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मुंबई
में लोहे की भट्टियों में झुलसता बचपन
मुंबई । फिल्मों में अक्सर
एक छोटा सा बच्चा फुटपाथ पर बूट-पॉलिश करता है और उसके सामने
पॉलिश का पैसा फेंक देने पर वह स्वाभिमान में अकड़ते हुए
डॉयलॉग बोलता है कि 'साहब वह मेहनत का पैसा ले रहा है न कि कोई
भीख।' बूट-पॉलिश कराने वाला साहब उससे प्रभावित होता है और फिर
उसके हाथ में पैसे दे देता है। ऐसे सीन वाली न जाने कितनी
फिल्मे मुंबई में बनी हैं और सुपर-हिट भी हुई हैं, फिल्मों में
प्रदर्शित स्वाभिमान की सच्चाईयों से दूर इसी मुंबई में ऐसे
बच्चों की कहानी महाभयानक है। वास्तविकता देखनी हो तो मुंबई
आइए जहां उसका स्वाभिमान तो छोड़िए, उसका जीवन ढाबों, होटलों,
घरों, दुकानों और आग और ज़हर उगलने वाले कारखानों में सिसक रहा
है।
रोजी-रोज़गार
की तलाश में हर साल लाखों लोग भारत की आर्थिक
राजधानी मुंबई की ओर रुख करते हैं। इनमें बहुत बड़ी संख्या में
दूर-दराज़ के वे बच्चे भी शामिल हैं जो गरीबी और भुखमरी से
जूझते हुये अपनो का सहारा लेकर मुंबई में कदम रखते हैं और फिर
यहां के कल-कारखानों में झोंक दिये जाते हैं। इन्हें दिहाड़ी
मजदूरों से भी कम 30 रुपये से 50 रुपये प्रतिदिन तक दिये जाते
हैं। जोगेश्वरी वेस्ट के पास एसवी रोड पर मुंबई के 'सेठों' की
लोहे की कई फैक्ट्रियां हैं, जिनमें बाल श्रमिक कानून की
धज्जियां उड़ाते हुए बहुत बड़ी संख्या में कम उम्र के बच्चों
से कठोर काम ले रहे हैं यह तब है जब मजदूरों के हितों और श्रम
कानून के पालन की लड़ाई लड़ने वाले मजदूर नेता सबसे ज्यादा
मुंबई में हैं।
इन फैक्ट्रियों में मकान निर्माण से लेकर मोटर गाड़ी
इत्यादि से संबंधित कई तरह के काम होते हैं। लोहे को तपती
भट्टी में डालने के बाद उन्हें तोड़-मरोड़ कर मांग के अनुसार
नये रूप और आकार में ढाला जाता है। चूंकि अनुभवी और परिपक्व
कारीगर इस काम के लिए अधिक पैसों की मांग करते हैं, इसलिये इन
फैक्ट्रियों के मालिक बहुत बड़ी संख्या में उन बच्चों का
इस्तेमाल कर रहे हैं, जो काम की तलाश में मुंबई आते हैं और
पैसे के लिए न सौदेबाजी करते हैं और नाही तनखाह के लिए कोई
यूनियनबाज़ी। फैक्ट्री मालिक समझते हैं कि इन्हें रोजगार की
तलाश है और ये अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए मेहनत से काम करते
हैं, इनका कोई हाजिरी रिकॉर्ड भी नहीं रखना होता है।
पिछले कुछ वषों से उत्तर प्रदेश और बिहार से बहुत बड़ी
संख्या ऐसे बच्चों का पलायन हुआ है, जो अपने इलाके में गरीबी
की मार झेलते आ रहे थे, और जिन्होंने गुरबत में स्कूल का मुंह
तक नहीं देखा है। अधिकतर बच्चे मुंबई में रहने वाले अपने उन
सगे संबंधियों का सहारा लेकर यहां पहुंचे हैं, जो पहले से ही
मुंबई में दोयम दर्जे के काम लगे हुये हैं। इन बच्चों को यही
कह कर काम पर लगाया जाता है कि लगातार काम करने से उनके हाथों
में हुनर आ जाएगा, और हुनर सीख गये तो फिर उनके लिए मुंबई में
पैसा कमाना आसान हो जाएगा। लोहे की इन फैक्ट्रियों में एक बार
लग जाने के बाद, वर्षों काम सिखाने के नाम पर उनका खूब शोषण
होता रहता है। तमाम तरह के उपक्रमों के साथ तपती भट्टी के
नजदीक काम करने से आग की तेज आंच से झुलस कर वे जवान होने के
पहले ही बूढ़े हो जाते हैं। लोहे की गर्मी और उनसे निकलने वाली
चिंगारियों का नकारात्मक असर उनकी आंखों पर भी पड़ रहा है
इसलिए इनमें कई बच्चे तो ऐसे हैं जिनकी आंखों की रोशनी अभी से
ही उनका साथ छोड़ रही है।
लोहे की बारीक कटाई और छटाई करने वाली मशीनों पर भी इन
बच्चों से खूब काम लिया जा रहा है। जरा सी नजर चूकने की स्थिति
में ये मशीने बच्चो की मांसपेशियों को चीरते हुये सीधे हड्डी
तक को काट डालती हैं। यहां काम करने वाले अधिकतर बच्चों के
शरीर पर कटे-फटे के निशान इस बात की गवाही दे रहे हैं कि वे
किन खतरों के बीच अपनी रोटी और अपने परिवार की खराब आर्थिक
स्थिति को संभालने के लिए जूझ रहे हैं। इन फैक्ट्रियों में काम
करने वाले बच्चों को बाल श्रमिक कानूनों के भय से लिखित रूप
में नहीं रखा जाता है, इसलिए किसी तरह की दुर्घटना होने की
स्थिति में फैक्ट्री के मालिक न सिर्फ इनके सेवायोजन से साफतौर
से इंकार कर देते हैं बल्कि उन्हें गालियां भी देते हैं कि ठीक
से काम करना आता नहीं है और पता नहीं कहां-कहां से चले आते
हैं।
स्टील और आयरन फैक्ट्रियों में काम करने की कोई समय सीमा
भी निर्धारित नहीं है। सुबह से लेकर देर रात तक बच्चों को यहां
पर काम करना पड़ता है। काम करने का माहौल भी काफी खतरनाक है।
लोहे की उड़ती हुई गर्म बुरादों के बीच उन्हें काम करना पड़ता
है। फैक्ट्री के अंदर चारों ओर फैले विभिन्न तरह के रसायनिक
अवयवो से उनका शरीर लिपटा रहता है। इन रासायनिक अवयवो का उनके
शरीर पर क्या-क्या प्रभाव पड़ रहा है, इससे बच्चे पूरी तरह से
अनभिज्ञ हैं और फैक्ट्री के मालिक भी इस विषय पर सोचने की जहमत
नहीं उठाते हैं। उन्हें तो बस आर्डर को समय पर पूरा करने की
रहती है।
फैक्ट्रियों में काम करने वाले अनुभवी कारिगर, मालिकों से
नजरें बचा कर काम सिखाने के नाम पर बालश्रमिकों का यौन-शोषण भी
कर रहे हैं। काम सीखने और अधिक पैसा पाने की लालच में ये बच्चे
बड़ी सहजता से उनके झांसे में आ जाते हैं। चूंकि विभिन्न उम्र
के बच्चों को एक ही साथ काम पर लगाया जाता है, इसलिये समय से
पहले ये बच्चे विकृत यौन प्रवृतियों के शिकार भी हो रहे हैं।
पड़ताल करने पर पता चला कि इनमें अधितर बच्चे अपने दूर के उन
सगे संबंधियों के पास रहते हैं, जो पहले से मुंबई में रहते आ
रहे हैं और ये ही दूर के सगे संबंधी इन बच्चों को सबसे ज्यादा
और खुलकर यौन शोषण कर रहे हैं।
एसवी रोड के पास लोहे की ये फैक्ट्रियां नाले के किनारे
स्थित हैं, जिसमें पूरे इलाके की गंदगी गिरते रहती हैं। इस
नाले से निकलने वाली दमघोटू बदबू ने लोहे की फैक्ट्रियों में
अपना डेरा जमा रखा है। इसी दमघोटू बदबू के बीच इन बच्चों को
काम करना पड़ता है। सबसे बुरी स्थिति तो खाने के समय होती है।
एक तो इन्हें स्वास्थ्यकर खाना उपलब्ध नहीं होता है, दूसरी बात
यह कि जब ये खाने के लिए बैठते हैं तो ऐसा लगता है कि खाने से
ही बदबू आ रही है। इन सब के बावजूद अन्य राज्यों से बच्चों के
यहां आने का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। किसी-किसी फैक्ट्री
में तो एक ही परिवार के तीन-चार बच्चे हाड़तोड़ मेहनत कर रहे
हैं। इस संबंध में बात करने पर ये बड़ी सहजता से बताते हैं कि
अपने गांव में गरीबी और भुखमरी झेलने से अच्छा है यहां काम कर
के कुछ कमा ले रहे हैं। अभी भले ही पैसा कम मिल रहा है लेकिन
आगे चलकर इतना पैसा उन्हें जरूर मिल जाएगा कि कुछ घर भेज
सकेंगे। इन फैक्ट्रियों में नियमित काम करने के बावजूद इनका
भुगतान एक दिहाड़ी मजदूर की तरह ही होता है। बच्चे की उम्र और
काम सीखने की काबिलियत के मुताबिक इन्हें दिहाड़ी के पैसे दिये
जाते हैं।
मुंबई में बाल श्रम और बाल अधिकारों पर कार्य करने वाली
बहुत सारी संस्थायें हैं, लेकिन इन फैक्ट्रियों में जाकर इन
बच्चों की दुर्दशा को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है, और
इन बाल मजदूरों की सबसे बड़ी मजबूरी और कमजोरी यह है कि यदि ये
यहां पर काम न करें तो कहां जाएं और क्या करें?
