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मायावती सर्वजन के
कितने नजदीक
बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की
मुख्यमंत्री मायावती सर्वजन के कितने करीब हैं? यह बताने के
लिए काफी है, वर्ष 2000 में प्रकाशित उनकी किताब ‘मेरे
संघर्षमय जीवन एवं बहुजन मूवमेंट का सफरनामा।’ इस पुस्तक के
प्रथम खंड के पृष्ठ 154 की पांचवीं पंक्ति में लिखा है ‘जब-जब
बहुजन समाज की ताकत बनने लगती है, मनुवादियों को खतरा महसूस
होने लगता है। वे किसी न किसी प्रकार उस ताकत को तोड़-फोड़कर
तहस-नहस कर देते हैं। आज वे बहुजन समाज को लुटिया पानी देने
लगे हैं। खटिया भी देने लगे हैं। मुझे लगता है कि वे बिटिया भी
देने लगेंगे। हमारे समाज को बस सावधान रहना होगा। आबादी के
आधार पर इस देश का कारोबार बहुजन समाज के हाथ में होना चाहिए।’
यह सफरनामा एक ज्वलंत सवाल बन गया है और मायावती का पीछा कर
रहा है।
पहली बात तो मायावती को यह समझ लेनी चाहिए कि देश
कारोबार के लिए नहीं होता, और जो भी लोग इसे कारोबार मानते हैं
या मानकर चल रहे हैं, वे देश की बात तो दूर अपने समाज के भी
हितैषी नहीं हो सकते। मायावती को छद्मावरण से बाहर आ कर यह
स्पष्ट करना होगा कि वह बहुजन की पार्टी है या सर्वजन की। उसे
बहुजन शब्द को भी परिभाषित करना होगा। केवल दलित ही बहुजन नहीं
होता, क्योंकि वह देश की कुल आबादी का महज 19 प्रतिशत ही है।
यह भी कि राजनीतिक नफे से अलग बहुजन में कौन-कौन सी जातियां
शामिल हैं।
कांशीराम की जयंती के अवसर पर मायावती ने अपना उत्तराधिकारी तय
किया था, उसमें उन्होंने दलित समाज की जातियों में से
एक खास जाति के ही व्यक्ति को वरीयता दी थी और उसका नाम भी
गुप्त रखकर उसे इस हद तक रहस्यात्मक बना दिया कि कई लोग इस
वरीयता के दावेदार पैदा हो गए। लोग और खासतौर से धंधेबाज़ तो
उसका नाम जानने के लिए सक्रिय हो उठे और इस वीवीआईपी के चक्कर
में कई को अपना नाम उछालकर बसपा से बाहर हो जाना पड़ा। प्रश्न
है कि इस प्रकार रहस्यात्मक तरीके से कहीं राजनीतिक
उत्तराधिकारी की घोषणा होती है्? इससे कुछ समय तो राज्य में
राजनीतिक अस्थिरता का वातावरण बना रहा और बाद में यह बसपा
नेत्री की खिल्ली का मसाला बना। क्या केवल ‘दलित’ ही बहुजन
हैं?, इस सवाल का जवाब दलित नेत्री को दलितों को ही देना
चाहिए। देश में दलितों की ढेर सारी उपजातियां हैं। पंजाब में
दलितों की पांच उपजातियां हैं। चंदोर, रामदासी या रविदासी,
जइया, चंबार और गोलिया। पटियाला में ही दो हैं बागरी और देसी।
संत नाभादास से उत्पन्न दलितों की चार उपजातियों में बूना,
चमार, चमारवा और चनवर शामिल हैं। जींद में ही रामदासी, जटिया,
चमार पासी और रैगर ये पांच उपजातियां हैं। वाल्मीकियों में
मसोद, छजगद्दी, हेल, लालबेगी, भखियार और शेख सरीखी कई
उपजातियां हैं। म्हार की 50 उपजातियां हैं।
कोरी हरिजनों की 22 उपजातियां हैं। मगहिया डोम में
सावंत, बलगई, चौधरी, चौहान, बिहारी और हजारी आदि आते हैं।
दुसाधों में भरसिया, धाड़ी, कन्नौजिया, मगहिया, राजर आदि
उपजातियां प्रसिद्ध हैं। धोबियों के विभाग और उपविभाग 925 हैं
जबकि यह जाति 10 मुख्य भागों में विभक्त है। अयोध्यावासी,
व्यास, चितोरिया, देवसार, कैथिया, कन्नोजिया, कठारिया,
मथुरिया, पुरबिया और श्रीवास्तव। पासियों को पंजाब में चूड़ा,
मजबी, बिहार में मेहतर और हलखोर तथा बंगाल में हलखोर कहा जाता
है। आदिवासियों की जातियों और उपजातियों का तो अभी वर्णन ही
नहीं हुआ है। ऐसे में किसी जाटव को ही अपना उत्तराधिकारी मान
लेना क्या बहुजन समाज की अवधारणा को बल प्रदान करना है?
