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बॉलीवुड को आस्कर से ज़िंदगी!
लॉस
एंजिल्स। 'एकेडमी अवार्ड आफ मेरिट' यानि आस्कर पुरस्कार।
फिल्मी दुनिया में जिसे पाने के लिए कलाकार सपने देखता है।
आस्कर पुरस्कार की प्रतीक इंसान की 13.5 इंच की सुनहरी मूर्ति
के लिए भारत का बॉलीवुड न जाने कब से तरस रहा था। दो भारतीय
फिल्मों स्लमडॉग और स्माइल पिंकी ने आठ आस्कर पर कब्जा जमाकर
हॉलीवुड और बॉलीवुड में अपना झंडा गाड़ा। यह फिल्में भारतीय
जनजीवन की सच्चाइयों पर आधारित हैं, और इनका निर्माण पूरी तरह
से विदेशियों ने किया है। काश! इनके निर्माता भी भारतीय ही
होते तो भारतीयों और बॉलीवुड के लिए यह खुशी आस्कर से भी आगे
चली जाती। भारतीय फिल्मों को आस्कर मिलने के बावजूद यह सवाल
फिर जोर पकड़ गया है कि 'मदर इंडिया' और 'लगान' जैसी फिल्में
आस्कर क्यों नहीं ला सकीं, जबकि इन फिल्मों ने भी अपने दौर में
बड़ी सफलता का परचम फहराया है।
भारतीय फिल्म उद्योग के लिए आस्कर की सफलता मायने तो
रखती है, लेकिन एक मंथन के लिए प्रेरित भी करती है कि क्या जब
तक किसी बालीवुड में विदेशी फिल्म निर्माता-निर्देशक की
फिल्म नहीं होगी तब तक बालीवुड आस्कर के सपने नहीं देखे।
क्योंकि कहा ना कि इससे पहले कुछ और फिल्में भी आस्कर के लिए
नामित हुई थीं लेकिन वे कुछ दूर चलीं पर आस्कर तक नहीं पहुंच
सकीं। बॉलीवुड में इन पुरस्कारों के आने के बाद यहां की
फिल्मों और संगीत में छाया एक निराशा का वातावरण दूर हुआ है और
फिर से आगे निकलने के लिए एक नया घमासान छिड़ने का रास्ता खुल
गया है। उम्मीद की जा रही है कि बॉलीवुड को अब और अच्छी
फिल्में और नया संगीत मिलेगा।
बालीवुड में आस्कर के आगमन का मार्ग मुंबई की
झोपड़पट्टी से गुजरता है, जहां से करोड़पति बनने की कहानी
सुनाने वाली फिल्म 'स्लमडॉग निकलती है, जिसके बाल कलाकारों की
जिंदगी ऐसे सुनहरे सपनों से कोसों दूर है। सच्चाई तो यह है कि
लास एंजिल्स में 'सितारों' सा सम्मान पाया अजहर बेहरामपाड़ा
में प्लास्टिक की झोपड़ी में रहता है। वैसे तो फिल्म में इस
बस्ती के करीब दो दर्जन बच्चों ने काम किया है। लेकिन अवार्ड
समारोह में प्रतिनिधित्व के लिए सिर्फ दो बच्चों अजहर एवं
रूबीना को चुना गया था। अजहर ने फिल्म में नायक के बड़े भाई के
बाल्यकाल का किरदार निभाया है जबकि रूबीना ने नायिका के
बाल्यकाल का अभिनय किया है। अजहर अपने परिवार में सबसे छोटा
है। उससे बड़ा एक भाई और दो बहनें हैं। पिता सलीम कबाड़ का
व्यवसाय करते हैं और टीबी से पीड़ित हैं। स्माइल पिंकी उस
बच्ची की कहानी है जो भारत में उत्तर प्रदेश राज्य के
मिर्जापुर जिले के रामपुर टिवरी गांव की रहने वाली है, जिसके
होंठ कटे हैं जिन्हें एक चिकित्सक सुबोध सिंह ने ऑपरेशन करके
