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लखनऊ विश्वविद्यालय की अब ये छवि
'भाग
जाइए, हमे कुछ नहीं पता'
लखनऊ।
विश्वविद्यालय में
एमबीए (पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी एंड मैनेजमेंट) करने का सपना देख
रहे सात छात्र छात्राओं को लखनऊ विश्वविद्यालय ने ऐसा झटका
दिया है कि वे चौराहे पर आ गये हैं। यह मामला विश्वविद्यालय
के एडमिशन प्रशासन की विफलता से जुड़ा है जिसकी जिम्मेदारी
लेने को कोई तैयार नही है, जो जिम्मेदार हैं वे छात्रों और उनके
अभिभावकों से कह रहे हैं कि
'भाग जाइए' या
'हमे कुछ नहीं पता।'
मामला राज्यपाल तक पहुंच गया है,
फिलहाल स्थिति जस कि तस है। छात्र और अभिभावक दोनो परेशान हैं
क्योंकि चयन के एक
महीने बाद इन्हें लखनऊ विश्वविद्यालय ने कहा है कि अपने घर
जाइए।
लखनऊ विश्वविद्यालय में एमबीए (पेट्रोलियम टेक्नोलॉजी
एंड मैनेजमेंट) कोर्स में अट्ठाइस जुलाई को दाखिला लिया गया
था। उस समय चयनित छात्रों से कहा गया था कि कक्षाएं चलेंगी और
कोर्स भी चलेगा। राज्यपाल को दिए एक ज्ञापन में भुक्त भोगी
छात्रों ने कहा है कि लखनऊ विश्वविद्यालय अब एक माह बाद
उन्हें सूचित कर रहा है कि उनकी कक्षाएं आरंभ नही की जाएंगी
क्योंकि चालीस प्रतिशत सीटें नहीं भर सकी हैं। छात्रों ने
आईएमएस के विशेष कार्याधिकारी जेके शर्मा पर आरोप लगाया है कि
वे उनके भविष्य पर पानी फेर रहे हैं। छात्रों ने राज्यपाल से
अनुरोध किया है कि 'हम बच्चों का भविष्य आपके हाथ में है, कृपा
करके आप हमारी कक्षाएं आरंभ कराने में मदद करें, हम सभी बच्चे
अपने भविष्य को देखते हुए आपसे हस्तक्षेप की गुहार लगा रहे
हैं। इन छात्रों के नाम हैं - अजय कुमार त्रिपाठी, जनार्दन
मिश्रा, शहंशाह, खुशबू सिंह, आसमां, तसनीम कौसर, और फरहत।
छात्रों को अपना भविष्य घोर अंधकार में नज़र आ रहा है।
वे राज्यपाल की शरण में गए हैं और अपनी मदद के लिए मीडिया के
पास भी जा रहे हैं। इनके अभिभावक अलग परेशान हैं और लखनऊ
विश्वविद्यालय की इस अंधेरगर्दी को लेकर भारी तनाव में हैं।
अभिभावक कह रहे हैं कि एक माह बाद अब अपने बच्चों को कहां ले जाएं।
वे लखनऊ विश्वविद्यालय के हर संबंधित अधिकारी के पास पहुंचे
तो उन्हें जवाब मिल रहा है कि
'भाग जाइए' या
'हमे कुछ नही पता।' छात्रों और अभिभावकों को कुलपति से लेकर एडमिशन की मुख्य
समन्वयक सरोज आनंद
तक से ऐसे अनुभव का सामना करना पड़
रहा है जैसे सड़क
पर यातायात का सिपाही रिक्शे वालों पर अपनी थर्ड डिग्री आजमाता
है। अभिभावकों और छात्रों का कहना है कि हमने सुन रखा था कि
लखनऊ विश्वविद्यालय में शैक्षिक और प्रशासनिक वातावरण औरों के
मुकाबले अच्छा है लेकिन यहां का रवैया देखकर लगा कि अब लखनऊ
विश्वविद्यालय की