असीमा
की कहानी पसंद आएगी- ग्रेसी सिंह
मुंबई ।
फिल्म लगान और मुन्नाभाई एमबीबीएस के माध्यम से हिन्दी
फिल्म जगत में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराने के बावजूद
ग्रेसी सिंह को यहां की फिल्म नगरी में कुछ खास तवज्जो नहीं
मिल पाई। यही कारण है कि कुछ दिनों के लिए ग्रेसी सिंह दक्षिण
भारतीय फिल्म उद्योग की ओर मुड़ गई थीं, लेकिन एक बार फिर
महिला केंद्रित फिल्म असीमा के माध्यम से हिन्दी फिल्म जगत में
ग्रेसी सिंह की वापसी हो रही है और ग्रेसी सिंह इस फिल्म को
लेकर काफी उत्साहित भी हैं। यह फिल्म शैलजा कुमारी लिखित
उपन्यास असीमा पर आधारित है, जिसके निर्देशक हैं शिशिर मिश्रा।
ग्रेसी सिंह को पूरा विश्वास है कि अपनी मजबूत कथा के कारण
यह फिल्म हर किसी के दिल को छू लेगी। इस संबंध में उन्होंने
कहा, ‘मेरे लिए ये स्क्रीप्ट सबसे अधिक मायने रखती है। मैं
काफी खुश हूं कि मेरी आने वाली फिल्म असीमा आम फिल्मों से
बिल्कुल इतर है। इस फिल्म की स्क्रीप्ट पढ़ने के बाद मुझे
अहसास हुआ कि यह एक महिला के जीवन के प्रत्येक क्षेत्र से
जुड़ी हुई है, चाहे वह मां-बेटी का संबंध हो या स्त्री-पुरुष
का।’ इस फिल्म में अपनी भूमिका के विषय में उन्होंने कहा, ‘यह
भूमिका मुझे बहुत पसंद थी, इसलिये मैंने इसे स्वीकार किया।
फिल्म में एक महिला के जीवन के तीन चरणों को प्रदर्शित करने का
मुझे मौका मिला है। यह एक महिला की जीवन यात्रा की एक कहानी
है, जिसे सफलता के साथ-साथ भावनात्मक आघात का स्वाद भी चखना
पड़ता है। यह काफी चुनौतीपूर्ण भूमिका थी। लेकिन इसका यह मतलब
नहीं है कि फिल्म गंभीर है। यह फिल्म सामाजिक संदेश तो देती ही
है, साथ में मनोरंजन का भी ख्याल रखती है।’
फिल्म के निर्देशक शिशिर मिश्रा ने फिल्म समय की धारा में
शबाना आज़मी और भीगी पलकें में स्मिता पाटिल को भी निर्देशित
किया था। इस संबंध में पूछे जाने पर ग्रेसी सिंह ने कहा कि
शबाना आज़मी और स्मिता पाटिल की श्रेणी में मुझे रखा जाना उचित
नहीं है। मैं अपनी तुलना इन दोनों के साथ कैसे कर सकती हूं?
लेकिन इस फिल्म का एक हिस्सा होकर मैं अपने आप को गौरवांवित
जरूर महसूस कर रही हूं, क्योंकि शिशिर मिश्रा ने मुझे न सिर्फ
एक महिला के जीवन के विभिन्न चरणों को प्रदर्शित करने में मदद
की है, बल्कि इससे मुझे काफी संतुष्टि भी मिली है। यह भूमिका
मेरे लिए मेरे सपनों की भूमिका से कुछ ज्यादा है। कोई बड़ा या
छोटा नहीं होता है। यह स्क्रीप्ट और कहानी है, जो खुद बोलती
है। मुझे पूरा विश्वास है कि असीमा की कहानी दर्शको को पसंद
आएगी।
शिशिर मिश्रा ने एक महिला की जीवन यात्रा को चित्रित किया
है, बहुत ही खूबसूरत तरीके से। वह अपनी पहचान के लिए लड़ती है।
शिशिर न सिर्फ एक प्रतिभाशाली निर्देशक हैं, बल्कि आप उनसे
बहुत कुछ सीख भी सकते हैं। यदि वह किसी खास दृश्य को खास तरीके
से चाहते हैं तो वह इसके लिए आपको पूरी तरह से आश्वस्त कर देते
हैं।’ यह पूछे जाने पर कि सेट पर तो वह सभी को सख्त अनुशासन
में रखते हैं, ग्रेसी सिंह ने कहा, ‘ऐसा नहीं है, लेकिन वह
अपने दिन की शुरुआत सुबह जगन्नाथ मंदिर में पूजा करने से करते
हैं, क्योंकि उनका मानना है कि दिन की शुरुआत भगवान के
आर्शीवाद से करने से सारा दिन बेहतर निकलता है और सारी बाधाएं
दूर हो जाती हैं। हर कोई फिल्म की बेहतरी के लिए काम करता है।
हम लोगों ने 45 दिन में फिल्म को सफलतापूर्वक पूरा कर लिया।’
भोजपुरी फिल्म जगत बना मुंबई में नरक !
मुंबई। पिछले कुछ वर्षों
से मुंबई में ताबड़तोड़ भोजपुरी फिल्में बन रही हैं और बहुत
बड़ी संख्या में लोग भोजपुरी फिल्म निर्माण से विभिन्न स्तर पर
जुड़े हुये हैं। इसके बावजूद भोजपुरी फिल्म जगत एक सड़न का
शिकार है। इसमें काम करने वाले लोगों को भुखमरी का सामना करना
पड़ रहा है, क्योंकि जीतोड़ काम करने के बावजूद उन्हें न सिर्फ
पैसा न के बराबर दिया जा रहा है, बल्कि उनके साथ प्राचीन रोम
के गुलामों से भी बदतर व्यवहार किया जा रहा है। भोजपुरी फिल्म
जगत का पड़ताल करने पर कई ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जिन्हें
देखकर सहजता से इसमें व्याप्त सड़न का अनुभव किया जा सकता है।
कुछ महत्वपूर्ण कलाकारों ओर तकनीशियनों को छोड़कर किसी
भोजपुरी फिल्म के प्रोजेक्ट में काम करने वाले तमाम लोगों के
साथ लिखित अनुबंध तो होता ही नहीं है। बहुत बड़ी संख्या में
लोगों से फिल्म निर्माण के विभिन्न स्तर पर बिना अनुबंध के ही
काम लिया जाता है। उनके काम के एवज में भुगतान भी नहीं किया
जाता है और किया भी जाता है तो बहुत ही मामूली सा। भुगतान
मांगने पर उन्हें टका सा जवाब दिया जाता है कि उनके लिए इतना
ही काफी है कि उन्हें इस प्रोजेक्ट पर काम करने का मौका दिया
जा रहा है। उन्हें बार-बार यह समझाया जाता है कि काम करते रहने
से ही उनका नाम होगा और एक बार जब उनका नाम हो जाएगा तो पैसा
भी खुद ब खुद मिलने लगेगा।
इन लोगों के पास अपना मुंह बंद करके काम करने के अलावा
कोई विकल्प नहीं है। अंदर खाते से इन्हें धमकी दी जाती है कि
किसी तरह की शिकायत करने या लड़ने झगड़ने की स्थिति में उन्हे
यूनिट से निकाल दिया जाएगा। एक बार निकाल दिये जाने के बाद
किसी अन्य यूनिट में उन्हें जगह नहीं मिलेगी। अपने नाम का
जिक्र न करने की शर्त पर एक कलाकार ने बताया कि वह पिछले तीन
साल से भोजपुरी फिल्मों में अभिनय करता आ रहा है अभी तक उसे एक
भी पैसा किसी भी भोजपुरी फिल्म के प्रोजेक्ट से नहीं मिला है।
मुंबई में अपना खर्च चलाने के लिए उसे तमाम तरह के अन्य काम
करने पड़ते हैं। यहां तो लोग शूटिंग के दौरान, यूनिट में भी,
अपने पैसे से बाहर से खाना खाकर आने को कहते हैं। शूटिंग स्थल
पर जाने तक का भाड़ा भी नहीं देते हैं।
कलाकारों का तो बुरा हाल है ही इनसे भी बुरा हाल लेखकों
का है। दरअसल अधिकतर भोजपुरी निर्देशक प्रोड्यूसरों को चपेटे
में लेने के लिए खुद ही कहानी का ताना बाना बुनते हैं और
प्रोड्यूसर की स्वीकृति मिल जाने की स्थिति में किसी लेखक को
पकड़ लेते हैं और उससे बेतरतीब तरीके से लिखवाते हैं। अधिकतर
प्रोड्यूसर फिल्म में खुद अभिनय करने की मंशा रखते हैं, इसलिये
वह डायरेक्टर पर इस बात के लिए दबाव बनाते हैं कि उनके लिए खास
तरह की भूमिका लिखी जाये। अक्सर फायनेंसर भी अपने लिए भूमिका
की मांग करते रहते हैं, और प्रोड्यूसरों को मजबूरीवश डायरेक्टर
से उनके लिए भूमिका निकालने को कहना पड़ता है। इन सबका भार
बेचारे लेखक के सिर पर आता है और वह जी कचोट कर फिल्म का
स्क्रीप्ट और डायलाग लिखता है। एक बार शुरु होने के बाद फिल्म
की कहानी किधर जाती है, बेचारे लेखक को भी पता नहीं होता है।
इतना ही नहीं लेखक को फिल्म लिखने के अलावा प्रोड्यर और
डायरेक्टर की अलग से भी कई तरह की सेवा करनी पड़ती है, जैसे
चाय पानी लाना, नाश्ते का इंतजाम करना आदि।
इस तरह के फिल्मी लेखकों को एक फिल्म का पांच सौ या एक
हजार रुपये मिल जाते हैं, जबकि बजट में फिल्म के लेखन के लिए
एक लाख से ढाई लाख रुपये तक दर्शाया जाता है। हद तो तब हो जाती
है जब फिल्म निर्माण के बाद इस तरह के लेखकों को क्रेडिट लाइन
से बाहर रखा जाता है। वे बेचारे मन मसोस कर दूसरी फिल्म की
तलाश में जुट जाते हैं। पिछले दो साल से घोस्ट राइटिंग करने
वाले एक युवा फिल्म लेखक ने कहा, यहां सब कुछ झोलझाल है। वह अब
तक दस से ज्यादा फिल्में लिख चुका है और इनमें से कई फिल्में
रिलीज भी हो चुकी हैं। फिल्म निर्माण के हर स्तर पर वह काम कर
