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मुरादाबाद में मायावती से गुस्साए लोग

जाट आंदोलन में राजनीति करने का उल्टा असर

सुनीता गौतम

जाट आंदोलन-Jat andolan

अमरोहा-मुरादाबाद। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती लखनऊ में निहत्थे और शांतिपूर्ण तरीके से राजभवन की ओर जाते भाजपा के नेताओं और कार्यकर्ताओं पर अनायास ही पुलिस से बर्बर लाठीचार्ज और उन पर पानी की तेज बौछार कराती हैं ताकि मुसलमान वोटर खुश हों कि देखिए! मायावती ने लखनऊ में किस तरह से भाजपाईयों की धुनाई कराई है और मायावती का यह दूसरा चेहरा भी देखिए! वे आरक्षण की मांग पर, 12-13 दिन से महिलाओं को ढाल बनाकर, अमरोहा के काफूरपुर रेलवे ट्रैक पर बैठे जाटों के आंदोलन का हर तरह से समर्थन करती हैं ताकि जाटों के वोट मिलें और केंद्र सरकार के भी दिमाग ठीक किए जाएं भले ही करोड़ों रूपए के रेल राजस्व का नुकसान हो, रेल पटरियां उखाड़कर फेंक दी जाएं और रेल यात्रियों को कितनी ही परेशानियां और रोजी-रोटी का नुकसान हो।

सर्वजन के नाम पर जातीय नफरत फैलाकर हर जगह नोट और वोट इकट्ठे करती घूम रहीं मुख्यमंत्री मायावती को यह मालूम होना चाहिए कि वह समय अत्यंत करीब है जब उन्हें उसी तरह सत्ता से उखाड़कर फेंक दिया जाएगा, जिस तरह मुलायम सिंह यादव को राज्य की जनता ने सत्ता से उतारा था। मायावती का हेलीकॉप्टर उड़ाने वाले और राज्य के केबिनेट सचिव शशांक शेखर सिंह, जाट हैं और मुरादाबाद में यह बात इस तरह से हर आदमी की जुबान पर है कि वे मायावती की नज़र में बने रहने के लिए जाटों को भड़का रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि कुछ जाट नेता खरीदे गए हैं और कुछ को राजनीतिक लालच देकर रेलवे ट्रैक पर बैठा दिया गया है ताकि केंद्र सरकार को दबाव में लिया जा सके। यह रेलवे ट्रैक ज्योतिबाफुले नगर जिला क्षेत्र में आता है और इस जिले के जिलाधिकारी अनिल कुमार और पुलिस अधीक्षक उदय प्रताप सिंह लाखों लोगों की परेशानियों और सरकारी संपत्ति के नुकसान से जानबूझकर बेपरवाह और आराम फरमा हैं और जाट नेताओं के संदेशों का लखनऊ में आदान-प्रदान करा रहे हैं।

जाटों के इस आंदोलन के परिणामस्वरूप अब तक करीब चार सौ करोड़ रूपये का रेलवे को नुकसान हो चुका है, रेल यात्रियों को भारी परेशानियां और उनकी बिजनेस या घरेलू यात्राओं पर जो बुरा असर पड़ा है, वह अलग है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को इस बात की रत्तीभर भी चिंता नहीं है कि कानून व्यवस्था को मुरादाबाद में बंधक बनाया गया है जोकि गंभीर अपराध है और जिसमें मायावती और उनकी शह पर जिला प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों की संलिप्ता भी अपराध की ही श्रेणी में आती है। यह पूछा जा रहा है कि बसपा अध्यक्ष मायावती ने जाट आंदोलन का समर्थन किया है या मुख्यमंत्री मायावती ने? मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री हैं और यह उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि वे अपने राज्य में जनसामान्य की दिनचर्या में असंवैधानिक रूप से व्यवधान उत्पन्न करने वालों, केंद्र सरकार या राज्य सरकार के अधिकारियों, कर्मचारियों से असहयोग करने वालों और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ तत्काल एवं कठोर कार्रवाई करें और जरूरी हो तो बल प्रयोग भी करें।

मायावती सरकार ने ऐसा न करके, अपने संवैधानिक दायित्व को न निभाकर बल्कि एक भीड़ को कुछ भी करने का समर्थन देकर उसे केंद्र सरकार के खिलाफ उकसाया है। आंदोलनकारियों को एक प्रकार से यह मायावती सरकार का अवैध समर्थन है जिसने रेलवे ट्रैक को खाली कराने के लिए कोई कदम उठाया है और न ही इस मामले में केंद्र सरकार की कोई मदद की है। मायावती और उनके अधिकारी चुप्पी मारे बैठे तमाशा देख रहे हैं जिससे जनसामान्य और कानून व्यवस्था की हालत बहुत खराब हो चुकी है। ज्योतिबाफुले नगर के जिलाधिकारी/जिला मजिस्ट्रेट अनिल कुमार और पुलिस अधीक्षक उदय प्रताप सिंह ही मुख्यरूप से जिले की कानून व्यवस्था के प्रमुख हैं जो अपनी जिम्मेदारी के निर्वहन से पूरी तरह विमुख दिखाई देते हैं और कदाचित राजनीतिक दिशा निर्देशों पर ही काम कर रहे हैं, वे इससे उत्पन्न कठिनाईयों के बारे में भी कोई जवाब नहीं दे रहे हैं।

