्गवासी ज्ञानचन्द जैन को जाना चाहिए जिन्होंने अध्ययन और परिश्रम उपरान्त हमें पूर्ण जानकारी दी। इसके लिए प्रकाशक विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी भी बधाई के पात्र हैं कि उन्होंने ऐसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ का प्रकाशन कर साहित्य की श्रीवृद्धि में योगदान दिया। —मदनमोहन वर्मा
ग्वालियर (मध्य प्रदेश)

 

बौद्ध कापालिक साधना और साहित्य

  • डॉ० नागेन्द्रनाथ उपाध्याय

सिद्ध-नाथ-सन्त साहित्य का अध्ययन करते समय लेखक ने डॉ० हजारीप्रसादजी द्विवेदी के ‘नाथ सम्प्रदाय’ का स्वाध्याय किया था और हर बार उससे कुछ नया मिलता रहा। ‘बामारग’ और कान्हुपा के कापालिक सम्बन्ध के मूल के प्रति लेखक का औत्सुक्य तीव्र था कि स्नेलग्रोव का ‘हेवज्रतन्त्र’ मिल गया। अनेक स्रोतों का संधान करते-करते अनेक सूत्र मिले, जिनका समन्वय-सामंजस्य इस ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत हो रहा है। बौद्ध सिद्धों में कृष्णपाद की अपभ्रंश रचनाओं ने विविध रूपों में आकृष्ट किया था। फलतः ‘तान्त्रिक बौद्ध सिद्धाचार्य कृष्णवज्रपाद की अपभ्रंश रचनाओं का अध्ययन और सम्पादन’ विषयक शोधप्रबन्ध पर कानपुर विश्वविद्यालय ने डी०लिट्० की उपाधि प्रदान की। उस शोधप्रबन्ध को कृष्णपाद के 13 चर्यापदों और 32 दोहों के मूल ताड़पत्रीय हस्तलेखों के आधार पर सम्पादन, डॉ० बागची द्वारा प्रस्तुत संस्कृत छाया श्लोकों के संस्कार, मुनिदत्त और मेखला की संस्कृत टीकाओं के हिन्दी रूपान्तर, चर्यापदों और दोहों पर हिन्दी में भाष्य, पारिभाषिक शब्दों पर विस्तृत टिप्पणियों आदि से सम्पन्न किया गया था। इस ग्रन्थ में मूल शोधप्रबन्ध के अध्ययन खण्ड को नवीन सामग्री के आधार पर संशोधित-परिवर्धित कर प्रस्तुत किया जा रहा है। तेंजुर से रचनाएँ अनूदित कर प्रस्तुत की जा रही हैं और इतर सामग्री भी बौद्ध कापालिक साधना और साहित्य के स्वरूप को अधिक प्रकाशित करने के लिए समायोजित की जा रही है। सामान्यतया सुपठित समाज को भी तान्त्रिक बौद्धों की कापालिकता का परिचय नहीं है। इसीलिए सारे सुलभ सूत्रों को यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है, फिर भी यह दावा नहीं है कि कापालिक बौद्धों का कोई अपना ‘यान’ रहा होगा। ‘सम्प्रदाय’ का सम्बन्ध गुरु-शिष्य परम्परा से है जबकि कुछ लोग इसे एक धार्मिक गठन मान लेते हैं। तान्त्रिक बौद्धों के अन्तर्गत ही चर्या, आचार, साधन सामग्री, वेश-भूषा तथा विचारणासम्बन्धी कुछ विशेषताओं से उनका वैलक्षण्य प्रतिपादित किया जा सकता है। (आगामी प्रकाशन द्वितीय संस्करण-2008 ई०)

 

