|
|
|
|
मक्खी:
एक विलक्षण कीट
वह कीट कौन है जो 7.5 मिलीमीटर लंबा, धूसरवर्णी,
चित्ताकर्षक और सुंदर भूरी आंखों वाला है? वह है-घरेलू मक्खी।
हम लोग इसे हानिकारक कीट मानकर इससे छुटकारा पाने का असफल
प्रयास करते हैं। मक्खी अपनी तरह के अन्य प्राणियों से करीब दो
मिलीमीटर छोटी होती है और इसके शरीर के पश्च भाग पर पीत वर्ण
के धब्बे होते हैं। यह हमारे घरों में सर्वाधिक पाया जाने वाला
कीट है।
हम प्रायः यह मानते हैं कि हम मक्खी के बारे में जानते
हैं परंतु वास्तव में कोई बिरला ही पूरी तरह इसे जान पाता है!
क्या आप ऐसा सोच सकते हैं कि यह अपने मुखाग्र से मादा के सिर
के पिछले हिस्से में एक चुंबन अंकित करती है। वहीं से दूसरा
साथी मिलन की वास्तविक रति शुरू करता है।
एक मादा मक्खी एक बार में सौ से भी अधिक अंडे देती है
और प्रायः उन्हें पशुओं के गोबर या सड़े हुए खाने के टुकड़ों
में देती है। इन अंडों से एक दिन या उससे भी कम समय में पीले
लारवा तैयार हो जाते हैं, जिन का काम सिर्फ खाना और बढ़ना ही
होता है। अनुकूल परिस्थितियां मिलने पर दो सप्ताह में उनका वजन
800 गुना बढ़ जाता है और वे पूर्ण वृद्धि प्राप्त कर लेते हैं।
फिर एक सप्ताह बाद वे एक पूर्ण विकसित घरेलू मक्खी बन जाती है।
आस्ट्रेलिया के व्यवहारविद कार्ल वॉन फाइश ने यह हिसाब
लगाया कि एक मक्खी कितनी संतान पैदा कर सकती है। अगर कोई बाधा
न हो तो एक मक्खी केवल चार पीढि़यों में 1.25 करोड़ संतान
उत्पन्न कर सकती है परंतु सौभाग्य से अधिकांश मक्खियां
लारवावस्था में ही मृत्यु का शिकार हो जाती हैं, वे या तो सूख
जाते हैं या फिर पक्षियों और अन्य शत्रुओं का भोजन बन जाते हैं
और इस प्रकार संसार में मक्खियों की संख्या का स्तर समान बना
रहता है।
शरद ऋतु में ये मक्खियां पतझड़ में पत्तों की भांति
नष्ट होने लगती हैं। अंदर ही अंदर से जर्जर करने वाले रोगों से
इन की मृत्यु हो जाती है। यही कारण है कि हम अकसर खिड़कियों और
दीवारों पर मरी हुई मक्खियां चिपकी हुई पाते हैं जिनके चारों
ओर जीवाणु लिपटे होते हैं। परंतु कुछ मक्खियां ठंडे और अंधेरे
स्थानों में शरद काल बिताकर जीवित बची रह जाती है और वसंत ऋतु
में उनकी संतति पुनः इस संसार में एक सफल जीवन व्यतीत
करती
है।
|
|
|