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जैविक कृषि राष्ट्रीय एवं वैश्विक जरूरत-कृषिमंत्री

इंडिया एक्सपो सेंटर ग्रेटर नोएडा में जैविक कृषि विश्व कुंभ

'देश में सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान एक बड़ी चुनौती'

स्वतंत्र आवाज़ डॉट कॉम

Thursday 9 November 2017 05:00:13 AM

radha mohan singh

ग्रेटर नोएडा। केंद्रीय कृषि और किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा है कि भारत परंपरागत रूपसे दुनिया का सबसे बड़ा जैविक कृषि करने वाला देश है, यहां तक कि मौजूदा भारत के बहुत बड़े भू-भाग में परंपरागत ज्ञान के आधार पर जैविक खेती की जाती है। राधामोहन सिंह ने यह बात आज इंडिया एक्सपो सेंटर ग्रेटर नोएडा में जैविक कृषि विश्व कुंभ 2017 के उदघाटन पर कही। इसमें विश्व के 110 देशों के 1400 प्रतिनिधि और 2000 भारतीय प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं और इसका आयोजन इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ आर्गेनिक फार्मिक मूवमेंट्स (आईफोम) और ओएफआई ने मिलकर किया है। राधामोहन सिंह ने कहा कि धरती मां के स्वास्थ्य, सतत उत्पादन, आमजन को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान के लिए जैविक कृषि आज राष्ट्रीय एवं वैश्विक आवश्यकता है।
कृषिमंत्री राधामोहन सिंह ने कहा कि देश में वर्तमान में 22.5 लाख हेक्टेयर जमीन पर जैविक खेती हो रही है, जिसमे परंपरागत कृषि विकास योजना से 3,60,400 किसान को लाभ पहुंचा है, इसी तरह पूर्वोत्तर राज्यों के क्षेत्रों में जैविक कृषि के अंतर्गत 50,000 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर करने का लक्ष्य है। कृषिमंत्री ने कहा कि देश में अब तक 45863 हेक्टेयर क्षेत्र को जैविक योग्य क्षेत्र में परिवर्तित किया जा चुका है और 2406 फार्मर इटेंरेस्ट ग्रुप यानी एफआईजी का गठन किया गया है और 2500 एफआईजी लक्ष्य के मुकाबले 44064 किसानों को योजना से जोड़ा जा चुका है। कृषिमंत्री ने कहा कि उत्तर प्रदेश में परंपरागत कृषि विकास योजना वर्ष 2015-16 से प्रारंभ हुई और 28750 एकड़ मे 28750 किसान को लाभ पहुंचा है। उन्होंने कहा कि किसानों के जैविक उत्पादों के विपणन के लिए राज्य सरकार 5 लाख रुपये प्रति जनपद को देकर बिक्री केंद्र खुलवा रही है। उन्होंने कहा कि दुनिया के कुछ वैज्ञानिक इसे 'डिफाल्ट ऑर्गेनिक' कहते हैं, लेकिन हमें यह समझने की जरूरत है कि जो किसान परंपरागत रूप से जैविक खेती कर रहे हैं, यह उनकी मजबूरी नहीं, उनकी पसंद है और बेहद गहरी समझ के साथ वो इस रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं।
राधामोहन सिंह ने कहा कि आज किसान रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते तो यह उनकी अज्ञानता नहीं है, बल्कि उन्होंने बहुत सोचसमझकर ऐसा न करने का फैसला किया है, इसलिए उनकी इस खेती की विधि को 'बाई डिफाल्ट' नहीं कहा जा सकता। राधामोहन सिंह ने कहा कि भारत सरकार इस बात को स्वीकार करती है कि पिछले कुछ दशक में खेतों में रासायनिक खाद के अंधाधुंध उपयोग ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि इस तरह हम कितने दिन खेती कर सकेंगे? रासायनिक खाद युक्त खेती से पर्यावरण के साथ सामाजिक-आर्थिक और उत्पादन से जुड़े मुद्दे भी हैं, जो हमारा ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अब देश में खाद्य आपूर्ति की कोई समस्या नही है, लेकिन देश की बढ़ती जनसंख्या को सुरक्षित एवं पौष्टिक खाद्यान उपलब्ध कराने की महत्वपूर्ण चुनौती का कार्य अभी शेष है, हमारी निर्भरता रासायनिक खेती पर हो गई है, जिसमें रासायनिक उर्वरक, कीट-रोगनाशी एवं अन्य रासायन का प्रयोग करके उत्पादन तो बढ़ गया है, लेकिन अनियंत्रित उपयोग से असुरक्षित खाद्यान उत्पन्न करने की समस्या पनप गई है।
कृषिमंत्री ने कहा कि यदि हम इन रासायनिक आदानों के अंधाधुंध प्रयोग द्वारा पर्यावरण पर होने वाले दुष्प्रभावों का विश्लेषण करें तो पता चलेगा कि इन सारे रासायनिक आदानों का बड़ा भाग मिट्टी, भू-जल, हवा और पौधों में समाविष्ट हो जाता है, यह छिड़काव के समय हवा के साथ दूर तक अन्य पौधों को प्रदूषित कर देते हैं। उन्होंने कहा कि भूमि में प्रवेश करने वाले ये रसायन भू-जल में मिलकर पानी के अन्य श्रोतों को भी प्रदूषित कर देता है। राधामोहन सिंह ने कहा कि रसायनों के दुष्प्रभाव से विश्व में जलवायु परिवर्तन और प्रकृति के पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो गया है और इसके मानव पर भी गंभीर दुष्प्रभाव देखे गए हैं।

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