माओवादी सत्‍ता में घिसटता नेपाल

  • यज्ञपुरूष गहिरे

काठमांडू। नेपाल में संविधान के भावी स्‍वरूप और नेपाल की शासन प्रणाली को लेकर भारी घमासान की ‌स्‍थिति ने यहां के हालात और बिगाड़ दिए हैं। विवाद के केंद्र में चीन है जो इस मामले में जबरदस्‍ती का सलाहकार बना हुआ है। राजतंत्र समाप्‍त हो जाने के बाद गठबंधन की सरकार चला रहे माओवादी, चीन के आर्शीवाद से नेपाल को रातों-रात ‌एक कम्‍युनिस्‍ट देश बना देना चाहते हैं। इस योजना के अमल के लिए प्रधानमंत्री कमल दहल प्रचंड, नेपाली सेना और पुलिस में पूरी तरह से कम्‍युनिस्‍ट मानसिकता के लड़ाके भर्ती करने हैं। जाहिर सी बात है कि कम्‍युनिस्‍ट देश का सपना पूरा करने में उन्‍हें उसी मानसिकता की सेना और पुलिस भी बनानी होगी जिसके सहयोग के बिना यह योजना सफल बनाना प्रचंड के लिए आसान नहीं है। नेपाल के सुप्रीम कोर्ट ने भी फिलहाल माओवादी लड़ाकों की नेपाली सेना में भर्ती पर रोक लगा दी है। इससे माओवादियों में काफी बेचैनी है।

प्रचंड की मुश्किलें अब बढ़ती ही जा रहीं हैं। नेपाली कांग्रेस ने प्रचंड सरकार में शामिल होने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया है। उसका कहना है कि वह नेपाल के वर्तमान हालात में सरकार में शामिल नही होना चाहती। नेपाली कांग्रेस के प्रवक्ता नरसिंह खत्री का आरोप है कि प्रचंड सरकार ने न केवल नेपाल के प्रशासनिक तंत्र को तहस-नहस कर दिया है अपितु सरकारी संस्थाओं का राजनीतिकरण करने से नेपाल के हालात और ज्यादा बिगाड़ दिए हैं। प्रचंड नहीं समझ रहे कि गठबंधन में मनमर्जी के लिए कोई जगह नही होती है। वैसे भी नेपाल आर्थिक रूप से काफी कमजोर हो गया है और ऐसे में उसकी मदद करने वालों की अपनी शर्तें हैं, जिनमें नेपाल में चीन के भारी हस्‍तक्षेप को तो तुरंत रोकना शामिल है। प्रचंड यह समझे हुए हैं कि नेपाल में उनकी सत्‍ता हमेशा के लिए है और चीन हर तरह से हमेशा उनकी मदद के लिए खड़ा रहेगा। वे शुरू से ही संविधान के भावी स्‍वरूप पर गठबंधन के सहयोगियों के अभिमत की अनदेखी करते आ रहे हैं। उनकी कार्यप्रणाली लोकतंत्र की भाषा जानती ही नही है, जिसकी प्रेरणा उन्‍हें चीन से मिला करती है, इसलिए गठबंधन की मर्यादाएं रौंदकर वे नेपाल पर अपने एजेंडे थोपते ही जा रहे हैं।
दुनिया यह भलि-भांति जानती है कि कमल दहल प्रचण्‍ड की भी नेपाल में राजतंत्र समाप्‍त करके उसे लोकतांत्रिक देश बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। इस दृष्‍टिकोण से वह नेपाल के महानायक कहलाए गए। लेकिन वह इस ताज को बचाए रखने में कामयाब नहीं हो सके हैं, क्‍योंकि उन पर चीन का एक ठप्‍पा लग गया है जिससे अब मुक्‍ति मिलना संभव नहीं है। भले ही वह आज जो कुछ भी कर रहे हैं अपने माओवादी मित्रों या ‌फिर चीन के दबाव में कर रहे हों। सहयोगी देशों के बीच एक संतुलन कायम करने और सबसे पहले नेपाल की जनता की आर्थिक प्रगति के लिए सभी का सहयोग लेना जरूरी था जिसमें कि कमल दहल प्रचंड कामयाब नहीं हो पाए। वे एक राष्‍ट्र का प्रधानमंत्री होना भूलकर पहले दिन से ही चीन के दरबारी बन गए। वे अभी भी नेपाल की मीडिया और अपने राजनीतिक आलोचकों से हिंसक तरीके से निपटना नहीं छोड़ सके हैं। मीडिया को धमकाने की पहल तो खुद प्रचंड ने ही की थी। उनके माओवादी आज भी उसी तरह हमले और लूटमार कर रहे हैं। उनको नेपाल की सेना और पुलिस बनाने के लिए प्रचंड गठबंधन के सहयोगियों की राय को आंखें दिखा रहे हैं। इससे आज नेपाल के हालात अत्‍यंत चिंताजनक हो रहे हैं और लोकतांत्रिक तरीकों से स्‍थापित की गई सरकार का अस्‍तित्‍व एक नाजुक मोड़ पर