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'राष्ट्र की आत्मा और एकता के प्रतीक हैं राम'

'श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन अस्मिता की अभिव्यक्ति'

'भारतीय संविधान की प्रथम प्रति पर भी हैं श्रीराम'

Tuesday 14 March 2017 06:40:47 AM

विनायकराव देशपांडे

विनायकराव देशपांडे

shri ram in ayodhya

श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन हिंदू मुस्लिम संघर्ष नहीं और मंदिर-मस्जिद विवाद भी नहीं, बल्कि यह राष्ट्रीयता बनाम अराष्ट्रीय का संघर्ष है। राष्ट्र माने केवल भू-भाग या जमीन का टुकड़ा नहीं, वरन उस जमीन पर बसने वाले मानव समाज में विद्यमान एकत्वशील जनजीवन है। इसमें देश के इतिहास, परम्परा, संस्कृति के प्रति तथ्यात्मक आस्‍था, नैतिकता, विश्वास के निर्माण से स्‍थापित राष्ट्र। राम इस देश का गौरवशाली इतिहास ही नहीं हैं बल्कि एक संस्कृति और मर्यादा के सर्वोच्च मानदंड के जीवंत प्रतीक हैं, एक जीता जागता आदर्श हैं। इस राष्ट्र की हजारों वर्ष की सनातन परम्परा के लोकनायक और मूलपुरुष हैं। हिंदुस्थान का हर व्यक्ति, चाहे पुरुष हो, महिला हो, किसी प्रांत या भाषा का हो उसे राम से, रामकथा से जो लगाव है, उसकी जितनी जानकारी है, जितनी श्रद्धा है, वह अनुकरणीय है, जो और किसी में भी नहीं दिखती है। भगवान राम राष्ट्रीय एकता के प्रतीक हैं, वे राष्ट्र की आत्मा हैं।
संविधान निर्माताओं ने भी संविधान की प्रथम प्रति में लंका विजय के बाद पुष्पक विमान में बैठकर आने वाले श्रीराम, माता जानकी और वीरवर लक्ष्मण का चित्र दिया है। संविधान सभा में तो सभी मत-मतांतरों के लोग थे। सभी की सहमति से ही वह चित्र छपा है। उस प्रथम प्रति में गीतोपदेश करते भगवान श्रीकृष्ण, भगवान बुद्ध, भगवान महावीर आदि श्रेष्ठ आदर्श एवं महानतम पुरूषों के चित्र हैं। ये हमारे राष्ट्रीय महापुरुष हैं, अत: ऐसे भगवान राम के जन्मस्थान की रक्षा करना हमारा संवैधानिक दायित्व भी है। समाजवादी विचारधारा के सुप्रसिद्ध नायक डॉ राममनोहर लोहिया को हम सब जानते हैं। उन्होंने भी कहा है कि राम-कृष्ण-शिव हमारे आदर्श हैं, राम ने उत्तर-दक्षिण जोड़ा और कृष्ण ने पूर्व-पश्चिम जोड़ा। सारी जनता इसी दृष्टि से अपने जीवन के आदर्श राम-कृष्ण-शिव में देखती है और उनका अनुसरण करती है। राम मर्यादित जीवन का परमोत्कर्ष हैं, कृष्ण उन्मुक्त जीवन की सिद्धि हैं और शिव असीमित व्यक्तित्व की संपूर्णता हैं। हे भारत माता! हमें शिव की बुद्धि दो, कृष्ण का हृदय दो और राम की कर्मशक्ति, एकवचनता दो। ऐसे राष्ट्रीय महापुरूष के जन्मस्थान की रक्षा करना हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है, देश की एकता और अखंडता के लिए करणीय कार्य है।