पिंकी के चेहरे पर मुस्कान ला दी और वह एक हीनभावना से बाहर
निकल आई। इसी पर बनी लघु फिल्म स्माइल पिंकी ने आस्कर जीता। इस
लघु फिल्म ने द फाइनल इंच को पछाड़ा। इन पुरस्कारों के लिए
मुंबई सहित भारत के विभिन्न शहरों में एक खुशी का माहौल है।
एआर रहमान के चेन्नई से लेकर मिर्जापुर की पिंकी का गांव जश्न
मना रहा है। आस्कर मिलने के बाद इन फिल्मों की चर्चा तो होती
ही रहेगी, थोड़ा यह भी जान लिया जाए कि आस्कर की कहानी क्या
है।
आस्कर 80 साल का हो चुका है। सन् 1929 में 'अकादमी ऑफ
मोशन फिक्चर आर्ट्स एंड साइंस' ने इन पुरस्कारों की शुरूआत की
थी। आस्कर पुरस्कार 25 श्रेणियों में दिए जाते थे। इनमें दस
श्रेणियां समाप्त की जा चुकी हैं। इसके नामांकन और विजेता का
चुनाव 6000 हजार अकादमी सदस्य करते हैं। हर साल 23 जनवरी को
नामांकनों की घोषणा होती है और फरवरी में समारोह। सन् 1953 में
पहली बार इस कार्यक्रम का प्रसारण टेलीविजन पर हुआ था और आज
करीब एक अरब से ज्यादा लोग इसे टेलीविजन पर देखते हैं। इससे
कुछ रोचक बातें भी जुड़ी हुई हैं जैसे छ: साल की शर्ली टेंपल
को यह आनरेरी पुरस्कार दिया गया था। जान मिल्स ने इस पुरस्कार
को लेने के बाद कुछ भी नहीं कहा था, जबकि गरीर गारसन ने 1943
में इसे जीतने पर लंबा भाषण दिया था। सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा
की फिल्म के वर्ग में पहली भारतीय फिल्म 'मदर इंडिया' 1956 में
नामित हुई थी। दूसरी भारतीय फिल्म 'सलाम बॉम्बे' 1988 में
नामित हुई और तीसरी भारतीय फिल्म 'लगान' 2001 में नामित हुई
थी। करीब 36 फिल्मों में से 2 बार यह पुरस्कार मिला। सन् 1991
में फिल्मकार सत्यजीत राय को आस्कर का लाइफटाइम अचीवमेंट
अवार्ड मिला था, जबकि सन् 1983 में 'गांधी' फिल्म के लिए बेस्ट
कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का अवार्ड भानु अथैया को मिला।
इस साल कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने वाली
स्लमडॉग के निर्माता और निर्देशक विदेशी हैं, जबकि फिल्म के
सभी प्रमुख कलाकार भारतीय या भारतीय मूल के हैं। यह फिल्म करीब
750 करोड़ रूपए की कमाई कर चुकी है। स्लमडॉग फिल्म निर्माण से
ही विवादों में रही है। यह विकास स्वरूप के उपन्यास 'क्यू एंड
ए' पर आधारित है। विकास स्वरूप प्रिटोरिया में भारतीय उप
उच्चायुक्त हैं। इस फिल्म में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए सीन
पेन (मिल्क) और सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के लिए केट विंसलेट (द
रीडर) को और सर्वश्रेष्ठ सहअभिनेता के लिए हीथ लेजर (द डार्क
नाइट) और सर्वश्रेष्ठ सह अभिनेत्री के लिए पेनोलेप क्रुज
(विकी, क्रिस्टीना, बार्सीलोना) को आस्कर दिया गया। स्लमडॉग के
