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हसन
कमाल को जीवंती गौरव सम्मान
मुंबई।
जीवंती फाउंडेशन, मुंबई ने भवंस कल्चरल सेंटर, अंधेरी के
सहयोग से एसपी जैन सभागार में शायर हसन कमाल को ‘जीवंती गौरव
सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मान स्वरूप वरिष्ठ पत्रकार
नंदकिशोर नौटियाल ने उन्हें प्रशस्तिपत्र और स्मृति चिन्ह भेंट
किया। समारोह संचालक आलोक भट्टाचार्य ने शायर हसन कमाल का ऐसा
आला तवारूफ़ कराया कि उसे सुनकर सामईन परेशान और शायर पशेमान हो
गए। जवाबी कार्रवाई हुए शायर हसन कमाल ने कहा-एक पल को मुझे
लगा कि कहीं मैं अल्लाह को प्यारा तो नहीं हो गया क्योंकि
ज़िंदा आदमी की इतनी तारीफ़ तो कोई नहीं करता। बहरहाल इतना बता
दें कि साप्ताहिक उर्दू ब्लिट्ज़ के पूर्व संपादक होने के साथ
ही साथ शायर हसन कमाल उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ के संपादक हैं।
ग़ालिब अवार्ड से सम्मानित लखनऊ के मूल निवासी इस शायर ने कई
फ़िल्मों के गीत भी लिखे जिनमें ‘निकाह’, ‘तवायफ़’, ‘आज की
आवाज़’ आदि फ़िल्मों के गीत काफ़ी लोकप्रिय हुए। बीआर चोपड़ा के
कई धारावाहिकों की पटकथा में भी उनका अच्छा योगदान रहा।
संस्था अध्यक्ष माया गोविंद के स्वागत के बाद वरिष्ठ
शायर नक़्श लायलपुरी की सदारत में मुशायरा का आयोजन हुआ।
मुशायरे का आग़ाज़ करने आए शायर सईद राही ने असरदार तरन्नुम
में ग़ज़ल सुनाकर रंग जमाया-
अब कहाँ ख़त का आना जाना है, ये तो आवाज़ का ज़माना है
लोग उड़ते हैं आसमानों में, घर पे होना तो इक बहाना है
अपने सूफ़ियाना अलबम ‘रूबरू’ से चर्चित हुए युवा शायर
हैदर नजमी ने भी तरन्नुम में ग़ज़ल पढ़कर दाद वसूल की-
कभी यूं भी मेरे क़रीब आ मेरा इश्क़ मुझको ख़ुदा लगे
मेरी रूह में तू उतर जरा कि मुझे कुछ अपना पता लगे
न तू फूल है न तू चांद है न तू रंग है न तू आईना
तुझे कैसे कोई मैं नाम दूं तू ज़माने भर से जुदा लगे
शायर देवमणि पांडेय ने अपने ख़ास अंदाज़ में ग़ज़ल सुनाई
जो सामईन को काफ़ी को पसंद आई-
इश्क़ जब करिए किसी से दिल में ये जज़्बा भी हो
लाख हों रुसवाइयां पर आशिक़ी बाक़ी रहे
दिल में मेरे पल रही है यह तमन्ना आज भी
इक समंदर पी चुकूं और तिश्नगी बाक़ी रहे
मुशायरे के नाज़िम अब्दुल अहद साज़ ने रोमांटिक ग़ज़ल
सुनाकर मोहब्बत की ख़ुशबू बिखेरी-
इस तरह जाए न मुझसे रूठकर कहना उसे
घेर लेगी राह में मेरी नज़र कहना उसे
मैं हूं उसके ग़म की दुनिया वो मेरी दुनिया का ग़म
जी न पाएगा वो मुझको छोड़कर कहना उसे
कई फ़िल्मों और धारावाहिकों के पटकथा-संवाद लेखन से
जुड़े वरिष्ठ फ़िल्म लेखक राम गोविंद यहां शायर राम अतहर के रूप
में सामने आए और कामयाब हुए-
कारनामे दूसरे के सर रहे, हम तो यारो नींव के पत्थर रहे
हम लिखा लाए परिंदों का नसीब, उम्र भर घर में रहे बेघर रहे