इसमें संदेह नहीं कि आज का दलित नेतृत्व दलितों की
मनोवैज्ञानिक पीड़ा, सामाजिक-आर्थिक दुर्दशा और उनके शोषण पर
ध्यान देने की बजाय उसी मनुवाद को गले लगा रहा है, जिसे वह
शुरू से ही पानी पी-पीकर कोसा करता था। दलितों के अस्तित्व की
रक्षा का काम न तो मायावती कर पा रही हैं और न ही रामविलास
पासवान। आरपीआई का तो सवाल ही नहीं उठता है। इसमें कोई संदेह
नहीं कि अब दलितों की राजनीति सत्ता प्राप्ति के अभियान और कुछ
लोगों की दूसरी तरह से स्वार्थपूर्ति का जरिया बन गई है। आज की
दलित राजनीति में न तो अंबेडकर और पेरियार जैसी बौद्धिक तैयारी
है और ना ही दलितों के सम्यक विकास की मुकम्मल कार्य योजना।
मायावती जिन अंबेडकर और ज्योतिबा फूले की प्रतिमाओं को लगवाती
फिर रही हैं, उन्होंने दलितों के विकास के लिए क्या कुछ किया
है, इसे जानने-समझने की न कोशिश है और संभवतः उन्हें फुर्सत भी
नहीं है। इतिहास साक्षी है कि ज्योतिबाफुले ने दलितों केउत्थान
के लिए देश में पहला विद्यालय खोला था। क्या मायावती अपने
कार्यकाल में वोट बैंक से अलग दलित विद्यालयों की उस परंपरा को
रंच मात्र भी आगे बढ़ा पाई हैं?
इतिहास में और आगे जाएं तो पाएंगे कि महर्षि चार्वाक के
बाद गौतमबुद्ध ही ऐसे थे, जिन्होंने समाज के दबे कुचले लोगों
के उत्थान की दिशा में सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ मोर्चा खोला
था। जातीय सत्ता केमौजूदा दौर में दलित मुक्ति की अवधारणा की
बात करने वाली मायावती शायद यह भूल गई हैं कि उनके राजनीतिक
सफरनामें में दलित, ज्योतिबाफुले, अंबेडकर और पेरियार बहुत
पीछे छूट गए हैं। सत्ता की होड़ में वे अपने परंपरागत
सहयोगियों और समर्थकों को ही भूल गई हैं। एक ओर तो वे बहुजन के
हितों के लिए मनुवादियों की आलोचना करती हैं, दूसरी ओर
मनुवादियों से गठबंधन कर वे दिल्ली की गद्दी भी हथियाना चाहती
हैं, परंतु इस क्रम में वे न तो अपने अतीत को भुला पाई हैं और
न ही उनके कार्य व्यवहार में कोई सर्वजन सापेक्ष बदलाव आया है।
अगर वे सर्वजन केसाथ हैं, जैसा कि वे मौजूदा चुनाव में
दावा कर रही हैं तो उन्हें यह बताना चाहिए कि अपनी ही किताब
में आपत्तिजनक वाक्यांशों की श्रेणी में आने वाली बातों शब्दों
और भावों से आज वे किस हद तक सहमत हैं? शादी-ब्याह के मानदंड
बदले हैं। सवर्णों में अंतरजातीय विवाहों को बहुत हद तक
स्वीकार किया जाने लगा है, परंतु जब मायावती खटिया और बिटिया
की बात कर रही हैं तो बिल्कुल साफ है कि उनके कहे-लिखे में
सद्भावना और सहिष्णुता दूर तक नहीं है। इसमें सवर्णों का
खुलेआम तिरस्कार निहित है। मायावती को पुस्तक में उपर्युक्त
बातें लिखने से पहले सोच लेना चाहिए था कि जिन मनुवादियों की
मायावती आलोचना करती हैं, उन्हीं मनुवादियों की गोद में बैठकर
उन्हें सर्वजन हिताय की बात भी सूझ सकती है प्रधानमंत्री की
कुर्सी करीब लगती है और इसमें उन्हें बिल्कुल नई राजनीतिक पारी
खेलनी पड़ सकती है।
मायावती को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि दक्षिण भारत में
दलितों की सियासत को पिछड़ों की राजनीति निगल गई है और वहां अब
दलित राजनीति के नाम पर कुछ भी अवशेष नहीं है। ले देकर उत्तर
