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ग्वालियर मे
अनोखा जैन तीर्थ
ग्वालियर।
मध्यप्रदेश
के हृदय स्थल ग्वालियर में तोमरवंशी राजाओं ने ईसवीं सन् १३९४
से १५७२ तक राज्य किया। ग्वालियर का किला न सिर्फ स्थापत्य कला
के कारण बल्कि इसके दक्षिण पश्चिमी द्वार की ओर गुजराती
घुमावदार ढलान के किनारे स्थापित जैन प्रतिमाओं के कारण अत्यंत
भव्य और नयनाभिराम है। इसके चारों ओर से एक शिला को काटकर
तराशी गई जैन तीर्थकरों की वे विशाल प्रतिमाएं हैं, जिनके
चेहरों पर अखण्ड क्रांति और निर्मल पवित्रता छाई हुई है। ये
कालजयी प्रतिमाएं उन तीर्थकरों की चौबीसी के रूप में स्थापित
हैं जिन्होने सांसासिक माया-मोह का परित्याग कर केवल्य पद
प्राप्त कर लिया है। जैनवाद जिन अर्थात् इंद्रिय विजयी वीरों
महावीरों का पथ है। तोमरवंशी राजाओं के प्रयासों से इन
आध्यात्मिक विजेताओं के एक लघु संसार की रचना इस उत्तुंग पाषाण
के हृदय में हुई। शिलाओं में उकेरी गई तमाम भव्य प्रतिमाओं में
पद्मासन में विराजमान एक प्रतिमा तो इतनी ऊंची है कि इसकी
भाव-भंगिमा पढ़ने के लिये क्रेन का सहारा लेना पडता है।
इन मूर्तियों से ऐसा तेज झलकता है, ऐसी दिव्य चमक
दिखलाई पड़ती है कि यह सम्यक् दर्शन मनुष्य मात्र को आम जिंदगी
के तनावों आंतरिक संघर्षों और सांसारिक संतापों के कुछेक
क्षणों के लिए मुक्ति दिला देता है यहां बहुत दूर-दूर से लोग
आकर आत्मीक शांति का अनुभव करते है और भगवान मे लीन हो जाते है
यहां अभी भी नई अद्भुत प्रतिमाओं की खोज दिन-प्रतिदिन की जा
रही है जैन समाज प्राचीन काल से चला आ रहा है अतीत के
शिल्पियों द्वारा पाषाण प्रतिमाओं में जीवन का सार तत्व उकेर
कर रख दिया गया है।
मगर इन तेजस्वी शिला प्रतिमाओं ने गर्दिश भरे दिन भी
देखे हैं। समय की निष्ठुरता और अत्याचारों को झेलती इन
सुंदर-संजीवन प्रतिमाओं में से आतताइयों के खडग से किसी ने
अपने नाक खोई, किसी ने आंख और कान। किसी-किसी का सिर ही कलम कर
दिया गया और किसी के हाथ पैर और सीना। मूर्तियां उस
दुर्भाग्यपूर्ण घटनाक्रम की साक्षी हैं, जब बाबर इस किले के
दोरे पर आया। उसका क्रोध और तिरस्कार इन बेजान संदरसजीली पाषाण
प्रतिमाओं को झेलना पड़ा। तीर्थकरों के दिगम्बरत्व से उसकी
भौतिकवादी मानसिकता हिल गई। उसके चेहरों को अंग-भंग कराकर अपनी
घृणा का बेलौस परिचय दे डाला। वही मानमंदिर महल देखकर वह
प्रसन्न हो उठा।
बहरहाल उपलब्ध मूर्तिशिल्पों के दर्शन और अध्ययन से पता
चलता है कि साधना उस सेना सरीखी है जिसने अपने शत्रु यानी कर्म
पर विजय प्राप्त कर ली है इसके बाद जीवधारी को अपनी देह छोड़नी
होगी। चौथी से आठवीं शताब्दी के मध्य मे ही दक्षिण के मंदिरों
में शिलाएं काटकर प्रतिमाओं के निर्माण का प्रचलन शुरू हुआ था।
वहां भी किलों के इर्द-गिर्द की पहाडि़यों, ढलानों और गुफाओं
में तीर्थकरों की भव्य प्रतिमाओं का निर्माण कराया गया था।
जहां तक ग्वालियर किले में स्थित प्रतिमाओं के मार्फत
जैन कलाओं के समग्र इतिहास से रूबरू होने का सवाल है तो हमें
