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मायावती के लिए नई मुसीबत बना परिषद चुनाव
लखनऊ।
कई मामलों में न्यायालयों में झूठे हलफनामे लगाकर उन्हें
गुमराह करने और देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं एवं परंपराओं की
धज्जियां उड़ाने में बेशर्मी की हद पार करने वाली मायावती
सरकार, विधान परिषद स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की मतगणना रोके
जाने से व्याकुल होकर केंद्रीय निर्वाचन आयोग को भारतीय कानून
समझा रही है। मायावती सरकार के कैबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह
मीडिया के माध्यम से निर्वाचन आयोग को बता रहे हैं कि वह गलत
है और मायावती सरकार जो कर रही है वह सही है। ऐसे सैकड़ों
उदाहरण हैं कि जिनमें मायावती सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के
स्पष्ट आदेशों की अनदेखी करते हुए अपनी मनमानी की है, जब उसकी
केंद्रीय निर्वाचन आयोग के सामने नहीं चल रही है तो वह कानून
की व्याख्या करके निर्वाचन आयोग को कभी कांग्रेस का एजेंट कहकर
और कभी कानून नहीं जानने वाला साबित करके उसकी आलोचना पर उतर
आई है। पूरा प्रदेश जान रहा है कि मायावती के मंत्रियों,
अधिकारियों और बसपा के एजेंटों ने इस चुनाव को जीतने के लिए
सारी लोकतांत्रिक मर्यादाएं तार-तार कर दी हैं।
समाजवादी पार्टी ने तो आरोप लगाया है कि
सत्तारूढ़ दल ने चुनाव जीतने के लिए ओछे हथकंडे अपना लिए हैं।
अपराधियों को जेल से निकालकर मायावती ने टिकट बांटे हैं। बसपा
के मंत्रियों को गांव प्रधानों को अगुवा करने का जिम्मा सौंपा
गया। चुनाव जीतने के लिए अपहरण, प्रलोभन और हत्याएं-क्या नहीं
हुआ है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव को हर तरह से कलंकित किया
गया है। पंचम तल से अधिकारियों को बसपा को जिताने के निर्देश
दिए गए। बाराबंकी में बेनी प्रसाद वर्मा का बसपा को समर्थन
करना प्रमाणित करता है कि कांग्रेस ने बसपा के लिए कालीन
बिछाने का काम किया है। समाजवादी पार्टी के विरूद्ध साजिश में
कांग्रेस-बसपा के साथ भाजपा भी अपनी भागीदारी निभा रही है।
फिरोजाबाद में भी यही कहानी दुहराई गयी थी। इन चुनावों में
राजनीतिक मर्यादाओं को सत्तारूढ़ दल ने ताक पर रख दिया।
मुख्यमंत्री मायावती का नौकरशाही पर पूरा दबाव है कि समाजवादी
पार्टी को कहीं भी न जीतने दिया जाए।
बहुजन समाज पार्टी के नेताओं के आरोप देखिए- बीएसपी के
प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है कि केन्द्रीय
निर्वाचन आयोग सत्तारूढ़ कांग्रेस की कठपुतली बन कर उसके
नुमाइन्दे के तौर पर काम कर रहा है। उन्होंने कहा है कि
निर्वाचन आयोग की यह जिम्मेदारी है कि वह चुनाव को स्वंतत्र और
निष्पक्ष ढंग से सम्पन्न कराये ना कि चुनाव के रास्ते में
अडंगेबाजी करे। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को निर्वाचन आयोग की छवि
को धूमिल होने से बचाना चाहिए और संवैधानिक प्रक्रिया के
माध्यम से निर्धारित किये गये चुनाव कार्यक्रम के तहत मतगणना
परिणाम को घोषित करना चाहिए। मौर्य का कहना है कि यह इस बात का
प्रमाण है कि केन्द्रीय चुनाव आयोग राजनैतिक प्रभाव में आकर
मतदाताओं के वोट डालने के संवैधानिक अधिकार का हनन कर रहा है।