भारत में दलित राजनीति का जो दबदबा है, उसमें समझ और सद्भावना
की कमी तथा स्वार्थ की बू आती है, जो एका सी दिखती है, उसमें
भी बिखराव अंतर्निहित है। मायावती की उत्तर भारत की दलित
राजनीति में अंबेडकर का चिंतन तो बिल्कुल गायब है। ऐसे में
उनके जैसी नेता कौन से बहुजन और सर्वजन का भला कर पाएंगी, यह
बेहद विचारणीय सवाल है। मायावती सवर्णों अर्थात सर्वजन के
कितने नजदीक हैं, यह भी उनकी किताब के अगले पृष्ठ पर स्पष्ट हो
गया है। किताब किसी भी लेखक केव्यक्तित्व का आईना होती है और
उसमें यह भी झलकता है कि समाज को लेकर लेखक की अपनी व्यक्तिगत
सोच वास्तव में क्या है।
अपनी किताब के पृष्ठ 155 पर उन्होंने यह भी लिखा है कि
‘सन 1977 में बहुजन समाज ने तय किया कि कांग्रेस की सरकार नहीं
बनने देंगे, वैसा ही हुआ। परंतु जब बाबूजी के प्रधानमंत्री
बनने की बात आई तब हलचल मच गई। जबर्दस्त चर्चा उठी कि एक चमार
(बाबू जगजीवन राम) प्रधानमंत्री कैसे बन जाएगा। यही हुआ पं.
मोरार जी देसाई प्रधानमंत्री बने। बहुजन समाज अपमानित महसूस
करता हुआ बाबूजी के पास पहुंचा और अनुरोध किया कि बाबूजी आप
नीला झंडा थाम लें और बहुजन समाज की अगुवाई करें। हमें अब और
अधिक अपमान बर्दाश्त नहीं। परंतु बाबू जी ने एक नहीं सुनी और
घूम-फिरकर उन्हीं मनुवादियों के साथ खड़े रहे। जीते जी तो वे
समाज का भला करने से रहे, उनके देहांत के बाद उनकी संपत्ति का
बंटवारा उनकी सवर्ण बहू और सवर्ण दामाद के बीच हो गया।’ जब
मायावती सवर्णों की खटिया और बिटिया की बात करती हैं तो वे यह
क्यों भूल जाती हैं कि बाबू जगजीवन राम ने इस परंपरा को बहुत
पहले ही आगे बढ़ा दिया था। उनकी सवर्ण बहू और उनका सवर्ण दामाद
मायावती को क्यों रास नहीं आता। व्यवहार का यह दोहरापन लिए
मायावती अंततः बहुजन समाज का खास कर दलितों का कौन सा हित साध
रही हैं?
जगजीवन बाबू को ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभी सम्मान
देते थे। वे नीली छतरी थामकर अपनी फजीहत नहीं तो और क्या
कराते? जगजीवन राम किन परिस्थितियों में प्रधानमंत्री नहीं
बने, यह विवाद का विषय हो सकता है, लेकिन वे प्रधानमंत्री बनने
के लिए मायावती जितने आतुर तब भी नहीं थे जबकि वे हमेशा
मायावती से कहीं ज्यादा ताकतवर और चिंतनवादी रहे। बल्कि उस समय
उन्हें प्रधानमंत्री पद का दावेदार माना भी गया, जबकि मायावती
को नहीं माना जा रहा है, यह अलग बात है कि कुछ दीगर दलों के
स्वार्थी नेता दलित वोटों के लालच में मायावती को बीच-बीच में
प्रधानमंत्री का सपना दिखाकर उन्हें भ्रम में डाले हुए हैं और
एक मायावती हैं जो यकीनपूर्वक इनके झांसे में अपने को उलझाए
हुए हैं। इसलिए मायावती ने हमेशा एक सवाल उछाला है कि दलित की
बेटी प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकती। वे यह भूल गई हैं कि
दलित का बेटा पहले ही इस देश का राष्ट्रपति बन चुका है और
राष्ट्रपति का पद प्रधानमंत्री के पद से कहीं अधिक गरिमामय है।
मायावती ने अपने सफरनामे में एक जगह लिखा है कि मनुवादी
व्यवस्था में क्षत्रिय भी अपमानित रहा है और आज भी है।
दस वर्ष की आयु का ब्राह्मण, सौ वर्ष की आयु के