पहले जैसी गरिमामय छवि खत्म होती जा रही है। यहां
झूंठ, कपट का जैसे कि बोलबाला हो। कोई किसी की सुनने को तैयार
नही है। किसी ने गलत कर दिया तो कर दिया उसी पर वीसी तक की मुहर
लग रही है। यहां का हर ओहदेदार व्यक्ति अपनी बला दूसरों पर टाल
रहा है और दूसरों को एक-दूसरे के खिलाफ उकसा भी रहा है।
छात्रों से कोई कह रहा है कि आपको कुलपति के पास लेकर
चलेंगे, उनके सामने आपकी बात रखी जाएगी, कल 12 बजे आप कुलपति
कार्यालय में मिलिए, यह भरोसा देने वाले एमबीए पेट्रोलियम
के निदेशक डॉ विभूति राय
हैं जो छात्रों इन को समय देकर कुलपति कार्यालय ही नहीं पहुंचे, बल्कि
उन्होंने अपना मोबाइल भी बंद कर दिया। डॉ विभूति राय यह भी कह
रहे हैं कि वह क्लास कराने को तैयार हैं, यदि जेके शर्मा लिखकर
भेज दें और जेके शर्मा कह रहे हैं कि हमसे गलती हो गई है, आप
किसी दूसरे पाठ्यक्रम में दाखिला लेने की कोशिश कीजिए। जानकारी
करने पर जेके शर्मा बार-बार अपना स्टेटमेंट भी बदल रहे हैं।
एडमिशन हेड सरोज आनंद इन छात्रों से कह रही हैं कि वे साइंस
फैकल्टी की ओएसडी आरके मिश्रा के पास चले जाएं और आरके मिश्रा
कह रहे हैं कि हमसे क्या मतलब? वो ये भी कह रहे हैं कि आप
लिखकर दे दीजिएगा तो जिस कोर्स में सीट खाली होंगी उनमें
दाखिले की वीसी से रिक्वेस्ट कर दी जाएगी। वे आगे कहते हैं कि
अगर आप कोई कार्रवाई करेंगे तो यही होगा कि एक-दो लोग निलंबित
हो जाएंगे इससे ज्यादा कुछ नहीं। इससे न आपका फायदा होगा और न
हमारा।
मान गए मिश्राजी! आप अत्यंत महान हैं और किस प्रकार
अपना विभाग चला रहे हैं उसका प्रमाण भी मिल गया। इनका सुझाव
देखिए कि जो छात्र दूसरे शहरों से भूगर्भ विज्ञान पढ़कर एमबीए
पेट्रोलियम में दाखिले के लिए दूसरे कालेजों के प्रस्ताव
छोड़कर आए लखनऊ विश्वविद्यालय आए हैं उन्हें यहां अपनी
गलतियों को सुधारने के बजाय आरके मिश्रा यह सलाह दे रहे हैं कि
ये छात्र मैथ, बायो या केमेस्ट्री पढ़ लें या अगली बार का
इंतजार करें। क्या यह संभव है? ऐसी घटिया तिकड़में सरोज आनंद
की तरफ से हो रही हैं जो इसमें अपनी बदनामी और नाकामी छिपाने
की कोशिश कर रही हैं। वे कह रही हैं कि इस मामले में जो होगा
देखा जाएगा। सरोज आनंद का व्यवहार
शुरू से ही सबसे ज्यादा अभद्रता और
असहयोग वाला है।
इनके बारे में छात्रों की ओर से और भी शिकायतें सुनी जाती रहीं
हैं। वे नही चाहतीं कि अब इन
छात्रों के मामले में या
किन्हीं और मामलों में उनकी कोई फाइल खुले, इसलिए वे सभी संबंधित पक्षों को गुमराह
करके झूंठी जानकारियां देने पर उतर आई हैं।
इस मामले में इससे बद्तर और क्या
हो सकता है कि
कार्यवाहक कुलपति उपेंद्र नाथ द्विवेदी ने इन
छात्रों की समस्या का समाधान करने के बजाय उनसे नकारात्मक
व्यवहार किया। पहले तो दो दिन तक वीसी