भोजपुरी और हिन्दी

  • डॉ शुकदेव सिंह

हिन्दी राजभाषा बनी, नहीं बनी। भोजपुरी गाते-बजाते अब फिल्मों की दुनिया से देश-देशान्तर में कहीं ‘क्रियोल’ बनकर, कहीं भारत की ‘जातीय-स्मृति’ बनकर अपने पूर्वजों की गिरमिटिया याद के साथ मजदूरों की भाषा से देशान्तर की राजभाषा बन गई है। ‘‘हम न मरिहाँ, मरिहैं संसारा’’ के विश्वास के साथ इसे फिर दुनिया के सामने कर रहा हूँ।
‘भोजपुरी’ पर बारह-तेरह हजार पृष्ठ काम मेरे साथ ही हुआ। एक तरह से मैंने ही किया। तब मेरे सहकर्मी कम से कम मेरे ही बराबर काम करने के लिए तैयार रहते थे। आज भी डॉ० आनन्द कुमार पाण्डेय जैसे मेरे छात्र और विद्याकर्मी अपनी व्यस्त दिनचर्या के बावजूद मेरी कलम बनकर लिखते हैं। किसी छूटते-टूटते प्रसंग पर ‘बना नहीं’ की टोक-टाक करते रहते हैं। मैं उन्हें उसी तरह से लाजवाब करता हूँ जैसे जब ‘किशन चन्दर’ जैसे महान् लेखक ने ‘मण्टो’ से पूछा कि मेरी कहानियों के बारे में तुम्हारी क्या राय है? तो मण्टो ने जवाब दिया था कि ‘तू बातें ही बनाता रहेगा या कहानियाँ भी लिखेगा।’ मैं आनन्द से कहता रहता हूँ कि तुम केवल ‘मित्र-मित्र’ ही कहते रहोगे या कोई नयी किताब या लेख लिख छपाकर शिवप्रसाद सिंह पर लिखी किताब का बीज विटप, तरु या अक्षय-वट भी बनाओगे? इस कित किंचित के साथ उन तेरह हजार पृष्ठों में से गाँव-गाँव में इस्तेमाल होने वाली घर-वार, खेत-खलिहान, सार-मवार, चरनी, खूँटा, पगहा, ढाबा, मड़ई, खुरपी, गड़ासी जैसे ग्रामीण जीवन की पेशापरक शब्दावली के नमूने दे रहा हूँ। ट्रैक्टर आया तो डर, हेंगा, परिहथ, हरिस, जुआठ, पैना, पांचर, फार चले गए। नयी धुलाई मशीन की वजह से छाडी, नाद, रेह, धोबिया-पाट, छइयो-छइयो, जजमान, पौनी क्रमशः अखबार आये तो डुग्गी, डफला, झाल, करताल, टी०वी० आया तो नाच-गाने से जुड़े शब्द, क्रिकेट आया तो गुल्ली-डंडा, बाना-बनेठी, कबड्डी, ऊढ़ा, घर-घरौना हजारों शब्द मर गये। मैंने शब्दों की शवयात्रा से जहाँ-तहाँ ठहरकर कुछ शब्दों के नमूने इसीलिए इस पुस्तक में दिये। लोकोक्तियाँ, मुहावरे, कहावतें, घाघ-भड्डरी की सूक्तियाँ, जन्म-संस्कार से लेकर शादी-विवाह, गारी, तीज-त्योहार, खान-पान, मिठाई, तिलवा, ढूँढी, भेली, राब, बहुरी, दाना, चूरा, परमल, भाती और रिझौना, गहुली (व्यंग्य और कटाक्ष से अधिक तीखा) तमाम तरह के ग्रामीण शब्दों के कुछ नमूने इस पुस्तक में दिये जा रहे हैं। ‘चुमावन’ से लेकर परिछावन और विदाई, रुलाई के साथ संभवतः पहली बार, हिन्दू-विवाह, गीतों के समानान्तर मुस्लिम निकाह गीतों में से कुछ सबूत इस किताब में भी हैं।
यह किताब भोजपुरी ‘पढ़त’ का छोटे से छोटा नमूना भर है। मेरी सत्तर वर्ष की श्रुति, स्मृति, पढ़ाई, लिखाई अर्थात् ‘‘कुछ शेष चिह्न हैं, मेरे उस महा मिलन के’’।
(आगामी प्रकाशन प्रथम संस्करण-2008 ई०)
 

प्रेरक प्रसंग

माइकेल मधुसूदन- एक महान व्यक्तित्व

 