चुका है। यहां तक कि शूटिंग के दौरान उसने स्टंट सीन भी दिया
है। यूनिट में बने रहने के लिए उसे अपने पैर बांधकर एक पेड़ पर
उलटा लटकने का सीन देना पड़ा था। यदि गलती से वह नीचे गिरता तो
उसके सिर के टुकड़े हो जाते। भोजपुरी के एक नामी गिनामी
निर्देशक कहते हैं कि लेखक को हमेशा भूखा रखो, नहीं तो उसकी
सृजनात्मक क्षमता खत्म हो जाएगी। जब इस तरह के सोच वाले
निर्देशक भोजपुरी फिल्मों में हैं तो फिर यहां काम करने वाले
लेखकों का तो भगवान ही मालिक है। यदि गलती से आपने पैसे की
मांग निर्देशक या प्रोड्यूसर से कर दी तो वह सीधे कहते हैं कि
आर्दशनगर इलाके में दो-दो सौ रुपये में स्क्रीप्ट लिखने वाले
घूमते रहते हैं, तुम भाग्यशाली हो कि तुम्हें यहां काम मिला
हुआ है।
अधिकतर भोजपुरी फिल्मों की स्क्रीप्ट शूटिंग शुरु हो
जाने के बाद तक लिखाई जाती रहती है। भोजपुरी में काम करने वाले
कुछ स्टार हीरो सेट पर आने के बाद अंतिम समय अपना सीन देखते
हैं और यदि उन्हें सीन पसंद नहीं आता है तो उसमें अपने तरीके
से तोड़-जोड़ करने को कहते हैं। इस मामले में मनोज तिवारी तो
काफी बदनाम रह चुके हैं। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर के साथ-साथ
वह लेखक तक को पानी पीला दिया करते थे।
असिस्टेंट डायरेक्टरों के साथ तो डायरेक्टर पूरी तरह से
रोम के गुलामों जैसा व्यवहार करता है। स्पाट ब्याय का खर्च
बचाने के लिए वह असिस्टेंट डायरेक्टरों से वे सारे काम लेता
है, जो सेट पर आमतौर पर स्पाट ब्याय करते हैं। उनसे कहा जाता
है कि सारा काम सीख लेने के बाद वे खुद फिल्म बनाने की स्थिति
में आ जाएंगे। इस संबंध में एक असिटेंट डायरेक्टर ने कहा,
एक्शन और कट बोलने के अलावा सेट पर मैं सारे काम करता हूं, फिर
भी मुझसे यही कहा जाता है कि मुझे काम नहीं आता है। यूनिट में
बने रहने के लिए डायरेक्टर और प्रोड्यूसर को मख्खन लगाते रहना
पड़ता है।
भोजपुरी फिल्मों के प्रोडक्शन विभाग में काम करने वाले
लोगों की स्थिति तो और भी दयनीय है। उच्चकई की हद को पार करते
हुये ये लोग प्रोडक्शन के हर काम में अंदर खाते कमीशन खाने की
कोशिश तो करते ही हैं, कभी-कभी डायरेक्टर के साथ मिल कर स्टाक
चुराने की भी साजिश करने से भी बाज नहीं आते हैं। इस संबंध में
प्रोडक्शन लाइन से जुड़े लोगों का कहना है कि यदि पैसा ऊपर से
नहीं मिलता है तो हम लोग नीचे से काट लेते हैं। हालांकि पकड़े
जाने पर प्रोडक्शन इन्चार्ज इनकी धुनाई करने से परहेज नहीं
करता है। एक भोजपुरी फिल्म के दफ्तर में रात के नौ बजे
प्रोडक्शन इन्चार्ज को प्रोडक्शन के एक आदमी की धुनाई करते
हुये इस संवाददाता ने खुद अपनी आंखों से देखा है। जबरदस्त
पिटाई के बावजूद वह व्यक्ति बार-बार यही कह रहा था कि उसे इस
प्रोजेक्ट से बाहर नहीं किया जाये।
प्रारंभिक दौर में भोजपुरी फिल्मों को उनके गानों के
लिये याद किया जाता रहा है। अब भोजपुरी फिल्मों में अश्लील
गानों की गंगा बह रही है। भोजपुरी फिल्मों के गानों पर मठवादी
संस्कृति हावी है। गानों का एक मुश्त टेंडर किसी गीतकार को दे
दिया जाता है, और उससे खासतौर से कहा जाता है कि गानों में
अधिक से अधिक अश्लील बोल का इस्तेमाल किया जाये। भोजपुरी के
गीतकार विनय बिहारी अश्लील गानों की रचना करने में अब तक के
अव्वल गीतकार हैं। वैसे तो मठवादी संस्कृति के कारण नये गीतकार
के लिए भोजपुरी फिल्म जगत में पैठ बना पाना मुश्किल है, लेकिन
गलती से कोई इसमें घुस जाता है तो प्रोड्यूसर और डायरेक्टर
उससे भी विनय बिहारी के तर्ज पर अश्लील गानो की रचना करने की
मांग करते हैं। मुंबई में रह रहे भोजपुरी के प्रति संवेदनशील
लोगों का मानना है कि अश्लील गीतों के माध्यम से भोजपुरी की
गंगा जमुना वाली संस्कृति को विकृत तरीके से प्रस्तुत किया जा
रहा है।
'सामना'
का ऑपरेशन राज ठाकरे 'नालायक औलाद!'
मुंबई ।
शिवसेना से अलग होने के बाद महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता
राज ठाकरे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए
शिवसेना को जिस तरह से कुतर कर खाते- चबाते हुये अपनी राजनीतिक
सेहत बनाते आ रहे थे उसके खिलाफ शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे अब
खुल कर मुखर हो गये हैं। अपने मुख-पत्र 'सामना' के संपादकीय
में उन्होंने राज ठाकरे पर कांग्रेस के हाथों में कठपुतली डांस
करने करने का आरोप लगाते हुए उन्हें जिन्ना तक करार दे दिया
है। यह भी लिख दिया है कि जिस तरह जिन्ना को अंतिम दिनों में
भारत विभाजन के लिए पश्चाताप हो रहा था उसी तरह राज ठाकरे को
भी एक दिन पश्चाताप और ग्लानि की अग्नि में जलना होगा।
कांग्रेस पर फूट डालो और राज करो की नीति पर चलने का आरोप
लगाते हुये उन्होंने राज ठाकरे को नालायक औलाद की संज्ञा दी
है। बाल ठाकरे और राज ठाकरे की इस लड़ाई के साथ ही महाराष्ट्र
में मराठी मतों की गोलबंदी और छीना-झपटी नये सिरे से शुरु हो
गई है। राज ठाकरे की महाराष्ट्र नव निर्माण सेना भी बाल ठाकरे
को लेकर अंदरखाने अपनी रणनीति बना रही है। इस चुनाव में राज
ठाकरे की जिम्मेदारी शिवसेना के मतों का विभाजन कराके कांग्रेस
गठबंधन का फिर सत्ता का मार्ग प्रशस्त करना है। कांग्रेस से
प्रायोजित उनके इस अभियान में यह देखने वाली बात होगी कि
शिवसेना के समर्थक, राज ठाकरे के बरगलाने में कितना आते हैं।
शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने जिस तरह से सामना में राज
ठाकरे को नालायक औलाद बता कर उन पर मराठी लोगों को विभाजित
करने का आरोप लगाया है उससे महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई
हलचल पैदा हो गई है। पुराने मराठियों पर आज भी बाल ठाकरे का
अच्छा खासा प्रभाव है, और अब मराठियों का नया तबका भी सामना के
संपादकीय पर गम्भीरता से विचार करने लगा है। उन्हें इस बात का
अहसास होने लगा है कि राज ठाकरे की पार्टी को मत देने की
स्थिति में मराठियों का मत निसंदेह बंटेगा और इसका खामियाजा
मराठियों को सत्ता से दूर होकर चूकना पड़ सकता है। सड़कों के
किनारे चाय की दुकानों, रेस्त्राओं, होटलों, क्लबों, पार्कों
और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर सामना के संपादकीय पर लोग बहस
करते हुये नजर आ रहे हैं। बाल ठाकरे के संपादकीय से महाराष्ट्र
का मराठी समुदाय चिंतन और मनन कर रहा है। उधर अभी तक राज ठाकरे
ने बाल ठाकरे के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा था। राज ठाकरे हमेशा
यही प्रदर्शित करते रहे हैं कि वह बाल ठाकरे का भरपूर सम्मान
करते हैं, और आज भी बाल ठाकरे उनके राजनीतिक गुरु हैं। अब बाल
ठाकरे का संपादकीय आने के बाद राज ठाकरे के पास भी खुलकर मुखर
होने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। फिलहाल मनसे के नीति
निर्धारकों के बीच इस बात को लेकर चर्चा हो रही है कि बाल
ठाकरे के संपादकीय पर कैसे और क्या प्रतिक्रिया दी जाए।
बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था में किसी एक दल की सफलता उस
दल विशेष की मजबूती के साथ-साथ अन्य दलों की टूटन और कमजोरी पर
निर्भर करती है। कांग्रेस को इसका अच्छा खासा व्यवहारिक अनुभव
है। इसी अनुभव के आधार पर अन्य दलों को विभिन्न स्तर पर नुकसान
पहुंचाते हुये कांग्रेस अपना सत्ता मार्ग प्रशस्त कर रही है।
महाराष्ट्र में चुनाव के बहुत पहले से ही कांग्रेस नियोजित
तरीके से अन्य दलों को कुतर रही है। इसके लिए वह शरद पवार का
भी इस्तेमाल कर रही है और भी अपने अनुभवों का इस्तेमाल करते