क्षत्रिय से श्रेष्ठ माना जाता है। परंतु वे यह बिल्कुल भूल
जाती हैं कि मनुस्मृति की रचना किसी ब्राह्मण ने नहीं की थी।
मनुस्मृति एक व्यवस्था थी, जो खुद महराज मनु ने अपने पुत्रों
के लिए निर्धारित की थी। कार्य विभाजन की दृष्टि से उन्होंने
चार वर्ण बनाए थे। एक क्षत्रिय राजा ने अपनी ही बनाई व्यवस्था
के तहत अगर खुद को ब्राह्मण से कमतर माना, तो इसमें किसका दोष
था? ब्राह्मण ने कभी किसी से नहीं कहा होगा कि उसे प्रणाम करो।
जो लोग प्रणाम करते हैं, और उन्हें ब्राह्मण का आशीर्वाद न
देना उनकी भावना का निरादर है।
प्रश्न है कि मायावती क्या साबित करना चाहती हैं। रही
बात दलितों केउत्पीड़न की तो ब्राह्मण न कभी सामंत रहे और न
राजा! मायावती ने सफरनामे में एक बात और भी लिखी है ‘वीपी सिंह
के राज्य मांडा में दास पुत्रों की नव विवाहित बहुओं के साथ
दुराचार होता था।’ हालांकि इसका कोई प्रमाण मायावती के पास
नहीं होगा। सुनी सुनाई बातों को लेखन का आधार बनाना लेखकीय
दायित्व की संकीर्णता और गैर जिम्मेदार लेखन में आता है। एक ओर
वे क्षत्रियों को दलित बताने का प्रयास कर रही हैं, दूसरी ओर
वे उन्हें दलितों पर जुल्म ढाने वाला आततायी कहने में भी पीछे
नहीं हैं। इसलिए क्षत्रियों के लिए उनकी सोच क्या है, यह उनकी
अपनी किताब में ही स्पष्ट है।
सफरनामे में उन्होंने रामायण और महाभारत को दासप्रथा को
बढ़ावा देने वाला करार दिया है। रामायण, महाभारत दोनों ही
हिंदू समाज के आस्था ग्रंथ हैं और इनमें जीवन की हर समस्याओं
के समाधान निहित हैं कोई यदि उन्हें नहीं मानता तो यह उनकी
निजी सोच-समझ है। आखिर मायावती यह क्यों भूल जाती हैं कि
अंबेडकर और ज्योतिबाफुले ने सत्ता पाए बगैर जो काम किया उसका
दसवां अंश भी वह सत्ता में रहकर नहीं कर सकी हैं। दलितों को
लेकर संविधान में तेरह संशोधन किसने किए। अंबेडकर का संविधान
निर्माण में योगदान सर्वविदित है लेकिन दलितों के ढांचागत
विकास को अंजाम देने की सोच क्या देश केसवर्ण नेताओं की नहीं
रही? दलित की बेटी की देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री
बनाने का काम भी उन्हीं मनुवादियों ने किया था, जिसे वे हमेशा
अपनी आलोचना का विषय बनाए रहती हैं।
मौजूदा परिस्थितियों में मायावती को यह तो स्पष्ट करना
ही होगा कि अगर वे सर्वजन केसाथ हैं तो सर्वजन के विपरीत लिखी
बातों को अपनी किताब से हटाने के प्रति खुलेमन से वे कितनी
गंभीर हैं? क्या अपनी किताब में कोई संशोधन करेंगी? आज जिस तरह
वह बसपा को सर्वजन की पार्टी बताती हैं मेरे संघर्षमय जीवन एवं
सर्वजन मूवमेंट का सफरनामा पुस्तक भी उन्होंने लिखी है, इस
विषय पर उनकी सोशल इंजीनियरिंग को ध्यान में रखते हुए संशोधित
किताब कब आ रही है? क्या मनुवादियों के इस अपमान के लिए उन्हें
मनुवादियों से क्षमा याचना नहीं करनी चाहिए? ये तमाम कई ऐसे
सवाल हैं जो उन्हें राजनीति के हर पायदान पर झकझोरते मिलेंगे।
काश! मायावती सर्वजन और बहुजन का निहितार्थ स्पष्ट कर पातीं
और वाकई सर्वजन के लिए काम करतीं।
(लेखक अमर उजाला लखनऊ में मुख्य उपसंपादक हैं)
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