आगन्तुक की आँखें फटी की फटी रह गईं। बोला—‘‘आप...माइकेल ...मधुसूदन दत्त... मगर चित्रों में तो...।’’
माइकेल ने फीकी मुस्कान बिखेर दी—‘‘चित्रों में आपने कीमती पोशाकों में सुसज्जित माइकेल का अतीत देखा है, मैं वर्तमान हूँ। पर बोलिए मेरे लिए क्या आज्ञा है?’’ ब्राह्मण ने सकुचाते हुए कहा—‘‘मैंने सुना था कि आपके यहाँ से कोई खाली हाथ नहीं लौटता...खैर छोडि़ये... आप स्वयं ही आर्थिक संकट में है।’’ कहकर वह वापस मुड़ने लगा।
कालजयी कृति ‘मेघनाथ वध’ के रचयिता मधुसूदन दत्त ने स्वभावसुलभ मुक्त हास्य किया—‘‘मेरे कष्ट की चिन्ता न करें श्रीमान्। माइकेल धन से गरीब जरूर हो गया है...मगर मन से बादशाह है। क्या कष्ट है निस्संकोच कहिए।’’
ब्राह्मण ने भारी आवाज में कहा—‘‘बात ऐसी है कि एक दरिद्री पुरोहित हूँ...कन्या के विवाह का बोझ सिर पर है...’’ कहते हुए ब्राह्मण की आँखें भर आईं।
अगले ही क्षण भावुक कवि ने अपनी फटी जेब में हाथ डालकर वे पूरे 500 रुपये निकाल कर दे दिये जो अभी कुछ समय पूर्व ही एक प्रकाशक ने उनकी करुण स्थिति को देखकर अग्रिम पारिश्रमिक के रूप में उन्हें दिये थे और...कवि ने शीघ्र एक पुस्तक लिख देने का वायदा किया था।
इस अप्रत्याशित दान से गद्गद् ब्राह्मण के आशीर्वाद देकर चले जाने के बाद कवि की दृष्टि अपनी विदेशी पत्नी पर पड़ी जिसके वस्त्र जगह-जगह से फटे हुए थे। उसके हाथ में एक मुड़ी-तुड़ी चिट थी जिस पर बाजार से मंगाई जाने वाली वस्तुओं के नाम लिखे थे, जिनमें पुत्री की औषधि, पति-पत्नी के वस्त्रादि एवं खाद्य पदार्थ सम्मिलित थे। कवि अपनी पत्नी के पास बढ़ आये। गम्भीर आवाज में बोले—‘‘प्रिये, मैं जानता हूँ...जिसकी बेटी उचित चिकित्सा के अभाव में मर रही हो...जिसकी पत्नी फटे वस्त्र पहन कर अपने शारीरिक संयम की रक्षा करती हो...जो स्वयं वस्त्रादि के अभाव में लोक समाज में जाने में असमर्थ हो, उसे इस तरह अपरिणामदर्शी और अविवेचक नहीं बनना चाहिए...पर मैं क्या करूँ... मेरे भीतर कविहृदय राजाधिराज है न...किसी का भी कष्ट उसे विचलित कर देता है...क्षमा करना।’’
भावाभिभूत पत्नी ने झुककर पति के चरण स्पर्श किये, बोली—‘‘माइकेल, अब तक तुम्हें मैं मात्र प्रतिभासम्पन्न कवि के रूप में ही जानती थी...तुम्हारा व्यक्तित्व कितना महान है यह आज मैं जान पाई। मैं विदेशी हूँ...तुम्हारे ही मुँह से मैंने कर्ण और हरिश्चन्द्र की दान-गाथाएँ सुनी हैं...आज उनके दर्शन भी कर लिये।’’

 