हुये राज ठाकरे की पीठ थप-थपाते आ रहे हैं। महाराष्ट्र में
कांग्रेस का विस्तार तभी संभव है जब शिवसेना टूटती चली जाए।
इसको पुन: मुसिको भव: करने के लिए राज ठाकरे कांग्रेस का
स्वाभाविक हथियार बन रहे हैं।
अगली पीढ़ी के नेतृत्व के मुद्दे पर शिवसेना से अलग
होने के बाद राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नव निर्माण पार्टी का
निर्माण किया था। उसी समय से कांग्रेस राज ठाकरे के प्रति एक
निश्चित नीति और उदार भाव अपना कर चल रही है। चूंकि महाराष्ट्र
नव निर्माण पार्टी की नींव शिवसेना की टूटन पर रखी गई थी,
इसलिये कांग्रेस की नज़र में राज ठाकरे स्वाभाविक रूप से राज्य
में कांग्रेस का ही सत्ता का मार्ग प्रशस्त करने वाले थे, और
पिछले लोकसभा चुनाव परिणामों से यह स्पष्ट हो गया है कि
महाराष्ट्र नव निर्माण पार्टी ने अप्रत्क्षरूप से शिवसेना को
घायल करके कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को ही लाभ
पहुंचाया है।
किसी भी राजनीतिक दल को आगे बढ़ाने के लिए उसे अधिक से
अधिक लोग चाहिएं। लोगों की फसल तैयार करके उन्हें वोट के रूप
में काट कर ही राजनीतिक पार्टी सत्ता की सीढ़ियों पर
चढ़ती-बढ़ती है। बाल ठाकरे की शिवसेना ने अपनी राजनीतिक जमीन
महाराष्ट्र में दक्षिण भारतीयों के खिलाफ नफरत फैलाकर तैयार की
थी, फिर समय और परिस्थिति के अनुसार स्वघोषित हिंदू सम्राट की
उपाधि लेकर बाल ठाकरे मुसलमानो की खिलाफत करके मराठी माणुस के
साथ-साथ हिंदु मानसिकता वाले लोगों पर अपनी पकड़ मजबूत करते
गये। उद्धव ठाकरे की शिवसेना में ताजपोशी करते ही राज ठाकरे ने
विद्रोह कर अपना अलग झंडा उठा लिया। बाल ठाकरे की तर्ज पर
उत्तर भारतीयों के खिलाफ जहर उगल कर राज ने जहां मराठावादियों
को भाषा और क्षेत्रीयता की भावनाओं में उलझा कर मराठियों का
शिव सेना के प्रति मोह भंग करने की कोशिश की साथ ही शिवसेना से
जुड़े उत्तर भारतीयों पर हमले करा कर उसके व्यापक आधार को
झकटने की कोशिश की। राज ठाकरे कांग्रेस की मदद से इसमे और काफी
हद तक सफल भी रहे। ध्यान रहे कि जिस समय महाराष्ट्र में उत्तर
भारतीयों पर जानलेवा हमले हो रहे थे उस समय कांग्रेस केवल
तमाशा देख रही थी और जब इसके लिए उसकी आलोचना शुरू हुई तो फिर
कांग्रेस ने हल्के-फुल्के बयान से अपनी जिम्मेदारी पूरी हुई
मान ली। इस चुनाव में यह भी एक मुद्दा होगा जिसका नुकसान
कांग्रेस और राज ठाकरे की पार्टी को होना लाज़िम है। उत्तर
भारतीयों की एक शसक्त लॉबी इस काम में लग गई है इसलिए राज
ठाकरे की भी राह उतनी आसान नहीं लगती है।
आमतौर पर शांत स्वभाव वाले उद्धव ठाकरे के नेतृत्व में
शिवसेना के उग्र तेवर कुछ ढीले दिखाई देते हैं। राष्ट्रीय पटल
पर भले ही शिव सेना की छवि कुछ चमकी है, लेकिन इसके हार्डकोर
कार्यकर्ताओं को निराशा जरूर हुई है। महाराष्ट्र की नई
राजनीतिक फसल जो पारंपरिक रूप से शिवसेना के साथ थी आज राज
ठाकरे को भी मानने लगी है। इसका प्रमुख कारण कांग्रेस है जो
खामोशी के साथ राज ठाकरे को अपना समर्थन देती आ रही है। उत्तर
भारतीयों के खिलाफ राज ठाकरे के अभियान में कांग्रेस ने इसीलिए
चुप्पी साध रखी थी ताकि शिवसेना की इमारत पूरी तरह से ध्वस्त
हो जाए। राज ठाकरे ने कांग्रेस की इस मनोकामना को कुछ हद तक
पूरा किया है। उत्तर भारतीयों के खिलाफ अभियान चलाकर राज ठाकरे
अपनी जमीन तैयार करते ही रहे है, साथ में कांग्रेस को भी
स्वाभाविक रूप से कई तरह से फायदे पहुंचाते रहे है।
आज स्थिति यह है कि महाराष्ट्र में विभिन्न स्थानों पर
रह रहे उत्तर भारतीय बड़े असमंजस में दिखाई देते हैं। मन पसंद
विकल्प के अभाव में वे अपना मत पूरी तरह से कांग्रेस गठबंधन को
भी देने की मानसिकता में नहीं हैं। मराठी वोट शिव सेना गठबंधन
और मनसे के खाते में विभक्त होने की स्थिति में है। चूंकि शरद
पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस की मराठी वोट पर
अच्छी पकड़ है इसलिए ऐसे में इसका लाभ कांग्रेस को होने जा रहा
है। एक समय शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी होने के मुद्दे
पर कांग्रेस नेतृत्व के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंकते हुये
राष्ट्रवादी कांग्रेस की स्थापना की थी। बाद में पार्टी के
अंदर और देशभर में सोनिया की स्वीकार्यता के साथ व्यवहारवादी
राजनीति के तहत शरद पवार के तेवर ढील होते गए और कांग्रेस के
नेतृत्व वाली केंद्रीय सरकार में एक हिस्सा बनने से भी
उन्होंने गुरेज नहीं किया। महाराष्ट्र में अब शरद पवार
कांग्रेस के साथ कदम ताल करते आ रहे हैं। उत्तर भारतीयों के मन
भी शरद पवार की अच्छी छवि है। इस तरह कांग्रेस के साथ गठबंधन
वाली सीटों पर उत्तर भारतीयों का एकमुश्त वोट शरद पवार के खाते
में भी गिरने की संभावना है।
मुसलमानों के लिए शिवसेना आज भी अछूत है। राज ठाकरे ने
भी मुसलमानों को अपनी ओर आकर्षित करने की कभी कोशिश नहीं की
है। वह इस बात को अच्छी तरह से समझते हैं कि चाहे वह कुछ भी कर
लें, महाराष्ट्र का मुसलमान उनकी तरफ किसी भी कीमत पर होने
वाला नहीं है। इस तरह से कांग्रेस मुसलमानो की स्वाभाविक पसंद
है। शरद पवार भी मुसलमानों को अपने साथ लेकर चलते रहे हैं।
उग्र हिंदू मानसिकता के खिलाफ मुसलमान अपना वोट स्पष्ट रणनीति
के तहत या तो कांग्रेस को देंगे या फिर राष्ट्रवादी कांग्रेस
पार्टी को। इस संदेश के साथ कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस
की रणनीति भी शिवसेना के मराठी वोट को तितर बितर करते हुये
अपने पारंपरिक वोटों को समेटना है। पिछले कुछ वर्षों में
इन्होंने जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर अपना स्टैंड लिया है
उससे अभी तक अपनी रणनीति में सफल दिख रहे हैं।
दिल्ली में भाजपा में चले आ रहे घमासान का असर
महाराष्ट्र में भाजपा कार्यकर्ताओं के चेहरे पर भी स्पष्टरूप
से देखा जा सकता है। मानसिक तौर पर भाजपा के कार्यकर्ता खुद को
केंद्रीय नेतृत्व के प्रति संतुष्ट नहीं कर पा रहे हैं। उनका
परंपरागत वोट भी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस की बात करने
लगा है। राज्य में मुसलमान पहले से ही भाजपा से दूरी बनाये
हुये हैं, और उत्तर भारतीयों को भी इस बात का अहसास है कि यदि
शिवसेना दरकती है, तो भाजपा के सरकार में शामिल होने का सवाल
ही पैदा नही होता है। यानि केंद्र में भाजपा की कमजोरी
महाराष्ट्र में कांग्रेस के लिए ताकत बन रही है।
डा भीमराव अंबेदकर ने दलितों के लिए एक मजबूत आंदोलन की
शुरूआत महाराष्ट्र से ही की थी। उनके पहले भी दलितों के
सामाजिक-राजनीतिक स्थिति में सुधार के लिए महाराष्ट्र में
विभिन्न तरह के आंदोलन चल रहे थे। लेकिन आज भी दलित महाराष्ट्र
में सामाजिक और राजनीतिक रूप से ठहरे हुये से हैं। अंबेदकर के
बाद दलितों का नया तबका आज भी नियमित आधुनिक शिक्षा से दूर
दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करते हुए नज़र आता है। अंबेदकर
के प्रभाव में आने के बाद बहुत सारे दलितों ने महाराष्ट्र में
बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था। लेकिन अंबेदकर की बातों का
अनुसरण करते हुए वे लोग आधुनिक शिक्षा की राह पर सलीके से आगे
नहीं बढ़ सके। मायावती के नेतृत्व में बसपा यहां पर दलितों को
लामबंद करने की पूरी कोशिश तो कर रही है, लेकिन यहां के दलित
राजनीतिक रूप से पूरी तरह से उदासीन दिख रहे हैं। मायावती की
मौका परस्त और उनकी भ्रष्ट छवि की यहां भी कोई कम चर्चा नहीं