ने छात्रों और उनके अभिभावकों से मुलाकात
ही नही की। छात्रों का कहना है कि कुलपति ऑफिस में
मौजूद रहे और दो दिन तक इंतजार कराने के बाद भी नही मिले और जब
किसी तरह वे उनसे मिले भी तो उन्होंने एक मिनट देते हुए तैश
में कहा कि 'आपका एडमिशन कैसे हो गया ये कोर्स तो बंद कर दिया
गया है, आप एडमिशन हेड से मिलिए और आप यहां से जा सकते हैं।'
एडमिशन हेड सरोज आनंद कहती हैं कि हमे ज्ञात नही था कि चालीस
प्रतिशत सीटें फिलअप नही हुई हैं मगर जब उन्हें कुछ जानकारी
देने की कोशिश की गई तो वे धमकाने पर उतर आईं। उनका कहना है कि
जब कुछ गलत हो जाता है तो उसके बाद अच्छा होता है, अब आगे के
बारे में सोचिए!
इससे सरोज आनंद की कार्यप्रणाली का अंदाजा लगाया जा सकता है।
छात्रों ने वस्तुस्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि
उन्हें चयनित करने के पश्चात्
28 जुलाई को काउंसिलिंग के
लिए बुलाया गया। काउंसिलिंग प्रक्रिया में साठ सीटों पर
पच्चीस सीटों की लिस्ट निकाली गई और बाकी छात्रों को प्रतीक्षा
में रखा गया। काउंसिलिंग के दौरान केवल सात छात्रों को चयनित
किया गया और बाकी को यह कहकर बाहर निकाल दिया गया कि ये छात्र
योग्य नही हैं। चयनित छात्रों से डॉ विभूति राय ने कहा कि उनकी
कक्षाएं 18 अगस्त से शुरू होंगी मगर जब चयनित छात्र
निर्धारित तिथि पर कक्षा में पहुंचे तो उन्हें कक्षा में बैठने
से मना कर दिया गया। उन्हें कहा गया कि वे अभी थोड़ी और
प्रतीक्षा करें। कुछ छात्रों को हॉस्टल में कक्ष आवंटित भी कर
दिए गए मगर ये सभी छात्र लखनऊ में किराए पर ही रह रहे हैं। इन
छात्रों में फीस जमा कर दी है इनको हॉस्टल का आवंटन भी हो गया
है ऐसी स्थिति में इनको एक माह बाद यह सूचना देना कि इन पर
बज्रपात के समान है कि उनका कोर्स बंद कर दिया गया है।
लखनऊ विश्वविद्यालय में यह मामला काफी चर्चा का विषय
बना हुआ है। छात्र और उनके अभिभावक इस अंधेरगर्दी के खिलाफ
राज्यपाल से मिलने के लिए राजभवन गए थे। उनकी राज्यपाल से तो
मुलाकात नहीं हुई उनके कार्यालय ने छात्रों का ज्ञापन ले लिया।
फिलहाल यह स्थिति है कि इन छात्रों को अभी कहीं से भी कोई राहत
नही मिली है।
लखनऊ विश्वविद्यालय में अब इस प्रकार के मामले सामान्य होते जा
रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन अपने को फंसता हुआ देखकर तुरंत
फीस वापसी की बात करने लगता है। लखनऊ विश्वविद्यालय का यह इतिहास रहा है कि उसमें मेरिट या
पाठ्यक्रमों के संचालन के मामले में कोई समझौता नही किया गया
है एक छात्र का मामला आया तो तब भी उसका समुचित
समाधान किया गया। यह तो 7 छात्रों का मामला है जोकि उनका अगला
कदम उनकी राजी-रोटी से जुड़ता है। हाल के वर्षों में अब
विश्वविद्यालय प्रशासन जुगाड़ दबाव और