आ गया है। पहले से ही कई ऐसे मुद्दे हैं जो नेपाल के बाहर गूंज रहे हैं और गठबंधन सरकार में विघटन पैदा कर चुके हैं। नेपाल के बाहर की दुनिया को यह तय करने में कठिनाई हो रही है कि वह नेपाल के राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और सुरक्षा जैसे मामलों पर किसकी बात का भरोसा करें, क्‍योंकि नेपाल में संविधान के भावी स्वरूप को लेकर ही माओवादियों और गठबंधन के सहयोगियों के बीच खाई और ज्‍यादा बढ़ती जा रही है। नेपाल में पूंजीनिवेश की स्‍थिति लगभग समाप्‍त सी हो गई है।
दरअसल नेपाल में सत्‍ता संभालने से पहले कमल दहल प्रचण्‍ड क्‍या थे और उनके ऊपर क्‍या इल्‍जामात हैं और उन्‍होंने नेपाल की राजशाही समाप्‍त करने की रणनीति में क्‍या-क्‍या ऐसा किया, जिसका आज भी सरकार के सहयोगी उनका समर्थन नहीं करते तो यह मुद्दा एक किनारे जा रहा था। यह इसलिए क्‍योंकि नेपाल की राजशाही के खिलाफ और वहां लोकतंत्र के लिए जनादेश में नेपाल की जनता ने माओवादियों पर सबसे ज्‍यादा भरोसा किया। प्रचंड इस आंदोलन के प्रमुख नेताओं में हैं। हालाकि नेपाल में माओवादियों को पूरी तरह से स्‍वीकार भी नहीं किया गया है, लेकिन उनके साथ चलने के पीछे कुल मिलाकर यही आशा रही कि राजतंत्र से मुक्‍ति और नेपाल में लोकतांत्रिक सरकार का सूर्योदय होने जा रहा है। माओवादी नेता कमल दहल प्रचण्‍ड, नेपाल की जनता की दूसरी आशा पर खरे नहीं उतर सके हैं। वे चाहते तो नेपाल की जनता के मन से राजतंत्र को उतार देते, लेकिन वे जिस तरह तुरंत चीन के हाथों का खिलौना बन गए उससे नेपाल की जनता में एक निराशा का भाव जोर पकड़ रहा है। नेपाल न चीन का है और न भारत का या किसी अन्‍य पड़ौसी का कोई अंग है। इसका हिंदू स्‍वरूप भारत के लिए कोई राजनीतिक या सामाजिक बख्‍शीश भी नहीं दे रहा है, भारत भी इसकी भूमि को किसी दूसरे देश के खिलाफ इस्‍तेमाल नहीं करना चाहता है और ना ही नेपाल को भारत से कोई खतरा है। तो फिर नेपाल की माओवादी गठबंधन सरकार के चीन से भी बहुत ज्‍यादा सरोकारों की जरूरत नही होनी चाहिए। लेकिन हो यही रहा है। प्रचण्‍ड इसका चाहे जितना खंडन करें, लेकिन उन पर चीन का ठप्‍पा लग चुका है, और ये ही नेपापल की प्रगति में एक ग्रहण है। नेपाल की जनता अगर गरीब है तो वह इतनी कमजोर नहीं है कि वह चीन के पीछे चल देगी क्‍योंकि अगर उसे ऐसा ही करना था तो वह राजशाही के जबड़ों में फंसी होने के दौरान भी ऐसा कर सकती थी। नेपाल में वास्‍तव में उसकी पुरातन विरासत को छिन्‍न-भिन्‍न करने की कोशिशें चल रही हैं और इसमें गठबंधन की इच्‍छा और उसके धर्म को दरकिनार करके स्‍वेच्‍छाचारी आचरण किया जा रहा है।
इसके एक नहीं बल्‍कि कई उदाहरण और कारण हैं। माओवादी सरकारी फैसलों में अपनी मनमानी करते जा रहे हैं, चाहे वह प्रशासनिक मामले हों, सामाजिक हों या राजनीति मामले हों। इनमें विदेशनीति सबसे ज्‍यादा प्रभावित हुई है, जिसको लेकर विश्‍व समुदाय में लगातार काफी भ्रम और अविश्‍वास की स्‍थिति बनी आ रही है। अमरीका, भारतीय उप महाद्वीप में भयावह आतंकवाद और नेपाल और उसकी मौजूदा सरकार में चीन के भारी दखल से काफी चिंतित है। वह अपने लिए भौगोलिक और सामरिक दृष्‍टि से अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण नेपाल की राजनीतिक घटनाओं और परिवर्तनों को नज़रअंदाज नहीं कर सकता है। उसकी नज़र में माओवादियों के कारण नेपाल की संप्रभुता सुरक्षित नहीं है। इसलिए नेपाल की ये नई परेशानियां हैं जो पहले से ज्‍यादा बढ़ी हैं। इसी प्रकार नेपाल में सामाजिक और आध्‍यात्‍मिक मामलों में भी भारी गतिरोध आया हुआ है। भगवान पशुपति