संगोष्ठी-लोकार्पण

लमही महोत्सव

लमही (वाराणसी)। अमर कथाकार प्रेमचंद की 128वीं जयन्ती उनकी जन्मस्थली लमही गाँव में मनाई गई। प्रेमचंद स्मारक भवन एवं विकासीय योजना समिति की ओर से जिलाधिकारी एके उपाध्याय ने ‘मुंशी प्रेमचंद लमही महोत्सव’ का शुभारम्भ किया।
पूरे समय तक गाँव में बिजली कटौती के बीच नाटक व कठपुतली के कार्यक्रम हुए। चित्र प्रदर्शनी लगी। लोकगीत व काव्यगोष्ठी हुई। खास यह कि अबकी लमही में ‘मुंशीजी’ को याद करने वालों में न तो उनके वंशज दिखे और न ही साहित्य जगत के जुड़े लोगों की विशेष उपस्थिति रही। संस्कृति विभाग का कोई प्रतिनिधि मौके पर नहीं था। ग्रामीणों की भीड़ रही।
इस अवसर पर जिलाधिकारी ने कहा कि प्रेमचंद अंतर्राष्ट्रीय स्तर के विचारक, समाज सुधारक व चिंतक थे। प्रेमचंद को जन-जन तक पहुँचाने के लिए सितम्बर में स्कूली बच्चों को लमही का भ्रमण कराया जाएगा। उन्होंने कहा कि गाँव में शोध केन्द्र स्थापित करने के लिए काहिविवि को मिले 2 करोड़ रुपये के समुचित उपयोग के बारे में कुलपति से बात होगी।

त्रैमासिक पत्रिका ‘लमही’ लोकार्पित
लमही (वाराणसी)। मुंशी प्रेमचंद के सरस्वती प्रेस में काम करनेवाले लमही-निवासी रामसूरत ने प्रेमचंद-जयन्ती पर त्रैमासिक पत्रिका ‘लमही’ का लोकार्पण किया। ‘मुंशीजी’ की 128वीं जयन्ती के मौके पर लमही में एक ओर जहाँ एक के बाद एक कई कार्यक्रम पेश किये जा रहे थे वहीं निकट ही रामसूरत के आवास पर हुआ यह आयोजन खामोशी लिये था। प्रेमचंद के वंशज ऋत्विक राय व प्रपौत्र विजय राय सम्पादित पत्रिका ‘लमही’ के लोकार्पण के मौके पर गिने-चुने लोग ही मौजूद थे। वक्ताओं ने पत्रिका के महत्त्व पर प्रकाश डालते हुए प्रेमचंद के व्यक्तित्व एवं कृतित्व को याद किया।

कालजयी पुस्तकें
काशी। गोस्वामी तुलसीदास के बाद मुंशी प्रेमचंद की कृतियों का दूसरी भाषाओं में सर्वाधिक अनुवाद हुआ। प्रेमचंद ने गुलामी व शोषण से उपजे दर्द को शिद्दत से महसूस किया तो भाषा, सौहार्द व साम्प्रदायिक सौहार्द के लिए सदा सचेत रहे। उनकी छोटी से छोटी कहानी भी गम्भीर घाव करने वाली है। वे औचित्यबोध व न्यायबोध से परिपूर्ण कालजयी रचनाकार थे। ऐसे साहित्यकारों की रचनाएँ हर काल में प्रासंगिक होती हैं व कभी पुरानी नहीं पड़ती हैं।
उपर्युक्त बातें महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ में हिन्दी विभाग की ओर से मुंशी प्रेमचंद जयंती के उपलक्ष्य में वक्ताओं ने कही। प्रो० चौथीराम यादव ने कहा कि आज जहाँ भूमण्डलीकरण का जश्न मनाया जा रहा है वहीं किसान आत्महत्या करने को विवश हैं।

कादंबिनी क्लब का वार्षिकोत्सव
गया। कादम्बिनी क्लब, गया के चौथे वार्षिकोत्सव अवसर पर मगध प्रमंडल के आयुक्त केपी रमय्या मुख्य अतिथि और कथाकार शैवाल विशिष्ट अतिथि थे। इस अवसर पर ‘वर्तमान में कला की उपयोगिता’ विषय पर हुई परिचर्चा में वीरेंद्र कुमार सिंह ने अपने विचार रखे। सभा के दूसरे सत्र में पीएन राय एवं सोनू अन्नपूर्णा ने कविता-पाठ किया। कादंबिनी क्लब, मोहम्मदबाग, लखनऊ के समारोह में कर्नल निर्मल सिन्हा के काव्य-संग्रह ‘असंख्य दीप जले’ तथा मांडवी चंद्रा के काव्य-संग्रह ‘भोर का स्वागत’ का लोकार्पण करते हुए आलोचक शंभुनाथ ने कहा कि कादम्बिनी पत्रिका ही नहीं, इस क्लब ने नये रचनाकारों के प्रोत्साहन का महत्त्वपूर्ण कार्य किया है।
‘कविता का लोकतंत्र’ का लोकार्पण
नई दिल्ली। मणिका फाउंडेशन के समारोह में वरिष्ठ कवयित्री रमणिका गुप्ता पर केंद्रित मदन कश्यप सम्पादित पुस्तक ‘रमणिका गुप्ता प्रतिनिधि कविताएं’ और ‘पातियां प्रेम की’ (प्रेम कविताओं का संकलन) और अभिषेक कश्यप की पुस्तक ‘कविता का लोकतंत्र’ का लोकार्पण अशोक वाजपेयी ने किया।

