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हथकरघा का अब भी कोई विकल्प नहीं

भारत में हथकरघा क्षेत्र के लिए असीम संभावनाएं

Saturday 5 August 2017 02:20:37 AM

केवी वेंकटसुब्रमणियम

केवी वेंकटसुब्रमणियम

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नई दिल्ली। हथकरघा का संबंध सदियों से कपड़ों से जुड़ी उत्कृष्ट भारतीय कारीगरी और लगभग प्रत्येक राज्य में लाखों हथकरघा कारीगरों को रोज़गार का स्रोत उपलब्ध कराने से जोड़ा जाता रहा है। भारत में तेजी से बदलती जीवनशैली के बावजूद कलाकारों और शिल्पकारों की कई पीढ़ियों के सतत प्रयासों के कारण कला एवं करघा परंपराएं अब तक जीवंत हैं, जिन्होंने अपने सपनों एवं विजन को उत्कृष्ट हथकरघा उत्पादों में पिरोया और अपने कौशल को अपनी पीढ़ियों तक रूपांतरित किया। विविध रंगों, आंखों को सुकुन देने वाली डिजायनें, चमचमाते रूपों और शानदार ताना बाना एवं उनकी खूबसूरत बुनावट इन कपड़ों में एक विशिष्ट आकर्षण पैदा कर देती हैं। भारत देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र से लेकर कश्मीर और दक्षिणवर्ती हिस्से तक इन कपड़ों की विशिष्टताएं एक अनूठी और मोहक आकर्षण जगाती हैं।
प्राचीन काल से ही भारतीय हथकरघा उत्पादों की पहचान उनकी दोषरहित गुणवत्ता से की जाती रही है। इनमें चंदेरी का मलमल, वाराणसी के सिल्क के बेल बूटेदार वस्त्र, राजस्थान एवं ओडिशा के बंधेज की रंगाई, मछलीपटनम के छींटदार कपड़े, हैदराबाद के हिमरूस, पंजाब के खेस, फर्रुखाबाद के प्रिंट, असम एवं मणिपुर के फेनेक तथा टोंगम तथा बॉटल डिजायन, मध्य प्रदेश की महेश्वरी साड़ियां और वडोदरा की पटोला साड़ियां शामिल हैं। कांचीपुरम एवं बनारस सिल्क, छत्तीसगढ़ एवं असम के कोसा एवं मोगा सिल्क या बंगाल की जामधानी, भागलपुर सिल्क, मध्य प्रदेश की चंदेरी, ओडिशा के टसर और इकाट जैसे इन विशिष्ट हथकरघा उत्पादों के निर्माण में शामिल कौशल देश की विशेष सांस्कृतिक पूंजी का हिस्सा हैं। हालांकि आज हल्के पश्चिमी परिधान पसंद किए जाते हैं, लेकिन अधिकांश लोग शादी विवाह एवं त्यौहारों जैसे विशेष अवसरों पर सर्वाधिक जटिल ढंग से बुने पारंपरिक परिधान पहनना नहीं भूलते।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार ने हथकरघा बुनकरों, पावरलूम तथा मिल क्षेत्रों के अतिक्रमण से इस उद्योग की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करने तथा खादी को सम्मान देने की गांधीवादी विरासत को संरक्षित करने के लिए कई सुरक्षोपाय किए हैं। उत्पादन के लिए सामग्रियों का आरक्षण अधिनियम 1985 ने किनारी वाली साड़ियों, धोती, लुंगी जैसी 22 पारंपरिक वस्त्रों को विशिष्ट हथकरघा उत्पादन से अलग कर दिया और उन्हें पावरलूम क्षेत्र के दायरे से बाहर कर दिया, लेकिन जब आठ वर्ष और पावरलूम क्षेत्र द्वारा एक लंबी मुकद्मेबाजी के बाद 1993 में यह कानून प्रभावी हुआ तो आरक्षित सूची में केवल 11 मद थे। वर्ष 1990 के दशक के उत्तरार्ध में ग्राहकों की बदलती अभिरुचियों, व्यापार प्रचलनों, चीनी क्रेप यार्न के शुल्क मुक्त आयातों जैसे कई कारकों के संमिश्रण की वजह से उत्पादन प्रभावित हुआ और बुनकर मजदूर बन गए। धीरे धीरे लोगों के रूझान में परिवर्तन आया और पारंपरिक शिल्पकारों को अपनी आजीविका बनाए रखना कठिन हो गया।
ग्रामीण भारत में हथकरघा क्षेत्र कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा रोज़गार प्रदाता क्षेत्र है और यह विभिन्न समुदायों के 4.33 मिलियन लोगों को रोज़गार उपलब्ध कराता है, जो देशभर में 2.38 मिलियन करघों से जुड़े हुए हैं। यह देश में कपड़ा उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत का योगदान देता है और निर्यात आय में भी सहायता करता है। विश्व में हाथ से बुने हुए 95 प्रतिशत कपड़े भारत के ही होते हैं। उद्योग के गौरवशाली इतिहास और वर्तमान समय में इसकी प्रासंगिकता को स्वीकार करते हुए सरकार हाथ से बुने कपड़ों और बुनकरों के पुनरुत्थान के प्रति प्रतिबद्ध है। वर्ष 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1905 में आरंभ स्वदेशी आंदोलन की याद में 7 अगस्त को राष्ट्रीय हथकरघा दिवस