खेती में भारत पड़ोसियों से भी पिछड़ा?

  • सुरिंदर सूद

कृषि उत्पाद के मामले में भारत, दक्षिण एशिया का दिग्गज देश तो नजर आता है, लेकिन पिछले आंकड़ों को देखें तो खाद्य फसलों की उत्पादनशीलता, छोटे पड़ोसी देशों से भी कम है। अफगानिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश जैसे देशों में दो दशकों में फसलों की उत्पादकता के मामले में विकास दर भारत से ज्यादा रही है। दिलचस्प यह है कि दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संघ (सार्क) के आठ देशों में फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के मामले में भूटान पहले स्थान पर है। इस पूरे इलाके को देखें तो पाकिस्तान में 90 प्रतिशत सिंचित क्षेत्र है और वहां पर औसत कृषि जोत करीब तीन एकड़ है, लेकिन फसलों की उत्पादकता के लिहाज से भूटान उससे भी आगे है।
मालदीव ऐसा देश है, जहां बमुश्किल ही खेती होती है और इस क्षेत्र की हिस्सेदारी सकल घरेलू उत्पाद के लिहाज से 3 प्रतिशत से भी कम है। सन् 1960 के दशक के अंतिम वर्षों में निश्चित रूप से भारत में हरित क्रांति का प्रभाव पड़ा, जिसके चलते एशिया के विभिन्न देशों में विकास के मामले में भारत अग्रणी देश बन गया। लेकिन यह जोश बरकरार रखने में भारत असफल रहा। खासकर 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद स्थिति में बदलाव आया, जिसके चलते अन्य देश फसलों की उत्पादकता के मामले में भारत से आगे निकल गए। कृषि के मामले में प्रगतिशील भारत में फसलों की उत्पादकता कम होती गई, भले ही अन्य क्षेत्रों में विकास दर उच्च हो गई।
नई दिल्ली में नवंबर 2008 में सार्क देशों के कृषि मंत्रियों की हुई बैठक में जो दस्तावेज पेश किया गया, उससे कुछ इसी तरह के तथ्य उभर कर सामने आए। ये आंकड़े संयुक्त राष्ट्र खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) से लिए गए थे और बैठक के दौरान इस पर चर्चा हुई। इससे स्पष्ट हुआ कि प्रमुख अनाज, जिसमें चावल, गेहूं और दालें शामिल हैं- इनकी उपज सार्क देशों की की तुलना में भारत में सबसे कम रही है। अब चावल को ही लें, जिसकी खेती इस इलाके में व्यापक रूप से होती है और इसकी खपत भी बहुत अधिक है। इसकी औसत पैदावार में उच्चतम वृद्घि 1991-93 और 2005-07 के बीच भूटान में 3.37 प्रतिशत रिकार्ड की गई। इस दौरान भारत में यह 1.21 प्रतिशत के न्यूनतम स्तर पर रही। बांग्लादेश की स्थिति पर गौर करें तो वहां भी 2.6 प्रतिशत की जोरदार बढ़ोतरी रही।
गेहूं के मामले में, जो इस इलाके की दूसरी प्रमुख फसल है- अफगानिस्तान में सबसे उच्च वार्षिक उत्पादकता दर्ज की गई जहां बढ़ोतरी 3.44 प्रतिशत की रही। दूसरे स्थान पर 3.39 प्रतिशत के साथ नेपाल रहा। गेहूं उत्पादन में बढ़ोतरी के लिहाज से भी भारत में विकास दर सबसे कम रही। श्रीलंका और बांग्लादेश में भी गेहूं के उत्पादकता के लिहाज से मानसून अनुकूल नहीं रहा। अगर कुल खाद्यान्न की उत्पादकता के लिहाज से वार्षिक वृध्दि दर को देखें तो यह भूटान में सबसे ज्यादा- 5.12 प्रतिशत है और सबसे कम भारत और श्रीलंका प्रत्येक में 1.46 प्रतिशत है। अगर हम दालों की उत्पादकता में बढ़ोतरी के आंकड़ों को देखें, जो सार्क देशों के मानव आहार में सबसे ज्यादा प्रोटीन का योगदान करता है तो भी वही कहानी सामने आती है।
भूटान इसकी उत्पादकता में बढ़ोतरी के लिहाज से 6.62 प्रतिशत के साथ पहले स्थान पर है और भारत नीचे से दूसरे स्थान पर है, जिसका विकास दर 0.62 प्रतिशत है। सार्क देशों में एक समान सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि है, इसे देखते हुए इन तुलनात्मक आंकड़ों को खारिज नहीं किया जा सकता है। अगर मालदीव को छोड़ दें तो बाकी सभी देशों में जनसंख्या ज्यादा है और जोत छोटे-छोटे हैं। इन सभी देशों में 60 प्रतिशत लोगों का कृषि क्षेत्र पर मालिकाना हक एक एकड़ से कम है, हालांकि पाकिस्तान इसका अपवाद है। इन देशों में अभी भी सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान 16.5 प्रतिशत से लेकर करीब 40 प्रतिशत तक है।
प्रश्‍न यह है कि भारत अपने पड़ोसी देशों से सीख लेते हुए आखिर अपनी उपज क्यों नहीं बढ़ा सकता है? ऐसा तो नही कि भारत की कृषि नीतियों में कहीं भारी सामंजस्‍य का अभाव है। यह भारत के लिए भारी चिंता का विषय है कि जो देश अपने खाद्यान्‍न उत्‍पादन में आत्‍मनिर्भरता की तरफ बढ़ रहा हो और दूसरे देशों की जरूरतों को भी पूरा करने की क्षमता रख्‍ाता हो वह खाद्यान्‍न उत्‍पादन में अपने पड़ोसियों से भी पिछड़ जाए वह भी तब जब सारे पड़ोसियों की भौगोलिक ‌स्‍थितियां लगभग एक जैसी हों। इस पर भारत को गंभीरता से विचार करना होगा और अपने खाद्यान्‍न उत्‍पादन के क्षेत्र में पूरा ध्‍यान देना होगा, अन्‍यथा यह खाद्यान्‍न के क्षेत्र में भारत के सामने एक भारी एवं भावी संकट की ‌स्‍थिति होगी।

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