भ्रष्टाचार की
सीमाएं लांघ रहा है। छात्रों की समस्याओं
के समाधान को
छोड़कर यहां के
अधिकांश अधिकारी अपने प्रमोशन और पदों को हथियाने या
अपने लोगों को एलयू में स्थापित करने की राजनीति करते
आ रहे हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय के
कार्यवाहक कुलपति उपेंद्र
नाथ द्विवेदी को अपनी चिंता है। उनका ध्यान इस
समय छात्रों की समस्याओं के निपटारे में न
होकर अपनी पदस्थापना की तरफ ज्यादा दिखाई देता है।
जबकि वे दावे बड़े-बडे़ करते हैं। यदि ऐसी ही
स्थितियां रहीं तो लखनऊ विश्वविद्यालय का जो दुनिया में नाम
है उसका
गौरव समाप्त होने में
ज्यादा वक्त नही लगेगा।
एलयू सहित दो विवि का अनुदान डी-फ्रीज
लखनऊ। सरकार ने लखनऊ विश्वविद्यालय सहित दो अन्य राज्य
सहायता प्राप्त विश्वविद्यालयों का वर्ष 1998-99 के स्तर पर
स्थिर (फ्रीज) अनुदान को डी-फ्रीज करने के प्रस्ताव को मंजूरी
दी है। मंत्रिपरिषद ने 1998-99 के स्तर पर फ्रीज अनुदान को
डी-फ्रीज करते हुये, लखनऊ विश्वविद्यालय को वर्तमान में दिए जा
रहे अनुदान 22-85 करोड़ रूपए के स्थान पर 36 करोड़ रूपए की
धनराशि, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी को
वर्तमान में दिए जा रहे अनुदान 5-7 करोड़ के स्थान पर 9-5
करोड़ रूपए और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी को
वर्तमान में दिए जा रहे अनुदान 5-6 करोड़ रूपए के स्थान पर 15
करोड़ रूपए वित्तीय वर्ष 2009-10 के लिए स्वीकृत दी गयी।
ज्ञातव्य है कि वर्ष 1998-99 में जब विश्वविद्यालयों को अनुदान
फ्रीज किया गया था, उसके पश्चात पंचम वेतन आयोग की संस्तुतियां
लागू हुई थीं और एक जनवरी 26 से छठे वेतनमान की संस्तुतियां
लागू होने के कारण विश्वविद्यालयों पर अधिक व्यय भार बढ़ गया
था। विश्वविद्यालय वर्ष 1995 के स्तर पर ही शिक्षण शुल्क ले
रहे है। ऐसी स्थिति में फ्रीज अनुदान को डी-फ्रीज करना जरूरी
हो गया था।
लविवि में पीएचडी करने पर लगी रोक हटी
लखनऊ। लखनऊ विश्वविद्यालय में पिछले कुछ माह से पीएचडी
करने पर लगी रोक हटा ली गई है। पीएचडी पाठ्यक्रम में प्रवेश
प्रक्रिया सितम्बर में आरम्भ हो जाएगी। इस बार पहली बार लविवि
पीएचडी के लिए प्रवेश परीक्षा आयोजित करेगा। परीक्षा परिणाम की
मेरिट के आधार पर ही पीएचडी में प्रवेश दिया जाएगा।
लविवि में कला संकाय की फैकेलटी ऑफ बोर्ड की बैठक हुई,
जिसमें सभी विभागों के विभागाध्यक्षों, डीन तथा एक-एक सीनियर
रीडर और लेक्चरार शामिल हुए। बैठक में पीएचडी करने पर लगी रोक
को हटाने की सहमति बनी। गत वर्ष कुलपति अजायब सिंह बरार ने
प्रवेश पर रोक लगा दी थी। प्रवेश में आरक्षण संबंधी नियमों का
पालन नहीं किया जा रहा था। इस कारण गत सत्र शून्य घोषित कर