है। मायावती के कोआर्डीनेटर यहां पर भी धन-वसूली और मुंबई की
मौज-मस्ती के अलावा कुछ नहीं कर रहे हैं। मायावती यहां आए दिन
पदाधिकारी बदलती हैं और कार्यकर्ताओं पर धन वसूली के लिए दबाव
बनाती हैं। महाराष्ट्र में दलितों के एक मुश्त वोट पर कांग्रेस
अपना परंपरागत अधिकार समझती है, और कांग्रेस को यकीन है कि
दलितों का यह वोट उसे मिलेगा।
राज ठाकरे ने महाराष्ट्र के विधान सभा चुनाव में मराठी
मानुष के बीच अपनी पैठ बनाने और अपनी मजबूती को दर्शाने के लिए
कई प्रकार की गैर वाजिब युक्तियों को अंजाम दिया है। वे कुछ
मीडिया वालों और अपने कुछ खास कार्यकर्ताओं से कहलवा रहे हैं
कि कांग्रेस उन्हें महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनवाने जा रही
है जिसके लिए उन्हें संकेत मिल गया है। उनके कुछ खास लोग चर्चा
कर रहे हैं कि महाराष्ट्र में कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों के
दावेदारों की स्थिति अच्छी नहीं है इसलिए कांग्रेस राज ठाकरे
के बारे में काफी गम्भीर है। राज समर्थकों का दावा है कि
शिवसेना के लोग राज की पार्टी को वोट करेंगे इसलिए मनसे को
काफी सीटें मिल जाएंगी जिससे कांग्रेस उन्हें मुख्यमंत्री
बनवाएगी। राज ठाकरे का यह दिवा स्वप्न जगाने वाले जिस विश्वास
के साथ यह प्रचार कर रहे हैं उससे कांग्रेस के नेताओं के भी
कान खड़े हैं और वह इस प्रकार के प्रचार को मज़ाक में उड़ा रहे
हैं जिससे राज ठाकरे की छवि एक वोटकटवा के रूप में स्थापित हो
रही है। अभी हाल ही में महाराष्ट्र में व्यापक पैमाने पर लोगों
को एसएमएस संदेश दिया गया है, जिसमें कहा गया है कि उत्तर
भारतीयों को यहां खदेड़ दिया जाएगा। इस संबंध में मनसे नेताओं
का कहना है कि इन संदेशों से उनका कोई वास्ता नहीं है। मनसे का
इन संदेशों से कोई संबंध हो या नहीं हो लेकिन यह कारगुजारी
मनसे के खाते में ही जा रही है।
मुंबई के
रेलवे स्टेशनों पर ब्लू फिल्मों की सीडी
मुंबई। मुंबई के लगभग सभी
लोकल रेलवे स्टेशनों के साथ-साथ गली
चौराहों
पर पाइरेटेड और ब्लू फिल्मों की सीडी धड़ल्ले से बिक रही हैं।
इससे प्रोड्यूसरों को करोड़ों रुपये का चपत तो लग ही रहा है,
छोटे-छोटे स्कूली बच्चे भी बड़े पैमाने पर ब्लू फिल्मों की
गिरफ्त में आ रहे हैं। मुंबई में आतंकी घटनाओँ की वजह से लगभग
सभी रेलवे स्टेशनों पर कड़ी सुरक्षा व्यवस्था का इंतजाम है और
बहुत बड़ी संख्या में पुलिस बल भी यहां पर तैनात रहते हैं,
इसके बावजूद यह रंगीन धंधा चल रहा है। पाइरेटे और ब्लू फिल्मों
की अवैध बिक्री के इस धंधे में पुलिस के साथ-साथ म्युनिसिपलिटी
के लोग भी अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं।
कांदिवली, गोरेगांव, जोगेश्वरी अंधेरी, विर्ले पाले,
दादर, बांद्रा, चर्चगेट, शिवा जी टर्मिनल, मीरा रोड, खार, आदि
रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही आपको पाइरेटेड और ब्लू फिल्मों
की सीडी बेचने वालों की चलती फिरती दुकानें मिल जाएंगी।
पाइरेडेट सीडी की कीमत 10 रुपये से लेकर 30 रुपये तक होती है,
जबकि ब्लू फिल्मों की सीडी की कीमत 50 रुपये है। नई फिल्मों की
पाइरेटेड सीड़ी तो आपको आसानी से मिल जाएगी, लेकिन ब्लू
फिल्मों की सीडी पाने के लिए थोड़ी प्रतीक्षा करनी पड़ सकती
है। ये लोग ब्लू फिल्मों की सीडी तब तक नहीं देते हैं जब तक
इन्हें इस बात का यकीन नहीं हो जाता है कि ग्राहक को वाकई में
इसकी तलाश है।
दिखावे का नाटक करते हुये कभी-कभी पुलिस वाले इनकी
घेराबंदी करते हैं, लेकिन इस तरह की घेराबंदी की जानकारी इन्हे
पहले ही मिल जाती है। ये लोग ब्लू फिल्मों की अपनी चलती फिरती
दुकानों को छोड़कर कुछ देर के लिए भीड़ में गुम हो जाते हैं।
दुकान के पास इन्हें न पाकर पुलिस वाले चलते बनते हैं। दुकानों
को जब्त करने के संबंध में जब एक पुलिस अधिकारी से पूछा गया तो
उसने टका सा जवाब देते हुये कहा, ‘इनको जब्त करने का काम हमारा
नहीं है। यह म्युनिसिप्लटी वालों का काम है।’ इस मामले में
म्युनिसिप्टी वालों का तर्क कुछ और है ही। उनका कहना है कि इस
तरह की किसी भी दुकान की जानकारी उन्हें नहीं है, यदि कोई
रेलवे स्टेशनों के पास ब्लू फिल्मों की सीडी बेच रहा है, तो
उसे पकड़ने काम रेलवे पुलिस का है। लोकल ट्रेनों पर सफर करने
वाले रोजाना यात्रियों को ब्लू सीडी के इस अवैध बिक्री के बारे
में पूरी जानकारी है। इस संबंध में एक यात्री सहज तरीके से
कहता है, ‘अरे ब्लू फिल्मों की सीडी की बिक्री तो सामान्य बात
है, इसको लेकर टेंशन लेने की जरूरत नहीं है। इसे देखने वालों
को मजा आता है, बेचने वाले अच्छी खासी कमाई कर लेते हैं, और
पुलिस और म्युनिसिप्लटी वालों को वेतन के अलावा अतिरिक्त आमदनी
हो जाती है।’
रेलवे स्टेशनों के अलावा मुंबई के गली मुहल्लो में भी
ब्लू फिल्मों की सीडी खुलेआम बिक रही हैं। ब्लू फिल्मों की
चलती फिरती दुकानों ने मुंबई के लगभग हर इलाके में अपने
खरीददार बना लिया हैं। कच्ची उम्र के स्कूली बच्चे और उम्र
दाराज लोग ब्लू फिल्मों की सीडी के सबसे बड़े खरीददार हैं। दिन
में इन चलती फिरती दुकानों के पास स्कूली बच्चों को अक्सर ब्लू
फिल्मों की सीडी खरीदते देखा जा सकता है। ये सीडी बेचने वाले
बच्चों को कम उम्र में ही विकृत यौन प्रक्रियाओं से रूबरू करा
रहे हैं और इनके मानसिक विकास को बुर तरह से प्रभावित कर रहे
हैं। उम्र दराज लोग अपनी यौन कुंठा को तृप्त करने के लिए इस
तरही की सीडी का इस्तेमाल कर रहे हैं।
इस रैकेट की जानकारी करने पर मालूम होता है कि मुंबई
में ब्लू फिल्मों की आपूर्ति खाड़ी देशों के बिचौलिये कर रहे
हैं। इनका निर्माण मुख्य रुप से अमेरिका या यूरोपीय दशों में
होता है और वहां से इन्हें सामान्य फिल्मों के लेबल के साथ
खाड़ी देशों में भेजा जाता है, फिर इन्हें सहजता से मुंबई के
बाजार में धकेल दिया जाता है। वैसे कोशिश यही होती है कि एक
मास्टर सीडी लाकर उसकी यहीं पर कापी कर ली जाये। इसमें रिस्क
भी कम होता है। यह पूरी तरह से धंधे के सौदागरों की आपसी
डिलिंग पर निर्भर करता है कि सीडी को थोक में मंगवाया जाये या
फिर एक मास्टर सीडी मंगाकर उसकी कापी कर ली जाये। इस अवैध
कारोबार का कहीं कोई लेखा जोखा नहीं है। सबकुछ मौखिक रूप से ही
चल रहा है।
धंधे से जुड़े एक व्यक्ति ने इसके बारे में अतिरिक्त
जानकारी दी कि भारत में बनने वाली ब्लू फिल्मों की क्वालिटी
काफी खऱाब होती है। यहां के लोग विदेशी फिल्मों को देखना पसंद
करते हैं। अब जब मार्केट में इन फिल्मों की डिमांड है, और हम
इस डिमांड को पूरा करते हैं तो क्या बुरा करते हैं, इससे अपने
और अपने परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ हो जाता है, हमें तो
पैसों से मतलब है, अब वो लिखित रूप से मिले या अलिखित रूप से
क्या फर्क पड़ता है? मजे की बात है कि यह तब है जब लगभग सभी
रेलवे स्टेशनों पर पुलिस का कड़ा पहरा होता है।
मुंबई में दूध की थैली पर भी बैठा ग़ुंडा
मुंबई।
यूं तो महाराष्ट्र के राजनीतिक ठेकेदारों को मुंबई में मराठा
मानुष की बड़ी चिंता रहती है और यहां से बड़े-बड़े दिग्गज
उद्योगपति और राजनेता आम आदमी के लिए बड़ी-बड़ी बातें करते हैं
महाराष्ट्र की जो भी सरकार आती है, वह भी दम भरती है कि इस
आर्थिक नगरी की सुख-समृद्धि के लिए उसके पास बड़ी कार्य
योजनाएं हैं मगर जब सतही तौर पर देखा जाता है तो एक दूध की
थैली भी माफियाओं और कालाबाजारी के हथियार बंद ठेकेदारों से
बची नहीं है। जिस देश में दूध की नदियां बहती थी उस देश की