मुहावरे की भाषा में कहें तो वरिष्ठ शायर ज़फ़र गोरखपुरी
ने अपनी बेहतरीन शायरी से मुशायरा लूट लिया। उनकी ग़ज़ल का
तेवर देखिए-
मर के जी उट्ठूं किसी दिन सनसनी तारी करूं
तेरी आंखों के हवाले से ख़बर जारी करूं
वो कभी मिल जाए मुझको अपनी सांसों के क़रीब
होंठ भी हिलने न दूं और गुफ़्तगू सारी करूं
और इस शेर पर तो हंगामा बरपा हो गया-
इत्तिफ़ाकन बेवक़ूफ़ों के क़बीले में ज़फ़र
मैं ही एक चालाक हूँ फिर क्यों न सरदारी करूँ
माया गोविंद ने तरन्नुम में वो ग़ज़ल पढ़ी जो उन्होंने
सोलह साल की उम्र में लाल क़िले पर सुनाई थी। श्रोताओं की
फ़रमाईश पर ब्रजभाषा के कुछ रसीले छंद सुनाकर उन्होंने अपना
असली रंग जमा दिया। शायर हसन कमाल ने अपनी एक चर्चित नज़्म
सुनाई-
‘गर हो सके तो प्यार के दो बोल भेज दो,
मुमकिन अगर हो गांव का माहौल भेज दो’
फिर उन्होंने अपनी एक लोकप्रिय ग़ज़ल सुनाकर समां बांध
दिया-
कल ख़्वाब में देखा सखी मैंने पिया का गांव रे
कांटा वहां का फूल था और धूप जैसे छांव रे
सबसे सरल भाषा वही सबसे मधुर बोली वही
बोलें जो नैना बावरे समझें जो सैंया सांवरे
सद्रे मुशायरा नक़्श लायलपुरी अपने धीमे लहजे में शेर
सुनाकर सामईन के दिल में उतर गए-
चुभें आंख़ों में भी और रुह में भी दर्द की किरचें
मेरा दिल इस तरह तोड़ो के आईना बधाई दे
खनक उट्ठें न पलकों पर कहीं जलते हुए आंसू
तुम इतना याद मत आओ कि सन्नाटा दुहाई दे
और इस शेर ने तो सबको भिगो दिया-
रहेगा बन के बीनाई वो मुरझाई सी आंख़ों में
जो बूढ़े बाप के हाथों में मेहनत की कमाई दे
मुंबई का भवंस कल्चरल सेंटर एक ऐसा मर्कज़ है जहां
मुशायरा सुनने के लिए बा-ज़ौक़ सामईन तशरीफ़ लाते हैं। इस
मुशायरे में भी वरिष्ठ फ़िल्म एवं नाट्य लेखक जावेद सिद्दीक़ी,
वरिष्ठ रंगकर्मी ललित शाह, शास्त्रीय गायिका सोमा घोष, ग़ज़ल
गायिका सीमा सहगल, संगीतज्ञ ललित वर्मा, अभिनेता राजेंद्र
गुप्ता, अभिनेता विष्णु शर्मा, कवि डॉ बोधिसत्व, कवि कुमार
शैलेंद्र, शायर हस्तीमल हस्ती, शायर खन्ना मुजफ़्फ़रपुरी, शायरा
देवी नागरानी, कथाकार संतोष श्रीवास्तव, प्रमिला वर्मा,
संपादक राजम नटराजन पिल्लै, संपादक अनंत कुमार साहू, हिंदी
सेवी डॉरत्ना झा और सरोजिनी जैन आदि मौजूद थे। व्यंग्यकार अनंत
श्रीमाली ने सबका आभार व्यक्त किया।
आबिद सुरती के जन्मदिन पर गोष्ठी और सम्मान

मुंबई।
साहित्यिक पत्रिका ‘शब्दयोग’ के आबिद सुरती केंद्रित अंक (जून
2010 ) के लोकार्पण एवं आबिद सुरती के 75 वें जन्म दिन पर एक
संगोष्ठी का आयोजन हिंदुस्तानी प्रचार सभा के सभागार में हुआ।
इस अवसर पर आबिद सुरती का सम्मान करते हुए समाज सेवी संस्था
‘योगदान’ के सचिव आरके अग्रवाल ने आबिद सुरती की पानी बचाओ
मुहिम के लिये दस हजार रुपये का चेक भेंट किया। सम्मान स्वरूप