श्रीराम जन्मभूमि राष्ट्रीय अस्मिता एवं स्वाभिमान का विषय है और अपमान का परिमार्जन करना ही पुरुषार्थ है। इसीके लिए यह आंदोलन है। स्वाभिमान जागरण से ही देश खड़ा होता है और सारी समस्याओं का हल करने की सामर्थ्य बढ़ाता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद ऐसा प्रयत्न अपवाद स्वरूप में हुआ। गुजरात के विश्वप्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का पुर्ननिर्माण हुआ। यह मंदिर 1026 से इक्कीस बार तोड़ा गया, परंतु बार-बार उसका निर्माण होता रहा। औरंगज़ेब के आदेश से सन् 1706 में यह मंदिर तोड़ा गया और वहां मस्जिद निर्माण की गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गुलामी के चिन्ह हटाने और स्वाभिमान जागरण के लिए देश के लौहपुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प लिया। महात्मा गांधी ने उसका समर्थन किया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के मंत्रिमंडल ने, जिसमें मौलाना अबुल कलाम आजाद भी एक मंत्री थे, सोमनाथ मंदिर के फिर से निर्माण की अनुमति दी और संसद ने इसके लिए प्रस्ताव पारित किया।
डॉ राजेंद्र प्रसाद उस समय देश के प्रथम राष्ट्रपति थे। उनके करकमलों से 11 मई 1951 को सोमनाथ में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा हुई। उनके वहां जाने का कुछ सेक्युलरिस्टों ने विरोध किया था, परंतु उन्होंने उसे नहीं माना। यह देश की अस्मिता और आस्‍था का विषय है, ऐसी डॉ राजेंद्र प्रसाद की भावना थी। उस समय उन्होंने कहा था कि सोमनाथ भारतीयों का श्रद्धा का स्थान है, श्रद्धा के प्रतीक का किसी ने विध्वंस किया तो भी श्रद्धा का स्फूर्तिस्रोत नष्ट नहीं हो सकता, इस मंदिर के पुर्ननिर्माण का हमारा सपना साकार हुआ, उसका आनंद अवर्णनीय है। इस कार्यक्रम में भगवान सोमनाथ को 121 तोपों से सलामी दी गई थी। दिल्ली के बिरला हाउस में महात्मा गांधी का 25 दिसम्बर 1947 को दिया गया प्रवचन बड़े ही महत्व का है। एक उर्दू समाचार पत्र में लेख आया था कि अगर सोमनाथ होगा तो फिर से गजनी आएगा। उस पर महात्मा गांधी बोले थे कि मोहम्मद गजनी ने जंगली और हीन काम किया, उसपर यहां के मुसलमान गर्व का अनुभव करते हैं तो यह दुर्भाग्य का विषय है। इस्लामी राज में जो बुराइयां हुईं, उन्हें मुसलमानों को समझना और कबूल करना चाहिए। अगर यहां के मुसलमान फिर से गजनी की भाषा बोलेंगे तो इसे यहां कोई बर्दाश्त नहीं करेगा।
सोमनाथ मंदिर के संबंध में जो भावना महात्मा गांधी, सरदार पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद आदि महानुभावों ने व्यक्त की थी, वही भावना श्रीराम जन्मभूमि के संबंध में हमारी भी है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सन् 1947 में देश के चौराहों, बगीचों में लगी विक्टोरिया रानी और जार्ज पंचम की मूर्तियां हटाई गईं। सड़कों के नाम बदले गए, दिल्ली का इर्विन अस्पताल जयप्रकाश नारायण अस्पताल बना, मिंटो ब्रिज को शिवाजी ब्रिज कहा जाने लगा। मुंबई में विंसेट रोड डॉ बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर रोड हो गया और विक्टोरिया टर्मिनल रेलवे स्टेशन का नाम छत्रपति