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राजशाही बहाली का प्रयास?
काठमांडू।
क्या आप मान सकते हैं कि पूर्व राजशाही के राजा ज्ञानेंद्र
नेपाल में राजशाही की वापसी का प्रयास कर रहे हैं या फिर से इस
राज परिवार का शासन आ जाएगा। राजशाही के रूप में तो अब कदापी
नहीं अगर लोकतंत्र के रास्ते से महाराज ज्ञानेंद्र सत्ता में
आने की सोच रहे हों तो अलग बात है। नेपाल के बारे में आ रही
विभिन्न खबरों के बीच ऐसी भी बातें हैं, जिन्हें केवल एक
शगूफे के तौर पर उछाल दिया जाता है और वे खबर का रूप धारण करने
लगती हैं।
ऐसा काम यहां के कुछ अफवाह बाज ही नहीं करते हैं बल्कि
स्वयं नेपाल के वित्त मंत्री बाबूराम भट्टाराई ने भी कहा हैं
कि पूर्व नरेश ज्ञानेन्द्र शाह की भारत यात्रा का उद्देश्य
अपने पोते ह्रदयेन्द्र को राज सिंहासन पर बैठाने का मार्ग
प्रशस्त करना है। डा.भट्टाराई यह भी कहते हैं कि पूर्व नरेश,
नेपाल में राजशाही बहाल कराने का प्रयास कर रहे हैं।
ज्ञानेन्द्र अपने पोते ह्रदयेन्द्र को सिंहासन पर बैठाने में
भारतीय प्रधानमंत्री और अन्य नेताओं का समर्थन हासिल करने के
लिए भारत गए हैं।
उल्लेखनीय
है कि पूर्व नरेश अपने एक रिश्तेदार के विवाह समारोह में
भाग लेने के लिए भारत गए थे और उनका कुछ भारतीय नेताओं से
मिलने का भी कार्यक्रम था, जिसे यहां के माओवादी नेता फिर से
राजशाही की वापसी के प्रयास के रूप में देख रहे हैं। दरअसल
माओवादी नेपाल में भारत विरोधी अभियान चला रहे हैं जिसका
प्रमुख कारण उनकी चीन से बढ़ती निकटता है। इस वजह से यहां भारत
विरोधी गतिविधियां लगातार जारी रहती हैं। इस स्थिति में दोनों
देशों के बीच विश्वास का भारी अभाव है। माओवादियों को नेपाल
के राज परिवार की भारत से निकटता हमेशा शक के दायरे में दिखाई
दिया करती है।
जब से नेपाल में माओवादियों की सरकार आई है तब से अब तक
नेपाल की अर्थव्यवस्था को काफी नुकसान हो चुका है। राजतंत्र
को हटाकर गणतंत्र के लिए जो कल्पनाएं की गई थीं माओवादियों ने
उन्हें तानाशाही का एक रूप दे दिया है। उनके एजेंडे
भ्रष्टाचार में डूबे हैं और वह यहां की अर्थव्यवस्था को
नहीं संभाल पा रहे हैं। इस कारण चीन ने यहां के अधिकांश
माओवादी नेताओं को जैसे वेतन पर रखा हुआ है और वह सरकार में
बैठकर चीन की भाषा बोलते हैं। माओवादियों के इन प्रयासों को
गठबंधन के सहयोगी कमजोर करने की कोशिश तो करते हैं लेकिन चूंकि
नेपाल की जनता ने माओवादियों को जनादेश दिया हुआ है इसलिए इनका
विरोध करते समय यह भी देखा जाता है कि कहीं माओवादी सहानुभूति
न
बटोर लें। नेपाल में माओवादियों की करतूतों से आम जन जीवन कोई
खुशहाल या प्रसन्न नहीं है।

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