उन्हें शाल और श्रीफल के बजाय उनके व्यक्तित्व के अनुरूप
कैपरीन (बरमूडा) और रंगीन टी शर्ट भेंट की गई।
कार्यक्रम की शुरुआत में आरके पालीवाल की आबिद सुरती पर
लिखी लम्बी कविता ‘आबिद और मैं’ का पाठ फिल्म अभिनेत्री एडीना
वाडीवाला ने किया। सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार शरद जोशी की एक
चर्चित रचना ‘मैं, आबिद और ब्लैक आउट’ का पाठ उनकी सुपुत्री
एवं सुपरिचित अभिनेत्री नेहा शरद ने स्वर्गीय शरद जोशी के
अंदाज़ में प्रस्तुत किया। संचालक देवमणि पांडेय ने निदा फाजली
की एक शेर के हवाले से आबिद का परिचय दिया- हर आदमी में होते
हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना।
समाज सेवी संस्था ‘योगदान’ की त्रैमासिक पत्रिका
शब्दयोग के इस विषेशांक का परिचय कराते हुए अंक के संयोजक और
कथाकार आरके पालीवाल ने कहा कि आबिद सुरती एक ऐसे विरल कथाकार
एवं कलाकार हैं जिन्होंने अपनी क़लम से हिंदी और गुजराती
साहित्य को पिछले पांच दशकों से निरंतर समृद्ध किया है, लेकिन
दुर्भाग्य और दुर्भावनावश इन दोनों भाषाओं में उन्हें वैसी
चर्चा नहीं मिली जिसके वे हक़दार हैं। इसके मूल में यह कारण भी
हो सकता है कि आबिद सुरती बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। कथाकार
और व्यंग्यकार होने के साथ ही उन्होंने कार्टून विधा में महारत
हासिल की है, पेंटिंग में नाम कमाया है, फिल्म लेखन किया है और
ग़ज़ल विधा में भी हाथ आजमाए हैं। ‘धर्मयुग’ जैसी कालजयी
पत्रिका में 30 साल तक लगातार ‘कार्टून कोना ढब्बूजी’ पेश करके
रिकार्ड बनाया है। इसीलिये इस अंक का संयोजन करने में भी काफी
मशक्कत करनी पड़ी है क्योंकि आबिद सुरती को समग्रता में
प्रस्तुत करने के लिये उनके सभी पक्षों का समायोजन करना ज़रूरी
था।
हिंदी साहित्यकार सुधा अरोड़ा ने आबिद सुरती से जुडे
कुछ रोचक संस्मरण सुनाये। उन्होंने हंस में छपी आबिद की चर्चित
और विवादास्पद कहानी ‘कोरा कैनवास’ की आलोचना करते हुए कहा कि
आबिद जैसी नेक शख़्सियत से ऐसी घटिया कहानी की उम्मीद नही थी।
उर्दू साहित्यकार साजिद रशीद और मराठी साहित्यकार प्रतिमा जोशी
ने भी आबिद की शख़्सियत पर प्रकाश डाला। वरिष्ठ गुजराती
साहित्यकार दिनकर जोशी ने आबिद सुरती के साथ बिताए लंबे
साहित्य सहवास को याद करते हुए कहा कि आबिद पिछले कई सालों से
अपने निराले अंदाज में लेखन में सक्रिय हैं। यही उनके स्वास्थ्य
एवं बच्चों जैसी चंचलता और सक्रियता का भी राज है।
श्रोताओं के प्रश्नों का उत्तर देते हुए आबिद सुरती ने
कहा कि 'मेरे सामने हमेशा एक सवाल रहता है कि मुझे पढ़ने के
बाद पाठक क्या हासिल करेंगे, इसलिए मैं संदेश और उपदेश नहीं
देता, आजकल मैं केवल प्रकाशक के लिए किताब नहीं लिखता और महज
बेचने के लिए चित्र नहीं बनाता, मेरी पेंटिंग और मेरा लेखन