संगीत के लिए एआर रहमान और 'जय हो' गाने के रचियता प्रख्यात
गीतकार गुलजार को भी यह अवार्ड मिला। रेसुल पूकुट्टी को
सर्वश्रेष्ठ ध्वनि मिश्रण का आस्कर मिला। सर्वश्रेष्ठ निर्देशक
डैनी बायल ने, सर्वश्रेष्ठ सिनेमेटोग्राफी के लिए एंथोनीडोड
मेंटल, सर्वश्रेष्ठ फिल्म एडीटिंग के लिए क्रिस डिकेंस और
सर्वश्रेष्ठ एडॉप्टेड स्क्रीनप्ले के लिए सिमोन बूफाय ने आस्कर
जीता।
दुनिया को 'जय हो' सुनाकर आस्कर अवार्ड जीतने वाले
भारतीय संगीतकार एआर रहमान की यह उपलब्धि दुनिया में भारतीय
संगीत के प्रति दिलचस्पी पैदा करने में मददगार तो साबित होगी।
अमेरिका के संगीतकार पीटर लैवेजोली कह रहे थे कि 'वर्ष 1960
में पंडित रविशंकर जैसे भारतीय संगीतकारों और मशहूर म्यूजिकल
ग्रुप बीटल्स की जुगलबंदी ने पश्चिमी देशों का ध्यान खींचा था।
यह मुख्यत: सितार, तबले और अन्य संगीत उपकरणों के सुरों पर
आधारित भारतीय संगीत के लिए एक नई पहल थी।' 'भैरवी- द ग्लोबल
इम्पैक्ट ऑफ इंडियन म्यूजिक' पुस्तक के लेखक लेवेजोली ने कहा
कि 'आस्कर में स्लमडाग मिलियनेयर की जबर्दस्त कामयाबी और काफी
पहले से ही आस्कर के हकदार रहे रहमान की सफलता से स्पष्ट संकेत
मिलते है कि पश्चिमी देशों में भारतीय फिल्म संगीत के प्रति
जागरूकता शुरू हो गई है।' रहमान की संगीत रचनाओं की अब तक करीब
10 करोड़ एलबम बिक चुकी हैं। उनकी पहचान बाजार में मांग वाले
एक ऐसे संगीतकार के रूप में की जाती है जिसने अपने संगीत में
ताजगी भरते हुए समकालीन भारतीय संगीत को पुनर्परिभाषित किया
है।
स्लमडॉग मिलियनेयर को लेकर भारतीय समुदाय में नकारात्मक
भाव भी सामने आए हैं और यह फिल्म समीक्षकों के बीच में भारी
आलोचना का शिकार भी हुई है। मुंबई के धारावी इलाके में इस
फिल्म पर खुशी है तो गुस्सा भी है। फिल्म में धारावी के चित्रण
पर नाराजगी है। फिल्म के नाम पर आपत्ति उठाने वाले पॉल रॉफिल
और गायक कुमार शानू कहते हैं कि कभी अंग्रेजों ने चुनिंदा
होटलों और क्लबों में भारतियों की तुलना कुत्तों से करते हुए
उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था। अब वही अंग्रेज इस फिल्म
के जरिए हमारी गरीबी को दुनिया में दिखाकर हमारा मजाक उड़ाना
चाहते हैं। रॉफिल बताते हैं कि लगभीग 17 लाख की आबादी वाली
धारावी भले ही पूरी दुनिया में एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी
के रूप में जानी जाती हो, लेकिन यह मुंबई का एक ऐसा लघु उद्योग
केंद्र भी है जहां बनी वस्तुएं पूरी दुनिया में धूम मचा रही
हैं। पॉल तो यह सवाल भी उठाते हैं कि यदि बिल्कुल यही फिल्म
किसी हिंदुस्तानी निर्माता-निर्देशक ने भारतीय बैनर से बनाई
होती, तो क्या उसे आस्कर की दौड़ में भी शामिल किया जाता?
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