शिवाजी टर्मिनल हो गया। ये पुराने नाम गुलामी के चिन्ह थे, इसीलिए हटाए गए। बाबरी ढांचा गुलामी का चिन्ह था, राम जन्मभूमि मंदिर यह स्वतंत्रता का चिन्ह है। गौरतलब है कि आधा यूरोप अनेक साल इस्लामी वर्चस्व में रहा। उस समय इस्लामी आक्रांताओं ने अनेक चर्च गिराकर, वहां मस्जिदें बनाई गईं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इन ईसाई यूरोपियन देशों ने ऐसी मस्जिदें ध्वस्त करके वहां फिर से चर्च बनाए। यह अपमान का परिमार्जन था। सन् 1815 में पोलैंड रूस ने जीता। जीतने के बाद रूस ने पोलैंड की राजधानी वारसा में एक बड़े चौराहे पर एक चर्च का निर्माण किया गया। प्रथम महायुद्ध की समाप्ति के समय 1918 में पोलैंड स्वतंत्र हुआ। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पोलैंड की सरकार ने रूस निर्मित चर्च गिराया और उसी जगह दूसरे चर्च का निर्माण किया। रूस और पोलैंड दोनों ईसाई देश हैं, तो भी रूसी चर्च क्यों गिराया गया? स्वाभिमानी पोलैंड की सरकार का उत्तर था-रूसी चर्च गुलामी का चिन्ह था, इसीलिए वह गिराया गया और अब यह नया चर्च हमारी स्वतंत्रता का प्रतीक है, इसको कहते हैं-राष्ट्रीय स्वाभिमान। इसी भावना से अयोध्या, मथुरा, काशी के धर्मस्थान मुक्त होने चाहिएं।
छत्रपति शिवाजी महाराज का सपनाः हम सब जानते हैं कि 1669 में औरंगज़ेब ने काशी विश्वनाथ का मंदिर तोड़ा और वहां ज्ञानवापी मस्जिद बनाई। यह समाचार मिलते ही शिवाजी ने औरंगज़ेब को चेतावनी देने वाला और काशी विश्वनाथ सहित अन्य धर्मस्थान मुक्त करने का संकल्प व्यक्त करने वाला पत्र लिखा था। छत्रपति शिवाजी अपने मराठा सरदारों और मंत्रियों के साथ धर्मस्थान मुक्ति की चर्चा करते थे। स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज ने अनेक मंदिरों का पुर्ननिर्माण कराया था। वे जब दक्षिण भारत गए थे तो उन्होंने आज के तमिलनाडु राज्य में दो मंदिरों का पुर्ननिर्माण कराया। कुछ वर्ष पहले दोनों मंदिर गिराकर मुसलमानों ने वहां मस्जिदें बनाई थीं। मस्जिदें गिराकर फिर से मंदिर का निर्माण किया गया। सभी मराठा सरदार, पेशवा इस संकल्पपूर्ति के लिए सतत प्रयत्न करते थे। सुप्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग र्त्यम्बकेश्वर, तीर्थक्षेत्र नासिक में सुंदर नारायण मंदिर, उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर जैसे अनेक मंदिरों को मुगल राज ने ध्वंस किया था। मराठों ने इन मंदिरों का बाद में पुर्ननिर्माण किया था। जब मराठों के विजयी घोड़े उत्तर भारत में दौड़ने लगे तो धर्मस्थान मुक्ति का प्रयत्न प्रारंभ हुआ। सन् 1751 से 1759 में अवध के नवाब की अयोध्या, प्रयाग, काशी की मुक्ति की शर्त लगाकर ही मदद की गई थी। मराठों का उनपर लगातार दबाव रहा, किंतु दुर्भाग्य से सन् 1761 में पानीपत की लड़ाई में हुई हार के कारण काशी, अयोध्या उस समय मुक्त नहीं हो सके।