मेरे आत्मसंतोष के लिए है, भविष्य में जो लिखूंगा अपनी
प्रतिबद्धता (कमिटमेंट) के साथ लिखूंगा।'
इस आयोजन में आबिद सुरती के बहुत से पाठकों एवं
प्रशंसकों के साथ मुंबई के साहित्य जगत से कथाकार ऊषा भटनागर,
कथाकार कमलेश बख्शी, कथाकार सूरज प्रकाश, कवि ह्रदयेश मयंक,
कवि रमेश यादव, कवि बसंत आर्य, हिंदी सेवी जितेंद्र जैन
(जर्मनी), डॉ रत्ना झा, एएम अत्तार और चित्रकार जैन कमल मौजूद
थे। प्रदीप पंडित संपादक शुक्रवार, डॉ सुशील गुप्ता संपादक
हिंदुस्तानी ज़बान, मनहर चौहान संपादक दमख़म, डॉ राजम नटराजन
पिल्लै संपादक क़ुतुबनुमा, दिव्या जैन संपादक अंतरंग संगिनी,
मीनू जैन सह संपादक, डिग्निटी डाईजेस्ट भी भाग लिया।
पत्रकारिता कोश का विमोचन

मुंबई।
पत्रकारिता कोश-2010 का विमोचन और हिंदुस्तानी मीडिया डॉट
कॉम वेबसाइट का उदघाटन घाटकोपर पश्चिम स्थित हिंदी हाई स्कूल
में वस्त्रोद्योग राज्यमंत्री मोहम्मद आरिफ नसीम खान और मुंबई
कांग्रेस अध्यक्ष कृपाशंकर सिंह ने किया। आफताब आलम इसके
संपादक हैं। हिंदी साहित्य परिषद, आरजे कॉलेज के इस समारोह की
अध्यक्षता दोपहर का सामना के कार्यकारी संपादक प्रेम शुक्ल ने
की। इस अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में हिंदी विद्या प्रचार
समिति के सचिव डॉ राजेंद्र सिंह, निर्भय पथिक के संपादक
अश्विनी कुमार मिश्र, मी मराठी चैनल के संपादक सचिन परब, मुंबई
मित्र/वृत्त मित्र के संपादक अभिजीत राणे, मुंबई कांग्रेस के
उपाध्यक्ष विजय सिंह, मध्य प्रदेश सूचना केंद्र की उप निदेशक
मोहिनी भड़कमकर, एसआई डब्ल्यूएस कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष
प्रोफेसर दयानंद तिवारी, झुंझुनवाला कॉलेज की प्राचार्या डॉ
उषा मुकुंदन, नवभारत के पत्रकार अखिलेश मिश्र, आदि उपस्थित थे।
कार्यक्रम का प्रारंभ डॉ रजनीकांत मिश्र की सरस्वती
वंदना से हुआ और सुरेश मिश्र, प्रदीप पांडेय, डॉ मुकेश गौतम,
अभय मिश्रा, आलोक भट्टाचार्य, कपिल कुमार, ओबैद आजमी आदि ने
अपनी हास्य रचनाएं प्रस्तुत कीं, तत्पश्चात सभी अतिथियों का
शॉल और पुष्पगुच्छ से स्वागत किया गया। पत्रकारिता कोश के
मुखपृष्ठ डिजाइनर खान एहसान और वेबसाइट के डिजाइनर ओबैद आजमी
का विशेष सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन आरजे कॉलेज की
हिंदी विभागाध्यक्षा डॉ मिथिलेश शर्मा और केंद्रीय हिंदी
प्रशिक्षण उपसंस्थान के सहायक निदेशक अनंत श्रीमाली ने किया।
आभार प्रदर्शन कोश के सहायक संपादक राजेश विक्रांत ने किया।
लगभग 700 पृष्ठों वाली इस पत्रिका में मुंबई सहित देश
के विविध क्षेत्रों से प्रकाशित होने वाले विविध भाषाओं के
समाचारपत्र-पत्रिकाओं, समाचार चैनलों के साथ-साथ उनमें कार्यरत
पत्रकार, लेखक, प्रेस फोटोग्राफर, टीवी कैमरामैन आदि की सूची
भी प्रकाशित की गई है। इसके अतिरिक्त प्रेस संगठन, समाचार एवं