आर्थिक नगरी में आज थैलीबंद दूध की कालाबाजारी जोरों पर है।
कहते हैं कि मुंबई धनवान है और यहां पानी की तरह धन
बरसता है, दुनिया के लोग इसे देखने के लिए आते हैं, कितने यहां
अपना सुनहरा भविष्य खोजते हैं, ऐसे में इससे ज्यादा खराब
स्थिति और क्या होगी कि यहां सवेरा होते ही दूध की थैली पर
मुंबई का ग़ुंडा आकर बैठ जाता है और छपे मूल्य को मिटा कर
मन-मर्जी का मूल्य वसूल करता है। जिसे दूध ये खरीदना तो खरीदे
वरना चुपचाप आगे खिसक ले। यहां दूध की कीमत पर इस पर सवाल
पूछने की इजाजत नहीं है। दबंग किस्म के खुदरा विक्रेताओं के
साथ-साथ थैलीबंद दूध की सप्लाई चैन से जुड़े लोग भी धड़ल्ले से
दूध की ऐसे ही कालाबाजारी में लगे हुये हैं, और इनका नेटवर्क
मुंबई में व्यवस्थित तरीके से काम कर रहा है। सवेरे के एक घंटे
में ही दूध के काले धंधे से अच्छे खासे पैसे खड़े कर लिए जाते
हैं।
अघोषित रूप से ये लोग आम लोगों से दूधबंद थैली पर अंकित
मूल्य से अधिक रकम वसूल रहे हैं और अंकित मूल्य का हवाला देने
पर ग्राहकों को सीधे आगे बढ़ने का इशारा करते हैं। एक के बाद
एक कई दुकानों का चक्कर लगाने के बाद ग्राहक की समझ में आ जाता
है कि अंकित मूल्य से अधिक रकम की वसूली उस खास इलाके के सभी
दुकानदार कर रहे हैं। ग्राहकों के पास खुदरा दुकानदारों द्वारा
तय की गई कीमत पर ही दूध खरीदने के अलावा और कोई विकल्प नहीं
है। अलग-अलग इलाकों में ग्राहकों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति को
देखते हुये थैलीबंद दूध पर अतिरिक्त रकम की वसूली की जा रही
है। इसलिए अतिरिक्त वसूली भिन्न-भिन्न इलाकों में भिन्न-भिन्न
है।
मुंबई में थैलीबंद दूध की आपूर्ति करने वाली कई
कंपनियां है। सभी कंपनियां अपने-अपने तरीके से दूध की पैकेजिंग
करके उन्हें बाजार में प्रतिदिन भेजती हैं। मिलीलीटर के हिसाब
से अलग-अलग थैलियों का इस्तेमाल किया जाता है। पांच सौ
मिलीलीटर थैली वाले अमूल ताजा दूध का अंकित मूल्य 12 रुपये
हैं, जबकि बाजार में इसे खुदरा विक्रेता 13 और 14 रुपये में
बेच रहे हैं। इसी तरह मदर डेयरी और महानंदा दूध के 500
मिलीलीटर दूध की थैलियों पर एक या दो रुपया अधिक वसूला जा रहा
है। पांच सौ मिलीलीटर के मदर डेयरी दूध की थैली पर अंकित मूल्य
11 रुपये है, लेकिन अलग से पुर्ननिर्धारित दर से थैली के दूसरी
ओर अंकित मूल्य 12 रुपया कर दिया गया। मदर डेयरी की यह थैली
बाजार में खुदरा विक्रेता 13-14 रुपये में बेच रहे हैं। इसी
तरह 500 मिलीलीटर लीटर के महानंद दूध की थैली पर अंकित मूल्य
11 रुपया है, लेकिन खुदरा बिक्रेता बाजार में इसे भी 13-14
रुपये में बेच रहे हैं। यह ध्यान देने योग्य है कि अंकित मूल्य
के साथ सभी कर सम्मिलित हैं।
दूध किसी भी महानगर की जरूरत होती है। मुंबई की सुबह
चाय के साथ होती है और चाय के लिए दूध का होना जरूरी है। चाय
की तलब में लोग सुबह-सुबह एक या दो रुपये के लिए दुकानदार से
झकझक करने से बचते हैं और खुदरा दुकानदारों की मर्जी को सहजता
से झेल लेते हैं। अतिरिक्त वसूली के संबंध में पूछे जाने पर
खुदरा बिक्रेता अकड़ कर कहते हैं दूध की कीमत कंपनी ने ही
बढ़ाई है। आपको जो भी सवाल है करना है कंपनी से जाकर करिए। साथ
ही बड़बड़ाने लगते हैं कि दूध को लाने के बाद उन्हें फ्रीज में
रखा जाता है, और फ्रीज रखने की कीमत कंपनी नहीं देती है। ऐसे
में वो घाटा उठाकर थोड़े ही दूध बेचेंगे। बहरहाल दुकानदारों का
तर्क चाहे जो हो, लेकिन इतना तो तय है कि मुंबई में दूध की
कालाबाजारी में प्रतिदिन करोड़ो रुपये का वारा न्यारा हो रहा
है। इस रकम का एक बहुत बड़ा हिस्सा उन माफियाओं और बिचौलियों
के जेब में जा रहा है जो दूध की आपूर्ति चैन की कड़ी हैं।
जुहू तट पर बाल-अपराधियों और पुलिस की चांदी
मुंबई। मुंबई के जुहू तट और उसके इर्दगिर्द के
इलाके में बाल अपराधियों का एक खतरनाक गिरोह सुनियोजित तरीके
से वहां आने वाले लोगों को अपना शिकार बना रहा है। इनके निशाने
पर मुख्य रूप से विदेशी पर्यटक और महिलाएं हैं। इस गिरोह में
20-25 लड़के हैं, जो अलग-अलग टोलियों में बंटकर पहले शिकार को
चिन्हित करते हैं, फिर मौका मिलते ही उनके कीमती सामानों पर
हाथ साफ कर देते हैं। स्थानीय पुलिस के लिए भी इस गिरोह की
उपस्थिति लाभ का एक और रास्ता खोलती है, वह गिरोह में सक्रिय
लड़कों पर हाथ डालने से परहेज कर रही है। यदि स्थानीय
दुकानदारों की माने तो पुलिस वालों को इन लड़कों को फ्री हैंड
देने के एवज में एक बंधी बधाई रकम मिलती है यही कारण है कि
आमदनी के इस जरिये को पुलिसवाले नष्ट नहीं करना चाहते हैं।
जुहू का समुद्री तट दूर तक फैला है और यहां पर लोग
दूर-दूर से समुद्री लहरों से अटखेलियां करने लिए आते हैं। शाम
ढलते ही लैंप पोस्ट की पीली रोशनी समुद्र तट को अपने आगोश में
समेट लेती है, और इठलाती लहरें लोगों को रुमानियत का एहसास
कराती हैं। मुंबई में बड़ों की देखा-देख यह शातिर बाल अपराधी
गिरोह, शाम ढलने के पहले ही अपने शिकार की तलाश कर लेता है और
उनके पीछ लग जाता है। अपने शिकार की तलाश के दौरान इस गिरोह के
सदस्य इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि शिकार के पास अधिक से
अधिक कीमती सामान हो। इनकी नजरें कैमरे, घड़ी, पर्स, मोबाइल
फोन आदि पर होती हैं।
विदेशी पर्यटकों को ये बच्चे विशेष नज़र रखते हैं और
उनको पटाने के लिए गांजा, अफीम और स्मैक आदि नशे का प्रलोभन भी
देते हैं। इनकी पूरी कोशिश होती है कि विदेशी पर्यटक नशे की ये
सामग्री इनसे खरीदे। नशे की सामग्री बेचने के बाद शातिर बाल
अपराधियों की दूसरी टोली इनके पीछे पड़ जाती है। नशे के
इस्तेमाल के बाद जब ये विदेशी पर्यटक तट पर मस्ती में झूम रहे
होते हैं तभी मौका देखकर दूसरी टोली के बच्चे इनके कीमती
सामानों को पेशेवर अंदाज में उड़ा लेते हैं। नशे की हालत में
होने की वजह से ये विदेशी पर्यटक पुलिस में रिपोर्ट करने से
परहेज करते हैं।
इन बाल अपराधियों की दूसरी पसंद यहां पर आने वाली
महिलाएं होती हैं। तट पर भीड़-भाड़ का फायदा उठाकर महिलाओं के
कंधे पर लटक रहे उनके थैलों से मोबाइल फोन या अन्य कीमती सामान
उड़ाने की कला में ये काफी निपुण हैं। कुछ बाल अपराधी भीड़ में
शामिल होकर महिला के साथ धक्का मुक्की करते हैं, इस बीच थैले
से चैन या बटन खोल कर मोबाइल फोन उड़ाने में पारंगत बच्चा अपना
कमाल दिखा देता है। चैन या बटन न खुलने की स्थिति में थैले को
काटने के लिए ये ब्लेड या धारदार उस्तरे का इस्तेमाल करते हैं।
कभी-कभी पकड़े जाने की स्थिति में अपने आप को छुड़ाने के लिए
ये सामने वाले पर इसका इस्तेमाल करने से भी नहीं हिचकते हैं।
स्कूली शिक्षा से इन बच्चों का दूर दूर तक कोई वास्ता
नहीं है। अगल बगल की मलीन बस्तियों में पलते बढ़ते हुये ये
सहजता से अपराध के रास्ते पर अग्रसर हो जाते हैं। इनके
इर्दगिर्द का वातारण इन्हें सहज अपराधी बनाने में काफी सहायक
होता है। इन अपराधी बच्चों के कारनामों पर रोकथाम के विषय में
जब एक पुलिस वाले से पूछा गया तो उसने कहा, ‘जब इनके मां-बाप
ही चोरी चकारी करते हैं, तो क्या ये साधू बनेंगे? एक बच्चे को
पकड़ो तो इनका सारा कुनबा दौड़ते हुये चला आता है, और हम
ज्यादा से ज्यादा चालान ही कर सकते हैं ना। जेल जाएंगे फिर छूट
के आएंगे और ये फिर चोरी चकारी करेंगे।’ इस इलाके के दुकानदार
दबी जुबान से कहते हैं कि इन अपराधी बच्चों को प्रश्रय इस
इलाके में तैनात पुलिसवाले देते हैं। इनके आकाओं और पुलिस
वालों में सांठगांठ हैं। पुलिसवाले इन बच्चों के नाम और घर तक
