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साहित्य अपने समय का प्रतिबिंब-पांडेय

बेटी को आगे बढ़कर संपत्ति का अधिकार दें-शीबा

चूरू में प्रयास संस्थान का सम्मान प्रदान समारोह

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Thursday 12 October 2017 05:32:38 AM

churu mein prayaas sansthaan ka sammaan samaaroh

चूरू। राजस्थान के चूरू शहर के सूचना केंद्र में प्रयास संस्थान के पुरस्कार समारोह में जोधपुर की लेखिका पद्मजा शर्मा को उनकी पुस्तक ‘हंसो ना तारा’ के लिए इक्यावन हजार रुपये का घासीराम वर्मा साहित्य सम्मान एवं गांव सेवा सवाई माधोपुर के लेखक गंगा सहाय मीणा को उनकी पुस्तक ‘आदिवासी साहित्य की भूमिका’ के लिए ग्यारह हजार रुपये का रुक्मणि वर्मा युवा साहित्यकार सम्मान प्रदान किया गया। इस दौरान 'भय नाहीं खेद नाहीं' पुस्तक के लिए भी नई दिल्ली की दीप्ता भोग और पूर्वा भारद्वाज को संयुक्त रूपसे पचास हजार रुपये का विशेष घासीराम वर्मा सम्मान दिया गया।
प्रख्यात गणितज्ञ डॉ घासीराम वर्मा की अध्यक्षता में हुए इस समारोह को हिंदी के आलोचक मैनेजर पांडेय ने संबोधित किया और कहा कि कवि किसी अर्थशास्त्री और इतिहासकार पर निर्भर नहीं रहता, वह अपने समय को जैसा देखता है, वैसा ही लिखता है, इसलिए साहित्य अपने समय की स्थितियों का प्रतिबिंब होता है। उन्होंने कहा कि मातृभाषा ने ही तुलसी, सूर, मीरा और विद्यापति को महाकवि बनाया, इसलिए हमें मातृभाषाओं में सृजन करना चाहिए। मैनेजर पांडेय ने कहा कि राजस्थान में असंख्य लेखक हैं, जो हिंदी के साथ-साथ अपनी मातृभाषा राजस्थानी में भी लिख रहे हैं।
मैनेजर पांडेय ने विजयदान देथा का स्मरण करते हुए कहा कि भाषा को जानना अपने अस्तित्व को जानना है। उन्होंने कहा कि आज जहां लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए लड़ रहे हैं, वहीं आदिवासी अपने अस्तित्व के लिए, जल, जंगल और जमीन को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। मैनेजर पांडेय ने ‘ग्रीन हंट’ का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्रिटिशकाल में भारत में आदिवासियों के साथ जैसा व्यवहार होता था, वैसा ही बर्ताव आजाद भारत में भी उनके साथ किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि पंडिता रमाबाई को याद करना, एक पुराने संघर्ष को याद करना है और स्त्री को यह याद दिलाना है कि वह किसी भी संघर्ष में अकेली नहीं है। उन्होंने कहा कि साहस के साथ अपनी बात कहने से आलोचना में जान आ जाती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य एक भाषिक प्राणी है और भाषा से ही परिवार और समाज की रचना होती है।
मुख्य वक्ता नारीवादी चिंतक शीबा असलम फहमी ने कहा कि कानून ने स्त्री को बराबरी का अधिकार दिया है, लेकिन समाज अपने अंदर से इसे स्वीकार नहीं करपा रहा है। उन्होंने कहा कि हम कितनी भी तरक्की कर लें, लेकिन यदि उपेक्षितों और वंचितों को बराबरी का अधिकार नहीं दे पाए और यह तरक्की चंद लोगों तक ही सीमित रहती है तो इसका कोई अर्थ नहीं है। शीबा असलम फहमी ने कहा कि हमारे भीतर बलात्कार के अपराधी के प्रति जो घृणा का भाव रहता है, वही घरेलू हिंसा जैसे अपराधों के लिए भी होना चाहिए। उन्होंने कहा कि शरीर के साथ होने वाले अपराध को तो हम देखते हैं, लेकिन मन के साथ होने वाले अपराध को हम नजरअंदाज कर देते हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने घर में एक मजबूत बेटी तैयार करनी चाहिए और उसे संपत्ति का अधिकार आगे बढ़कर देना चाहिए।
साहित्यकार पद्मजा शर्मा, दीप्ता भोग, पूर्वा भारद्वाज और गंगा सहाय मीणा ने अपनी सृजन प्रक्रिया, संघर्ष और अनुभवों को साझा किया। भंवर सिंह सामौर ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रयास संस्थान के अध्यक्ष दुलाराम सहारण ने आभार उद्बोधन में आयोजकीय पृष्ठभूमि पर प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन कमल शर्मा ने किया। सम्मान समारोह में मालचंद तिवाड़ी, नरेंद्र सैनी, रियाजत खान, रामेश्वर प्रजापति रामसरा, मीनाक्षी मीणा, दलीप सरावग, रघुनाथ खेमका, जमील चौहान, आरजेएस चंद्रशेखर पारीक, कुमार अजय, विकास मील, हेमंत सिहाग, आशीष दाधीच, राकेश बेनीवाल, अमित सैनी, रामनाथ कस्वां, शिवकुमार मधुप, बाबूलाल शर्मा, हरिसिंह सिरसला, राजकुमार लाटा, डॉ मूलचंद, मोहनसोनी चक्र, राजेंद्र मुसाफिर, सुनील शर्मा और बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी मौजूद थे।

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