प्रतिनिधि कविताओं का उर्दू अनुवाद
नई दिल्ली। साहित्य अकादमी के समारोह में सुदीप बनर्जी के हिन्दी में प्रकाशित और वरिष्ठ कवि विष्णु नागर तथा लीलाधर मंडलोई सम्पादित काव्य-संग्रह ‘प्रतिनिधि कविताएँ’ का उर्दू अनुवाद ‘नुमाइंदे नज़्मे’ का लोकार्पण जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति मुशीरुल हसन ने किया। अकादमी के इस संग्रह का अनुवाद उर्दू के प्रसिद्ध लेखक सैय्यद सादिक ने दिया है।

छत्तीसगढ़ साहित्य सम्मेलन
छत्तीसगढ़। पिछले दिनों छत्तीसगढ़ी साहित्य समिति ने दूधाधारी मठ में छत्तीसगढ़ी साहित्य सम्मेलन आयोजित किया जिसका उद्घाटन रामसुंदर दास ने किया। अध्यक्ष थे देवेंद्र वर्मा। ‘छत्तीसगढ़ी राजभाषा और साहित्यकारों का दायित्व’ पर आधारित संगोष्ठी में श्यामलाल चतुर्वेदी, प्रभाकर चौबे, विनय पाठक और मुकुंद कौशल आदि ने चर्चा की। दूसरे सत्र में साहित्यकारों का सम्मान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि अशोक शर्मा थे।

संतोष भारतीय की दलित-मुस्लिम पुस्तक

 नई दिल्ली। वरिष्ठ पत्रकार संतोष भारतीय की पुस्तक ‘दलित, अल्पसंख्यक सशक्तीकरण’ का गत दिनों पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने लोकार्पण किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि आजादी के साठ साल बाद भी हम सामाजिक परिवर्तन नहीं कर पाए। उन्होंने पुस्तक को वैचारिक पुस्तक का दर्जा देते हुए कहा कि जिनका भी रिश्ता परिवर्तन से है उन्हें इसे पढ़ना चाहिए। लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता केन्द्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने की। पुस्तक में प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, इंद्रकुमार गुजराल, केंद्रीय मंत्री एआर अंतुले, सुशील कुमार शिंदे, शिवराज पाटील सहित दस से ज्यादा केंद्रीय मंत्रियों और असगर अली इंजीनियर, पीएस कृष्णन, प्रो इम्तियाज अहमद, एएस नाकादार, विमल थोराट सहित तीस से ज्यादा बुद्धिजीवियों के लेख शामिल हैं। इस अवसर पर एक चर्चा काफी रही वो यह कि पत्रकार संतोष भारतीय के दलित-मुस्लिम प्रेम के पीछे किसकी प्रेरणा है क्योंकि लोकसभा चुनाव के मद्देनज़र आजकल दिल्ली की मीडिया मंडी के कई चेहरे इसी तरह से राजनीतिक दलों में अपना राजनीतिक भविष्य खोजते फिर रहे हैं।