जानते हैं, लेकिन पैसों के लोभ में इनके खिलाफ किसी भी तरह की
कार्रवाई नहीं करते हैं।
जुहू के समुद्र तट पर पर्यटकों को लूटने के साथ-साथ
वहां पर खड़ी कारों से म्युजिक सिस्टम उड़ाने की कला में भी यह
गिरोह पारंगत है। हालांकि पुलिस वालों की यही कोशिश होती है कि
ये कारों की तरफ रुख नहीं करें, क्योंकि कार अक्सर स्थानीय
लोगों की होती है और म्युजिक सिस्टम चोरी होने की स्थिति में
वे लोग थाने में जाकर रिपोर्ट लिखाने से नहीं हिचकते हैं। इस
संबंध में जांच पड़ताल के दौरान जब उस इलाके के एक पुराने
अपराधी से बातचीत हुई तो उसने कहा, ‘अरे आप काहे को टेंशन लेते
हो। ये सब तो यहां चलता रहता है। अभी से ही इन्हें कमाने की
आदत पड़ रही है। धंधा सीख रहे हैं। कम से कम इस धंधे में आमदनी
की गारंटी तो है। स्कूल जाके पढ़ाई लिखाई करके क्या करेंगे,
अपन कभी स्कूल नहीं गया, लेकिन धंधा करना सीख गया। ये भी सीख
रहे हैं। और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि ये लड़के आप से
ज्यादा कमाते हैं।’
अपराध की दुनिया में मजबूती से कदम बढ़ा रहे इन बच्चों
का भविष्य क्या होगा, इस बात का अंदाजा सहजता से लगाया जा सकता
है। फिलहाल तो ये जुहू के समुद्री तट पर अपने हुनर को निखार
रहे हैं, और महज जेल भेज देने से इनके जीवन में कोई परिवर्तन
होने संभावना नहीं दिखती है। यदि जुहू की मलीन बस्तियां व
समुद्री तट इनके लिए अपराध का स्कूल का काम कर रहा है तो जेल
इनके लिए विश्वविद्यालय साबित होगा, जहां से निकल ये निसंदेह
अपराध की नई कहानी गढ़ेंगे।
आर्थिक खतरों पर मुंबई में बैंकिंग सम्मेलन
मुंबई। फेडरेशन ऑफ इंडियन कामर्स एंड इंडस्ट्री
(फिक्की) और इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के तीन दिवसीय सम्मेलन में
उपस्थित सभी लोग इस बात से सहमत हुए हैं कि वित्तीय संकट ने
दुनिया भर में बैंकिंग व्यवस्था में व्पाप्त विश्वास को हिला
दिया है। इससे सबक सीखने के साथ-साथ वित्तीय व्यवस्था के
निर्माताओं को इसे पुन: पटरी पर लाने की जरूरत है। होटल ग्रैंड
हयात में वैश्विक बैंकिंग: प्रतिमान स्थानांतरण विषय पर आयोजित
इस सम्मेलन के उद्धघाटन सत्र की शुरुआत फिक्की के वाइस
प्रेसिडेंट और मैरिको लिमिटेड के चेयरमैन और मैनेजिंग
डायरेक्टर हर्ष सी मारीवाला के स्वागत भाषण से हुई। इस पर
प्रारंभिक टिप्पणी इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के चैयरमैन और
यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के चैयरमैन प्रबंध निदेशक एमवी नायर ने
की। विषय का प्रस्तुतिकरण इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के
उप-चेयरमैन और स्टेट बैंक आफ इंडिया के चेयरमैन ओपी भठ्ठ ने
किया। उद्घघाटन भाषण भारत सरकार के वित्तीय राज्यमंत्री नामो
नाराइन मीना ने दिया। इस सत्र की समाप्ति फिक्की के जेनरल
सेक्रेटरी डा अमित मित्रा के भाषण से हुई।
सम्मेलन में एक अन्य सत्र में संकट से निपटना : संकट के
बीच क्षमताओं को खोलना विषय को इंडियन बैंक्स एसोसिएशन के
चैयरमैन और यूनियन बैंक आफ इंडिया के चैयरमैन प्रबंध निदेशक
एमवी नायर की अध्यक्षता में बीसीजी एशिया के चेयरमैन डा जनमेजय
सिन्हा ने रोचक तरीके से प्रस्तुत किया। इस विषय पर बोलने
वालों में एचएसबीसी के ग्रुप जीएम और कंट्री हेड नैना लाल
किदवई, फिक्की बैंकिंग एंड फाइनेंशिएल इंस्टिट्यूशन कमेटी
सह-अध्यक्ष आईसीआईसीआई बैंक की प्रबंध निदेशक और मुख्य
कार्यकारी अधिकारी चंदना कोचर और फिक्की बैंकिंग एंड
फाइनेंशिएल इंस्टीट्यूशन कमेटी सह-अध्यक्ष स्टैंडर्ड चार्टेड
बैंक के भारत और दक्षिण एशिया के क्षेत्रीय मुख्य कार्यकारी
अधिकारी नीरज स्वरूप, सेंट्रल बैंक आफ इंडिया के चेयरमैन और
प्रबंध निदेशक एस श्रीधर, यस बैंक के संस्थापक और प्रबंध
निदेशक राना कपूर, एमसीएक्स स्टाक एक्चेंज के प्रबंध निदेशक और
मुख्य कार्यकारी अधिकारी जोसेफ मासे, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष
की एशिया और पैसेफिक उप निदेशक कल्पना कोचर और मार्गन स्टेनली
इंडिया के प्रबंध निदेशक और कंट्री प्रमुख नारायन रामचंद्रन
शामिल थे।
वित्तीय रेग्यूलेशन और सुपरविजन को मजबूती प्रदान करने
के विषय को लेकर एक विशेष सत्र का आयोजन किया गया था। इस सत्र
में इस बात पर जोर दिया गया कि इस वित्तीय संकट ने उन
क्षेत्रों को चिन्हित किया है, जहां पर नियंत्रण और पर्यवेक्षण
को और भी मजबूत किया जाना चाहिए। इस सत्र के दौरान कुछ नये
क्षेत्र जैसे व्यवस्थित जोखिम को भी रेग्यूरेटरी प्रारुप में
शामिल करने की बात कही गई। इस सत्र की अध्यक्षता रिजर्व बैंक
आफ इंडिया की उप गर्वनर उषा थोराट ने किया। इस सत्र को
उन्होंने विशेषतौर पर संबोधित भी किया। इससे संबंधित प्रमुख
बिन्दुओं पर बांग्लादेश बैंक के गर्वनर डा अतिउर रहमान ने
प्रकाश डाला। सत्र को संबोधित करने वाले वक्ताओं में ब्रिटिश
बैंकर्स एसोसिएशन के उप मुख्य कार्यकारी और इंटरनेशनल बैंकिंग
फेडरेशन की प्रबंध निदेशक सैली स्कूट, अमेरिका स्थित फेडरेशन
रिजर्व बोर्ड के इंटरनेशन सुपरविजन सेक्शन, डिविजन आफ बैंकिंग
सुपरविजन और रेग्यूलेशन असिस्टेंट डायरेक्टर रिचर्ड नायलोर,
स्टैंडर्ड एंड पुअर्स के सिंगापुर और मुंबई की प्रबंध
निदेशक–कारपोरट और गवर्मेंट रेटिंग्स सुश्री सुजाने स्मिथ और
फीच रेटिंग्स सिंगापुर के फाइनेंसिएल इंस्टीट्यूशन्स ग्रुप के
प्रबंध निदेशक डैविड मार्शल थे।
नया रिस्क प्रबंधन युग पर अलग से एक सत्र का आयोजन किया
गया। वित्तीय संकट की भविष्यवाणी करने या इसे रोकने में विकसित
जोखिस प्रबंधन व्यवस्था की असफलता ने जोखिम प्रबंधन प्रारुप को
बैंक के मु्ख्य एजेंडे में शामिल कर दिया है। यह बैंक की
संस्कृति, आंकड़ों को एकत्र और विश्लेषण करने की नई तकनीकी का
समावेश, व संगठन आदि से संबंधित है। इस सत्र की अध्यक्षता
इंडियन बैंक एसोसिएशन के डिप्यूटी चेयरमैन और एचडीएफडीसी बैंक
के प्रबंध निदेशक आदित्य पुरी ने किया। इस सत्र को संबोधित
करने वालों में आईडीबीआई बैंक के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक
योगेश अग्रवाल, एमसीएक्स स्टाक एक्सचेंज के कार्यकारी निदेशक
यू वेंकटरमन, बीसीजी, लंदन के साझेदार और प्रबंध निदेशक पीयेरे
पारक्यूरे, जेपी मार्गन चेस के प्रबंध निदेशक डा डैविड ए
वेसबोर्ड, पीआरएमआईए के कार्यकारी निदेशक स्टेव लिंडो व विजय
बैंक के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक अलबर्ट टायूरो शामिल थे।
उभरते हुये वित्तीय वास्तुशिल्प, दक्षिण एशिया में वित्तीय
एकीकरण, वित्तीय वास्तुशिल्प में खोज की प्रक्रिया विषय पर
बांग्लादेश बैंक के गर्वनर ने विशेषतौर पर एक सत्र को संबोधित
किया।
संकट के बीच अवसर विषय पर एक विशेष सत्र का आयोजन किया
गया था। जिस समय वित्तीय संकट गहरा रहा था उस समय पर्याप्त
अवसर भी उभर कर सामने आ रहे थे। भारत में एक ओर शहरी क्षेत्र
में जहां मंदी थी वहीं ग्रामीण इलाकों में विभिन्न क्षेत्रों
में पर्याप्त अवसर ऊभर कर सामने आ रहे थे। क्या बैंकिंग
व्यवस्था इन अवसरों से लाभ उठाने के लिए तैयार है? इस सत्र की
अध्यक्षता रिजर्व बैंक आफ इंडिया के उप गवर्नर डा केसी
चक्रवर्ती ने किया। इस सत्र को संबोधित करने वाले वक्ताओं में
बीएएसआईएक्स के चेयरमैन विजय महाजन, एचएसबीसी के मुख्य
कार्यकारी अधिकारी (भारत) स्टुअर्ट डैविड, बीसीजी इंडिया के
साझेदार और निदेशक सौरभ त्रिपाठी, सम्मिलित विकास के लिए
आईसीआईसीआई फाउंडेशन के प्रेसीडेंट डा नचिकेत मोर और नोकिया के