घोषित किया था और इस दिवस को देश के बुनकरों को समर्पित कर दिया और पांच एफ: फार्म टू फाइबर, फाइबर टू फैब्रिक, फैब्रिक टू फैशन एवं फैशन टू फॉरेन के अपने चुनावी वादे को पूरा किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग्राहकों का विश्वास जीतने के लिए सामाजिक एवं पर्यावरण अनुकूलता के अतिरिक्त कच्चा माल, प्रसंस्करण, बुनावट एवं अन्य मानदंडों के लिहाज से उत्पादों की गुणवत्ता के समर्थन के लिए उसी दिन 'भारत हथकरघा ब्रांड' भी लांच किया। आईएचबी ब्रांड ने उच्च गुणवत्तापूर्ण हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए ग्राहकों के बीच जागरूकता निर्माण करने एवं इसके लिए एक विशिष्ट पहचान बनाने में सहायता देने के लिए शीघ्र ही सोशल मीडिया पर ग्राहकों, विशेष रूपसे युवाओं के बीच अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने कपड़ा मंत्रालय का पदभार ग्रहण करने के बाद से ही सोशल मीडिया पर पिछले अगस्त से अपने 'आई वियर हैंडलूम' अभियान के साथ एक उदाहरण स्थापित किया है। सरकार ने भी हथकरघाओं को पुनरुजीवित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। सरकार ने बुनकरों की आय बढ़ाने पर विशेष बल दिया है, जिससे युवा पीढ़ी आकर्षित होकर इस पेशे से जुड़ सकती है। इन कदमों में क्लस्टरों में बुनकरों को संगठित रूप देना एवं समान सुविधा केंद्रों के निर्माण के जरिए उन्हें बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना शामिल हैं।
हथकरघा को बढ़ावा देने के लिए कपड़ा मंत्री ने अभी हाल में एक अनूठी सार्वजनिक-निजी साझीदारी के जरिए देश के अग्रणी डिलायनरों को एक साथ लाने का काम किया है। उनमें से एक दर्जन से भी अधिक डिजायनरों को उत्पाद विकास एवं बुनकरों को उनके कौशल को उन्नत बनाने हेतु उन्हें प्रशिक्षण देने के लिए हैंडलुम क्लस्टर सौंपे गए। अन्य कदमों में-ई कॉमर्स के जरिए उत्पादों को बेचने के लिए बुनकरों को प्रोत्साहित करना, बुनकरों के परिवारों के शिक्षित युवाओं को बुनकर उद्यमियों के रूप में प्रोत्साहित करना, जिन्हें प्रत्यक्ष रूपसे बाजार सूचना, उत्पाद एवं बाजार कपड़ा प्राप्त होगा, बाजार को विस्तारित करने एवं आय में बढ़ोतरी करने के लिए हथकरघा को फैशन एवं पर्यटन से जोड़ना और डिजायन विकास तथा विपणन में निजी क्षेत्र को शामिल करना है। कपड़ा मंत्रालय सभी प्रकार के कपड़ों के लिए भारत को एक वैश्विक सोर्सिंग केंद्र्र बनाने का सतत प्रयास कर रहा है, जिससे कि भारत का हथकरघा अंतर्राष्ट्रीय फैशन उद्योग में अपना विशेष योगदान दे सके।
बुनकरों की सुविधा, उत्पादकता एवं गुणवत्ता के लिहाज से हाथ से बुनाई की जाने वाली प्रौद्योगिकी को उन्नत बनाने के प्रयास जारी हैं। हाथ से बुनाई की जाने वाली विरासत की निरंतरता सुनिश्चित करने के लिए देशभर में स्थित नौ भारतीय हथकरघा प्रौद्योगिकी संस्थान अगली पीढ़ी को हथकरघा बुनाई में विशिष्ट प्रशिक्षण प्रदान कर रहे हैं। आधुनिक विश्व में ग्राहकों की बदलती मांग की पूर्ति करने के लिए भारत में हथकरघा बुनाई रोजाना विकसित हो रही है। भारी खेसमंट, पुनरावर्तित गलीचा एवं मोटे कपास में जैकक्वार्ड बुने कपड़े तथा रेशमी कपड़े आज सबसे पसंदीदा वस्त्र बन गए हैं। हाथ से बुनने वाले बुनकर कपास एवं रेशम में घरों के लिए सजावटी एवं फनिर्शिंग कपड़ों की विशाल श्रृंखला प्रस्तुत करते हैं। हाथ से बुने उत्पादों के निर्यात में 50 प्रतिशत से अधिक योगदान गृह कपड़ा उत्पादों का होता है। सेलेब्रिटी और डिजायनर लगातार दुनियाभर में भारतीय हथकरघों को फैशन स्टेटमेंट बनाए रखते हैं।
हथकरघा उत्पादन की विकेंद्रित प्रकृति और पर्यावरण पर इसका गैर-प्रदूषणकारी प्रभाव इसे भविष्य में एक पसंदीदा क्षेत्र बनाता है। एक निम्न पूंजी-उत्पादन अनुपात के साथ इस क्षेत्र की मजबूती इसके अनूठेपन, समृद्ध परंपरा, लघु उत्पादन के लचीलेपन, नवोन्मेषण के प्रति खुलेपन और आपूर्तिकर्ताओं की जरुरतों के प्रति अनुकूलता में निहित है। बहरहाल 2015 से साड़ियों ने हथकरघा में लोगों की दिलचस्पी फिर से इतनी अधिक बढ़ा दी जितनी पहले कभी नहीं थी।

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