अवधनारायण मुद्गल-समग्र का लोकार्पण

नई दिल्ली। अवधजी को मैं लखनऊ से ऊपरी तौर पर ही जान सका था, लेकिन ‘सारिका’ के सम्पादन के दौरान मैंने उसे अधिक जाना। यह विचार ‘रशियन कल्चरल सेंटर’ में वरिष्ठ कवि-कथाकार कुँवर नारायण ने व्यक्त किये। वह किताब घर की किताब ‘अवधनारायण मुद्गल समग्र’ के लोकार्पण के सभापति की हैसियत से बोल रहे थे।
समग्र के सम्पादक और कथाकार महेश दर्पण ने मुद्गलजी के साथ अपने आत्मीय रिश्तों के साथ ही उनके रचना-संसार के साथ अपने लगाव की बात कही। रूसी केन्द्र के निदेशक चराकास ने कहा कि यह महत्त्वपूर्ण लेखक की रचनाओं की समग्र प्रस्तुति तो है ही, इसके जरिए हम उनके समय को भी जान-समझ सकते हैं। मुख्य अतिथि ममता कालिया ने कहा कि अवधजी ने साहित्यिक पत्रकारिता का लम्बा युग जिया है। इस अवसर पर अवधनारायण मुद्गल ने अपनी कुछ कविताओं का पाठ किया।

लोकार्पण एवं सम्मान समारोह
जोधपुर। अखिल भारतीय साहित्य परिषद का जोधपुर के जनकवि गणेशीलाल व्यास उस्ताद सभागार, सूचना केन्द्र, जोधपुर में ‘लोकार्पण एवं सम्मान समारोह’ डॉ० (श्रीमती) अजित गुप्ता (अध्यक्ष, राजस्थान साहित्य अकादमी, उदयपुर) के मुख्य अतिथ्य एवं बनवारीलाल गौड़ (कुलपति, राजस्थान आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर) के सभापतित्व में हुआ। इस अवसर पर परिषद् की स्मारिका ‘हमारा दृष्टिकोण’ तथा श्रीहरि प्रकाश सठी के कहानी संग्रह ‘माटी के दीये’ का लोकार्पण हुआ।

1857 की क्रांति पुस्तक पर विचार-गोष्ठी
भोजपुर (बक्सर)। जनवादी लेखक संघ, भोजपुर (बक्सर) के तत्त्वावधान में सुभाष शर्मा, अनन्त कुमार सिंह और जवाहर पाण्डेय रचित पुस्तक ‘कुँअर सिंह और 1857 की क्रांति’ पर गत दिनों विचार-गोष्ठी का आयोजन किया गया। गोष्ठी का सभापतित्व जयप्रकाश विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ दुर्ग विजय सिंह ने किया। गोष्ठी के विशिष्ट अतिथि वीर कुँअर सिंह विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ रामपाल सिंह ने कहा कि आज के नेतृत्वकर्ता अपने सामाजिक परिवेश और राजनीतिक उत्तरदायित्व के प्रति उतने जिम्मेदार नहीं हैं, जितने कुँअर सिंह थे। इस पुस्तक में कई अछूती जानकारियाँ आज महत्त्वपूर्ण हैं।

 