प्रबंध निदेशक डी शिवकुमार शामिल थे।
बैंकिंग व्यवस्था के साथ तकनीक के जुड़ाव विषय पर
आयोजित सत्र में इस बात पर जोर दिया गया कि बैंक व्यवस्था की
सफलता के लिए यह जरूरी है कि इसके कार्य संचानल में नई तकनीक
को शामिल किया जाए। वर्तमान चुनौतियों से निपटते हुये भविष्य
के विकास की तैयारी के लिए कैसे तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभा
सकती है, इस पर खुलकर बहस की गई। इस सत्र में उभरते हुये जोखिम
प्रारुप, सूचना सुरक्षा और धोखाधड़ी की रोकथाम, ग्राहकों के
साथ बेहतर संबंध व्यवस्था का प्रबंधन व कार्यशक्ति का प्रबंधन
आदि चर्चा हुई। इस सत्र की अध्यक्षता इंडियन ओवरसीज बैंक के
चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एसए भाट ने की।
सत्र को संबोधित करने वाले वक्ताओं में इंस्टीट्यूट फोर
डेवलपमेंट एंड रीसर्च इन बैंकिंग टेक्नोलाजी (आईडीआरबीटी)
निदेशक एस सांबामूर्ति, आईआईएससी, बंगलूर के मुख्य रीसर्च
वैज्ञानिक, सिटिजनक्रेडिट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड के प्रबंध
निदेशक वीजे कारनिरो व एयरटेल इंटरप्राइजेज सर्विसेस के मुख्य
कार्यकारी अधिकारी –इंडस्ट्रीज वर्टिकल अरुण भारद्वाज शामिल
थे। यूनिक आइडेंटिफिकेशन अथोरिटी आफ इंडिया (यूआईडीएआई) के
चेयरमैन नंदन निलेकानी ने अलग से इससे संबंधित मुख्य बिंदुओ पर
रोशनी डाला।
आधुनिक आधारभूत संरचना के बड़े वादे विषय पर आयोजित
सत्र में राष्ट्र को संबोधित भारत के राष्ट्रपति के विजन 2011
तक प्रत्येक भारतीयों की एक अनोखी पहचान बायोमैट्रिक कार्ड के
जारी करने के विषय पर चर्चा की गई कि कैसे इस नए आधारभूत
संरचना से लाभ उठाने के लिए बैंकिक व्यवस्था को तैयार करना है।
इस सत्र की अध्यक्षता इंडियन बैंक एसोसिएशन के डिप्टी चेयरमैन
और बैंक आफ बड़ौदा के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक एमडी माल्या ने
की। संबोधित करने वाले वक्ताओं में कोरपोरशन बैंक के चेयरमैन
और प्रबंध निदेशक जेएम गर्ग, ट्रांस यूनियन के प्रेसिडेंट व
मुख्य कार्यकारी अधिकारी सिद्धार्थ मेहता, सीआईबीआईएल के
प्रबंध निदेशक अरुण ठुकराल, फीच रेटिंग्स इंडिया के प्रबंध
निदेशक अमित टंडन व यस बैंक की ग्रुप प्रेसिडेंट व चीफ रिस्क
अधिकारी कविता वेनुगोपाल शामिल थीं।
मंदी के बीच बढ़ते क्रेडिट-एक बेहतरीन संतुलन को बनाये
रखना विषय पर आयोजित सत्र में जोर देते हुये कहा गया कि आर्थिक
मंदी के दौर में जहां बहुत सारी वित्तीय व्यवस्थाएं चरमरा रही
हैं, बैंकिंग व्यवस्था के रूप में भारतीय बैंक पूरी मजबूती से
खड़े हैं। क्रेडिट विस्तार के क्षेत्र में बैंक के सामने अभी
बहुत सारी चुनौतियां हैं। अवसर और चुनौतियों के बीच कैसे
संतुलन बनाया जाये यह विचारणीय प्रश्न है। इस सत्र की
अध्यक्षता वित्र मंत्रालय में बैंकिंग और बीमा विभाग के
संयुक्त सचिव अमिताभ वर्मा ने की। इसका प्रस्तुतिकरण मैककिन्से
एंड कंपनी के साझेदार नवीन ताहिलयानी ने किया। सत्र को संबोधित
करने वाले वक्ताओं में केनरा बैंक के चैयरमैन व प्रबंध निदेशक
एसी महाजन, कर्नाटका बैंक के गैर कार्यकारी चेयरमैन अनंथ
कृष्णा, जेपी मार्गन की मुख्य कार्यकारी अधिकारी कल्पना
मोरपारिया, एसआईडीबीआई के उप प्रबंध निदेशक राकेश रेवारी,
जम्मू और कश्मीर बैंक के चेयरमैन व मुख्य कार्यकारी अधिकारी डा
हासीब द्राबू, इन्फ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस लिमिटेड के चेयरमैन और
प्रबंध निदेशक हेमंत कनोरिया, जेके पेपर लिमिटेड के मुख्य
वित्तीय अधिकारी वी कुमारस्वामी और सुजलान एनर्जी लिमिटेड के
मुख्य संचानल अधिकारी सुमंत सिन्हा शामिल थे। वित्र मंत्रालय
के बैंकिंग और बीमा विभाग के अतिरिक्त सचिव श्री जीसी
चतुर्वेदी ने बदलते परिदृश्य में बैंककर्मियों के लिए मानव
संशाधन चुनोतियां विषय पर रोशनी डाली। वित्र मंत्रालय के
वित्तीय सचिव श्री अशोक चावला ने अपने विशेष संबोधित में इसके
विभिन्न पहलुओं की चर्चा की।
वित्तीय सेक्टर मूल्यांकन रिपोर्ट (सीएफएसए) पर कमेटी
विषय पर आयोजित सत्र में वैश्विक श्रेष्ठ अभ्यासों के संदर्भ
में भारतीय वित्तीय सेक्टर की मजबूती और कमजोरी का आकलन किया
गया। इस बात पर जोर दिया गया कि मौजूदा हालात में यह रिपोर्ट
समयानुकुल है, क्योंकि इस वित्तीय संकट ने पुन: अवलोकन की
जरूरतों को रेखांकित किया है और भारतीय वित्तीय व्यवस्था में
प्याप्त मजबूती को प्रदर्शित किया है। सत्र की अध्यक्षता स्टेट
बैंक आफ इंडिया व ट्राई के पूर्व चेयरमैन एमएस वर्मा ने किया।
सत्र को संबोधित करने वालों में आईडीएफसी के प्रबंध निदेशक और
मुख्यकार्यकारी अधिकारी राजीव लाल, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ
मैनेजमेंट, अहमदाबाद के फाइनेंस और एकाउंट के प्रोफेसर टीटी
राम मोहन, ग्लोबल फाइनेंस सर्विस, अर्नेस्ट एंड यंग के साझेदार
अविनाश पारेख, इंडियन बैंक एसोसिएसन के मुख्य कानूनी सलाहकार
एमआर उमराजी व वारबर्ग पिंकस एलएलसी के प्रबंध निदेशक लियो
पूरी शामिल थे।
निवेश बैंकिंग के भविष्य और निर्मित वित्तीय उत्पाद पर
आयोजित सत्र में इस बात पर चर्चा की गई कि वित्तीय संकट ने
निवेश बैंकिंग के व्यवसाय को परिवर्तित कर दिया है। सत्र को
संबोधित करने वालों में टाटा कैपिटल लिमिटेड के प्रबंध निदेशक
और मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रवीण काडले, फिक्की के कैपिटल
मार्केट कमेटी और एडेलवेस कैपिटल लिमिटेड के चेयरमैन राशेश
साह, सेबी के पूर्णकालिक सदस्य प्रशांत सारन, यूबीएस
सेक्यूरिटिज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड की प्रबंध निदेशक मनिषा
गिरोत्रा, आईसीआईसीआई सेक्यूरिटिज की मुख्य कार्यकारी अधिकारी
और प्रबंध निदेशक माधाबी पुरी बूच और एसबीआई कपिटल के एमडी और
मुख्य कार्यकारी अधिकारी एस विश्वनाथन प्रमुख थे।
आगे के अवसरों के लिए मानव संशाधन का पोषण विषय पर
आयोजित सत्र में बैंकिंग में मानव संशाधन के महत्व पर प्रकाश
डाला गया। विकास के लिए कर्मचारियों की जरूरत को चिन्हित किया
गया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में युवा कर्मचारियों की कमी
को महसूस करने के साथ -साथ बैंकिंग की कार्य संस्कृति को भी
नये सिरे से अवलोकन करने पर जोर दिया गया। सत्र की अध्यक्षता
इंडियन बैंक एसोसिएशन के मुख्य कार्यकारी डा के रामकृष्णन ने
की। सत्र को संबोधित करने वालों में बैंक आफ इंडिया के चेयरमैन
और प्रबंध निदेशक आलोक मिश्रा, बैंक आफ महाराष्ट्रा के चेयरमैन
और प्रबंध निदेशक एलेन पेरिरा, टाटा संस के एचआर प्रमुख सतीश
प्रधान, बीसीजी इंडिया के साझेदार और निदेशक नीरज अग्रवाल,
स्टेट बैंक आफ इंडिया के प्रबंध निदेशक और समुह कार्यकारी आर
श्रीधरन, भारत पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड की कार्यकारी
निदेशक (एचआर) दिप्ती सांजगिरी व टीम लीज सर्विसेज के सह
संस्थापक और चेयरमैन मनीष सबरवाल शामिल थे।
सत्र में इंडियन बैंक एसोसिएशन के चेयरमैन व यूनियन
बैंक आफ इंडिया के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक एमवी नायर ने मौजूद
प्रतिनिधियों का स्वागत किया। इस अवसर पर फिक्की के वरिष्ट
वाइस प्रेसिडेंट भारती इंटरप्राइजे लिमिटेड के चेयरमैन व
प्रबंध
निदेशक रंजन भारती मित्तल ने
प्रतिनिधियों को खासतौर पर
धन्यवाद दिया। सम्मेलन का समापन रिजर्व बैंक आफ इंडिया के
गवर्नर डा सुब्बाराव के भाषण के साथ संपन्न हुआ।
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