ढलान की तरफ पड़ने वाले चार हिस्सों में जाना होगा।
दक्षिणी-पश्चिमी तरफ के हिस्से में उरवाई गेट से ऐसे गुफा
मंदिरों में प्रवेश पाया जा सकता है, जहां सर्वाधिक ऊँची (५७
फीट ऊंची) जैन प्रतिमा स्थित है ग्वालियर किले में स्थापित
समस्त प्रतिमाओं में यह सर्वाधिक ऊंची है। किले के प्रसिद्ध
तालाबों में से खंबा ताल नाम से प्रतिद्ध तालाब के निचली तरफ
इन गुफाओं को खड़ी चट्टान पर बनाया गया है और ग्वालियर पहाड़ी
की समूची जैन गाथाओं में सर्वाधिक प्राचीन प्रतिमाओं में इनकी
गणना होती है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने हाल ही में उन
हिस्सों को सील बंद कर दिया है। यहां ये अमूल्य शिल्पकार मौजूद
है।
पहाड़ी के पूर्वोत्तर भाग में किले का ग्वालियर गेट दो
अत्यंत महत्वपूर्ण स्थलों की तरफ खुलता है। ये हैं - गुजरी महल
जिसे राजामान सिंह ने अपनी गूजर पत्नी के निमित्त बनवाया था
तथा एक अन्य स्थल भगवान नेमिनाथ का गुफा समूह - नेमिनाथ
जैनियों के २२ वें तीर्थंकर हुये। इसके सामने घोघां गेट में
प्रवेश करने पर पांच अन्य गुफायें मिलती हैं। ये सभी जैन
मूर्तियों से भरी है।
तीर्थंकरों की मूर्तियों की अन्य विशेषता यह है कि
प्रत्येक पूर्ति में पहचान और दिव्यता का एक खास चिन्ह होता
है। यही चिन्ह यह दर्शाता है कि यह अमुक तीर्थंकर की मूर्ति
है। इन गुफाओं में तीर्थकरों के अतिरिक्त और भी जिन साधुओं की
प्रतिमाएं हैं, इनमें पहचान और दिव्यता के चिन्ह नदारद हैं। ये
मूर्तियां पृष्ठभूमि में स्थापित हैं। इनमें से अधिकांश तो
राजाओं, सामान्यजन और स्थानीय रक्षकों की भी मूर्तियां हैं। इन
मूर्तियों की विशेषता यही है कि इन्होने जैन मूर्तियों को
मोक्ष और दिव्यता प्रदान करने में अपूर्व योगदान दिया था।
क्षेत्रीय पुरातात्विक खोजों से यह भी पता चला है कि एक
ओर जहां बौद्ध संप्रदाय राजमार्गों से होते हुये पठारी
क्षेत्रों में पहुंचा, वहीं जैन मतावलम्बी मौन व्रत धारण किये
हुये आज्ञात वनो और गिरी -कंदराओं में साधना हेतु विचर गये।
राजाओं ने यु़द्ध लड़कर देशों को जीता और जैन साधुओं ने
अध्यात्म का बिगुल फूंककर जन सामान्य के हृदय -स्थल को।
इतिहास में कई ऐसे मोड़ आये जब मूर्तियों का विध्वंस हुआ तो
पुनर्निर्माण भी। किले की दीवारों पर उकेरी गई जैन प्रतिमाओ
मंदिरों की निगहबानी कर रही हों। ये पुरातात्विक संपदा,
कल्पना, ज्ञान और वैविध्य की पराकाष्ठा है। इनमें से अधिकांश
किले में उन उद्धरणों या उद्गारों को जीवंत किये हुए हैं जिनसे
पता चलता है कि जैन होने का मतलब क्या है? धर्म केवल पंथ या
संप्रदाय अथवा जातीय संगठन नहीं, मानव का मोक्ष द्वार भी है।
ये तमाम मंदिर ४५० वर्षो के भीतर ही बने हैं। इन जैन
कलाकृतियों ने ग्वालियर किले को जैन तीर्थो के रूप में पहचान
दिलाई है।
किले
के उत्तर पश्चिम में गोपाचल पर्वत है इसे विश्व जैन तीर्थ के
रूप में संरक्षित किया जा चुका है।
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