मुरादाबाद और आस-पास की जनता भी अब इस कथित आंदोलन और मायावती के खिलाफ खड़ी हो रही है। यह समझा जा चुका है कि इस मामले में मिली भगत और योजना के तहत ही रेल ट्रैक जाम किया गया है, जिसके पीछे राजनीतिक लुका-छिपी है और रेल विभाग अब उत्तर प्रदेश सरकार के असहयोग के परिणामस्वरूप कड़ा कदम उठाने जा रहा है। रेलवे प्रशासन के सामने इस मामले से निपटने के कई विकल्प हैं जिनमें एक विकल्प कोर्ट भी है और इस मामले को लेकर रेलवे के कोर्ट जाने पर मायावती सरकार को एक बड़े संवैधानिक संकट का सामना करना पड़ सकता है। मायावती और उनके हुक्मरान इस मामले को बहुत हल्का लेकर चल रहे हैं, जैसाकि जिलाधिकारी ज्योतिबाफुले नगर का कहना है कि इस मामले में मंडल रेल प्रबंधक को पत्र लिखा गया है और वहां के एसपी का कहना है कि हम इस समय समाजवादी पार्टी के आंदोलन में व्यस्त हैं। इन दोनों अधिकारियों ने इस गंभीर मामले पर अपने प्रयासों के संबंध में कुछ नहीं बोला और फोन काट दिया।

आज नहीं तो कल मुरादाबाद में रेलवे ट्रैक खाली कराया ही जाएगा, लेकिन यह एक ऐसा गंभीर मामला बन चुका है जिसमें मुख्यमंत्री मायावती सहित वहां के जिलाधिकारी अनिल कुमार और पुलिस अधीक्षक उदय प्रताप सिंह को यह स्पष्ट करना ही होगा कि जिला प्रशासन का प्रमुख होने के नाते अपने क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारी निभाने में क्यों विफल रहे हैं? वे वहां किसके लिए काम कर रहे हैं जनता के लिए या सत्ता के दलालों के लिए? क्योंकि रेल संपत्ति को नुकसान पहुंचाने, जबरिया ट्रैक को ठप करने और यात्रियों को भारी परेशानी को लेकर ज्योतिबा फुले नगर के जिलाधिकारी अनिल कुमार और एसपी उदय प्रताप सिंह ने मंडल रेल प्रबंधक के पत्र पर न तो कोई कार्रवाई की है और ना ही वह इस मामले में कोई सहयोग कर रहे हैं।

अब आइए देखते हैं कि रेल यात्रियों और रेल से होने वाले व्यापार की हानि की क्या स्थिति है। होली का त्योहार है, लोगों को अपने घरों पर जाने का कार्यक्रम बनाकर उसे रद्द करना पड़ा है अपने घर जाने वाले इस तरह के हजारों परिवार हैं। इस कारण यात्रा रद्द की बदनामी का ठींकरा मायावती के सर ही फूट रहा है। केंद्र सरकार को झटका देने के चक्कर में मायावती ने जो किया है सो किया है, ज्योतिबाफुले नगर के जिला प्रशासन (डीएम अनिल कुमार-एसपी उदय प्रताप सिंह) ने अपने दायित्वों को छोड़कर और किसी राजनीतिक इशारे पर कार्य करते हुए भारत सरकार की दृष्टि में अपनी सत्यनिष्ठा संदिग्ध बनाने का काम किया है। मुरादाबाद, अमरोहा, रामपुर में कारोबार ठप्प है। अकेले पीतल नगरी मुरादाबाद से निर्यात के कंटेनर बड़ी संख्या में फंसे हुए हैं और निर्यातक अपने भारी नुकसान से परेशान हैं।

इस आंदोलन के कारण कम से कम 30 ट्रेनें रद्द हैं और इतनी ही ट्रेनें मार्ग बदलकर चलानी पड़ रही हैं। मुरादाबाद मंडल में रेल व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त है और जानकारी के अनुसार अब तक 340 ट्रेनें रद्द की जा चुकी हैं। रेल अधिकारियों ने जेपी नगर के जिलाधिकारी और एसपी को पत्र लिखकर कहा है कि आंदोलनकारी रेल ट्रैक को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए मगर इसका कोई भी उत्तर नहीं है। आंदोलन से परेशान लोग, जाट आंदोलन के खिलाफ आवाज उठाने लगे हैं। कुछ लोगों ने यहां कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन करके जाट आंदोलन का विरोध किया है। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि जाट सबसे बड़े भूमिधर हैं और संपंन हैं इसलिए उनके लिए कैसा आरक्षण? उनका कहना है कि आरक्षण व्यवस्था तो निम्न और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए है किंतु साधन संपंन जाट केंद्र सरकार पर अनैतिक दबाव बनाकर, अराजकता फैलाकर आरक्षण लेना चाहते हैं? इस आंदोलन के विरोधियों ने मायावती सरकार को भी आड़ हाथों लिया है जिन्होंने अपने निहित स्वार्थो के कारण बड़ी संख्या में जनता और व्यवसाय को परेशानी में डाल रखा है, जिसे सहन नहीं किया जा सकता।

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