विरोधी पार्टियों के नेता अपनी खिसियाहट मिटाने के लिए
ऊल-जुलूल बयानबाजी पर उतारू हो गये हैं जबकि मीडिया में भी कोई
चुनावी धांधले बाजी की खबरें सामने नहीं आई हैं।
मायावती सरकार ने निर्वाचन आयोग से अपने फैसले पर पुनर्विचार
कर विधान परिषद स्थानीय प्राधिकारी क्षेत्र की मतगणना कराने का
अनुरोध किया और दावा किया है कि निष्पक्ष, शांतिपूर्ण और विवाद
रहित चुनाव सम्पन्न हो जाने के बावजूद निर्वाचन आयोग का परिणाम
घोषित न करना और उच्च न्यायालय की कोई रोक न होने के बावजूद
नामित सदस्यों को मतदान करने से प्रतिबंधित करना संवैधानिक
अधिकारों का उल्लघंन है। उत्तर प्रदेश के मंत्रिमण्डलीय सचिव
शशांक शेखर सिंह ने मतगणना तिथि में परिवर्तन किये जाने के
बारे में प्रदेश सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि एक बार
निर्वाचन की प्रक्रिया प्रारम्भ होने के बाद उसे किसी भी स्तर
पर बाधित नहीं किया जा सकता, यदि कोई आपत्ति है तो निर्वाचन
प्रक्रिया पूरी होने के बाद उसके निराकरण के लिए न्यायालय जाना
ही विकल्प है। उन्होंने कहा कि यह एक अत्यधिक गम्भीर विषय है,
जिस पर आयोग के स्तर पर पुनर्विचार आवश्यक है। नामित सदस्यों
के मताधिकार के संबंध में कई रिट याचिकाएं उच्च न्यायालय में
दाखिल की गयी थीं, जिन पर 4 जनवरी से सुनवाई भी चल रही थी,
परंतु न्यायालय ने उत्तर प्रदेश विधान परिषद स्थानीय
प्राधिकारी के चुनाव में नामित सदस्यों के मताधिकार पर किसी
प्रकार की कोई रोक नहीं लगायी। निर्वाचक नामावली को भी
निर्वाचन आयोग ने ही अंतिम रूप दिया था, लेकिन इसके विरूद्ध
किसी भी समय किसी भी स्तर पर किसी भी प्रकार की कोई शिकायत
प्राप्त नहीं हुई।
मंत्रिमण्डलीय सचिव ने कहा है कि प्रदेश में मतदान
शांतिपूर्वक, नियमानुसार, निष्पक्ष और विवाद रहित ढंग से
सम्पन्न कराये जाने के बावजूद भी 9 जनवरी को अचानक निर्धारित
मतगणना स्थगित किये जाने का कोई कारण समझ में नहीं आता।
निर्वाचन आयोग ने इस सम्बन्ध में राज्य सरकार से कोई भी चर्चा
अथवा वार्ता तक नहीं की, जबकि निर्वाचन की प्रक्रिया में
प्रत्येक स्तर पर राज्य सरकार सम्बद्ध रहती है, यहां तक कि इस
सम्बन्ध में दाखिल याचिकाओं में राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग
दोनों ही रिस्पॉडेंट हैं। केंद्रीय निर्वाचन आयोग को उन्होंने
भारत के संविधान के अनुच्छेद 171 समझाते हुए कहा कि इसके
अन्तर्गत नगर पालिका सदस्यों को निर्वाचक मण्डल में शामिल किया
गया है। संविधान के अनुच्छेद 243 (आर) में यह स्पष्ट है कि
नामित सदस्य नगर निकाय की बैठक में मताधिकार का प्रयोग नहीं कर
सकेंगे मगर नामित सदस्यों के अन्य प्रदत्त अधिकारों जैसे विधान
परिषद के चुनाव में मतदान देने के अधिकार पर कोई रोक नहीं
लगायी गयी है। उप्र नगर निगम अधिनियम-1959 की धारा-2 (38) में
स्पष्ट तौर पर प्राविधानित है कि निगम के सदस्यों का तात्पर्य
कारपोरेटर, पदेन सदस्य, नामित सदस्य आदि से है। इसी प्रकार
उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम 1916 की धारा-9 के अनुसार नगर
निकाय में निर्वाचित सदस्य, पदेन सदस्य और नामित सदस्य आदि की
व्यवस्था है। इस तरह विधान परिषद के चुनाव में नगर निकाय के