सम्मान-पुरस्कार

साहित्य अकादमी पुरस्कार
नई दिल्ली। साहित्य अकादमी पुरस्कार हिंदी कथाकार गोविंद मिश्र को मिला है। यह सम्मान उन्हें "कोहरे में कैद रंग" उपन्यास पर दिया गया है। साहित्य अकादमी ने भारतीय भाषाओं के सात उपन्यासकारों, छह कवियों, पांच लघुकथाकारों, दो आलोचकों और एक निबंध लेखक को पुरस्कार दिया है। साहित्य अकादमी के कार्यकारी बोर्ड ने कुल बाइस लेखकों को अकादमी पुरस्कार देने की अनुशंसा की थी। अकादमी के अध्यक्ष सुनील गंगोपाध्याय की अध्यक्षता में इन लेखकों का चयन हुआ।
पुरस्कृत किए जाने वाले उपन्यासकारों में रीता चौधरी (असमिया), विद्यासागर नरजारी (बोडो), गोविंद मिश्र (हिंदी), श्रीनिवास वैद्य (कन्नड़), अशोक कामत (कोंकणी), श्याम मनोहर (मराठी) और मित्तर सैन मीत (पंजाबी) शामिल हैं।
इसके अलावा कवियों में शरत कुमार मुखोपाध्याय (बंगाली), चंपा शर्मा (डोगरी), एओ मेमचौबी (मणिपुरी), प्रमोद कुमार मोहंती (उड़िया), ओमप्रकाश पांडे (संस्कृत) और जयंत परमार (उर्दू) को भी साहित्य अकादमी पुरस्कार घोषित हुए हैं। लघु कथाकारों में सुमन शाह (गुजराती), श्रीकीरत (नेपाली), दिनेश पांचाल (राजस्थानी), बादल हेमबाब (संथाली) और मेलामई पुन्नुस्वामी (तमिल) साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुने गए।
आलोचना के लिए गुलाब नबी आतिश (कश्मीरी) और हिरो शेवकानी (सिंधी) की किताबों को साहित्य अकादमी पुरस्कार के लिए चुना गया। इसके साथ ही मलयालम के लेखक दिवंगत केपी अप्पन की कृति को सम्मानित करने के लिए चुना गया। अप्पन का निधन दिसंबर में हुआ है। मैथिली और तेलुगु भाषाओं के पुरस्कारों की घोषणा अभी होनी है। इस साल अंग्रेजी के लिए किसी लेखक को साहित्य अकादमी पुरस्कार घोषित नहीं हुआ है।
घोषित अकादमी पुरस्कार की घोषणा पर गोविंद मिश्र ने भोपाल से कहा कि कृतियों की गुणवत्ता पुरस्कारों में देखी जाती है तो उसका अपना सुख है। मगर लेखक का असल पुरस्कार उसके पाठकों से आता है। दस वर्ष पहले गोविंद मिश्र को उनके उपन्यास "पांच आंगनों वाला घर" के लिए व्यास सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है।

सत्रह विद्वानों को हिंदीसेवी पुरस्कार

नई दिल्ली। केंद्रीय हिन्दी संस्थान ने वर्ष 2007 के ‘हिंदीसेवी सम्मान’ की घोषणा कर दी। पुरस्कार की सात श्रेणियों के लिए 17 व्यक्तियों का चयन किया गया है। हर श्रेणी के चयनित को एक-एक लाख रुपये की राशि प्रदान की जाती है। संस्थान के उपाध्यक्ष रामशरण जोशी ने बताया कि हिन्दी के प्रचार और प्रशिक्षण के लिए चार विद्वानों को ‘गंगाशरण सिंह पुरस्कार’ दिया गया। इनमें तमिलनाडु के एम शेषण, केरल के ए अरविंदाक्षण, मणिपुर के देवराज और जम्मू-कश्मीर विश्वविद्यालय की जौहरा अफजल हैं।
पत्रकारिता में ‘गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार’ प्रिंट मीडिया में आलोक मेहता को दिया गया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पुरस्कार को निजी चैनलों और दूरदर्शन के बीच विभाजित कर दिया। इसमें एनडीटीवी के कमाल खान और दूरदर्शन के अमरनाथ अमर का संयुक्त रूप से चयन किया है।
वैज्ञानिक तकनीकी साहित्य के क्षेत्र में ‘आत्माराम पुरस्कार’ राजस्थान के दुर्गादत्त ओझा और उड़ीसा के सुबोध महंती को दिया है। इसी श्रेणी का एक और पुरस्कार दिल्ली की विनीता सिंघल और मनोज पटेरिया को मिला है। हिंदी के आलोचनात्मक क्षेत्र में ‘सुब्रह्मण्यम भारती पुरस्कार’ दिल्ली की निर्मला जैन और बिहार के नंद किशोर नवल को मिला है।
हिंदी में खोज और यात्रा विवरण के लिए ‘राहुल सांकृत्यायन पुरस्कार’ भूमि सुधारों पर सर्वाधिक सक्रिय रहे उत्तराखण्ड के पूरनचंद जोशी और राजस्थान के आईपीएस अधिकारी हरिराम मीणा को मिला है।
विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए ‘डॉ जार्ज ग्रियर्सन पुरस्कार’ पोलैंड की दातूना स्ताषिक को दिया है। विदेशों में भारतीय मूल के व्यक्तियों को दिया जानेवाला ‘डॉ मोटूरि सत&