हमारा और बाबर का क्या संबंध है? वो एक विदेशी, विधर्मी हमलावर था। बाबर मध्य एशिया का था। उसने पहले अफगानिस्तान जीता, बाद में भारत आया। बाबर की कब्र अफगानिस्तान में है। भारत का एक प्रतिनिधिमंडल सन् 1969 में अफगानिस्तान गया था। उसमें समीक्षक, विचारक और अफगानिस्तान नीति के विशेषज्ञ पत्रकार डॉ वेदप्रताप वैदिक भी थे। वे बाबर की कब्र देखने गए। वह कब्र जीर्ण-क्षीर्ण अवस्था में है। उन्होंने एक अफगानी नेता से पूछा कि बाबर की कब्र की ऐसी दुरावस्‍था क्यों है? अफगान नेता का पलट कर सवाल था कि बाबर का हमारा क्या संबंध? बाबर एक विदेशी हमलावर था, उसने हमारे ऊपर आक्रमण किया था, हमें गुलाम बनाया था, वह मुसलमान था, इसीलिए हमने यह कब्र बस गिराई नहीं, परंतु जिस दिन गिरेगी, उस समय हरेक अफगानी को आनंद होगा। बाबर हमारा शत्रु था, यह बोलने वाले बबरक करमाल 1981 में अफगानिस्तान के प्रधानमंत्री बने। बाबर के बारे में उनकी भावना भारत के मुसलमानों को ध्यान में लेनी चाहिए। इंडोनेशिया की 90 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है। वह घोषित मुस्लिम देश है, परंतु उनके सर्वश्रेष्ठ आदर्श आज भी राम और हनुमान हैं। वहां के प्राथमिक विद्यालयों में रामायण का अध्ययन अनिवार्य है। सवाल है कि यह भारत में क्यों नहीं? इंडोनेशिया 700 वर्ष पहले हिंदू-बौद्ध था, लेकिन उसने अपनी परंपराएं नहीं छोड़ी हैं।
ईरान मुस्लिम देश है, परंतु वे रूस्तम, सोहराब को अपना राष्ट्रीय पुरूष मानते हैं। रूस्तक और सोहराब तीन हजार साल पहले हुए हैं और वे मुस्लिम नहीं, बल्कि पारसी थे। मिस्र देश में पिरामिड राष्ट्रीय प्रतीक है। पिरामिड साढ़े तीन हजार वर्ष पूर्व के हैं और उस समय इस्लाम था ही नहीं। भगवान राम हजारों वर्ष पूर्व हुए, उस समय इस्लाम था ही नहीं। भारत के मुसलमान भी 200-400-800 साल पहले हिंदू ही थे तो भारत के मुस्लिम राम को अपना पूर्वज और उन्हें भारत का राष्ट्रीय महापुरूष क्यों नहीं मानते? ईरान और मिस्र के मुसलमानों जैसा आदर्श यहां के मुसलमान रखेंगे तो सारी समस्या का हल हो जाएगा। भारत का उत्थान हो जाएगा। राष्ट्रीय एकता आएगी।
भगवान श्रीराम भारत की पहचान हैं, राष्ट्रीयता के प्रतीक हैं। बाबर विदेशी हमलावर, हमारा शत्रु था। बाबर के संबंध में हमारे सिख धर्म के प्रवर्तक गुरू नानकदेवजी ने कहा है कि बाबर का राज माने पाप की बारात। उस बाबर ने मंदिर तोड़ा। भारत के मुसलमानों का उस बाबरी ढांचे के लिए चिल्लाना अराष्ट्रीयता है। हम राम के भक्त हैं या बाबर के वारिस यह प्रश्न सबको पूछना चाहिए? राम मंदिर निर्माण यह राष्ट्रीयता का विषय है, इसलिए उस पर समझौता नहीं हो सकता, रामजन्म भूमि अयोध्या में उस स्‍थान पर राम मंदिर का निर्माण होना ही चाहिए। (लेखक विनायकराव देशपांडे श्रीराम जन्मभूमि मंदिर-निर्माण आंदोलन से सक्रिय रूपेण जुड़े लेखक और विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय संयुक्त महामंत्री हैं)।

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