नाथ मंदिर के भारतीय पुजारियों को हटाने का विवाद खत्‍म नहीं हुआ है। इस मामले से बेवजह ही हिंदुओं में नेपाल की छवि को नुकसान हुआ। कुमारी देवी की पूजा रोकने का मामला भी यहां काफी गर्म है और सामाजिक स्‍तर पर उससे छेड़छाड़ की कोई जरूरत नहीं दिखाई देती थी। सेना में विद्रोही माओवादियों की भर्ती की जिद पर तो भारी गतिरोध है ही। भारत और नेपाल के संबंधों को लेकर तनाव का ठींकरा नेपाली जनता पर कैसे फूट रहा है, इसे तो नेपाल का बच्‍चा-बच्‍चा जान ही रहा है। नेपाल के पूर्व नरेश महाराज वीरेंद्र की उनके परिवार सहित हत्‍या की घटना की फिर से जांच कराने के निर्णय पर भी विवाद शुरू हो चुका है। तत्कालीन प्रधानमंत्री गिरिजा प्रसाद कोईराला की सरकार में गठित पैनल ने उस समय के राजकुमार दीपेंद्र पर हत्या का आरोप लगाया था और कहा था कि ड्रग्स और अल्कोहल के नशे में उन्होंने एक जून 2001 को यह कृत्य किया था। हालॉकि उस समय कोइराला सरकार की रिपोर्ट की वैधता पर काफी सवाल उठाए गए थे, क्योंकि मृत परिवार के किसी भी सदस्य का पोस्टमार्टम नहीं कराया गया था। पूर्व नरेश ज्ञानेंद्र को इस षड्यंत्र का मुख्य केंद्र बिंदु माना गया। उस हत्याकांड के बाद ही ज्ञानेंद्र नेपाल के राजा बने थे। ज्ञानेंद्र पर सबूतों को नष्ट करने का आरोप लगाते हुए नेपाल के प्रधानमंत्री कमल दहल प्रचंड ने पांच सदस्‍यों के पैनल से इस पूरे मामले की फिर से जांच कराने की बात कही है। लेकिन इनकी इस पहल से नेपाल की जनता में एक भ्रम और विवाद की स्‍थिति पैदा हो गई है। माना जाता है कि कमल दहल प्रचंड इसमें किसी भी तरह से निष्‍पक्षता नहीं बरतेंगे क्‍योंकि वह पहले से नेपाल की राजशाही के खिलाफ सशस्‍त्र संघर्ष में शामिल रहे हैं। उन्‍हें आशंका है कि ज्ञानेंद्र नेपाल की राजनीति में सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं इस लिए उनके ऐसे प्रयासों को इसी प्रकार नाकाम कर दिया जाए। इस मामले की जांच से नेपाल में विभिन्‍न मत आपस में भिड़ेंगे और यह मामला हमेशा के लिए विवाद ग्रस्‍त ही हो जाएगा।
नेपाल में कोई भी ऐसा मामला नहीं है जिसको लेकर गठबंधन सरकार और नेपाली जनता में भारी गतिरोध न हो। ऐसे ही संविधान के प्रारूप का मामला है। सत्तारूढ़ दल के शीर्ष नेता ने ही नेपाल के वित्त मंत्री बाबूराम भंट्टराई के संविधान प्रारूप पर सवालिया निशान लगा दिया है। एकीकृत सीपीएन-माओवादी दल के कंट्टरपंथी नेता मोहन वैद्य किरण का कहना है कि सार्वजनिक किए गए संविधान प्रारूप पर संविधान प्रारूप समिति में चर्चा ही नहीं की गई। माओवादी दल के साप्ताहिक मुखपत्र महिमा में कहा गया है कि पता नहीं कि प्रारूप कैसे सार्वजनिक किया गया। इस पर संविधान प्रारूप समिति में विचार-विमर्श नहीं किया गया, जो कि बेहद गंभीर मामला है, जिसे समुचित चर्चा के बगैर ही सार्वजनिक कर दिया गया। आशंका है कि वैद्य के नेतृत्व में कंट्टरपंथी धड़े और भट्टराई के नेतृत्व वाले उदारवादी धड़े के बीच मतभेद गंभीर हो सकते हैं जिससे संविधान निर्माण की प्रक्रिया में भारी गतिरोध आ सकता है। जैसे-जैसे इनके काम के तौर तरीके सामने आते जा रहे हैं वैसे-वैसे नेपाली जनता के बीच में इनकी लोकप्रियता और नीतियां कमजोर भी पड़ रही हैं। नेपाल में हर रोज ऐसी ही स्‍थितियां निर्मित हो रही हैं जिनसे विश्‍व समुदाय में भी माओवादी शासन के प्रति अविश्‍वास बढ़ता ही जा रहा है। जहां तक नेपाल के भारत से तल्‍ख होते जा रहे रिश्‍तों का सवाल है तो इसके परिणाम भी नेपाल की जनता की समृद्घि के खिलाफ ही जाते हैं।

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