फीचर एजेंसियां, जनसंपर्क अधिकारी, जनसंपर्क एजेंसियां,
पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थान, केंद्र एवं राज्य के
मंत्रियों/विधायकों, राज्यों के मुख्यमंत्री, राज्यों के
राज्यपाल, पुलिस स्टेशन, आदि भी शामिल किए गए हैं।
रेखा मैत्र के सम्मान में काव्य संध्या
मुंबई।
अमेरिका से पधारीं कवयित्री रेखा मैत्र के सम्मान में जीवंती
फाउंडेशन, मुंबई की ओर से जुहू में एक काव्य संध्या का आयोजन
किया गया। अध्यक्षता वरिष्ठ कवयित्री माया गोविंद ने की। रेखा
का परिचय कराते हुए कवि-संचालक देवमणि पाण्डेय ने कहा कि बनारस
(उप्र) में जन्मीं रेखा मैत्र की उच्च शिक्षा सागर (मप्र) में
हुई और मुंबई में कुछ साल अध्यापन करने के बाद मेरीलैंड
(अमेरिका) में जाकर बस गईं जहां वे भाषा के प्रचार-प्रसार से
जुड़ी संस्था ‘उन्मेष’ के साथ सक्रिय हैं। रेखा के अब तक दस
कविता संकलन प्रकाशित हो चुके हैं। रेखा मैत्र ने अपने जीवंत
व्यवहार और संवेदनशील कविताओं से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर
दिया है। समकालीन हिंदी कविता के जाने-माने हस्ताक्षर
डॉ.बोधिसत्व ने ‘तमाशा’ कविता का पाठ किया।
कवयित्री माया गोविंद ने तरन्नुम में ग़ज़ल सुनाकर सबको
भाव-विभोर कर दिया-
सूनी
आंखों में जली देखीं बत्तियां हमने
जैसे
घाटी में छुपी देखीं बस्तियां हमने
अब
भटकते हैं यूं सहरा में प्यास लब पे लिए
हाय
क्यूं बेच दी सावन की बदलियां हमने
प्रतिष्ठित फ़िल्म लेखक राम गोविंद का शायराना अंदाज़
देखिए-
वो
समझते थे दिल की जां सा है
क्या
पता था कि वो जहां सा है
आह की
हमसे बड़ी भूल हुई
वो
समझते थे बेज़ुबां सा है
अपने
सूफ़ी अलबम ‘रूबरू’ से लोक प्रिय हुए युवा शायर हैदर नज़्मी ने
एक बेहतर नज़्म पेश करने के साथ ही ग़ज़ल सुनाकर समां बांधा-
तुम्हें
इस दिल ने जब सोचा बहुत है
हंसा तो
है मगर रोया बहुत है
मुझे अब
ज़िंदगी भर जागना है
कि
मुझपे ख़्वाब का क़र्ज़ा बहुत है
कवि-गीतकार
देवमणि पाण्डेय ने भी ग़ज़ल सुनाकर इस ख़ूबसूरत सिलसिले को आगे
बढ़ाया-
इस ग़म
का क्या करें हम तनहाई किससे बांटें
जो भी
मिली है तुमसे रुसवाई किससे बांटें
तेरी
मेरी ज़मीं तो हिस्सों में बंट गई है
यह दर्द
की विरासत मेरे भाई किससे बांटें?
कथाकार अरुण अस्थाना ने सामयिक कविता का पाठ किया। सुमीता
केशवा ने औरत के अस्तित्व पर और कविता गुप्ता ने तितलियों के
तितलाने पर कविता सुनाई। अनंत श्रीमाली ने व्यंग्य कविता और
अरविंद राही ने ब्रजभाषा के छंद सुनाए। जीवंती फाउंडेशन की ओर
से बॉबी ने रेखा मैत्र का पुष्पगुच्छ से स्वागत किया। माया
गोविंद ने रेखा को अपना काव्य संकलन भेंट किया। इस अवसर पर उमा
अरोड़ा और कुमकुम मिश्रा अतिथि के रूप में मौजूद थीं।
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