नामित सदस्य मतदान के लिए अधिकृत हैं।
कैबिनेट सचिव ने कहा कि उच्च न्यायालय में विचाराधीन
याचिका एमबी (52/2010) जनपद प्रतापगढ़ से सम्बन्धित है।
जिलाधिकारी प्रतापगढ़ ने निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता से दूरभाष
पर बात करके नामित सदस्यों के मताधिकार के सम्बन्ध में
मार्गदर्शन मांगा था। निर्वाचन आयोग के अधिवक्ता ने जिलाधिकारी
प्रतापगढ़ को यह परामर्श दिया था कि उच्च न्यायालय ने विधान
परिषद स्थानीय प्राधिकारी की चुनाव प्रक्रिया प्रारम्भ होने
में हस्तक्षेप करने संबंधी कोई अंतरिम आदेश पारित नहीं किया है
अतः चुनाव प्रक्रिया निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार आगे बढ़
सकती है।
मंत्रिमण्डलीय सचिव ने बताया कि मुख्य निर्वाचन अधिकारी
ने अपने पत्र 14 दिसम्बर, 2009 के माध्यम से प्रमुख सचिव नगर
विकास से यह जानकारी देने की अपेक्षा की थी कि नगर पंचायत, नगर
पालिका परिषद और नगर निगम के नामित सदस्यों को विधान परिषद
स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन में मत देने का अधिकार है या
नहीं। इस पर 16 दिसम्बर, 2009 को मुख्य निर्वाचन अधिकारी को यह
अवगत कराया गया था कि नगर निकायों के नामित सदस्य विधान परिषद
सदस्य के निर्वाचन में मताधिकार का प्रयोग कर सकते हैं। मुख्य
निर्वाचन अधिकारी ने इसी विधिक स्थिति के आधार पर चुनाव
प्रक्रिया/कार्यक्रम सम्पादित भी कराए। कैबिनेट सचिव ने स्पष्ट
किया कि राज्य सरकार की ओर से प्रेषित पत्र में यह लिखा गया है
कि एक बार निर्वाचन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाने के बाद कोई
स्पष्टीकरण प्राप्त करने का आयोग को विधिक अधिकार नहीं है।
प्रश्नगत याचिका जनपद प्रतापगढ़ के निर्वाचन तक ही सीमित है,
अतः इस याचिका में पारित आदेश को अन्य स्थानीय प्राधिकारी
क्षेत्र के निर्वाचन के बाबत लागू नहीं किया जा सकता। इसके
अलावा उच्च न्यायालय का आदेश केवल नगर निगम की बैठक तक ही
सीमित है। इससे अलग इन चुनावों में इस आधार पर किसी स्थगन की
बात नहीं की जा सकती।
मायावती सरकार इस चुनाव में अपनी छीछालेदर को नहीं रोक
सकी है। इसका एक कारण यह है कि वह यह संदेश देना चाहती है कि
राज्य की राजनीति में केवल वह ही है और बाकी दलों का कोई वजूद
नहीं है। सच यह है कि इस चुनाव में मायावती ने जिस प्रकार के
हथकंडों का इस्तेमाल किया है और जिस प्रकार मायावती की
कार्यप्रणाली पर एक राजनीतिक चुप्पी चल रही है वह एक समय बाद
राजनीतिक विस्फोट के रूप में सामने आएगी जिसमें यह बात साफ हो
जाएगी कि मायावती जिसे अपनी ताकत समझती आ रही हैं वास्तव में
वह उनके लिए ताकत नहीं बल्कि एक बड़ी मुसीबत बन गई है। मायावती
की इतनी हिम्मत नहीं हो सकी कि वे अपनी मर्जी से अपने कॉडर के
लोगों को परिषद चुनाव में उतार सकें। उन्हें इसके लिए समाज
विरोधी कृत्यों में लिप्त अपराधी किस्म के लोगों के साथ ही
खड़ा होना पड़ा है। उन्होंने सरकार के सहयोग से जीतने के लिए
जो हथकंडे अपनाए वे मायावती के गले की हड्डियां बनते जा रहे
हैं। मायावती को इस चुनाव
में सौ फीसदी सफलता भले ही मिल जाए लेकिन आज इस चुनाव की सारी
सच्चाई हर आदमी की जुबान पर है।
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