दिया गया। पीएचडी पर लगी रोक को हटाते हुए इसकी प्रवेश
प्रक्रिया को सितम्बर माह में शुरू करने का निर्णय लिया गया
है।
प्रवेश के लिए इस बार प्रवेश परीक्षा का आयोजन किया
जाएगा। परीक्षा के मेरिट के आधार पर ही अभ्यर्थियों को प्रवेश
दिया जाएगा। शोधार्थियों को अब अप्लाईड विषय में शोध करने की
अनुमति नहीं दी जाएगी। उदाहरण के तौर पर भूगोल के छात्र भूगर्भ
में शोध करते थे, इक्नामिक्स के छात्र अप्लाईड इक्नामिक्स
में शोध कर लिया करते थे, मगर अब छात्रों के लिए अप्लाईड विषय
में शोध के रास्ते को बंद कर दिया गया है। शोध पत्र को तीन साल
के भीतर दाखिल करने को अनिवार्य कर दिया गया है लेकिन कोई भी
दो वर्ष के पूर्व अपना शोध पत्र दाखिल नहीं कर पाएगा।
इसके साथ ही प्रत्येक छात्र को अपने विषय में दो
आर्टिकल लिखने अनिवार्य होंगें। जो छात्र तीन साल के भीतर शोध
पत्र नहीं दाखिल कर पाएंगे, उन्हें शोध पत्र प्रस्तुत करने के
लिए दो साल का अतिरिक्त समय दिया जाएगा। लेकिन तब वे संस्थागत
छात्र नहीं कहलाएंगे। इसके साथ ही सेवानिवृत शिक्षक शोध नहीं
कर पाएंगे तथा एक शिक्षक के अतंर्गत 12 छात्रों को ही शोध करने
की अनुमति दी जाएगी।
नेशनल पीजी कालेज में
लुआक्मैट की प्रवेश परीक्षा
लखनऊ। नेशनल पीजी कालेज के प्रबंधन पाठ्यक्रमों के लिए
संयुक्त प्रवेश परीक्षा लुआक्मैट इस वर्ष भी आयोजित की जाएगी।
इस प्रवेश परीक्षा के परिणाम के आधार पर नेशनल पीजी कालेज़ के
साथ अन्य महाविद्यालयों में बीबीए, बीएमएस, बीसीए, एवं
बीजेएमएस पाठ्यक्रमों में प्रवेश मिल सकेगा। कालेज़ के
प्राचार्य डॉ. एसपी सिंह ने बताया कि प्रबंधन पाठ्यक्रमों के
लिए प्रवेश प्रक्रिया 25 जून को आयोजित की जाएगी। उन्होंने
बताया कि एक फार्म और एक परीक्षा के माध्यम से प्रबंधन की 750,
बीसीए की 300 और बीजेएमसी की 30 सीटों पर प्रवेश किया जाएगा।
वर्ष 2008 के मुकाबले इस वर्ष प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने
वाले महाविद्यालयों की संख्या 7 से बढ़कर 11 हो गई है और
पाठ्यक्रम भी दो से बढ़कर चार हो गए हैं। प्रवेश परीक्षा हेतु
आवेदन पत्र सभी महाविद्यालयों से लिए जा सकते हैं, परन्तु
आवेदन पत्र नेशनल पीजी कालेज में 25 मई से 22 जून तक जमा
होंगे। प्राचार्य ने बताया कि इस वर्ष नेशनल पीजी कालेज़ में
पहली बार प्री काउंसिलिंग का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें
जिले के सभी छात्र और अभिभावक भाग ले सकेंगे। काउंसिलिंग में
विशेषज्ञ बुलाए जाएंगे, जो अभि भावकों
के साथ उनके बच्चों को कैरियर और उज्जवल भविष्य के लिए
महत्वपूर्ण टिप्स देंगे।
डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट से साभार।
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